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भक्ति आंदोलन | Bhakti Andolan

भक्ति आंदोलन | Bhakti Andolan

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भक्ति आंदोलन | Bhakti Andolan

वैसे तो श्वेताश्वेत्तर उपनिषद में पहली बार भक्ति का उल्लेख मिलता है। किन्तु भक्ति का सर्वप्रथम विस्तृत उल्लेख श्रीमद्भगवत्गीता में है जहाँ इसे मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है।

भक्ति आन्दोलन का उद्भव दक्षिण भारत से हुआ था।

मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन (13वीं से 16वीं सदी) भक्ति का पुनर्जन्म या भक्ति का द्वितीय चरण है, इसका प्रथम चरण या आरम्भ 7वीं सदी में दक्षिण भारत में अलवार/आलवार (वैष्णव ) एवं नयनारों (शैव) द्वारा किया गया था।

मध्यकाल में वैदिक धर्म की जटिलता, दिल्ली के सुल्तानो की कठोर नीति, हिन्दुधर्म में सुधार की आवश्यकता तथा हिन्दु-मुसलमानों में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से भक्ति को साधन बनाकर एक आन्दोलन प्रारम्भ किया, जो कि भक्ति आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है। अपने शान्त स्वरूप के कारण इसे मौन क्रान्ति भी कहा गया है।

  • भक्ति आन्दोलन की पृष्ठभूमि शंकराचार्य ने तैयार की थी, जबकि भक्ति आन्दोलन के जनक/ प्रवर्तक रामानुजाचार्य थे।
  • वैष्णव सम्प्रदाय चार प्रमुख शाखाओं में विभाजित था।
  • प्रथम सम्प्रदाय रामानुज के समर्थकों का था जो लक्ष्मी नारायण की पूजा व भक्ति में विश्वास करते थे। 8.दूसरा सम्प्रदाय चैतन्य महाप्रभु का था।
  • तीसरा सम्प्रदाय वल्लभाचार्य के समर्थकों का था। सूरदास व मीराबाई भी इसी सम्प्रदाय के थे। वे श्री  कृष्ण की पूजा करते थे व मूर्ति पूजा पर बल देते थे।
  • चौथा सम्प्रदाय रामानन्द के समर्थकों का था। वे राम-सीता की पूजा करते थे।
  • वैष्णव भक्ति आंदोलन पर भागवत् पुराण का प्रभाव था।

भक्ति आंदोलन के प्रमुख सन्त

रामानुज/रामानुजाचार्य, निम्बार्क (12वीं सदी), मध्वाचार्य (1199-1278 ई.), रामानन्द (15वीं सदी), कबीर (1398-1518 ई.), रविदास (रैदास), गुरु नानक (1469-1538 ई.), दादू (1544-1603 ई.), चैतन्य

रामानुज/रामानुजाचार्य :-

रामानुज वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। ये वेदान्त के विशिष्टाद्वैत दर्शन (1017-1137 ई.) के प्रणेता थे तथा सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे। इन्होंने श्री संप्रदाय की स्थापना की।

रामानुज का जन्म तमिलनाडु के पेराम्बदूर में हुआ था इनकी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र काँची और श्रीरंगम था। इन्होंने श्रीरंगम के मन्दिर में शिक्षण का कार्य भी किया।

इन्होंने श्रीरंगम के यतिराज नामक संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली।

शैव अनुयायी चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम के विरोध के कारण रामानुज को श्रीरंगम छोड़ना पड़ा तथा तिरूपति को केन्द्र बनाया।

रामानुज ने अपने गुरु यादव प्रकाश से काँची में वेदान्त की शिक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात् रामानुज यामुनाचार्य के शिष्य बने।

उन्होंने भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया।

रामानुज प्रथम सन्त थे जो ज्ञान के स्थान पर भक्ति को मुक्ति (मोक्ष) का साधन मानते थे और बताया कि जीव मोक्ष के बाद भी ईश्वर से अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखता है।

श्रीभाष्य नाम से ब्रह्मसूत्र पर भाष्य/टीका लिखी। वेदान्तसार, वेदान्त द्वीप एवं वेदान्त संग्रह की भी रचना की।

रामानुज ने शुद्रों को भागवत दर्शन एवं मोक्ष का अधिकार दिया।

रामानुज को दक्षिण का विष्णु का अवतार कहा जाता है।

उन्होंने होयसल वंश के जैन शासक विटिंग को वैष्णव बनाया, विटिंग ने अपना नाम बदलकर विष्णुवर्धन रख लिया।

रामानुजाचार्य की मृत्यु के बाद वैष्णव सम्प्रदाय बड़कलै एवं तैकले में विभाजित हो गया।

निम्बार्क (12वीं सदी) :-

निम्बार्क का जन्म दक्षिण (बेलारी, कर्नाटक) में हुआ। ये तेलुगू ब्राह्मण थे। ये रामानुज से प्रभावित थे व रामानुज के समकालीन थे

कुछ विद्वान निम्बार्क को 14वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध का मानते हैं, क्योंकि 14वीं सदी के पूर्वार्द्ध में माधवाचार्य द्वारा लिखित सर्वदर्शन संग्रह में निम्बार्क का उल्लेख नहीं है।

निम्बार्क का अधिकांश समय वृन्दावन में बीता। वे अवतारवाद में विश्वास करते थे।

निम्बार्क का एक नाम भास्कर भी था। इन्हें सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है।

इन्होंने राधाकृष्ण की भक्ति की व मथुरा के पास ब्रज (वृन्दावन) में अपना आश्रम स्थापित किया। इनका निधन 1172 ई. में हुआ।

वैष्णव सम्प्रदाय में इन्होंने द्वैताद्वैत दर्शन प्रचलित किया।

  • द्वैताद्वैत को भेदाभेद या सनक संप्रदाय भी कहते हैं। भेदाभेद से अभिप्राय है कि ईश्वर, आत्मा व जगत तीनों में समानता होते हुए भी परस्पर भिन्नता है।
  • राजस्थान में निम्बार्क पीठ अजमेर जिले में सलेमाबाद में है।
  • निम्बार्क ने दस श्लोकी सिद्धान्त रत्न की रचना की।
  • कृष्ण के साथ राधा की भक्ति पर बल देने वाले प्रथम संत निम्बार्क थे।

मध्वाचार्य (1199-1278 ई.) :-

इनका जन्म 1199 में दक्षिण भारत में उडुपी में हुआ।

मध्वाचार्य ने द्वैतवाद दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार ईश्वर व जीव पृथक-पृथक हैं।

इन्होंने शंकर व रामानुज के दर्शन का विरोध किया।

वे लक्ष्मी नारायण (विष्णु) के उपासक थे।

  • मध्व ने ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना की। मध्व को पूर्ण प्रज्ञ या आनन्द तीर्थ भी कहा जाता था। इन्हें वायु का अवतार माना जाता है।
  • इन्होंने वैष्णव धर्म से सम्बन्धित 36 पुस्तकों की रचना की थी।
  • मध्व का दर्शन भागवत पुराण पर आधारित था।

रामानन्द (15वीं सदी) :-

रामानन्द का जन्म इलाहाबाद में कान्यबुज ब्राह्मण परिवार में हुआ, लेकिन काशी में रहते थे। इनके गुरु का नाम राघवानन्द था, जिनसे धर्म की शिक्षा ली।

इन्होंने संस्कृत के स्थान पर हिन्दी में उपदेश दिये जिससे आन्दोलन की लोकप्रियता बढ़ी।

इन्होंने दक्षिण से उत्तरी भारत में भक्ति का प्रसार कर सेतु का काम किया। वे उत्तरी भारत के पहले महान् भक्ति आंदोलन के सन्त थे तथा रामानुज के शिष्य थे एवं रामानुज के श्रीसम्प्रदाय के पाँचवें गुरु (अध्यक्ष) बने, परन्तु इन्होंने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति की रामानन्द ने शैव एवं वैष्णव धर्म में प्रयाग में समन्वय स्थापित किया।

उन्होंने सभी वर्णों को उपदेश दिये। वे सभी जातियों को समान मानते थे, किन्तु उन्होंने जाति प्रथा का कोई विरोध नहीं किया।

इन्होंने जाति के स्थान पर मानव की एकता पर बल दिया एवं कहा “कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति से उसका धर्म, सम्प्रदाय एवं जाति न पूछे” (जात-पात पूछे ना कोई, हर का भजे सो हर का होई)

“ईश्वर मनुष्य के गुणों को देखता है, उसकी जाति नहीं। दूसरे संसार में कोई जाति नहीं है।” -रामानन्द 7.रामानन्द के 12 शिष्य थे। वे विभिन्न जातियों के थे जैसे रैदास (रविदास)- चमार, कबीर-जुलाहा, धन्ना-जाट, पीपा-राजपूत, सघना कसाई, सेना-नाई आदि 8.सघना, सेना व धन्ना के कुछ पद भी आदि ग्रंथ में संकलित हैं।

  • रामानन्द पहले भक्ति सुधारक थे जिन्होंने महिलाओं को भी अपना शिष्य बनाया जिसमें पद्मावती एवं सुरसीर प्रमुख थी।
  • सिखों के आदि ग्रंथ में रामानन्द का एक पद (दोहा) संकलित है।
  • उन्होंने रामानंदी सम्प्रदाय एवं वैरागी संघ का गठन किया।
  • रामनन्दी या रामावत सम्प्रदाय का राजस्थान में प्रथम केन्द्र गलता (जयपुर) एवं दूसरा रैवासा (सीकर) में है।
  • रामानन्द ने आनन्दभाष्य नाम से ब्रह्मसूत्र पर टीका लिखी।

कबीर (1398-1518 ई.) :-

इनको नीरू व नीमा नामक जुलाहा दंपती ने वाराणसी में लहरतारा के तालाब के पास पाया। शिशु कबीर को किसी विधवा द्वारा लोक लज्जा के भय से छोड़ दिया गया था।

कबीर अरबी भाषा का शब्द है ‌‌जिसका अर्थ है महान्। कबीर निर्गुण भक्ति एवं एकेश्वरवादी सन्त थे तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रवक्ता थे। उन्होंने मूर्ति पूजा, जात-पात, छुआ-छूत आदि का विरोध किया।

“पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूं पहार, ताते तो चकिया भली पीस खाय संसार” -कबीर

कबीर गृहस्थ सन्त थे तथा तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के कटु आलोचक थे। कबीर ने सती प्रथा एवं बाल विवाह के विरुद्ध आवाज उठायी थी। कबीर ने साम्प्रदायिक सद्भाव पर सर्वाधिक बल दिया।

कबीर ने प्रसिद्ध सूफी शेख तकी से भी दीक्षा ली थी। 17वीं सदी के सूफी ग्रन्थ मिरात उल असरार में कबीर को फिरदौसी सूफी कहा गया है।

इनके कुछ पद आदि ग्रंथ में संकलित हैं।

कबीर की शिक्षाएं उनके शिष्य भागदास ने बीजक में संगृहीत की कबीर की मृत्यु मगहर (कबीरनगर) में हुई।

कबीर बहलोल लोदी एवं सिकन्दर लोदी के समकालीन थे।

सबद, साखी, रमैनी, मंगल, बसन्त, होली, रेखताल आदि कबीर की रचनाएं है। कबीर की कुछ रचनाओं को उलट बाँसी के नाम से जाना जाता है।

  • कबीर की मृत्यु के बाद संत धर्मदास कबीर पंथ की गद्दी पर बैठे।
  • कबीर एवं धर्मदास के संवादों का संकलन अमरमूल नामक ग्रन्थ में है।
  • मलूक दास कबीर के प्रमुख अनुयायी थे। इनका जन्म कड़ा इलाहाबाद में 1574 ई. में खत्री परिवार में हुआ। ये भी गृहस्थ थे।
  • मलूकदास ने रत्नखान, ज्ञानबोध एवं परिचई ग्रन्थ लिखा।

रविदास (रैदास) :-

रविदास के तीस से अधिक भजन गुरुग्रन्थ साहब (आदि ग्रंथ) में संगृहीत हैं। ये रामानन्द के शिष्य थे तथा निम्न जाति (चमार/मोची) के थे। इनका जन्म वाराणसी (काशी) में हुआ।

कबीर ने रैदास को संतों का संत कहा है।

रैदास निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे।

मीरा बाई एवं रानी झाली भी रैदास की शिष्या थी।

रैदास ने रायदास (रैदास) सम्प्रदाय की स्थापना की।

रैदास के कथन है

“मन चंगा तो कठौती में गंगा”,

“हरि सब में है और सब हरि में’

गुरु नानक (1469-1538 ई.) :-

इनका जन्म 1469 ई. में तलवंडी परिवार में हुआ। तलवंडी को ननकाना साहब कहा जाता है।

वे भी कबीर की भांति निर्गुण ईश्वर के उपासक थे तथा जाति-पाँति व आडम्बरों में विश्वास नहीं करते थे। वे मूर्तिपूजा, तीर्थ यात्रा आदि के भी विरोधी थे। निर्गुण ईश्वर को वे अकाल पुरुष कहते थे।

“ईश्वर मनुष्य के सदगुण को पहचानता है तथा उसकी जाति नहीं पूछता, आगामी दुनिया में कोई जाति नहीं होगी।” नानक

नानक के अनुसार यह युग एक कटार है और राजा कसाई है।

नानक ने स्त्रियों द्वारा परिवार एवं समाज में निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका की अपने उपदेशों में पहचान की।

गुरुनानक के शिष्य लहना एवं मरदाना थे, मरदाना सारंगी बजाता था, तो गुरुनानक रबाब के साथ गीत गाया करते थे।

  • नानक ने श्रीलंका, मक्का व मदीना का भी भ्रमण किया।
  • गुरुनानक के गीतों व उपदेशों को आदिग्रन्थ में संकलित किया गया।
  • जब लोदी वंश का पतन एवं बाबर सत्तारूढ़ हुआ, उस समय नानक के उपदेशों की प्रसिद्धि चरम पर थी।
  • गुरु नानक ने बाबर की आक्रमणकारी सेना को पाप की बारात कहा।
  • नानक की प्रसिद्ध रचना जपजी है, जो आदिग्रन्थ में संकलित है।
  • गुरुनानक का निधन करतारपुर (डेराबाबा) में हुआ।

दादू (1544-1603 ई.) :-

दादू दयाल भी निर्गुण भक्ति परम्परा के महत्वपूर्ण सन्त थे। इनका जन्म 1544 ई. में अहमदाबाद में हुआ। कुछ विद्वान उन्हें ब्राह्मण व कुछ जुलाहा परिवार का मानते हैं। वे कबीर के सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक थे।

इन गुरू कमाल (कबीर के पुत्र) थे।

दादू का प्रारम्भिक नाम महाबली था और ये जातिके धूनिया थे।

दादू कबीरपंथी थे एवं अकबर के समकालीन थे।

ईश्वर के सम्मुख सभी स्त्री पुरुष भाई-बहन है।” -दादू

राजस्थान में नराना (नरायणा) में इनकी मुख्य गद्दी थी।इस मत को मानने वाले मुख्यतः राजस्थान में ही मिलते हैं। थी।

इन्होंने मूर्ति पूजा, जाति प्रथा व कर्मकाण्ड का विरोध किया।

इनके उपदेश दादूवाणी में संगृहीत हैं, जिनमें लगभग 5000 छन्द हैं।

दादू गृहस्थ थे तथा मानते थे कि गृहस्थ जीवन आध्यात्मिक उन्नति के लिये अधिक उपयुक्त है।

दादू के अनुसार बिना गुरु के ईश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।

इन्होंने निपख संप्रदाय (असाम्प्रदायिक मार्ग) का उपदेश दिया एवं षडदर्शन के मूल्यों को अस्वीकार कर दिया। दादू ने विनम्रता पर अधिक बल दिया।

दादू पंथ को परब्रह्म सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

अकबर ने 1585 ई. में दादू को धार्मिक चर्चा के लिए एक बार फतेहपुर सीकरी बुलाया था।

आमेर नरेश भगवन्तदास दादू से प्रभावित थे। भगवन्तदास ने अकबर का दादू से परिचय करवाया।

दादू पंथ के सत्संग स्थल अलख दरीबा कहलाते हैं एवं प्रार्थना स्थल दादूद्वारा है।

दादूपंथी शवों को न जलाते है, न दफनाते हैं वरन् उसे पशु-पक्षियों के खाने के लिए जंगल में छोड़ आते हैं।

दादू की मृत्यु 1603 ई. में नरायना/नरैना (जयपुर) में हुई थी।

दादू की शिष्य परम्परा में 152 मुख्य शिष्य माने जाते हैं, जिनमें से 100 एकान्तवासी थे। शेष 52 शिष्य बावन स्तम्भ कहलाने लगे तथा 52 स्थानों पर दादू-द्वारे बनवाये।

दादूपंथ की पाँच शाखायें:-

  1. खालसा,
  2. विरक्त,
  3. उत्तरोद (उत्तरादेव),
  4. खाकी,
  5. नागा

नागा सम्प्रदाय की स्थापना सुन्दरदास द्वारा की गई। इस सम्प्रदाय के लोग सेना में भर्ती होना पसन्द करते थे। इनकी सैनिक टुकड़ी नागा फौज कहलाती थी।

  • दादू के मुख्य शिष्यों में सुन्दरदास, गरीबदास, बखना जी व रज्जब जी प्रमुख थे। दादू की मृत्यु के बाद गरीब दास गद्दी पर बैठे।
  • रज्जब हमेशा दुल्हे के वेश में रहते थे।
  • रज्जब ने कहा कि ‘यह संसार वेद है यह सृष्टि कुरान है।

चैतन्य महाप्रभु (1486-1533ई़)-

इनका जन्म 1486 ई. में नदिया या नवदीप (बंगाल) में ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनका बचपन का नाम निमाई था व वास्तिविक नाम विश्वम्भर था। इनके गुरू सुदर्शन एवं केशव भारती थे।

चैतन्य वैष्णव धर्म के कृष्णमार्गी शाखा से सम्बन्धित थे।

शिक्षा पूरी करने पर इन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई।

चैतन्य ने दो बार विवाह किया, किन्तु 24 वर्ष की आयु में संन्यास ले लिया।

चैतन्य ने बंगाल में गौड़ीय वैष्णव धर्म की स्थापना की। इसे मध्य गौड़ीय सम्प्रदाय या अचिन्त्य भेदाभेद सम्प्रदाय भी कहते हैं।

उनके दार्शनिक सिद्धान्त अद्वैतवाद की ही शाखा थे।

भक्ति कवियों में चैतन्य ने मूर्ति पूजा का विरोध नहीं किया। वे सभी को कृष्ण भक्ति के योग्य मानते थे किन्तु मुसलमानों और निम्न जातियों के लोगों को मंदिरों में प्रवेश के योग्य नहीं मानते थे।

चैतन्य ने 6 गोस्वामी वृन्दावन को तीर्थस्थल के रूप में स्थापित करने के लिए भेजे एवं गोसाई संघ की स्थापना की।

उनकी भक्ति साधना के 9 सिद्धान्त थे। सनातन एवं सपा नामक शिष्यों ने चैतन्य के विचारों को ठोस दार्शनिक आधार प्रदान किया।

चैतन्य की भक्ति मार्ग का आधार गान एवं नृत्य था।

इन्होंने वृन्दावन में कृष्ण भक्ति सम्प्रदाय को स्थापित किया तथा राधा-कृष्ण की उपासना को लोकप्रिय बनाकर वृन्दावन के गौरव को पुनः स्थापित किया।

चैतन्य को उनके अनुयायी कृष्ण या विष्णु का अवतार मानते है तथा गौरांग महाप्रभु के नाम से चैतन्य की पूजा करते हैं।

उड़ीसा के राजा प्रताप रूद्र गजपति उनके शिष्य थे। चैतन्य पुरी में रहते थे व पुरी में ही उनका निधन हुआ।

बंगाल के अलाउद्दीन हुसैनशाह एवं उड़ीसा के प्रताप रूद्रदेव नामक शासकों ने चैतन्य को संरक्षण दिया।

चैतन्य ने भक्ति में कीर्तन प्रथा एवं जोड़ी करताल को प्रसिद्ध बनाया।वे अपने अनुयायियों के साथ भक्ति भावना से ओत-प्रोत होकर नाचते थे।

हरिदास उनके मुख्य शिष्य थे। निम्न जाति व मुस्लिम समुदाय के लोग भी उनके शिष्य थे।

  • चैतन्य जयदेव व चण्डीदास के भक्ति गीतों से प्रभावित थे।
  • इन्होंने ज्ञान के स्थान पर प्रेम व भक्ति पर बल दिया।
  • चैतन्य सामाजिक सुधारक नहीं थे। उनके उपदेशों में समाज सुधार व सामाजिक बुराइयों पर ध्यान नहीं दिया गया है।
  • कविराज कृष्णदास द्वारा रचित चैतन्य चरितामृत में चैतन्य के उपदेशों का संग्रह है।

मीरा बाई (1498-1546 ई.) :-

मीराबाई भक्तिकाल की महान् महिला सन्त थी। इनका जन्म कुड़की (मेड़ता) में हुआ। इनके पिता राजा रतनसिंह राठौड़ थे।

मीराबाई का विवाह सिसोदिया वंश के मेवाड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज से हुआ।

मीरा भोजराज की मृत्यु के बाद कृष्ण भक्ति में लीन हो गई, कृष्ण को अपना पति माना तथा राजस्थानी व ब्रजभाषा में गीतों की रचना की।

मीराबाई ने पहले जीव गोस्वामी (चैतन्य संप्रदाय के भक्त) तथा फिर रैदास से दीक्षा ग्रहण की।

  • मीराबाई के भक्ति गीत को पदावली कहा जाता है। मीराबाई तुलसीदास के समकालीन थी।
  • इन्होंने राग गोविन्द एवं नरसी का मायरा की रचना एवं गीत गोविन्द पर टीका लिखी।
  • मीरा की तुलना प्रसिद्ध स्त्री सूफी संत रबिया से की जाती है। मीरा को मृत्यु द्वारका में हुई।

सूरदास :-

सूरदास का जन्म रुकनात गाँव (आगरा) में हुआ तथा जन्म से अन्धे थे। सूरदास ने वल्लभाचार्य से दीक्षा ग्रहण की।

ये अकबर व जहांगीर के समकालीन थे तथा जहांगीर के संरक्षण में सूरसागर की रचना की।

  • ये कृष्ण भक्त थे तथा सगुण भक्ति के उपासक थे।
  • इन्होंने ब्रजभाषा में सूरसागर, सूरसारावली तथा साहित्य लहरी की रचना की एवं भ्रमर गीतों की रचना की।
  • सूरदास को पुष्टिमार्ग का जहाज/अष्टछाप का जहाज कहा गया है। सूरदास का अब्दुर्रहीम खानखाना से सम्पर्क था।

तुलसीदास (1532-1623 ई.) :-

राम भक्त तुलसीदास का जन्म बादाॅं जिले (उत्तरप्रदेश) के राजापुर गाँव में हुआ।

तुलसीदास के पिता आत्माराम दुबे, माता हुलसी एवं पत्नी का नाम रत्नावली और गुरू नरहरिदास थे। तुलसीदास ने भी शैव-वैष्णव धर्म में समन्वय स्थापित किया था।

इन्होंने अकबर के काल में अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की।

दोहावली, गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, सतसई, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामज्ञा प्रश्न, वैराग्य संदीपनी, रामलला नहछू आदि इनकी अन्य प्रसिद्ध रचनायें है।

तुलसीदास अकबर एवं जहांगीर के समकालीन थे, किन्तु आइने अकबरी में उनका उल्लेख नहीं है।

वल्लभाचार्य (1479-1531 ई.) :-

ये मूलतः तेलंगाना के ब्राह्मण परिवार के थे। जब इनके माता पिता वाराणसी में तीर्थ यात्रा पर आये तो चम्पारण्य वन में वाराणसी में ही इनका 1479 ई. में जन्म हुआ। इनका निधन भी वाराणसी में गंगा में जल समाधि द्वारा हुआ।

वाराणसी में इन्होंने शिक्षा प्राप्त की। विजय नगर में कृष्णदेवराय समय इन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की। इन्होंने सबोधिनी और सिद्धान्त रहस्य एवं भक्तिवर्धिनी नामक धार्मिक ग्रन्थ लिखे।

वे कृष्ण भगवान की श्री नाथजी के नाम से पूजा करते थे तथा मूर्ति पूजा पर बल देते थे। श्रीनाथजी कृष्ण के बाल रूप को कहा जाता है।

वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ ने वृन्दावन में श्रीनाथजी का एक भव्य मन्दिर बनवाया व श्रीनाथ की मूर्ति स्थापित करवाई।

औरंगजेब के समय श्रीनाथजी की मूर्ति को उदयपुर पहुंचा दिया और सिहाड़ गाँव जहाँ यह मूर्ति प्रतिष्ठित की गई वह स्थान नाथद्वारा (जिला राजसमन्द, राजस्थान) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इन्होंने रूद्र संप्रदाय की स्थापना की व इनका दर्शन शुद्धाद्वैत था। वे पुष्टिमार्ग और भक्ति मार्ग में विश्वास करते थे।

बल्लभाचार्य पुष्टिमार्ग के संस्थापक एवं आचार्य थे।

वल्लभाचार्य वैष्णव धर्म के कृष्णमार्गी शाखा में थे।

कुछ विद्वानों ने इसे विष्णु स्वामी सम्प्रदाय भी कहा है तथा वल्लभाचार्य का दूसरा नाम विष्णु स्वामी बताते हैं।

वल्लभाचार्य को ‘जगतगुरू महाप्रभु श्रीमपदाचार्य की उपाधि विजनगर दरबार में मिली।

इन्होंने वेदान्त सूत्र की संस्कृत में टीका लिखी।

इन्होंने 4 वेद 6 शास्त्र एवं 18 पुराणों का अध्ययन किया।

वल्लभाचार्य को वैश्वानरावतार अग्नि का अवतार कहा गया है।

इन्होंने आत्मा व संसार का ब्रह्म के साथ पूर्ण सादृश्य माना है तथा आत्मा व ब्रह्म में किसी विभेद को स्वीकृति नहीं दी।

वल्लभाचार्य चैतन्य महाप्रभु के समकालीन थे।

इनके पुत्र विठ्ठलनाथ को अकबर ने गोकुल व जैतपुरा को जागीरें प्रदान की एवं गोस्वामी की उपाधि दी विठ्ठलनाथ द्वारा अष्टछाप की स्थापना की गई।

अष्टछाप में आठ कवि थे:-

  1. सूरदास
  2. कुम्भनदास
  3. परमानन्ददास
  4. कृष्णदास
  5. छीत स्वामी
  6. गोविन्द स्वामी
  7. चतुर्भुजदास
  8. नन्ददास

कबीर, नानक व दादू की भांति इन्होंने भी गृहस्थ जीवन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधक नहीं माना तथा इन्होंने भी संन्यास नहीं लिया।

वल्लभाचार्य ने प्रायश्चित, आत्मसंताप तथा संसार त्याग पर बल दिया।

शंकर देव (1449-1568 ई.) :-

शंकर असम एवं कामरूप के एकेश्वरवादी सन्त थे। वे विष्णु व उसके अवतार कृष्ण की भक्ति करते थे। उन्हें असम का चैतन्य महाप्रभु एवं नारंगदेव कहा जाता है।

इन्होंने असम, कामरूप एवं कूचबिहार में वैष्णव धर्म का प्रचार किया।

शंकर के उपदेशों को भगवती धर्म कहकर संबोधित किया जाता है, क्योंकि वे भगवद् गीता एवं भागवत पुराण पर आधारित थे।

शंकर ने अपने संप्रदाय में भगवत पुराण को मंदिर में पवित्र पुस्तक के रूप में प्रतिष्ठित करवाया।

इनके सम्प्रदाय को महापुरूषीय धर्म नाम से भी जाना जाता है।

शंकर ने वरगीत परम्परा को जन्म दिया।

इन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिए सत्र या मठ तथा नामधोरा देत (प्रार्थना गृह) को स्थापना को बढ़ावा दिया।

शंकर ने एक शरण सम्प्रदाय की स्थापना की। उनके धर्म में संन्यास का कोई स्थान नहीं था। उन्होंने गृहस्थ जीवन व्यतीत किया।

शंकर मूर्ति पूजा के विरोधी थे। वे एकमात्र कृष्ण वैष्णव सन्त थे जिन्होंने मूर्ति के रूप में कृष्ण पूजा का विरोध किया।

इन्होंने देवताओं के महिला सहयोगियों (राधा, सीता आदि) को मान्यता नहीं दी।

शंकरदेव की मुख्य काव्य रचना कीर्तनघोष है। शंकर ने भक्ति के  लिए नाम कीर्तन एवं श्रद्धावान भक्तों के सत्संग में ईश्वर के नाम उच्चारण पर बल दिया।

नरसी मेहता (15वीं सदी) :-

ये गुजरात के प्रसिद्ध सन्त थे। इन्होंने राधा कृष्ण की भक्ति में गुजराती में एक लाख दाहों की रचना की।

इनके गीत सुरत संग्राम में संकलित है।

महात्मा गांधी के प्रिय भजन ‘वैष्णवजन तो तेनों कहिये’ की रचना नरसी मेहता ने ही की थी।

सतनामी सम्प्रदाय:-

दादू के समकालीन सन्त वीरभान ने सतनामी संप्रदाय की स्थापना की।औरंगजेब के समय यह संप्रदाय बहुत लोकप्रिय हो गया था। ये मूर्तिपूजा, जाति प्रथा, संपत्ति संचय आदि का विरोध करते थे।

सतनामी सम्प्रदाय को मुण्डिया एवं मिनियास कहा जाता है। सतनामी बैरागीपथी (कबीरपंथी) थे। सतनामी सम्प्रदाय की स्थापना 1657 ई. में नारनौल में हुई।

इनकी पुस्तकें पोथी कहलाती है। औरंगजेब के खिलाफ इनके विद्रोह को बिशनसिंह कल्लवाह ने दबा दिया।

जगजीवन साहब सतनामी सम्प्रदाय से थे, जिन्होंने इस सम्प्रदाय को पुनः संगठित किया था।

अन्य सन्त व सम्प्रदाय :-

हितहस्विंश (हरिवमसा) ने 1551 ई. में राधावल्लभी संप्रदाय की स्थापना आगरा में की।

सखी सम्प्रदाय में कृष्ण को ही एकमात्र पुरुष माना गया, बाकी सभी पुरुषों को स्त्री (कृष्ण की सखी) माना गया है। इनके पुरुष अनुयायी भी स्त्री वेश-भूषा धारण किये रहते हैं।

सखी सम्प्रदाय को हरिदासी सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

लालस से लालदासी, रामचरन ने रामस्नेही और सहजानन्द ने स्वामी नारायणी धार्मिक सम्प्रदायों की स्थापना की।

नारायणी सम्प्रदाय की स्थापना नारायणदास ने गुजरात में की थी।

16वीं शताब्दी में पुरन्दरदास ने कर्नाटक में दासकूट आन्दोलन चलाया।

कश्मीर में लल्ला देवी मध्यकाल की महान् शैव महिला सन्त थी।

प्रणामी या धामी सम्प्रदाय की स्थापना प्राणनाथ ने की थी, जिन्होंने कुलजम स्वरूप ग्रन्थ की रचना की।

शिवनारायण सम्प्रदाय की स्थापना शिवनारायण ने की थी, बलिया (उत्तरप्रदेश) इनका प्रमुख क्षेत्र था, मुगल सम्राट मुहम्मदशाह रंगीला इसी सम्प्रदाय का अनुयायी था।

लालगिरी ने अलखगिरी सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

भक्ति आन्दोलन के अन्य तथ्य:-

स्वयं को लीन करने का सिद्धान्त निर्गुण उपासको से सम्बन्धित है। निर्गुण उपासको में कबीर, नानक, रैदास, रामानन्द, दादू एवं पीपा प्रमुख थे।

कश्मीर की रानी हब्बाखातुन कश्मीर की मीराबाई के नाम से प्रसिद्ध है।

शंकराचार्य को षण्मत स्थापनाचार्य कहते हैं। 4.मलिक मुहम्मद जायसी ने बारहमासा, आखिरी कलाम, अखरावट,कान्हावत की रचना की।

चंदेश्वर बिहार के एवं चण्डीदास बंगाल से थे।

बंगाल के नवदीप के रघुनन्दन ने हिन्दु धर्म पर 28 पुस्तकें लिखी।

 महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन

महाराष्ट्र धर्म वैष्णववादी भक्ति परम्परा से निकली मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन को एक शाखा थी।

चोखमेला, सान्मतमाली एवं नरहरी महाराष्ट्र में निम्न जाति में उत्पन्न संत और कान्होपात्रा निम्न जाति की महिला संत थी।

महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन पण्ढ़रपुर के देवता विठोबा या विठ्ठल देव के मन्दिर के चारों और केन्द्रित था।

विठोवा को कृष्ण का अवतार माना जाता है। 5.महाराष्ट्र धर्म दो सम्प्रदायों में विभाजित थाः-

बारकरी:- ये विठोबा के सौम्य भक्त थे। ये अधिक भावुक व सैद्धान्तिक थे। ज्ञानेश्वर, नामदेव एवं तुकाराम इसी सम्प्रदाय से थे।

धरकरी:- ये रामदास पंथ (Cult) के अनुयायी थे। ये अधिक तार्किक व व्यावहारिक थे। मुख्य देवता राम थे। रामदास एवं एकनाथ इसी सम्प्रदाय से थे।

दोनों सम्प्रदायों का अन्तर सतहों है। ईश्वर प्राप्ति दोनों का उच्चतम लक्ष्य था।

बारकरी को पवित्र तीर्थ यात्री एवं धरकरी को स्वतंत्रता के सेनानी कहा जाता है।

ज्ञानेश्वर या ज्ञान देव (13वीं सदी) :-

ज्ञानेश्वर का जन्म आलिन्दी में हुआ, इन्होंने महाराष्ट्र में भागवत धर्म की आधारशिला रखी। ज्ञानेश्वर को बारकरी सम्प्रदाय में विष्णु का अवतार एवं मराठी साहित्य का जनक माना जाता है।

इन्होंने मराठी भाषा में भागवत्‌गीता पर ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका नामक टीका लिखी।

ज्ञानेश्वर ने अम्रतानुभव, चंगदेव प्रशस्ति, हरिपाठ भी लिखी।

नाम देव (1270-1350 ई.) :-

इनका जन्म दर्जी (छीपा) परिवार में सतारा के नरसो बमनी गाँव में हुआ। ये बचपन में डाकू थे।

नामदेव के गुरु विसोबा खेचर थे। नामदेव का महाराष्ट्र धर्म के उदय में महत्त्वपूर्ण योगदान है, इन्होंने ब्रह्मणों की सत्ता को चुनौती दी एवं जाति प्रथा का विरोध किया।

इन्होंने वारकरी सम्प्रदाय की विचारधारा को लोकप्रिय बनाया ये विठोबा के परम भक्त थे।

नामदेव के कुछ पद्य गुरु ग्रन्थ साहिब (आदिग्रन्थ) में संकलित हैं।

इन्होंने दिल्ली में सूफी सन्तों से भी वाद-विवाद किया नामदेव इस्लाम धर्म से प्रभावित थे।

नामदेव ने कहा कि ‘‘एक पत्थर की पूजा होती है तो दूसरे को पैरों तले रौंदा जाता है। यदि एक भगवान है तो दूसरा भी भगवान है।”

नामदेव ने हरि नाम से ईश्वर की उपासना का उपदेश दिया।

ज्ञानेश्वर की मृत्यु के बाद नामदेव महाराष्ट्र छोड़कर पंजाब के गुरदमपुर जिले में घोमन नामक गांव में बस गए, जिसके कारण उनका पंजाब से भी सम्बन्ध रहा।

एक नाथ (1533-1599 ई.) :-

इनका जन्म पैठण (औरंगाबाद) में हुआ। ये अत्यधिक दयालु प्रवृत्ति के थे। इन्होंने ज्ञानेश्वरी का विश्वसनीय संस्करण प्रकाशत करवाया।

एकनाथ ने भगवद्गीता के चार श्लोकों पर टीका लिखी।

एकनाथ की कविताएँ भी अभंगों के नाम से जानी जाती है।

इनका महाराष्ट्र का तुलसीदास कहा जाता है, भावार्थ रामायण, एकनाथी भागवत एवं रूक्मणी स्वयंबर इनकी रचनाएं है।

इन्होंने महाराष्ट्र में भजन गायन (कीर्तन) को लोकप्रिय बनाया।

“यदि संस्कृत देवभाषा है, तो यह मेरी भाषा (मराठी) दस्यु भाषा है।” – एकनाथ

तुकाराम (1598-1650 ई ) :-

तुकाराम को महाराष्ट्र का कबीर जाता है। तुकाराम जहागीर एवं शिवाजी के समकालीन थे।

इन्होंने शिवाजी द्वारा प्रदत धन को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि मेरे लिए सोना एवं मिट्टी एक समान है।

तुकाराम का जन्म पूना के निकट देहू में हुआ। वे जन्म से शूद्र थे।

वे रोज विठोबा की अपने हाथों से पूजा करते थे।

इनकी शिक्षाएं अभंगों के रूप में संकलित है।

तुकाराम ने बारकरी पंथ की स्थापना की।

रामदास (1608-1681 ई.) :-

इन्होंने धरकरी पंथ की स्थापना की।

इनका जन्म 1608 ई. में हुआ। ये शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु थे तथा समर्थ गुरु रामदास के नाम से विख्यात हुये व परमार्थ संप्रदाय चलाया।

रामदास ने दास बोध एवं आनन्द वन भुवन नामक पुस्तक की रचना की रामदास का आश्रम सज्जनगढ़ में था।

रामदास का वास्तविक नाम नारायण सूर्यजी पंत था। शिवाजी ने रामदास के वस्त्र को अपना भगवा ध्वज बनाया था।

इनका कहना था “माँ एवं मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।”

महानुभाव पंथ- इसके संस्थापक गोविन्द प्रभु थे, इनके ग्रन्थ मराठी भाषा में है। इस पथ के अनुयायी दत्तात्रेय को ईश्वर का अवतार मानते हैं।

चक्रधर भी इसी सम्प्रदाय से थे जो इस सम्प्रदाय के प्रथम धर्मप्रचारक थे।

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्त और उनके सिद्धान्त/पंथ

  1. श्री कंठ – शैव विशिष्टाद्वैत
  2. श्री पति – वीर शैव विशिष्टाद्वैत
  3. निम्बार्क – भेदाभेद वाद
  4. विज्ञान भिक्षु – अविभागाद्वैत
  5. कबीर – विशुद्ध द्वैतवाद/ कबीर पंथ
  6. हितहरिवंश – राधावल्लभ संप्रदाय
  7. तुकाराम – वारकरी पंथ
  8. भस्कराचार्य – भेदाभेदवाद
  9. मध्वाचार्य – हरियाली सम्प्रदाय

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