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भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव

भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव
भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव – भारत के समान्य ज्ञान की इस पोस्ट में हम भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और नोट्स प्राप्त करेंगे ये पोस्ट आगामी Exam REET, RAS, NET, RPSC, SSC के दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है

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भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव

भारत की एक समग्र छवि बनाने के लिए, – भारतीयों के चरित्र और मानस को ढालने में भूगोल और पारिस्थितिकी की भूमिका को समझने और सराहना करने का प्रयास आवश्यक है। भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास के बीच सम्बन्ध को जानना बहुत ही जरुरी है इस पोस्ट में हम भारत की भौगोलिक सरंचना एवं इस का भारतीय इतिहास पर प्रभाव को जानेगे
भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव

                                                                       भारत की भौगोलिक संरचना एवं इतिहास पर प्रभाव

भारत का नामकरण:

ऐसी मान्यता है कि पौराणिक राजा दुष्यन्त एवं उनकी पत्नी शकुतंला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। भरत नाम सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है।
  • एक भू-भाग के रूप में भारतवर्ष शब्द सर्वप्रथम प्रथम शताब्दी ईसा  पूर्व के खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में मिलता है। भारतवर्ष अर्थात्-भरतों का देश
  • वैदिक कालीन जन (कबीला) भरत के नाम पर इसका नाम भारत पड़ा ये भी कुछ विद्वान मानते है
  • अशोक के अभिलेखों में भारत का नाम जम्बूद्वीप मिलता है। जम्बू नामक वृक्ष की उपलब्धता के कारण इसे जम्बूद्वीप कहा गया (प्रथम गौण शिलालेख)
  • सिन्धु नदी के पूर्वी क्षेत्र के लिए फारसियों (ईरानियों) ने फारसी भाषा में हिन्दू शब्द का प्रयोग किया। अरबी लोगों ने इस क्षेत्र को अलहिन्द नाम दिया। तुर्क मुसलमानों ने हिन्दुस्तान तथा उनकी भाषा को हिन्दवी नाम दिया।
Note – हिन्दु शब्द की व्युत्पत्ति सिन्धु नदी के नाम से हुई है। फारसवासी (आधुनिक ईरान) ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ के रूप में करते थे। इसलिए उन्होने सिन्धु का उच्चारण हिन्दु के रूप में किया अतः सिन्धु नदी के पूर्व दिशा की ओर की भूमि को हिन्दुस्तान कहा जाता था।
  • हिन्दुस्तान नामक का प्राचीनतम प्रयोग 262 ई. में उत्कीर्ण सासानीय (ईरानी) शासक शापुर प्रथम के नक्श-ए-रूस्तम लेख में मिलता है। यह लेख ईरानी, पहलवी तथा ग्रीक-यूनानी भाषा में है।
  • यूनानियों ने इस देश को इण्डिया नाम दिया। (सर्वप्रथम- हेरोडोटस)
  • यूनानी और रोमवासी सिन्धु को इंडस और इसके पूर्व की भूमि को इंडिया कहते थे।
  • मनु स्मृति में पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक तथा हिमालय से लेकर विंध्याचल के बीच के भाग को आर्यावर्त कहा गया है। राजशेखर की काव्य मीमांसा में भी नर्मदा नदी के उत्तर के भाग को आर्यावर्त कहा गया है।
  • विष्णु पुराण– समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो कल्पित है वह भारत देश है तथा वहां की सन्तानें भारतीय है।

भारत में नृजातीय तत्व:-

बी.एस. गुहा ने शिरस्य सूचकांक (Cephalic Index) के आधार पर भारत की आदिम जातियों को 6 भागों में बाँटा है
  1. नेग्रिटो– यह भारत की सबसे प्राचीन प्रजाति थी।
  2. प्रोटो ऑस्ट्रेलायड– ये भारतीय जनसंख्या के आधारभूत अंग थे।नाग, मकर, कच्छप, पूजा, चन्द्रगणना, निछावर प्रथा, लिंगोपासना, मृत्योत्तर विश्वास आदि भारतीय संस्कृति को इनकी देन रही है।
  3. मंगोलायड– इनकी भाषा चीनी-तिब्बत समूह (किरात) की भाषा से मिलती है। तंत्र, वामाचार, शक्तिपूजा आदि धार्मिक कृत्यों का आविर्भाव मंगोल जाति के प्रभाव की देन है।
  4. मेडीटरेनियन (भू-मध्य सागरीय)– इस प्रजाति के वंशज भारत में बड़ी संख्या में विद्यमान है। सामान्यतः इस प्रजाति का सम्बन्ध द्रविड़ (द्रमिल) जाति से है। नौ परिवहन, कृषि व्यापार वाणिज्य, नगरीय सभ्यता का भारत में सूत्रपात इसी प्रजाति की देन है।
  5. नार्डिक– इस प्रजाति को आर्यों का प्रतिनिधि तथा हिन्दू सभ्यता का जनक कहा जाता है। आर्य वस्तुतः एक भाषिक पद है।
  6. पश्चिमी ब्रेकाइसेफलस (अल्पाइन, डिनारिफ, आमनायड) ।

 भारत की अवस्थिति एवं विस्तार:-

यह उत्तर में हिमालय पर्वत, उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश एवं सुलेमान श्रेणियाँ, उत्तर-पूर्व में पूर्वांचल पहाड़ियाँ तथा दक्षिण में विशाल हिन्द महासागर से सीमांकित एक वृहत भौगोलिक इकाई है, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता है।

  • भारतीय उपमहाद्वीप के अन्तगर्त पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और भारत सहित कुल पाँच देश आते हैं। भारत अक्षांशीय एवं देशान्तरीय से क्रमशः उत्तरी गोलार्द्ध और पूर्वी गोलार्द्ध में स्थित है। भारत की मुख्य भूमि दक्षिण से उत्तर 8°4′ से 37°6′ उत्तरी अक्षांशों एवं पश्चिम से पूर्व 68°7 से 97°25′ पूर्वी देशान्तरों के मध्य विस्तृत है।
  • 82½° पूर्वी देशान्तर इसके लगभग मध्य से होकर गुजरती है, जो कि देश का मानक समय है ग्रीनविच समय से 5 घंटा 30 मिनट आगे है। 82½° पूर्वी देशान्तर इलाहाबाद के निकट मिर्जापुर से होकर गुजरती है। इस देशान्तर रेखा को भारत की मानक देशान्तर रेखा भी कहा जाता है। यह भारत के पाँच राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आन्ध्रप्रदेश) से होकर गुजरती है।
  • भारत का दक्षिणतम बिन्दु इंदिरा प्वाइंट है जिसे पिगमिलियन प्वांइट भी कहते है जो 6° 4′ उत्तरी अक्षाशं पर निकोबार द्वीप समूह में स्थित है जबकि मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिन्दु कन्या कुमारी के पास कुमारी अंतरीप (केप कमोरिन) दक्षिणतम छोर है जो 8°4′ उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, जो तमिलनाडु राज्य में स्थित एक द्वीप है।
  • भारत का उत्तरी विन्दु जम्मू-कश्मीर में इंदिरा कॉल (37°6′ उत्तरी अंक्षाश) है और पूर्वी बिन्दु अरूणाचल प्रदेश में किबिथु (97°25* पूर्वी देशान्तर) स्थित है, पश्चिमी बिन्दु गुजरात में गौरमोता (68°7* पूर्वी देशान्तर) स्थित है।
  • कर्क रेखा भी भारत के मध्य से गुजरती है यह भारत के जिन प्रदेशों से होकर गुजरती है वे है- गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पं. बंगाल, त्रिपुरा तथा मिजोरम
  • कर्क रेखा (23½ उत्तरी अक्षांश) भारत को लगभग दो बराबर भागों (उत्तरी भारत एवं दक्षिणी भारत) में बाँटती है, जिसका दक्षिणी हिस्सा उष्ण कटिबन्ध और उत्तरी हिस्सा उपोष्ण कटिबन्ध या कोष्ण शीतोष्ण कटिबन्ध कहलाता है। अतः भारत का विस्तार उष्ण एवं उपोष्ण दोनों कटिबन्ध में है।
  • भारतीय भू-भाग की लंबाई पूर्व से पश्चिम तक 2,933 कि.मी. तथा उत्तर से दक्षिण तक 3,214 कि.मी. है।
  • भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है जो विश्व का कुल क्षेत्रफल का 2.43 प्रतिशत है।
  • क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का रूस, कनाडा, चीन, यू.एस.ए., ब्राजील तथा आस्ट्रेलिया के बाद सातवां स्थान है।
  • भारत की स्थलीय सीमा की लम्बाई 15,200 कि.मी. तथा मुख्य भूमि की तटीय सीमा की लम्बाई 6,100 कि.मी. है द्वीपों समेत देश के कुल तटीय सीमा 7516.5 कि.मी. है इस प्रकार भारत की कुल सीमा 22,716.5 (15200+7516.5) कि.मी. है
  • गुजरात की तटीय सीमा (1214 किमी) सबसे लम्बी है क्योंकि इसमें सर्वाधिक क्रीक हैं। सबसे छोटी तटीय सीमा गोवा की है।
  • देश में 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित (अण्डमान एवं निकोबार, चण्डीगढ़, जम्मू एवं कश्मीर, लद्दाख, दिल्ली, पुदुच्चेरी, लक्षद्वीप, दमन एवं दीव दादरा एवं नगर हवेली) प्रदेश हैं।

भारत के पड़ौसी देश:-

भारत के निकटतम पड़ोसी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार तथा बांग्लादेश हैं श्रीलंका भारत का सबसे निकटतम समुद्री पड़ोसी देश है। जबकि इण्डोनेशिया दूसरा निकटवर्ती समुद्री पड़ोसी है
  • पाकिस्तान (3310 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश है (5)- लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, पंजाब राजस्थान तथा गुजरात।
  • अफगानिस्तान (80 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले मात्र भारतीय केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख हैं। भारत एवं अफगानिस्तान के बीच ड्यूरेंड रेखा (Durand Line) है।
  • चीन (3917 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य/ केन्द्र शासित प्रदेश (6) – जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश स्पर्श करते है। भार एवं चीन के बीच मैकमोहन रेखा (McMahon Line) है।
  • नेपाल (1752 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य (5) उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, सिक्किम हैं।
  • म्यांमार (1458 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य (4) अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर तथा मिजोरम हैं।
  • बांग्लादेश (4096 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य (5) मिजोरम, त्रिपुरा, असम, मेघालय तथा पश्चिम बंगाल हैं।
  • भूटान (587 किमी.) की सीमा को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य (4) सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल हैं।
  • 8 राज्यों की सीमाओं को छूने वाला राज्य- उत्तर प्रदेश
  • 7 राज्यों की सीमाओं को छूने वाला राज्य- असम
  • 6 राज्यों की सीमाओं को छूने वाले राज्य- छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र
  • 1 राज्य की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य- मेघालय एवं सिक्किम
  • तटीय राज्य- 9
  • भारत का सीमांतर्गत क्षेत्र आगे समुद्र की ओर 12 समुद्री मील (लगभग 21.9 किमी.) है।

भारत के भौगोलिक भाग

भारत का भौतिक स्वरूप – प्राचीन भारत में संस्कृत तथा पाली साहित्य में इस देश को 5 क्षेत्रों- उत्तर (उदीच्य), मध्य (मञ्जिम देश), पूर्व (प्राच्य), पश्चिम (प्रतीच्य) तथा दक्षिण (दक्षिणापथ) में विभाजित किया गया है। ह्वेनसांग इन्हें ही फाइव इण्डीज (पंच भारत) कहता है
मत्स्य पुराण के अनुसार भारत वर्ष के नौ भाग है– इन्द्रद्वीप, कसेरू, ताम्रपर्णी, गर्भास्तमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व, वारूण तथा सागर से घिरा भारत।
वराहमिहिर की वृहत संहिता में भारत भूमि को कूर्म की आकृति का, पुराणों के भुवनकोष में धनुआकृति का दीप निकाय में छकड़े की भांति तथा महाभारत में समभुजाकार त्रिभुज की भाँति बताया गया है।
भारत के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 10.7 प्रतिशत पर्वतीय भाग (जो समुद्र तल से 2135 मीटर या अधिक ऊँची), 18.6 प्रतिशत पहाड़ियाँ है (जो 305 से 2,135 मीटर ऊँची) 27.7 प्रतिशत पठारी क्षेत्र (जो 305 से 915 मीटर ऊँचा) और 43 प्रतिशत भू-भाग मैदानी हैं।

उच्चावच के लक्षणों के आधार पर भारत के भौतिक:

  • हिमालय पर्वत समूह
  • उत्तरी भारत का मैदान
  • प्रायद्वीपीय पठार
  • तटीय मैदान
  • द्वीप समूह

1. हिमालय पर्वत समूह (उत्तर की विशाल पर्वतमाला)

हिमालय वास्तव में अभी भी एक युवा पर्वत हैं, जिसका निर्माण कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है हिमालय के क्षेत्र में आने वाले भूकम्प, हिमालयी है नदियों के निरन्तर होते मार्ग परिवर्तन एवं पीरपंजाल श्रेणी में 1500 से 1850 मीटर की ऊँचाई पर मिलने वाली झील निक्षेप (जिन्हें करेवा भी कहा जाता है) हिमालय के उत्थान के अभी भी जारी रहने की ओर संकेत करते हैं।
हिमालय के स्थान पर पूर्व में टेथिस सागर हुआ करता था। हिमालय पश्चिम से पूर्व की ओर 2400 कि.मी. लम्बाई से एक चाप के आकार में फैला हुआ है।

उच्चावच के आधार पर इसे निम्न भागों में विभाजित किया गया है

महान हिमालय/वृहद हिमालय/सर्वोच्च हिमालय या आन्तरिक हिमालय:-इसे प्राचीन ग्रंथों में हिमाद्रि, मध्य हिमालय,मुख्य हिमालय अथवा बर्फीला हिमालय भी कहा गया है।
यह पश्चिम में सिन्धु नदी के मोड़ के पास से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक 2,400 किमी. लम्बाई तक एक चाप के आकार में टेढी रेखा के समान फैला हुआ है।
वृहद हिमालय की औसत ऊँचाई 6000 किमी. है इसकी सभी चोटियों हिम से ढँकी रहती है।
यह भाग बहुत ऊँचे तेज ढाल, ऊँची चोटियां और घाटियों की खड़ी “दीवारों वाला है मध्य भाग में नेपाल में स्थित है जो सबसे ऊंचा भाग है।

विश्व की उच्चतम चोटिया इसी हिमालय में स्थित है। प्रमुख निम्न है-

  1. माउन्ट एवरेस्ट (8848 मीटर, नेपाल)
  2. गोडविन ऑस्टिन (के) (8611 मीटर, भारत)
  3. कंचनजंघा (8598 मीटर, भारत)
  4. मकालू (8481 मीटर, नेपाल)
  5. धौलागिरी (8172 मीटर, नेपाल)
गंगोत्री व यमुनोत्री नदियाँ महा हिमालय से ही निकलती है।
कराकोरम (कृष्णा गिरी) लद्दाख व जास्कर श्रेणी महाहिमालय में है।

(B) लघु या मध्य हिमालय या हिमाचल श्रेणी :-

  • औसत ऊंचाई 3000 मीटर है। प्रमुख स्वस्थ्य वर्धक स्थल शिमला, मसूरी, चकराता, नैनीताल, रानीखेत,दार्जिलिंग आदि है।
  • इसमें कोणधारी वन मिलते है तथा ढालों पर छोटे-छोटे मैदान मिलते हैं, जिन्हें कश्मीर में मर्ग तथा उत्तराखण्ड में बुग्याल और पयार कहते है।
  • मध्य और महान हिमालय के बीच दो खुली घाटियाँ पायी जाती हे पश्चिम में कश्मीर की घाटी, जिसका क्षेत्रफल 4900 वर्ग किमी. है पूर्व में काठमाण्डू घाटी है जो नेपाल में स्थित है।
  • इस श्रेणी में पीरपंजाल और बनिहाल प्रमुख दरें स्थित है।
  • पीर पंजाल, धौलाधर, नागटिब्बा एवं महाभारत श्रेणियाँ लघु हिमालय का ही भाग है।

(C) उप हिमालय (बाह्य हिमालय अथवाशिवालिक हिमालय) :-

  • यह पश्चिम में पोटवार बेसिन के दक्षिण से प्रारम्भ होकर पूर्व की ओर कोसी नदी तक फैली है।
  • यह 2400 किमी. लम्बाई में स्थित है इसकी औसत ऊंचाई से 600 मीटर है।
  • शिवालिक को जम्मू में जम्मू पहाड़ियाँ तथा अरूणाचल प्रदेश में डाफला, मिरी, अबोर, मिशमी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है।
  • शिवालिक हिमालय हिमालय का सबसे नवीन भाग है।
  • ऊंचा नीचा धरातल, तेज ढाल, भूस्खलन के कारण जमा हुआ अवसाद तथा गहरी घाटियाँ पायी जाती है गोरखपुर के पास इसे लँडवा पूर्व की ओर चूरिया और मूरिया कहते है इसकी घाटियों के पश्चिम में दून (देहरादून, कोटरीदुन, पाटली दून) और पूर्व में द्वार (हरिद्वार) कहते है।

हिमालय का प्रादेशिक वर्गीकरण

कश्मीर या पंजाब हिमालय :- सिन्धु और सतलज के बीच 560 किमी. की दूरी में फैला हुआ है यहाँ हिमालय क्रामिक रूप से ऊँचाई प्राप्त करता है कराकोरम, लद्दाख, जास्कर, पीरपंजाल, धौलाधर श्रेणियाँ इसी के भाग हैं हिमालय की चौड़ाई यहाँ सर्वाधिक है एवं यह 250 से 400 किमी. चौड़े क्षेत्र में विस्तृत है।

कुमायूँ हिमालय-

यह सतलज और काली नदियों के बीच 320 किमी की दूरी में फैला हुआ है। यह उत्तरांचल क्षेत्र में विस्तृत है। नंदा देवी, कामेट, बद्रीनाथ, केदारनाथ, त्रिशुल आदि इसके प्रमुख शिखर है।

नेपाल हिमालय-

यह काली और तिस्ता नदियों के बीच 800 किमी. की दूरी में फैला हुआ है। यहाँ हिमालय की चौड़ाई अत्यधिक कम है परन्तु हिमालय के सर्वोच्च शिखर यहीं मिलते है, जैसे- एवरेस्ट कंचनजंगा, मकालू आदि।

असम हिमालय-

यह तिस्ता तथा दिहांग (सांगपो-ब्रह्मपुत्र) नदियों के बीच 720 किमी की दूरी में फैला हुआ है। यहाँ हिमालय की ऊँचाई पुनः कम होने लगती है। मैदानी भाग में इसका ढाल काफी तीव्र है।

प्रमुख दर्रे :

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में स्थित काराकोरम दर्रा भारत का सबसे ऊंचा दर्रा (5654मी.) है यहाँ से चीन को जाने वाली एक सड़क भी बनाई गई है।
  1. बुर्जिल दर्रा श्रीनगर से गिलगित को जोड़ती है।
  2. जोजिला दर्रा जॉसकर श्रेणी में स्थित है, इससे श्रीनगर से लेह का मार्ग गुजरता है
  3. पीरपंजाल दर्रे से कुलगांव से कोठी जाने का मार्ग गुजरता है।
  4. बनिहाल दर्रे से जम्मू से श्रीनगर जाने का मार्ग गुजरता है। जवाहर सुरंग भी इसी में स्थित है।
  5. शिपकीला दर्रा शिमला से तिब्बत को जोड़ता है।
  6. बड़ालाचाला दरें से मंडी से लेह जाने का मार्ग गुजरता है।
  7. थागा ला, माना, नीति व लिपुलेख दर्रा उत्तरांचल के कुमाऊं श्रेणी में स्थित है, इनसे मानसरोवर झील व कैलाश घाटी का मार्गा गुजरता है।
  8. सिक्किम में स्थित नाथूला व जेलपल्ला दरें का व्यापक सामरिक महत्त्व है यहाँ से दार्जिलिंग व चुम्बी घाटी से होकर तिब्बत जाने का मार्ग है।
  9. बोमडिला व यांगयाप दर्रा अरुणाचल प्रदेश में स्थित है, बोमडिला दरे से त्वांग घाटी होकर तिब्बत जाने का मार्ग जाता है। जबकि यांगयाप दरें के पास ही ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है यहाँ से चीन के लिए भी मार्ग जाता है।
  10. दिफू व पांगसाड दर्रा अरुणाचल प्रदेश से भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित है।
  11. मणिपुर में स्थित तुजू दर्रे से इम्फाल से तामू और म्यांमार जाने का मार्ग गुजरता है।
  12. रोहतांग दर्रा यह हिमाचल प्रदेश में है।
भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थिर खैबर, बोलन, गोमल, कुर्रम तथा टोची दरें भी ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण थे। इनमें सबसे प्रसिद्ध खैबर दर्रा है। इससे होकर काबुल-पेशावर का मार्ग जाता है। सिकन्दर एवं महमूद गजनवी का भारत आक्रमण इसी दरें से हुआ था। गौरी भारत में गोमल दरें से आया था।
मध्य युग तक प्रमुख विदेशी आक्रमण (ईरानी, यूनानी, शक, पहलव कुषाण, हूण, तुर्क) इन्ही दरों में हुए। ये दरें भारत का विदेशों से सांस्कृतिक तथा व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने का साधन भी रहे है। फाह्यान तथा ह्वेनसांग जैसे यात्री इन्ही दरों से होकर भारत आये। भारतीय आर्यों का प्रवेश भी इन्ही दरों से हुआ था।
उत्तर पश्चिम में भारतीय उपमहादेश की वैज्ञानिक सीमा काराकोरम तथा हिन्दुकश पर्वत है। यहाँ सुलेमान, सफेद कोह तथा किरथर पर्वत हैं, जो भारत को अफगानिस्तान एवं बलूचिस्तान से पृथक करते हैं। बलूचिस्तान का समुद्र तट मकरान तट कहलाता है।
भौगोलिक दृष्टि से मेघालय का पठार उत्तर पूर्वी पहाड़ियों का ही भाग है। इस पठार पर गारों, खासी और जयन्तियां पहाड़िया है। संरचनात्मक दृष्टि से मेघालय प्रायद्वीपीय पठार भाग है। हिमालय श्रंखला को म्यांमार में अराकान योमा के नाम से जाना जाता है। अण्डमान निकोबार द्विप समूह हिमालय के ही भाग है।

उत्तरी भारत का मैदान

भारतीय इतिहास में यह मैदान बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की सभ्यता ऊं और संस्कृति का विकास इसी मैदान में हुआ है। मैदान की उपजाऊ  मिट्टी, उपयुक्त जलवायु और पर्याप्त जल आपूर्ति के आधार पर ऐसी कृषि का विकास हुआ, जिसमें लोगों की जरूरत से ज्यादा उत्पादन होता था। इस अधिशेष उत्पादन ने सभ्यता के विकास में बड़ा भारी योगदान किया है।
  • उत्तरी मैदानी प्रदेश भारत का हृदय स्थल तथा संस्कृति तथा सभ्यता का पोषण स्थल कहलाता है।
  • हड़प्पा संस्कृति का उद्भव-विकास सिन्धु घाटी में, वैदिक संस्कृति का उद्भव पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा पंजाब में तथा विकास पश्चिमी गंगा घाटी में हुआ।
  • लौह मूलक वैदिकोत्तर संस्कृति मध्य गंगा घाटी में फूली-फली गुप्त युग में निचली गंगा घाटी तथा उत्तरी बंगाल उत्कर्ष हुआ।
  • भारत के अधिकांश समृद्धशाली साम्राज्यों तथा समृद्धशाली नगरों का इसी भू क्षेत्र में हुआ।
कुरूक्षेत्र, तराईन, पानीपत की रणस्थलियों ने कई बार भारतवर्ष के भाग्य का निर्णय किया। यहाँ स्थित नदियों को वाणिज्य तथा संचा की धमनियाँ माना जाता है। हस्तिनापुर, प्रयाग, वाराणसी तथा पाटलिपु (देश की पहली प्रमुख राजधानी) जैसे अनेक नगर एवं राजधानिय नदी पट पर ही बसी थी। भारत में सबसे प्राचीन बस्तियाँ पहाड़ी इलाकों में तथा पहाड़ों के बीच की नदी घाटियों में स्थापित हुई।

मैदान का विस्तार

यह मैदान हिमाचल के दक्षिण में तथा प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर में पूर्व से पश्चिम तक फैला है। सिन्धु के मुहाने से गंगा के मुहाने तक मैदान की लम्बाई 3200 किलोमीटर है। इसकी चौड़ाई 150 से लेकर 300 किलोमीटर तक है।

उच्चावच की भिन्नताओं के आधार पर मैदान का विभाजन

उच्चावच की भिन्नताओं के आधार पर मैदान को चार भागों में बांटा जा सकता है।
  1. भावर
  2. तराई
  3. बांगर
  4. खादर

मैदान का प्रादेशिक विभाजन

सिन्धु से लेकर असम तक इस मैदान के पूरे विस्तार से स्थानीय उच्चावच में काफी भिन्नता दिखाई पड़ती है। इन्हीं भिन्नताओं के आधार पर उत्तरी भारत के मैदान को निम्नलिखित चार विभागों में बांटा जा सकता है।

(1) सिन्ध का मैदान:-

इस मैदान का निर्माण सिन्धु नदी के द्वारा हुआ है। सिन्धु नदी के पश्चिम का भाग बांगर है। पुराने नदी मार्गों के बचे हुए भाग को धौरोस कहते है। धौरोस लंबे संकरे गर्त है। इनमें से कुछ सूखे नदी मार्गों के साथ-साथ खारे पानी की झीले है। जिनका स्थानीय नाम ढांड है।

(2) पंजाब तथा हरियाणा का मैदान:-

आब फारसी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है पानी। पंजाब अर्थात् पांच पानी दो नदियों के बीच के भाग को दोआब कहते हैं। पंजाब के मैदान में पांच दोआब हैं।
  1. व्यास सतलुज के मध्य फैला बिस्त दोआब ।
  2. व्यास तथा रावी के मध्य बारी दोआब
  3. रावी तथा चिनाब के बीच रचना दोआब
  4. चिनाब तथा झेलम के मध्य चाज दोआब
  5. झेलम, चिनाब तथा सिन्धु के बीच सिन्ध सागर दोआब

(3) गंगा का मैदान-

उत्तरी भारत के मैदान का यह भाग गंगा, यमुना, रामगंगा, घाघरा, गोमती, गंडक आदि नदियों के द्वारा बहाकर लाए गए अपरदित पदार्थों से बना है। प्रायद्वीपीय पठार की ओर से बहकर आनेवाली चंबल, सिंध, बेतवा, केन और सोन नदियों का भी इस मैदान को बनाने में योगदान है। इसका विस्तार मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में है। गम्भीर समतलता के कारण उत्तरी गंगा मैदान को डेड प्लेन कहा जाता है।

(4) ब्रह्मपुत्र का मैदान:-

असम में मैदान की चौड़ाई 90 से 100 किमी तक ही है। इसका विस्तार असम में धुबरी से सदिया तक है। इस मैदान का निर्माण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों द्वारा बहकर लाए अपरदित पदार्थों से हुआ है। वर्षा ऋतु में इस मैदान का अधिकतर भाग ब्रह्मपुत्र की विनाशकारी बाढ़ो की चपेट में आ जाता है।

दक्षिण का पठार

पठार का ढाल दक्षिण एवं पूर्व की ओर है। अतः अधिकांश नदियाँ इस पठार पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। जैसे- महानदी, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी ये सभी नदियाँ डेल्टा बनाती है। पठार के उत्तरी भाग में नर्मदा एवं ताप्ती नदियाँ पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में गिरती है। यही दो नदियाँ एस्चुअरी का निर्माण करती है।
  • नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ, विन्ध्य तथा सतपुड़ा पहाड़ियाँ और महाकान्तार के वन मिलकर उत्तर भारत को दक्षिण भारत से पृथक करते है। इसी पृथकता के कारण दक्षिण में आर्य संस्कृति से सर्वथा भिन्न द्रविड़ संस्कृति का विकास हुआ।
  • कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों से निर्मित दोआब रायचुर दोआब कहलाता है।
  • बौद्ध साहित्य में सुत्त निकाय तथा बोधायन धर्मसूत्र में दक्षिणापथ शब्द का उल्लेख मिलता है।
  • सामान्यतः विन्ध्य पर्वत के दक्षिण से कृष्णा नदी के उत्तर दिशा वाले भाग को दक्षिणापथ कहा जाता है।
  • दक्षिणापथ के पूर्व में स्थित बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में स्थित अरब सागर तथा दक्षिण में स्थित हिन्द महासागर को क्रमशः महोदधि, रत्नाकर तथा इन्दु सागर कहा गया है।
  • दक्षिण के पठार पर स्थित महत्ववपूर्ण पर्वत- विन्ध्याचल, सतपुड़ा,पश्चिमी घाट (सहयाद्री) एवं पूर्वी घाट पर्वत । विन्ध्याचल पर्वत उतर भारत को दक्षिण भारत से अलग करता है।
  • सतपुड़ा पर्वत श्रेणी रापीपला पहाड़ियों से आरम्भ होकर महादेव एवं मैकाल पहाड़ियों के रूप में छोटा नागपुर पठार तक फैली है धूपगढ़, पंचमढी तथा अमरकंटक इसकी प्रमुख चोटियाँ हैं।
  • विन्ध्याचल एवं सतपुड़ा के मध्य नर्मदा नदी है एवं सतपुड़ा के दक्षिण में ताप्ती नदी है।

पश्चिमी घाट या सहयाद्री पर्वतमाला पर चार महत्वपूर्ण दरें हैं।

थाल घाटः नासिक एवं मुम्बई के बीच मार्ग प्रशस्त करता है।
भोर घाट: मुम्बई से पुणे के बीच मार्ग
पाल घाट कोयम्बटूर से कोचीन के बीच मार्ग
सिनकोटाः त्रिवेन्द्रम से मदुरई के बीच मार्ग
पश्चिमी घाट एवं पूर्वी घाट पर्वत दक्षिण में जहाँ आपस में मिलते हैं उन पहाड़ियों को नीलगिरी कहते हैं। दक्षिण भारत की सबसे ऊँची चोटी अनाईमुड़ी है जो अन्नामलाई की पहाड़ी पर स्थित है। दक्षिण भारत का दूसरा सबसे ऊंची चोटी दोदाबेटा है जो नीलगिरी की सबसे ऊंची चोटी है। नीलगिरी, अन्नामलाई पालनी एवं कार्डामम (इलायची) की पहाड़ियाँ दक्षिण भारत के पठार पर स्थित प्रमुख पहाड़ियाँ है। दक्षिण के पठार के उत्तरी-पश्चिमी भाग में लावा निर्मित उपजाऊ काली मिट्टी पाई जाती है।
इस पठार के उत्तरी भाग में छोटे छोटे पठार स्थित है- हाड़ौती का पठार, मालवा का पठार, बुन्देलखण्ड का पठार, बघेलखण्ड का पठार, छोटा नागपुर का पठार, रांची का पठार एवं पूर्व में मेघालय का पठार

तटीय मैदान

दक्षिण के पठार के पूर्व एवं पश्चिम में क्रमशः पूर्वी एवं पश्चिमी तटीय मैदान है। इनका निर्माण या तो तटीय भागों को समुद्र तल से उपर उठ जाने या नदियों द्वारा मिट्टी के निक्षेप से हुआ है।
 (i) पूर्वी तटीय मैदान:
यह मैदान उत्तर में स्वर्ण रेखा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक है।
 इसके उत्तरी भाग को उत्तरी सरकार तट तथा दक्षिणी भाग को कोरोमण्डल तट कहा जाता है।
इस मैदान को उत्तर से दक्षिण के उत्कल का मैदान उत्तरी सरकार तट, कोरोमण्डल तट में विभाजित किया जाता है।
अरिकामेडू, महाबलिपुरम तथा कावेरीपट्टनम के बन्दरगाह कोरोमण्डल तट पर अवस्थित थे।
मैदान के समुद्र के निकटवर्ती भाग में बालू के ढेरों की लम्बी श्रंखला मिलती है, जिनका निर्माण समुद्री लहरों ने किया है। इन बालू के ढेरो के कारण ही चिल्का (उड़ीसा) एवं पुलिकट (तमिलनाडू) कोलेरू (आन्ध्रप्रदेश) जैसी छिछली झीलों का निर्माण हुआ है। ऐसी झीले लेगून कहलाती है।

पश्चिमी तटीय मैदानः

यह मैदान उत्तर में खम्भात की खाड़ी से लेकर दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक फैला है। इसके उत्तरी भाग को कोंकण व दक्षिणी भाग को मालाबार तट कहते है। गुजरात के तट को सौराष्ट्र तट कहा जाता है। पश्चिमी तटीय मैदान की नदियाँ ज्वान्दमुख का निर्माण करती हैं। यह पूर्वी तटीय मैदान की अपेक्षा कम चौड़ा है। मालाबार तट पर लैगूनों की अधिकता है। पश्चिम तटीय मैदान में नारियल, चावल, सुपारी, केला, काजू व मसालों की कृषि की जाती है। केरल के तटीय क्षेत्र में मोनोजाइट (थोरियम) जैसा बहुमूल्य आणविक खनिज मिलता है।
  • सोपारा (शूर्पारक), भड़ौच (भृगुकच्छ), कल्याण (कैलियोन) मुजिरिस पश्चिमी तट के प्रसिद्ध बंदरगाह थे।
  • केरल का मालाबार तट प्राचीन काल का प्रसिद्ध व्यापारिक अधिवास रहा है।
नोट-भारत पर स्थल आक्रमण पश्चिम के दर्रो से हुए तथा 15वीं शताब्दी के अन्त से यूरोपीय आगमन समुद्री मार्ग से हुआ।

भारत के द्वीप समूह

भारत में द्वीपों की कुल संख्या 247 है, जिसमें 204 द्वीप बंगाल की खाड़ी में एवं शेष अरब सागर एवं मन्नार की खाड़ी में स्थित है। अरब सागरीय द्वीपों का निर्माण प्रवाल भित्तियों द्वारा हुआ है। लक्षद्वीप, मिनीकोय एवं अमीनदीवी अरब सागर के महत्वपूर्ण द्वीप है। इन द्वीपों पर नारियल के वृक्षों की अधिकता है।
  • अण्डमान निकोबार द्वीप समूह भारत का सबसे महत्वपूर्ण द्वीप समूह है। जो बंगाल की खाड़ी में स्थित है। ये द्वीप वास्तव में समुद्र में डूबे हुए पर्वत के शिखर है।
  • बैरने और नारकोंडम ज्वालामुखी द्वीप है जो यहीं स्थित है। भारत का दक्षिणतम बिन्दु प्वाइंट ग्रेट निकोबार पर स्थित है। डंकन पास बड़ा अण्डमान को छोटा अण्डमान से अलग करता है। 10° चैनल छोटा अण्डमान एवं कार निकोबार के बीच स्थित है।
  •  न्यू मूर द्वीप को लेकर भारत बंग्लादेश के मध्य विवाद बना हुआ था। पम्बन द्वीप मन्नार की खाड़ी स्थित है। बंगाल की की खाड़ी के द्वीप, अरब सागरीय द्वीपों की तुलना में अधिक बड़े एवं अधिक आबादी में योग्य है।

अन्य तथ्यः

  • वृहत्त हिमालय, लघु हिमालय से मेन सेन्ट्रल थ्रस्ट द्वारा अलग होती है।
  • लघु हिमालय शिवालिक हिमालय से मेन बाउंड्री फाल्ट द्वारा अलग होती है।
  • शिवालिक हिमालय के दक्षिण में ग्रेट बांउड़ी फाल्ट हैं।
  • विष्णु पुराण में गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु एवं कावेरी को सात पवित्र मोक्षदायिनी नदियाँ कहा गया है।
  • अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काँची, अवन्तिका एवं सात पवित्र मोक्षदायी नगरियाँ मानी गई है।
  • महेन्द्र, मलय, सहा, शक्तिमान, ऋक्ष्य, विन्ध्य एवं पारियात्र सात पैराणिक पर्वत हैं।

पुराणों में चार तीर्थ माने गये हैं, जो निम्नलिखित हैं

  1. पूर्व में श्वेत गंगा
  2. पश्चिम में गोमती कुण्ड (द्वारका)
  3. उत्तर में तप्त कुण्ड (बद्रीनाथ)
  4. दक्षिण में धनुष तीर्थ
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