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कलचुरि वंश (त्रिपुरी)

कलचुरि वंश (त्रिपुरी)

कलचुरि वंश (त्रिपुरी) – भारत के समान्य ज्ञान की इस पोस्ट में हम कलचुरि वंश (त्रिपुरी) की स्थापना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और नोट्स प्राप्त करेंगे ये पोस्ट आगामी Exam REET, RAS, NET, RPSC, SSC, india gk के दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है

कलचुरि वंश (त्रिपुरी)

चन्देल राज्य के दक्षिण में चेदि के कलचुरियों का राज्य था। उनकी राजधानी त्रिपुरी थी।कलचुरि अपने को कीर्तिवीर्य अर्जुन का वशंज मानते हैं। यह डाहल (जबलपुर) क्षेत्र में था। त्रिपुरी वर्तमान जबलपुर का तेवर गाँव है। कलचुरि वंश को चेदि या हैहय वंश के नाम से भी पुकारा जाता है।

कलचुरि वंश का प्रथम शासक कोक्कल प्रथम था जो 845 ई. में गद्दी पर बैठा।

दसवीं शताब्दी के मध्य युवराज प्रथम महत्त्वपूर्ण राजा हुआ।

इसके शासनकाल में राजशेखर कन्नौज छोड़कर त्रिपुरी आ गया तथा यही पर उसने ‘काव्य मीमांसा’ व ‘विद्धसालभंजिका’ नामक दो ग्रन्थों की रचना की।

भेड़घाट (जबलपुर) का प्रसिद्ध चौसठ योगिनी मन्दिर का निर्माण युवराज प्रथम ने कराया था।

राजशेखर ने युवराज प्रथम को उज्जयिनी भुजंग कहा है।

गांगेय देव (1010 से 1041 ई.) कलचुरि वंश का एक प्रतापी राजा हुआ।

गांगेय देव ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

पूर्व मध्यकाल में स्वर्ण सिक्कों के अप्रचलित हो जाने के बाद गांगेय देव कलचुरि ने उन्हें उत्तर भारत में प्रारम्भ करवाया। गांगेय देव के सिक्कों पर बैठी हुई लक्ष्मी का चिन्ह अंकित है।

गांगेय देव ने प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे 100 रानियों के साथ मृत्यु को प्राप्त किया।

गांगेय देव का पुत्र कर्ण देव (1041 से 1070 ई.) इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक हुआ।

उसने गुजरात के चालुक्य नरेश भीम के से मिलकर परमार राजा भोज को पराजित किया। कर्ण देव (लक्ष्मी कर्ण) ने कलिंग विजय कर त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण की।

  • कर्ण का एक स्तम्भ लेख बंगाल के वीरभूम जिले में मिला है।
  • कर्णदेव का विवाह हूण राजकुमारी आंवलदेवी से हुआ, इससे यशकर्ण पुत्र हुआ।
  • दीपंकर अतिशा ने विग्रपाल तृतीय (1055-1070 ई.) एवं कलचुरी कर्ण के बीच कपाल सन्धि करवाई थी।
  • विग्रहपाल तृतीय ने कर्ण की पुत्री यौवनाश्री से विवाह किया।
  • इस वंश का अन्तिम शासक विजय सिंह था।
  • कलचुरि नरेश शैव धर्म के अनुयायी थे।
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