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Bharat Mein Aaya Pramukh videshi Yatri – भारत में आये प्रमुख विदेशी यात्री

Bharat Mein Aaya Pramukh videshi Yatri - भारत में आये प्रमुख विदेशी यात्री

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Bharat Mein Aaya Pramukh videshi Yatri

स्काईलेक्स (ईरानी शासक दारा का यूनानी सैनिक) तथा हिकेटियस मिलेटस (549 ई.पू. से 496 ई.पू.) नामक यूनानी लेखकों की रचनाओं से भारत की केवल सिन्धु घाटी क्षेत्र तक का ज्ञान प्राप्त होता है। ये दोनों ही लेखक हेरोडोटस के पूर्ववर्ती थे।

टेसियस

यह ईरानी राजवैद्य था। यह कभी भारत नहीं आया। इसने ईरानी अधिकारियों से ही भारत विषयक ज्ञान प्राप्त करके लिखा। इसने भारत पर इण्डिका एवं फारस पर पर्शिका नामक इतिहास लिखा।

हेरोडोटस –

इतिहास का पिता (Father of History) कहे जाने वाले हेरोडोटस ने अपने ग्रन्थ हिस्टोरिका में 5वीं शताब्दी ई.पू. भारत फारस सम्बन्ध का वर्णन अनुश्रुतियों के आधार पर किया है। वह कभी भारत नहीं आया।

नियार्कस – यह सिकन्दर के जहाजी बेड़े का सेनापति था।

ओनेसिक्रिटस– इसने सिकन्दर की जीवनी लिखी।

एरिस्टोब्युलस – इसने ‘युद्धों का इतिहास’ नामक पुस्तक में भारत के बारे में लिखा। यह सिकन्दर के साथ भारत आया था।

मेगस्थनीज-

सैल्यूकस ‘निकेटर’ का चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत मेगस्थनीज 14 वर्ष भारत रहा। इसकी पुस्तक इण्डिका मूल रूप में उपलब्ध नहीं है, लेकिन परवर्ती यूनानी लेखकों यथा- स्ट्रेबो, प्लिनी, एरियन, प्लूटार्क, जस्टिन और डायोडोरस की रचनाओं में इण्डिका के उद्धरण प्राप्त होते हैं।

1846 ई. में ई.ए. स्वानबेक (E.A. Schwanbeck) ने इन उद्धरणों को एक स्थान पर संग्रहीत कर इण्डिका पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। 1891 ई. में जे.डब्ल्यू. मैकक्रिण्डल (John Watson McCrindle) ने इण्डिका को अंग्रेजी भाषा में अनूदित किया।

डायमेकस सीरियाई राजा एन्टियोकस के राजदूत के रूप में बिन्दुसार के दरबार में रहा।

डायोनिसियस –

मिस्र के नरेश टॉलेमी द्वितीय ‘फिलाडेल्फस’ के राजदूत के रूप में अशोक के दरबार में आया।

प्लिनी द एल्डर (23 ई.-79 ई.)-

  • प्रथम शताब्दी ई. में 75 ई. के आस-पास लैटिन भाषा में नेचुरल हिस्टोरिका लिखी।
  • इसके छठे अध्याय में दिया गया भारत का वर्णन मेगस्थनीज की इंडिका पर आधारित है।
  • प्लिनी इटली का नागरिक था। इसने भारत-इटली के मध्य व्यापार का वर्णन किया है।
  • प्लिनी रोम से भारी मात्रा में भारत को निर्यात होने वाले सोने के लिए दुःख प्रकट करता है।
  • इसमें भारतीय वनस्पति,खनिज एवं पशुओं की जानकारी मिलती है।

टोलेमी– इसने ग्रीक भाषा में 150 ई. के आस-पास ज्योग्राफी नामक पुस्तक की रचना की।

एक अज्ञात (Unknown) लेखक की ग्रीक भाषा में पेरिप्लस ऑफ में द एरीथ्रियन सी (Periplus of the Erythracan Sea) में प्रथम शताब्दी ई. में भारत के बन्दरगाहों एवं व्यापारिक वस्तुओं की जानकारी मिलती है। यह 80 ई. से 115 ई. के बीच लिखी गई। इसमें लाल सागर से भारत तक की यात्रा का वर्णन दिया गया है। एरीथ्रियन सी का अर्थ है लाल सागर। विल्फ्रेड हार्वे शॉफ (Wilfred Harvey Schoff) ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया।

प्लूटार्क-

प्लूटार्क ने पैरेलल लाईब्ज (Parallel Lives), मोरालिया – (Moralia) एवं लाइफ ऑफ एलेक्जेण्डर (Life of Alexander) नामक पुस्तकें लिखी।

जस्टिन– जस्टिन ने सार संग्रह (Epitome) नामक पुस्तक लिखी।

जस्टिन का कथन- “सिकन्दर की मृत्यु के बाद भारत ने अपनी गर्दन से दासता का जुआ उतार फैंका एवं यूनानी क्षत्रपों की हत्या कर

स्ट्रेबो स्ट्रेबो

(64 ई. पू. से 23 ई.) ने ईसा की प्रथम शताब्दी में ग्रीक भाषा में ज्योग्राफी/ज्योग्राफिका (Geography ) नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखा। यह सत्तरह खण्ड में है। इसमें भारत के बारे में जानकारी मिलती है। स्ट्रेबों ने डायमेकस को सबसे बड़ा झूठा तथा मेगस्थनीज को डायमेकस के बाद सबसे बड़ा झूठा बताया है।

एरियन (92 ई. से 175 ई.) –

ईसा की दूसरी शताब्दी में एरियन ने ‘इण्डिका’ और ‘सिकन्दर का आक्रमण’ नामक दो ग्रन्थ लिखे। ये मेगस्थनीज की इण्डिका पर आधारित है।

पेट्रोक्लीज-

इसने पूर्वी देशों का भूगोल लिखा। इसके भारत संबंधी वर्णन की स्ट्रेबो तथा सिकन्दरिया (Alexandria) के पुस्तकालयाध्यक्ष एरेटोस्थैनीज (Eratosthenes) ने प्रशंसा की है।

कॉस्मस इण्डिकोप्लस्टेज (530-50 ई.) नाम से विख्यात इस यूनानी भिक्षु ने समुद्री मार्ग से भारत एवं श्रीलंका की यात्रा की। इसने अपनी पुस्तक क्रिश्चियन टोपोग्राफी में छठी शताब्दी ई. की भारतीय अर्थव्यवस्था की जानकारी दी है।

कॉस्मस का उपनाम ‘भारतीय नाविक’ (द इण्डिकोप्लस्टेज: The Indicopleustes) है।

कॉस्मास ही वह यूनानी भिक्षु था जो कि यहाँ आकर बौद्ध बन गया।

चीनी लेखक

चीनी यात्री भारत को ‘यिन-तु‘ कहते थे।

सुमाचीन-

यह चीन का सर्वप्रथम इतिहासकार है। इसे चीनी इतिहास का जन्मदाता कहा जाता है। इसने प्रथम शताब्दी ई.पू. में इतिहास पर ग्रन्थ लिखा, जिसमें भारत के बारे में जानकारी मिलती है।

फाह्यान-

यह चीनी यात्री चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में 399 ई. से 414 ई. के बीच 15 वर्ष तक भारत रहा। इसने कहीं भी राजा के नाम का उल्लेख नहीं किया है। इसकी यात्रा का उद्देश्य बौद्ध धर्म ग्रन्थों का अध्ययन करना था। फाह्यान ने फू-क्योकी (Fu kuo-Ki) नामक पुस्तक में अपना यात्रा वृत्तांत लिखा है। फाह्यान स्थल मार्ग से आया एवं जल मार्ग से वापस गया। फाह्यान ने मध्य देश को ब्राह्मणों का देश कहा एवं 6 अशोक स्तम्भों का उल्लेख किया है।

ह्वेनसांग-

  • यह हर्षवर्धन के काल में 16 वर्ष तक भारत रहा तथा नालन्दा विश्वविद्यालय में रहकर शिक्षा प्राप्त की।
  • इसका यात्रा विवरण सी-यू- की के नाम से प्रसिद्ध है।
  • ह्वेनसांग (युवान-चुवांग) को ‘प्रिन्स ऑफ पिलग्रिम्स’ (तीर्थयात्रियों का राजकुमार) भी कहा जाता है।
  • ह्वेनसांग स्थल मार्ग से भारत आया एवं स्थल मार्ग से ही वापस गया।
  • वह सर्वप्रथम भारत के कपिशा राज्य पहुंचा।
  • ह्वेनसांग को वर्तमान शाक्यमुनि भी कहा जाता है।
  • ह्वेनसांग जब भास्करवर्मा के दरबार में था, तब हर्ष ने ह्वेनसांग को भेजने को कहा, तो भास्करवर्मा ने कहा “वह चीनी यात्री के बदले अपना सिर देना पसन्द करेगा।” ह्वेनसांग एवं हर्ष की पहली भेंट कजंगल (बंगाल) में हुई। ह्वेनसांग ने शुद्रों को कृषक कहा है।

इत्सिंग (671 ई.- 693 ई.)-

यह चीनी यात्री सातवीं शताब्दी के अन्त में भारत आया। यह नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय में रहा। इसने ‘प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की आत्मकथाएँ’ नामक ग्रन्थ लिखा, जिसमें 56 बौद्ध भिक्षुओं एवं 56 बौद्ध यात्रियों का विवरण है। इत्सिंग समुद्री मार्ग से भारत आया एवं समुद्र मार्ग से ही वापस गया।

हुइली– इसने ह्वेनसांग की जीवनी लिखी।

मात्वान– लिन इसने हर्ष के पूर्वी अभियान का वर्णन किया है।

चाऊ-जू-कुआ (1225 ई.-1254 ई.)-

इसने चोल इतिहास का विवरण किया है। इसने चु-फान-ची (Chu-Fan-Chi) नामक पुस्तक में दक्षिण भारत एवं चीन के व्यापारिक सम्बन्धों की जानकारी दी है। चाऊ जू कुआ की पुस्तक से मध्यकालीन चोल-युगीन न्याय व्यवस्था की जानकारी भी मिलती है।

सुंगयुन

यह चीनी यात्री बौद्ध धर्म की जानकारी प्राप्त करने – आया। 515 से 522 ई. के मध्य गांधार की यात्रा की।

भारत वांगश्वास / वांग हुएन से (Wang Hiuen-Tse) इस चीनी यात्री ने तीन बार भारत की यात्रा की।

महुआन– ये 1451 ई. में भारत आया था।

अरब यात्री

अरबी लेखकों में अल्बरुनी, सुलेमान, अलमसूदी, इब्नखुर्दाद्ब आदि प्रमुख हैं।

अल्बरुनी

  • अल्बरुनी ने तहकीक ए हिन्द या किताब-उल-हिन्द लिखी।
  • वह महमूद गजनवी का राज ज्योतिषी था।
  • उसने गीता, पुराण, वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त का अध्ययन किया।
  • अल्बरुनी ने भारतीय जाति व्यवस्था की कठोरता पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि किसी को भी अपनी जाति से बाहर विवाह करने, एक व्यवसाय या व्यापार से दूसरे में परिवर्तित करने की अनुमति नहीं थी।

सुलेमान-

नवीं शताब्दी में भारत आने वाले अरब यात्री सुलेमान ने प्रतिहार और पाल राजाओं के विषय में लिखा है। उसने पाल शासक को रूहमा, राष्ट्रकूट राज्य को बल्हर एवं राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत को मंकीर कहा है। वह लिखता है कि बल्हर की जुज्र के राजा (कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार नरेश) के साथ शत्रुता थी। सुलेमान के अनुसार बल्हर का राज्य संसार के चार बड़े राज्यों में से एक था। इसने ‘अखबार-उल-सिन्ध-वाल-हिन्द’ नामक पुस्तक की रचना की। सुलेमान ने सती प्रथा का उल्लेख किया है।

अलमसूदी-

  • अलमसूदी को अरब का हेरोडोटस कहा जाता है।
  • 915-16 ई. में बगदाद के यात्री अलमसूदी ने प्रतिहार एवं राष्ट्रकूट राजाओं के विषय में अपने ग्रन्थ मुरुजुल जहाब में लिखा है।
  • यह प्रतिहार शासक महीपाल प्रथम के शासन काल में आया था।
  • यह प्रतिहार शासकों को बऊर कहता है। अलमसूदी ने राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय को बल्हर कहा है।

इब्नखुर्दाव (864 ई.)-

  • फारसी भूगोलवेत्ता था।
  • इसने किताबुल मसालिक-उल-ममालिक (मार्गों एवं राज्यों की विवरण पुस्तिका) नामक ग्रन्थ अरबी में लिखा।

इसने भारतीय समाज में सात जातियों का वर्णन किया है:-

  • सवूकफूरिया (सत् क्षत्रिय) – इस वर्ग से राजा चुने जाते थे।
  • कतरिया – क्षत्रिय
  • ब्रह्म – ब्राह्मण
  • बैसुरिया – वैश्य
  • सुदारिया – शूद्र (ये कृषक थे)
  • सण्डालिया – चाण्डाल
  • लहूद – खानाबदोस जातियाँ

इब्नखुर्दाव ने लिखा है कि कभी-कभी वृद्ध मनुष्य तीर्थस्थलों में पानी में डूबकर या अग्नि में जलकर आत्महत्या कर लेते थे।

अलबिलादुरी-

  • इसने नवीं सदी में फुतुह-उल- बुल्दान नामक ग्रन्थ लिखा।
  • इसके विवरण में देवल स्मृति में प्रतिपादित शुद्धि आन्दोलन की पुष्टि होती है, जिसके द्वारा जबरन इस्लाम ग्रहण करवाये हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में शामिल किया जाता था।

अल-इदरीसी-

इसने नुहजुल मुश्ताक नामक ग्रन्थ की रचना ग्यारहवीं शताब्दी में की। यह भारतीयों के चरित्र एवं न्यायप्रियता की प्रशंसा करता है। यह भारतीयों द्वारा की जाने वाली वृक्ष पूजा तथा सूर्य पूजा का भी उल्लेख करता है।

अबूजईद (916 ई.) –

इसने भारत एवं चीन की यात्राएँ की थी तथा दोनों देशों का तुलनात्मक वर्णन किया है। इसने सिलसिला-उत् तवारीख की रचना की।

इब्न- हौकल

  • इसने अश्काल-उल-बिलाद में भारत के बारे में जानकारी दी है।
  • इब्ने हौकल ने 943-969 ई. के बीच भारत यात्रा की।
  • इब्न हौकल की पुस्तक किताब अल-सूरत-अल-अद (The face of Earth) है, जिसमें इस्तखरी के कार्यों का उल्लेख है।

इस्तखरी

अल इस्तखरी अल इस्तखारी ने ‘किताब-उल-अकलीम’ तथा ‘मसालिक- अल ममालिक’ की रचना की, जिसमें भारत विषयक जानकारी है। इस्तखरी ईरान के इस्तखर शहर का निवासी था यह 951 ई. में भारत आया। अल इस्तखरी सिन्ध में इब्न हौकल से भी मिला। इस्तखरी पवनचक्की के बारे में सबसे पहले उल्लेख करता है। इस्तखरी ने विश्व का मानचित्र भी बनाया।

मार्कोपोलो-

वेनिश (इटली) के यात्री मार्कोपोलो को मध्यकालीन यात्रियों को राजकुमार कहा जाता है। पाण्ड्य शासक कुलशेखर मारवर्मन के समय मार्कोपोलो भारत आया। मार्कोपोलो ने काकतीय वंश की राजकुमारी रूद्रमादेवी का उल्लेख किया है। मार्कोपोलो 1288 ई. में चीन के मंगोल शासक कुबलाया खान के दरबार में भी गया। मार्कोपोलो रेशम मार्ग की यात्रा करने वाला सम्भवतः प्रथम यूरोपीय यात्री था।

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भारत में आये प्रमुख विदेशी यात्री FAQ

Q 1 भारत आने वाले विदेशी यात्री कौन कौन थे?

Ans –भारत में आये प्रमुख विदेशी यात्री

  • मेगस्थनीज
  • फ़ाह्यान
  • ह्वेनसांग
  • इत्सिंग
  • अलबरूनी
  • मार्कोपोलो
  • इब्नबतूता
  • निकोलो कोंटी

Q 2 पाटलिपुत्र आने वाले विदेशी यात्री कौन कौन थे?

Ans – यूरोपियों यात्रियों में राल्च फिच, एडवर्ड टेरी मैनरीक, जॉन मार्शल, पीटर मुण्डी मचुकी, टैबेमियर, बॉरी और विशप हेवर ने अपने यात्रा वृतान्त में बिहार के सम्बन्ध में वर्णन किया है । मेगस्थनीज, डायमेक्स तथा डायोनिसियस आदि को यूनानी शासकों द्वारा पाटलिपुत्र के मौर्य दरबार में भेजे गये थे ।

Q 3 भारत आने वाला प्रथम विदेशी यात्री कौन है?

Ans – मेगस्थनीज

भ्रमण काल विदेशी यात्री किसके समय में
305 से 297 ई० पू० मेगस्थनीज (यूनानी राजदूत) चन्द्रगुप्त मौर्य
298 से 273 ई० पू० डाइमेकस (सीरिया का राजदूत) बिन्दुसार
284 से 262 ई० पू० डायोनिसियस (मिस्र का राजदूत) बिन्दुसार, अशोक
399 से 414 ई० पू० फाहियान (चीनी बौद्ध यात्री) चन्द्रगुप्त द्वितीय
547 ई० पू० कास्मॉस (यूनानी बौद्ध यात्री) दक्षिण भारत में
629 से 644 ई० पू० ह्वेनसांग (चीनी बौद्ध यात्री) हर्षवर्द्धन
643 ई० पू० वांग-हुएन-सी (चीनी राजदूत) हर्षवर्द्धन
675 से 695 ई० इत्सिंग (चीनी बौद्ध यात्री) पश्चिमोतर भारत में
864 इब्ने खुर्दादब (अरब यात्री) मिहिर भोज प्रतिहार
9 वीं शताब्दी सुलेमान (अरब यात्री) बंगाल नरेश देवपाल
915 से 916 ई० अलमसूदी (अरब यात्री) महिपाल प्रथम प्रतिहार
1000 10300 अलबरूनी (गजनी का विद्वान) (महमूद गजनवी केसाथ ) पश्चिमोत्तर भारत में

 

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