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मालवा के परमार – Malwa ka Parmar Vansh

मालवा के परमार - Malwa ka Parmar Vansh

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मालवा के परमार

परमार प्रतिहारों के सामन्त थे, किन्तु 10वीं शताब्दी में प्रतिहार शक्ति कमजोर होने पर मालवा क्षेत्र में परमारों की स्वतंत्र सत्ता का उदय हुआ।

इस वंश का संस्थापक उपेन्द्र (कृष्णराज) या व प्रथम महत्वपूर्ण राजा सीयक द्वितीय था। सीयक ने राष्ट्रकूट नरेश खोटिग को हराया एवं राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त हुए। सौयक द्वितीय को हर्ष भी कहा जाता है।

परमार वंश का प्रथम अभिलेख सीयक द्वितीय का हरसोल अभिलेख है, जिसमें परमार शासकों की वंशावली है। परमारों की स्वतंत्रता का जन्मदाता सीयक द्वितीय था।

मुंज (972 से 994 . ):-

परमार वंश की शक्ति का वास्तविक उदय सीयक के पुत्र वाक्पति मुंज के समय हुआ। मुंज ने कल्याणी के चालुक्य नरेश तैलप द्वितीय को छः बार पराजित किया किन्तु सातवीं बार वह धोखे से तैलप द्वारा बन्दी बना कर मार डाला गया। उसने धारा में मुंज सागर झील का निर्माण करवाया।

मुंज एवं तैलप द्वितीय के संघर्ष की जानकारी प्रबन्ध चिन्तामणि से मिलती है।

नवसाहसांक चरित में मुंज को उत्पल राज कहा गया है।

परमार मुंज को कविमित्र कहा जाता है।

मुंज को तैलप द्वितीय की बहिन मृणालवती से कारागार में प्रेम हो गया लेकिन मृणालवती ने मुंज को धोखा दे दिया।

मुंज एक प्रतिभावान कवि व विद्वानों का संरक्षक था। उसके दरबार में ‘नवसाहसांक चरित’ के लेखक ‘पद्यगुप्त‘, ‘दशरूपक’ के लेखक ‘धनंजय’, दशोरूपावलोक तथा काल निर्णय के लेखक धनिक तथा शोभन, हलायुध एवं अमितगति आदि विद्वान रहते थे।

अमितगति ने सुभाषित रत्न संदोह नामक ग्रन्थ लिखा।

हलायुध ने पिंगलछन्द शास्त्र पर मृत संजीवनी नामक टीका तथा अभिधान रत्नमाला नामक ग्रन्थ की रचना की।

मुंज की राजसभा में महासेन नामक विद्वान ने प्रद्युम्नचरित नामक ग्रन्थ लिखा।

मुंज ने पृथ्वी वल्लभ, श्री वल्लभ और अमोघवर्ष जैसी राष्ट्रकूट शासकों की उपाधियां धारण की।

सिन्धुराज (994 से 1010 .):

मुंज की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई सिन्धुराज शासक बना। नवसाहसांक चरित में इसी की जीवनी है।

उसने कुमार नारायण, साहसांक आदि उपाधियां धारण की।

सिन्धुराज ने चालुक्य नरेश सत्याश्रय को पराजित कर अपने भाई की हत्या का बदला लिया।

भोज (1010 से 1055 ):-

भोज इस वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा हुआ।

उसने कल्याणी व अन्हिलवाड़ के चालुक्यों को पराजित किया किन्तु चन्देल शासक विद्याधर से पराजित हुआ।

भोज के अन्तिम समय में कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण और गुजरात के चालुक्य नरेश भीम प्रथम ने एक संघ बनाकर उसे पराजित किया व धारा नगरी को लूटा।

भोज की इसी अभियान के समय मृत्यु हो गई।

इस ने उज्जैन के स्थान पर धारा को अपनी राजधानी बनाया।

भोज की सभा का नाम भुवन विजय था।

इस ने चित्तौड़ में त्रिभुवननारायण मन्दिर (शिव मन्दिर) बनवाया।

भोज अपनी विद्वत्ता के कारण कविराज (उदयपुर प्रशस्ति-मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में) की उपाधि से भी जाना जाता था।

उसने विविध विषयों पर अनेक ग्रन्थ लिखे जिनमें व्यवहारमंजरी, शृंगार प्रकाश, शृंगार मंजरी, चंपुरामायण, अवनिकुमार, कोदण्ड काव्य, तत्व प्रकाश, “आयुर्वेद सर्वस्व”, स्थापत्य शास्त्र पर “समरांगण सूत्र धार” आदि प्रमुख हैं।

परमार शासक भोज ने समरांगणसूत्रधार में विभिन्न प्रकार के काल्पनिक वैज्ञानिक उपकरणों का उल्लेख किया है।

इसके अतिरिक्त भोज की अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें सरस्वती कंठाभरण, विद्याविनोद, राजमार्तण्ड, युक्ति कल्प तरू, सिद्धान्त संग्रह, योग सूत्र वृत्ति, चारूचर्चा, आदित्य प्रताप सिद्धान्त, राजमृगांक, व्यवहार समुच्चय, शब्दानुशासन, नाममालिका है।

युक्ति कल्प तरू में विविध प्रकार की नावों के निर्माण की चर्चा है।

भोज परमार की मृत्यु पर यह कहावत प्रचलित हो गई, जिसका उल्लेख धनपाल की तिलकमंजरी में है।

‘अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती पण्डिता खण्डिताः सर्वे भोजराज दिवंगते।”

परमार भोज को कविराज एवं मध्ययुग का विक्रमादित्य कहा जाता है।

भोज ने शैव धर्म से संबंधित पुस्तक ‘तत्व परीक्षा’ लिखी।

भोज के दरबारी कवि उवट ने मंत्र भाष्य लिखा तथा वैदिक साहित्य पर टीका लिखी।

इस ने भोजपुर नामक नगर बसाया तथा भोजसर नामक तालाब भी बनवाया।

भोज की रानी अरुन्धती भी एक विदुषी महिला थी।

11वीं शताब्दी में धारा मध्यभारत में संस्कृत शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था।

मालवा के परमार important points

भोज ने धारा में भोजशाला नामक संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कण्ठाभरण) की स्थापना कर उसमें वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित की। वाग्देवी की प्रतिमा जो ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह है, वह भोज द्वारा स्थापित वाग्देवी की प्रतिमा से ली गई है।

वाग्देवी की प्रतिमा का मूर्तिकार मंथन था।

वाग्देवी प्रतिमा वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में है।

आइने अकबरी के अनुसार उसकी राजसभा में 500 विद्वान थे। इनमें भास्कर भट्ट, दामोदर मिश्र व धनपाल प्रमुख थे।

जैन लेखक धनपाल ने तिलक मंजरी तथा पाइयलच्छीमाला की रचना की।

भोज के बाद जयसिंह तथा उदयादित्य राजा हुए और धीरे-धीरे परमार शक्ति की अवनति हो गई।

उदयादित्य ने विदिशा के पास उदयपुर नगर बसाया।

उदयादित्य ने उदयपुर में नीलकंठेश्वर मन्दिर बनवाया।

परमारों की शाखाएँ धारा, चन्द्रावती (माउन्ट आबू), वागड़ (बाँसवाड़ा), ज्वालिपुर (जालोर) तथा किरातकूप (किराडु, बाड़मेर) थी। इनमें धारा (उज्जैन) की शाखा सबसे प्रमुख थी।

परमार शासक नरवर्मन (1093-1133 ई.) ने निर्वाण नारायण की उपाधि धारण की।

1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने महलक देव परमार को परास्त कर मालवा पर अधिकार कर लिया।

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