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भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ – भारत के समान्य ज्ञान की इस पोस्ट में हम भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और नोट्स प्राप्त करेंगे ये पोस्ट आगामी Exam REET, RAS, NET, RPSC, SSC के दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ

संस्कृति शब्द मूलतः संस्कृत भाषा का है अंग्रेजी का Culture लेटिन भाषा के Cultura एवं कोलियर से बना है इसका शाब्दिक है  सुधरी हुई या परिष्कृत अवस्था

संस्कार का अर्थ है- कतिपय धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन। 

प्रोफेसर डाडवेल– ‘भारतीय संस्कृति महासमुद्र के समान है जिसमें नदियाँ आकार विलीन होती रही है।’ 4.भारतीय संस्कृति में त्याग, तपस्या एवं तपोवन इन तीन त का विशेष महत्व है।

‘संस्कृति आजन्म मानव प्रघटना है‘- आर. सी. शास्त्री

‘ईरान की संस्कृति के निर्माता दक्षिणी भारतीय थे’– एच. आर. हॉल

भारतीय संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया मूंगे के चट्टान की भांति है। भारतीय संस्कृति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1. प्राचीनता :-

भारतीय संस्कृति सनातनी संस्कृति है। यह विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति मानी जाती है। हड़प्पा सभ्यता एवं वैदिक संस्कृति इसकी प्राचीनता के प्रमाण हैं।

2. निरन्तरता / सततता:-

विश्व की अन्य संस्कृतियाँ वक्त के साथ मिटती गई, लेकिन भारतीय संस्कृति अब भी अपने मूल स्वरूप को बचाये रखने में सफल रह रही है कवि इकबाल ने सही कहा है-

‘यूनाँ मिस्र रोमा, सब मिट गए जहां से, 

बाकी मगर है अब तक, नामो निशां हमारा 

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन, दौर ए जहां हमारा’

 

मैक्समूलर ने कहा है कि ‘अगर कोई देश है जो मानवता के लिए पूर्ण और आदर्श है, तो एशिया की ओर ऊँगली उठाऊँगा जहाँ भारत है।’

विल ड्ररेण्ट ने ‘सभ्यताओं के इतिहास’ में लिखा है कि जब तुम भारत के सान्निध्य में आओगे तो तुम्हें अनश्वर शान्ति का दिव्य मार्ग मिलेगा।

3. आध्यात्मिकता:

सर्वे भवन्तु सुखिन भारतीय संस्कृति का मूल है। भारतीय संस्कृति में लौकिकता एवं आध्यात्मिकता को अलग-अलग नहीं माना है। भारतीय महापुरूष सन्त, योगी एवं महात्मा रहे है। यह भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता का अकाट्य प्रमाण है। लेकिन भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक होते हुए भी इस लोक के सुख की उपेक्षा नहीं करती। चार पुरुषार्थ इसका उदाहरण है। भारतीय संस्कृति में सत्य एक अनुभूति है उसे बुद्धि से नहीं साक्षात्कार से जाना जा सकता है।

4. अवतारवादः

भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि जब-जब अधर्म की वृद्धि होती है, पाप बढ़ता है तब तब इस अधर्म का विनाश करने के लिए ईश्वर स्वयं अवतार लेते हैं।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।’

महाभारत में गीता के इस श्लोक का अर्थ है कि जब-जब धर्म की हानि होती है एवं अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं आता हूँ। सज्जन लोगों की रक्षा के लिए एवं दुष्टों के विनाश के लिए मैं आता हूँ, धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूँ और युग-युग में जन्म लेता हूँ। विष्णु के दस अवतारों की अवधारणा इस अवतारवाद से ही सम्बन्धित है।

5. समन्वय की भावना एवं ग्रहणशीलता/आत्मसात की प्रवृत्तिः-

भारतीय संस्कृति खुले मन से विश्व की अन्य सभी संस्कृतियों के श्रेष्ठ तत्वों को आत्मसात करने के लिए तत्पर रही है।

वराहमिहिर ने कहा है ‘यद्यपि यवन मलेच्छ है लेकिन उनके ज्योतिष शास्त्र ज्ञान के कारण वे ऋषियों की तरह पूजनीय है।’ मध्यकाल में सूफी भक्ति आन्दोलनों के द्वारा संस्कृति में विदेशी तत्वों को आत्मसात करने का प्रयास किया गया।

यद्यपि भारतीय संस्कृति ने जिस प्रकार शक, सीथियन, गुर्जर, प्रतिहार, हूण जैसे विदेशी तत्वों को आत्मसात कर लिया उस प्रकार मुस्लिम संस्कृति को आत्मसात नहीं कर पायी। फिर भी हिन्दू एवं मुस्लिम संस्कृति में सांस्कृतिक समन्वय सूफी भक्ति सन्तों से लेकर रीति रिवाजों तक प्रत्येक स्तर पर देखने को मिलते हैं। जैसे-

  1. हिन्दुओं में मुण्डन तो मुस्लिम समाज में अकीका
  2. हिन्दुओं में विद्यारम्भ तो मुस्लिम समाज में बिस्मिल्लाह
  3. हिन्दुओं में विवाह तो मुस्लिम समाज में निकाह 
  4. हिन्दुओं में माला तो मुस्लिम समाज में तसबीह
  5. हिन्दुओं में दसकर्म तो मुस्लिम समाज में दसवाँ
  6. हिन्दुओं में आरती तो मुस्लिम समाज में नमाज 
  7. हिन्दुओं में व्रत तो मुस्लिम समाज में रोजा
  8. हिन्दुओं में यज्ञोपवीत तो मुस्लिम समाज में हिलाल एवं सितारा 

6. समयानुकूल परिवर्तनशीलता:-

भारतीय संस्कृति में बदलते समय के अनुसार परिवर्तन किया गया है। विदेशी आक्रमणों के कारण आई नई जातियों को आत्मसात करने के लिए धर्म शास्त्रों एवं स्मृतियों में परिवर्तन किया गया है एवं अनेक वर्ण संकर जातियों को समाज में स्थान दिया गया।

7. सर्वांगीणता एवं सार्वभौमिकता एवं विश्वबंधुत्व:-

भारतीय संस्कृति में चार आश्रम, चार पुरुषार्थ, पंच महायज्ञ आदि के माध्यम से जीवन के सभी पक्षों का एवं सृष्टि में सभी जीवों का विकास एवं परोपकार की कल्पना की गई है।

अथर्ववेद में वैदिक राष्ट्रीय गीत (पृथ्वी सूक्त) में कहा गया है कि ‘पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।’ 

8. सहिष्णुता एवं सर्वधर्म समभाव:-

‘एकम सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’- ऋग्वेद के इस मंत्र में मतों की विभिन्नता के प्रति सहनशीलता व्यक्त होती है, क्योंकि इन विभिन्न मतों के पीछे भी मूल सत्य एक है।

  • स्यादवाद, सप्तभंगीनय, अशोक का 12वां शिलालेख आदि भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता एवं सहनशीलता को दर्शाते हैं।
  • भारतीय संस्कृति में साधना के अनेक मार्ग बताये गए है ज्ञान, भक्ति एवं कर्म आदि।

व्यक्ति अपनी अभिरूचि के अनुसार आध्यात्मिक साधना करता है विष्णु सहस्त्रनाम में कहा गया है कि ‘हम किसी भी देव की पूजा करे वह परम ईश्वर की ही पूजा हो जाती है।’ इसी प्रकार गीता में कहा गया है कि सब देवताओं को किया गया नमस्कार कृष्ण को ही प्राप्त होता है।’सवदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति’

9. विविधता में एकता:-

  1. भारतीय संस्कृति में विभिन्न विचारधाराएं, मतमतान्तर, जाति, नस्ल, धर्म, भाषाएं, भौगोलिक विभिन्नताएं आदि होते हुए भी विविधता एकता है। यह देश की सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है।
  2. रामधारी सिंह दिनकर ने अपने निबन्ध विविधता में एकता के माध्यम से इस सांस्कृतिक विशेषता को निरूपित किया है। 
  3. जब से सभ्यता का उदय हुआ है तभी से भारत के मस्तिष्क पर एकता की भावना ने अधिकार कर लिया है।’- नेहरू
  4. ‘भारत में धार्मिक विभिन्नताओं के होते हुए भी मौलिक एकता है -हैवल
  5. वी. ए. स्मिथ ने भारत में ‘एकता में अनेकता एवं अनेकता में एकता’ का विचार दिया है।
  6. ‘भारत को मतों, पंथो, प्रथाओं, संस्कृतियों, धर्मों, भाषाओं, जातियों एवं सामाजिक संस्थाओं का अजायबघर कहा जा सकता है।’- राधाकुमुद मुखर्जी

रविन्द्रनाथ टैगोर ने भारतीय संस्कृति को संस्कृतियों का सागर कहा है जिस प्रकार महासागर में अनेक नदियां आकर एकाकार हो जाती है उसी तरह भारत संस्कृति सागर में अनेकानेक संस्कृतियाँ निषाद, किरात, द्रविड़, आर्य आदि मिलकर एक हो गई।

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