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बहमनी साम्राज्य का इतिहास | Bahmani Sultanate

बहमनी साम्राज्य का इतिहास | Bahmani Sultanate

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बहमनी साम्राज्य का इतिहास | Bahmani Sultanate

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन के अन्तिम दिनों में दक्षिण के अमीर ए-सादा के विद्रोहों के कारण बहमनी साम्राज्य की स्थापना हुई।

दक्कन का प्रथम स्वतन्त्र शासक ‘इस्माइल मख नासिरुद्दीन शाह’ था, लेकिन अधिक उम्र होने के कारण उसने पद त्याग दिया। अमीरों ने उसके अनुयायी जफर खाँ (हसन गंगू) को शासक चुना।

जफर खाँ (1347-1358 ई.) 1347 ई. में अबुल मुज्जफर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से शासक बना व बहमनी साम्राज्य की नींव डाली। वह अफगान था।

उसने गुलबर्गा को राजधानी बनाया व उसका नाम अहसानाबाद रखा।

फरिश्ता के अनुसार हसन प्रारम्भ में गंगू नामक ब्राह्मण का नौकर था अतः उसे हसन गंगू कहा गया। हसन गंगू ने बहमन शाह की उपाधि धारण की अन्य विचार के अनुसार वह अपने को पौराणिक ईरानी यौद्धा बहमन शाह का वंशज मानता था।

उसने अपने साम्राज्य को चार प्रान्तों (तरफ) में विभाजित किया-गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर

प्रत्येक तरफ एक तरफदार के अधीन था। गुलबर्गा का तरफ सबसे महत्त्वपूर्ण था। बीजापुर इसमें सम्मिलित था।

उसने पश्चिमी तट के सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह दाभोल (दाबुल) पर भी अधिकार कर लिया।

उसने दक्षिण के हिन्दू शासकों को अपने अधीन किया व हिन्दुओं से जजिया न लेने का आदेश दिया।

वह पहला मुस्लिम शासक था जिसने जजिया माफ कर दिया। दूसरा शासक जैनुल अबीदीन व तीसरा शासक मुगल बादशाह अकबर था।

मुहम्मद शाह प्रथम (1358-1373 ई.) :-

उसने प्रशासन को पुनर्गठित किया तथा केन्द्रीय प्रशासन को 8 विभागों में विभक्त कर अलग-अलग मंत्री नियुक्त किये। उसने तेलंगाना (वारंगल) के कंपा नायक से युद्ध कर विजय प्राप्त की। कंपा नायक ने गोलकुण्डा का प्रदेश बहमनी साम्राज्य को दे दिया तथा तख्त-ए फिरोजा नामक राजसिंहासन भी दिया।

1367 ई. में विजयनगर शासक बुक्का प्रथम ने रायचूर दोआब की मांग को लेकर तुगंभद्रा दोआब में स्थित मुदकल के किले पर आक्रमण किया व नागरिकों का नरसंहार किया। बदले में मुहम्मद प्रथम ने भी विजयनगर पर आक्रमण कर निर्दोष हिन्दुओं की हत्या की एवं युद्ध को जिहाद का रूप दिया। इसी युद्ध में पहली बार बारूद का प्रयोग हुआ।

दोनों पक्षों में भविष्य के युद्धों में निहत्थे नागरिकों की हत्या न करने का समझौता हुआ।

मुहम्मद शाह प्रथम ने प्रधानमंत्री (वजीर/वकील) सैफुद्दीन गौरी की मदद से प्रशासनिक प्रणाली की नींव रखी।

उसने अमीर-ए-जुमला (वित्तमंत्री) तथा वजीर-ए-अशरफ (विदेश मंत्री) भी नियुक्त किये।

मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु के पश्चात् अलाउद्दीन मुजाहिद (1373 77 ई.) एवं दाउद खाँ (1378 ई.) अल्प समय के लिए शासक बने।

मुहम्मद शाह द्वितीय (1378-1397 ई.) :-

यह शान्तिप्रिय व विद्वानों का संरक्षक था। उसने प्रसिद्ध फारसी कवि हाफिज को गुलबर्गा आने का निमंत्रण दिया। उसके काल में विजयनगर में शान्ति रही व कोई युद्ध नहीं हुआ।

दर्शन व कविता के प्रति अभिरूचि के कारण मुहम्मद शाह द्वितीय को ‘दूसरे अरस्तू’ की उपाधि से विभूषित किया गया।

ताजुद्दीन फिरोज शाह (1397-1422)-

फिरोज विद्वान शासक था। उसने चौल व दाभोल के बन्दरगाहों को व विकसित किया।

उसने विजयनगर से तीन युद्ध किए। प्रथम दो में वह विजयी रहा।

फिरोज ने विजयनगर के शासक देवराय प्रथम को सोनार की बेटी के युद्ध में पराजित किया। देवराय प्रथम ने दस लाख हून, मोती व हाथी हर्जाने के रूप में दिये।

देवराय ने अपनी पुत्री का विवाह फिरोज से किया व बंकापुर का क्षेत्र दहेज में दिया। फिरोज ने गौड़वाना क्षेत्र के खेरला शासक की पुत्री से भी इससे पहले विवाह किया।

फिरोज ने पश्चिम एशिया के मुसलमानों को आमन्त्रित कर प्रशासन में ऊँचे पद दिये, जिससे अमीर वर्ग अफाकी (विदेशी) व दक्कनी (घरीब/देशी) दो गुटों में बंट गया। इस गुटबन्दी से बहमनी साम्राज्य का विघटन हुआ।

अफाकी शिया थे व दक्कनी सुन्नी थे। अफाकियों में ईरानी, अरब व तुर्क थे।

बुरहान ए मआसिर के लेखक के अनुसार फिरोजशाह कुरान की नकल की प्रतियां बेचकर आजीविका चलाता था।

फिरोजशाह अरबी, फारसी, तुर्की, तेलुगू, कन्नड़ एवं मराठी भाषाओं का जानकार था।

फिरोज ने प्रशासन में बड़े स्तर पर हिन्दुओं को शामिल किया।इसके समय से दक्कनी ब्राह्मण प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगे। 10.फिरोज विजय नगर से तीसरे युद्ध में पांगुल नामक स्थान पर देवराय प्रथम से पराजित हुआ। इस पराजय के बाद फिरोज के भाई अहमद शाह प्रथम ने उसे सिंहासन से हटा दिया व स्वयं शासक बना।

इसने भीमा नदी के किनारे फिरोजाबाद नगर एवं नक्षत्रशाला (जंतर मंतर) की स्थापना की।

फिरोज के गुलबर्गा के सन्त गेसूदराज से कटु संबंध थे। गेसूदराज को भू अनुदान दिया था।

फिरोज गुलबर्गा का अन्तिम सुल्तान था।

शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम अहमदशाह वली (1422-1435 ई ) :-

अहमद ने 1425 ई. में राजधानी गुलबर्गा से बीदर स्थानांतरित कर दी तथा इसका नाम मुहम्मदाबाद रखा।

अहमद के शासनकाल में दक्कनी व विदेशी अमीरों की गुटबंदी अत्यधिक बढ़ गई व साम्प्रदायिक रूप ले लिया।

इसने वारंगल के शासक की हत्या कर वारंगल का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त कर दिया।

इसने मालवा के हुशंग शाह को भी पराजित किया।

अहमद के दरबार में खुरासान का प्रसिद्ध कवि शेख आजरी आया था।

अहमद शाह को न्याय व धर्मनिष्ठता के लिये तथा सूफी सन्त गेसूदराज के शिष्य होने के कारण वली (सन्त) कहा जाता था।

गेसूदराज को बन्दा नवाज भी कहा जाता था।

गेसूदराज दक्षिण का पहला विद्वान था जिसने उर्दू में ‘मिरात-उल-आशिकी’ नामक ग्रन्थ लिखा।

अहमद की अन्तिम विजय कोंकण पर थी।

अहमद प्रथम ने सेना में मनसबदारी प्रथा शुरू की।

अलाउद्दीन अहमद द्वितीय (1436-1458 ई.)-

इसके काल में ईरान (अफाकी) निवासी महमूद गवां को राज्य की सेवा में लिया गया। महमूद गवाॅं पहले व्यापारियों का प्रमुख (मलिक तुज्ज़ार) था। महमूद गवाँ अफाकी शिया थे। इसने बीदर में अस्पताल का निर्माण करवाया।

हुमायूँ (1458-1461 ई.)-

यह अलाउद्दीन का पुत्र था तथा इतना क्रूर था कि उसे जालिम को उपाधि दी गई। इसे दक्कन का नीरो भी कहा जाता था।

हुमायूँ ने महमूद गवां को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा एक प्रशासनिक परिषद की नियुक्ति की जिसमें राजमाता व गवाँ सहित चार व्यक्ति थे। हमायूँ का आठ वर्षीय पुत्र निजाम शाह (1461-63ई.) शासक बना किन्तु दो वर्ष में ही उसकी मृत्यु हो गई।

मुहम्मद शाह तृतीय (1463-1482 ई.)-

राज्यारोहण के समय इसकी आयु मात्र नौ साल थी, अतः महमूद गवाँ इसका प्रधानमंत्री रहा। गवाँ को ख्वाजा जहां की उपाधि दी गई। गवाँ बीजापुर का तरफदार था।

रूसी यात्री निकितिन ने मुहम्मद तृतीय के काल में बहमनी साम्राज्य की यात्रा की।

महमूद गवाँ

महमूद गवाँ ने अपने कुशल नेतृत्व व सैन्य शक्ति के बल पर बहमनी साम्राज्य का विस्तार किया।

उसने मालवा को पराजित किया।

महमूद गवाँ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि 1472 ई. में गोवा पर अधिकार थी। गोवा विजयनगर के अधिकार में था।

गोवा पश्चिमी समुद्र तट का सर्वाधिक प्रसिद्ध बन्दरगाह था। 1473 ई. में उसने बेलगाँव/बेलगाम जीता, विजयनगर से दाभोल भी जीता।

महमूद गवां ने साम्राज्य के चार प्रान्तों को आठ प्रान्तों में विभाजित कर दिया। बरार को गाविल और माहुर, गुलबर्गा को बीजापुर एवं गुलबर्गा, दौलताबाद को दौलताबाद एवं जुन्नार तथा तेलंगाना को राजमुंद्री और वारंगल के रूप में विभाजित किया।

महमूद गवाँ ने प्रान्तीय गवर्नरों के अधिकारों पर नियंत्रण रखा था। उनसे कुछ प्रदेश लेकर खालसा भूमि में परिवर्तित किया गवर्नर के अधीन केवल एक ही किला रहने दिया।

उसने भूमि की पैमाइश व लगान निर्धारण की जाँच कराई।

महमूद गवाँ विद्वानों का संरक्षक था। उसने बीदर में महाविद्यालय एवं मदरसा की स्थापना कराई।

गवां ने कई ग्रन्थ लिखे। ये थे:- रौजत-उल-इन्शा,दीवान-ए-असरा एवं मनाजिर उल इन्शा

गवाॅं ने इराक, ईरान, मिस्र, टर्की आदि देशों के सुल्तानों के साथ पत्र व्यवहार किया। इन पत्रों को रियाजुल इन्शा कहा जाता था।

गवाॅं ने तगा नामक स्केल का विकास किया।

महमूद गवाँ अफाकियों व दक्कनियों के बीच की दलीय गुटबन्दी शिकार हो गया और महमूद तृतीय ने इसे 1481 में मृत्युदण्ड दे दिया।

महमूद गवाॅं की के साथ ही बहमनी साम्राज्य का पतन तीव्र हो गया।

बहमनी प्रशासन

बहमनी साम्राज्य प्रान्तो में बंटा हुआ था, जिन्हें तरफ कहा जाता एवं सूबेदार को तरफदार कहा जाता था।

प्रान्तों का विभाजन सरकार, परगना एवं ग्रामों में हुआ था।

सुल्तान की सहायता के लिए 8 मंत्री होते थे।

  • प्रधानमंत्री – वकील-उस-सल्तनत
  • वित्तमंत्री – अमीर-ए-जुमला
  • उपवित्तमंत्री – नाजिर
  • विदेश मंत्री – वजीर-ए-अशरफ
  • न्यायाधीश एवं धार्मिक कार्य – सद्र-ए-जाहर
  • सेनापति – अमीर-उल-उमरा (यह सुल्तान के बाद सेना का सबसे बड़ा अधिकारी था।)

अमीर उल उमरा के नीचे बारबरदान होते थे जो आवश्यकता के समय सेनाओं को इकट्ठा करते थे।

पेशवा ‘वजीर एकुल’ एवं प्रधानमंत्री कार्यालय से सम्बन्धित था।

सैफद्दीन गोरी प्रथम पाँच बहमनी शासकों के काल में मंत्री रहा तथा महमूद गवाँ अन्तिम तीन वास्तविक बहमनी शासकों (अलाउद्दीन अहमद द्वितीय,

हुमायूँ व मुहम्मद तृतीय) के काल में प्रमुख अधिकारी व प्रधानमंत्री रहा।

बहमनी राज्य की मुद्रा हूण थी।

दक्कन के शासकों ने भू-राजस्व का रियायती मूल्यांकन के लिए इस्तवा उपाय किए।

महमूद शाह तृतीय (1482-1518 ई.) के काल में एक विदेशी तुर्की सरदार अमीर अली बरीद का पिता कासिम बरीद प्रधानमंत्री था। महमूद शाह व उसके उत्तराधिकारी कठपुतली मात्र थे।

बहमनी वंश का अन्तिम सुल्तान कलीमुल्ला शाह था 1527 ई. में उसकी मृत्यु के साथ ही बहमनी साम्राज्य का अन्त हो गया। बहमनी साम्राज्य के अन्त का प्रमुख कारण प्रान्तपतियों का विद्रोह । इसके स्थान पर पाँच नवीन राजवंशों का उदय हुआ।

 राज्य
बीजापुर (1489 ई.)
अहमदनगर (1490 ई.)
बरार (1490 ई.)
गोलकुण्डा (1512 ई.)
बीदर (1527 ई.)
राजवंश
आदिलशाही
निजामशाही
इमादशाही
कुतुबशाही
बरीदशाही
संस्थापक
युसूफ आदिल खाँ
मलिक अहमद
फतेहउल्ला इमादशाह
कुलीशाह
अमीर अली बरीद

बरार

सबसे पहले बहमनी साम्राज्य से बरार 1484 ई. में फतहउल्ला इमादशाह के नेतृत्व में स्वतन्त्र हुआ, लेकिन 1490 ई. में इसे स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता मिली।

इसने इमादशाही वंश की स्थापना की। फतहउल्ला हिन्दू से मुसलमान बना था।

1574 ई. में अहमदनगर ने बरार को हड़पकर इसका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर दिया और 1595-96 ई. में अकबर के साथ हुई संधि के तहत् बरार अहमदनगर से मुगलों को दे दिया गया।

बरार ने 1565 ई. में विजयनगर के विरुद्ध तालीकोटा युद्ध में भाग नहीं लिया था

बीदर

अमीर अली बरीद ने 1527 ई. में बीदर में स्वतंत्र बरीदशाही वंश की स्थापना की। इसे ‘दक्कन की लोमड़ी’ कहा जाता था। यह बहमनी साम्राज्य का अन्तिम वजीर (प्रधानमंत्री) था।

बीदर बहमनी साम्राज्य से स्वतंत्र होने वाला अन्तिम राज्य था।

1618-19 ई. में बीजापुर ने बीदर को हड़प लिया और 1656 ई. में बीजापुर ने बीदर मुगलों को सौंप दिया।

अहमदनगर

अहमद नगर राज्य की स्थापना मलिक अहमद ने 1490 ई. में की एवं निजामशाही वंश की नींव रखी।

मलिक अहमद ने ही 1490 ई. में अहमदनगर शहर की स्थापना की तथा अपनी राजधानी जुन्नैर से वहां स्थानान्तरित की।

महमूद गवाँ के बाद मलिक अहमद बहमनी साम्राज्य का वजीर बना तथा निजामुलमुल्क की उपाधि धारण की।

मलिक अहमद के पिता निजामुलमुल्क बहरी हिन्दू थे जिन्होंने बाद में इस्लाम स्वीकार किया।

बुरहान निजामशाह (1508-53 ई.):-

1508 ई. में मलिक अहमद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बुरहान शासक बना।

अहमदनगर सुल्तानों में वह पहला था जिसने निजामशाह की उपाधि धारण की मुकम्मल खाँ दक्किनी उसका प्रधानमंत्री था

हुसैन निजाम शाह (1553-65 ई.) :-

इसके शासन काल में 1562 ई. में बीजापुर के आदिलशाह एवं गोलकुण्डा के कुतुबशाह ने विजयनगर के रामराय के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा बनाकर अहमदनगर पर आक्रमण कर मुस्लिमों को बुरी तरह लूटा।

हुसैन निजाम शाह 1565 ई. में विजय नगर के विरुद्ध तालीकोटा के युद्ध में बने मुस्लिम संघ में शामिल था। चाँद बीबी हुसैन निजाम शाह की बेटी तथा बुरहान द्वितीय बेटा था।

मुर्तजा निजाम शाह (1565-1588 ई.) :-

इसके काल में मुगलों ने पहली बार अहमदनगर पर आक्रमण किया।

मुर्तजा निजामशाह ने बरार को 1574 ई. में अहमदनगर में मिलाया।

बुरहान निजाम शाह द्वितीय (बुरहान उल मुल्क) (1591-95 ई ) :-

इसके शासन काल में सैयद अली तबतबा द्वारा बुरहान-ए-मासिर नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ की रचना हुई।

इसकी मृत्यु के बाद चाँद बीबी (बीजापुर के अली आदिल शाह को पत्नी) ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने पति की मृत्यु के बाद वह वापस अहमदनगर आ गई।

बुरहान की मृत्यु के बाद अहमदनगर के दरबार में चाँद बीबी व मियाँ मंझू के गुट में टकराव हुआ। मियां मंझू ने मुगल सम्राट अकबर के पुत्र मुराद से मदद माँगी।

चाँद बीबी ने बुरहान के पुत्र बहादुर (1595-1600 ई.) का पक्ष लिया।

चाँद बीबी ने मुगलों का बहादुरी से मुकाबला किया किन्तु उसे अन्त में समझौता कर बरार का क्षेत्र मुगलों को सौंपना पड़ा। मुगलों ने बहादुर के राजगद्दी के दावे को मान्यता दी।

विरोधी गुट ने 1599 ई. में चाँद बीबी की हत्या कर दी व बहादुर को मुगलों ने बन्धक बनाकर ग्वालियर भेज दिया।

बहादुर निजामशाह के बन्धक बनने के बाद मुर्तजा निजामशाह द्वितीय शासक बना। इसने अहमदनगर, बालाघाट और दौलताबाद के कुछ हिस्से मुगलों को सौंप दिये व शेष राज्य का मुगलों के प्रति वफादारी की शर्त पर शासक बना।

मलिक अम्बर:-

यह अबीसीनियाई दास था। इसने मुर्तजा द्वितीय (1600-1610 ई.) को सुल्तान घोषित कर मुगलों के विरुद्ध अहमदनगर की कमान संभाली।

मलिक अम्बर ने मुगलों के विरुद्ध छापामार पद्धति से युद्ध किया. लेकिन 1617 ईव 1621 ई. में खुर्रम (शाहजहाँ) से पराजित हुआ।

मलिक अम्बर ने दक्षिण में टोडरमल की भूमि व्यवस्था के आधार पर रैयतबाड़ी (जाब्ती) व्यवस्था लागू की तथा भूमि को ठेके पर देने की प्रथा समाप्त की।

वर्गी गिरि (गुरिल्ला) युद्ध नीति का जनक भी मलिक अम्बर था।

मलिक अम्बर की 1626 ई. में मृत्यु के बाद मुगल बादशाह शाहजहाँ ने 1633 ई. में अहमदनगर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

बुरहान तृतीय (1610-1632 ई.) के बाद हुसैन तृतीय (1632 33 ई.) शासक हुआ। हुसैन तृतीय अहमद नगर का अंतिम शासक था। इसे शाहजहाँ ने ग्वालियर के किले में कैद करवा लिया।

बीजापुर

बीजापुर के सूबेदार युसूफ आदिल खाँ ने 1489-90 ई. में बीजापुर को स्वतन्त्र घोषित कर आदिलशाही वंश की स्थापना की। वह अपने को तुर्की के सुल्तान का वंशज मानता था।

युसूफ आदिल खाँ ने फारसी के स्थान पर हिन्दवी (दक्कनी उर्दू) को राजभाषा बनाया।

आदिल खाँ शिया था। उसने अन्य धर्मों व कला और साहित्य को भी संरक्षण दिया। 1510 ई. में पुर्तगालियों ने युसूफ आदिल खाँ से गोवा छीन लिया।

इस्माइल आदिल शाह (1510-34 ई.) युसूफ आदिल शाह का उत्तराधिकारी था।

इब्राहीम आदिलशाह (1534-1558 ई. ) :-

इब्राहीम बीजापुर का पहला शासक था जिसने शाह की उपाधि धारण की। उसने हिन्दुओं को राजकीय पदों पर नियुक्त किया।

इस समय असद खाँ बीजापुर का योग्य मंत्री था।

अली आदिलशाह (1558-1580 ई.) :-

इसे सूफी के रूप में जाना जाता है। वह हिन्दू व मुस्लिम सन्तों से चर्चा करता था।

अली आदिलशाह ने अकबर से भी पहले कैथोलिक मिशनरियों को अपने दरबार में बुलाया।

इसका विवाह अहमद नगर के हुसैन निजामशाह की पुत्री चाँद बीबी से हुआ।

अली आदिलशाह ने अपने पुस्तकालय में संस्कृत के विद्वान वामन पंडित को नियुक्त किया।

अली आदिलशाह का विजयनगर के विरुद्ध बनाये गये मुस्लिम राज्यो के संगठन में प्रमुख हाथ था। इसे रामराय अपने पुत्र के समान समझता था।

इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय (1580-1627 ई.)-

वह महान विद्वान एवं उदार शासक था। उसके उदार दृष्टिकोण के कारण प्रजा उसे जगत गुरु भी कहती थी।

गरीबों की सहायता करने के कारण उसे अबलाबाबा एवं गरीबों का मित्र भी कहा जाता था।

इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय ने हिन्दी गीत संग्रह किताब-ए  नौरस की रचना की।

उसने पंढारपुर के विठोबा मन्दिर को भी दान दिया।

इब्राहीम ने नौरसपुर नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाई।

इसने अपने गीतों में विद्या व संगीत की देवी सरस्वती का आह्वान किया है।

इब्राहीम के शासन काल में मोहम्मद कासिम हिन्दू शाह उर्फ फरिश्ता (1560-1620 ई.) ने तारीख-ए-फरिश्ता (गुलशन-ए इब्राहीम) नाम ऐतिहासिक ग्रन्थ की रचना की। यह पुस्तक मुगल बादशाह जहांगीर के समय 1612 ई. में पूरी हुई।

एलेक्जेण्डर डोव ने 1768 ई. में तारीख-ए-फरिश्ता का अंग्रेजी अनुवाद किया।

इब्राहीम के काल में शुरू के वर्षों में उसकी चाची चाँदी बीबी बीजापुर की वास्तविक शासिका रही, क्योंकि इब्राहिम नौ वर्ष की आयु में ही शासक बना।

इसने अपनी पुत्री का विवाह अकबर के पुत्र दानियाल से किया।

इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय ने उर्दू को राजकीय भाषा बनाया।

इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय का मकबरा ‘इब्राहीम रोजा’ है जिसका निर्माण उसने स्वयं करवाया।

उसकी बेगम ताज सुल्ताना भी इसी मकबरे में दफन है।

मुहम्मद अली आदिलशाह द्वितीय (1627-1672 ई.)-

वह इब्राहीम का पुत्र व उत्तराधिकारी था। इसने शाहजहाँ से 1636 में सन्धि कर मुगल अधीनता स्वीकार की।

मुहम्मद अली आदिल शाह द्वितीय का मकबरा गोल गुम्बज के नाम से विश्व विख्यात है।

इसके समय मुरारी पंडित ने बीजापुर की राजनीति में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिवाजी के पिता शाहजी भी बीजापुर में महत्वपूर्ण अधिकारी थे। शाहजी पहले अहमदनगर की सेवा में थे।

1686 ई. में औरंगजेब ने बीजापुर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया। इस समय बीजापुर का सुल्तान सिकन्दर आदिलशाह था। उसे मृत्यु के बाद धार्मिक गुरु शेख फहीमुल्ला की कब्र के पास दफना दिया गया।

गोलकुण्डा

गोलकुण्डा के कुतुबशाही वंश के राज्य की स्थापना कुलीशाह ने 1512 या 15.18 ई. में की।

कुलीशाह की 1543 ई. में उसके पुत्र जमशेद (1543-1550 ई.) ने हत्या कर दी।

गोलकुण्डा का राज्य वारंगल के हिन्दू राज्यों के स्थान पर बना।

 

इब्राहीम कुली कुतुबशाह (1550-1580 ई.)-

इब्राहीम गोलकुण्डा का पहला सुल्तान था, जिसने कुतुबशाह की उपाधि धारण की वह विजयनगर के विरुद्ध 1565 ई. में बने मुस्लिम राज्यों के संघ में भी शामिल था। इसके समय मुरारी राव पेशवा बना

मुहम्मद कुली कुतुबशाह (1580-1612 ई.)-

इसकी साहित्य व स्थापत्य में रूचि थी। यह हैदराबाद नगर का संस्थापक था। इसने दक्कनी उर्दू में प्रथम दीवान (काव्य संग्रह) की रचना की।

हैदराबाद को साहित्यकारों का बौद्धिक क्रीड़ा स्थल कहा जाता है।

मुहम्मद कुली कुत्तुबशाह दक्कनी उर्दू काव्य का जन्मदाता माना जाता है।

मुहम्मद कुली ने उर्दू व तेलुगू को समान रूप से संरक्षण दिया।

उसने प्रथम बार धर्म निरपेक्ष विषयों पर कविता लिखी।

मुहम्मद कुली कुतुबशाह ने 1591 ई. में हैदराबाद की चार मीनार का निर्माण कराया।

मुहम्मद कुतुबशाह ने 1612 से 1626 ई. तक शासन किया।

अब्दुल्ला कुतुबशाह (1626-1672 ई.)-

यह अल्पायु ( 11 वर्ष) होने के कारण अपनी माता हयात बख्श बेगम के संरक्षण में सुल्तान बना

अब्दुल्ला कुतुबशाह ने 1636 ई. में मुगलों से सन्धि कर ली तथा मुगल बादशाह शाहजहाँ का नाम खुतबा व गोलकुण्डा के सिक्कों में सम्मिलित किया।

मिर्जा निजामुद्दीन अहमद के ‘हकीकत-उस-सलातीन‘ से हमें अब्दुल्ला कुतुबशाह के शासन के इतिहास का वर्णन मिलता है।

अब्दुल्ला के काल में मीर मुहम्मद सैयद (मीर जुमला) नामक फारसी उसका बजीर था, जो बाद में मुगलों की सेवा में चला गया।

गोलकुण्डा के अन्तिम सुल्तान अबुल हसन के काल में 1672 ई. से 1687 ई. तक मदन्ना व अखन्ना दो भाइयों ने गोलकुण्डा के प्रशासन व सेना पर नियंत्रण कर रखा था।

1687 ई. में औरंगजेब ने गोलकुण्डा को मुगल साम्राज्य में मिला लिया व सुल्तान अबुल हसन कुतुबशाह को बन्दी बनाकर दौलताबाद के किले में भेज दिया।

वजबी व फैज नामक विद्वान भी गोलकुण्डा के दरबार में थे।

वजबी ने कुतुब मुशतरी व सबरस नामक किताबें लिखी।

मुहम्मद नुसरत नामक विद्वान ने दक्षिण में उर्दू में गुलशन-ए-इश्क, अलीनामा व तारीखे सिकन्दरी लिखी।

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बहमनी साम्राज्य FAQ

Q 1 बहमन साम्राज्य का अंतिम शासक कौन था?

Ans – बहमनी साम्राज्य का अंतिम शासक कलीमुल्लाह था

Q 2 बहमनी साम्राज्य की राजधानी क्या है?

Ans – बहमनी साम्राज्य की राजधानी गुलबर्ग थी

Q 3 बहमनी साम्राज्य की स्थापना कब हुई थी?

Ans – 1347

Q 4 बहमनी साम्राज्य के पतन के बाद कितने नए राज्यों का उदय हुआ?

Ans – 5

बहमनी साम्राज्य में प्रांतों को क्या कहा जाता था?

Ans तरफ अथवा प्रान्तों

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