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तुर्क आक्रमण | Bharat Par Turki Akraman

तुर्क आक्रमण | Bharat Par Turki Akraman

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तुर्क आक्रमण | Bharat Par Turki Akraman

सुबुक्तगिन भारत पर आक्रमण करने वाला पहला तुर्क शासक था। उसने 986 ई. में जयपाल (शाही वंश के राजा) पर आक्रमण किया और जयपाल को पराजित किया। जयपाल का राज्य सरहिंद से लमगन (जलालाबाद) और कश्मीर से मुल्तान तक था।

महमूद गजनवी

गजनी साम्राज्य की स्थापना अलप्तगीन ने 962 ई. में की। अलप्तगीत के गुलाम सुबुक्तगीन ने 977 ई. में यामिनी वंश की स्थापना की एवं गजनी को राजगद्दी पर बैठा।

सुबुक्तगीन प्रथम तुर्की शासक था जिसने भारत पर आक्रमण किया एवं हिन्दू शाही शासक जयपाल को पराजित किया। जयपाल को महमूद के इतिहासकारों ने ईश्वर का शत्रु बताया है।

काबुल और पंजाब में हिन्दू शाही राजवंश का शासन था। इनकी राजधानी उद्भाण्डपुर थी। इसे वैहन्द भी कहा जाता था।

अलबरूनी के अनुसार हिन्दुशाही वंश के शासक कुपण नरेश कनिष्क के वंशज थे। सुबुक्तगीन का पुत्र महमूद गजनवी 998 ई. में अपने छोटे भाई इस्माइल की हत्या करके गद्दी पर बैठा एवं 1030 ई. तक शासन किया।

महमूद गजनवी ने अमीन-उल-मिल्लत (मुसलमानों का संरक्षक) तथा यामिन-उद-दौला (साम्राज्य का दाहिना हाथ) की उपाधिया बगदाद के खालीफा अल कादिर बिल्लाह से प्राप्त की।

महमूद इस्लामी इतिहास में प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने सुल्तान की उपाधि धारण की।

तारीख ए गुजीदा के अनुसार सीस्तान के राजा खलफ बिन अहमद को हराने के बाद महमूद ने सुल्तान की उपाधि ग्रहण की।

गजनवी के भारत पर आक्रमण के कारण:-

महमूद के भारत आक्रमण का प्रमुख उद्देश्य धन लूटना था न कि इस्लाम का प्रचार-प्रसार” -इरफान हबीब

उतबी (महमूद का दरबारी इतिहासकार) के अनुसार महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य जेहाद या इस्लाम प्रचार था उतबी एकमात्र इतिहासकार था जिसने महमूद के भारत पर आक्रमणों का वर्णन किया है, किन्तु उतबी महमूद गजनवी के अभियानों में उसके साथ भारत नहीं आया।

गजनवी ने खैबर दर्रे को पार कर भारत पर आक्रमण किये।

महमूद के आक्रमण के समय कश्मीर में रानी दिद्दा व कन्नौज में प्रतिहार शासक राज्यपाल का शासन था। बंगाल पाल शासक महिपाल था। चन्देल शासक विद्याधर था जिस पर 1019-20 ई. में महमूद ने आक्रमण किया किन्तु उसे परास्त न कर सका चोल शासक राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम थे।

महमूद ने भारत पर प्रथम आक्रमण हिन्दुशाही शासक जयपाल पर 1000 ई. में किया।

जयपाल ने महमूद गजनवी से पराजित होने पर 1001 ई. में आत्मदाह कर लिया।

शाही वंश में जयपाल के बाद आनन्दपाल, त्रिलोचनपाल व भीमपाल उत्तराधिकारी हुये।

सर हेनरी इलियट के अनुसार महमूद ने 1000 ई. से 1027 ई. तक भारत पर 17 बार आक्रमण किये। महमूद के आक्रमण के समय सिन्ध व मुल्तान पर मुस्लिम शासन था मुल्तान पर अब्दुल फतेह दाउद नामक करमाथी शिया संप्रदाय के अनुयायी का शासन था।

महमूद ने मुल्तान पर 1004-05 ई. में आक्रमण किया, जो भारत पर चौथा आक्रमण था।

महमूद ने 1008 में छठौं अभियान हिन्दूशाही शासक आनन्दपाल के विरुद्ध किया ये पंजाब पर दूसरी बार आक्रमण था, जिसमें पंजाब के शासक आनन्दपाल को छाछ के युद्ध में वैहन्द के मैदान में पराजित किया। इस युद्ध में प्रतिहार शासक राज्यपाल व चन्देल शासक गण्ड ने आनन्दपाल की मदद के लिए सेनायें भेजी।

1009 ई. में 7वाँ आक्रमण नारायपुर (अलवर) पर किया।

फरिश्ता के अनुसार अजमेर, दिल्ली, उज्जैन, ग्वालियर, कालिन्जर तथा कन्नौज के शासकों ने आनन्दपाल की मदद की।

1019-20 ई. में महमूद के विरुद्ध चन्देल शासक विद्याधर ने राजाओं का एक संघ बनाया था, जिसमें कन्नौज का प्रतिहार त्रिलोचनपाल एवं हिन्दूशाही त्रिलोचनपाल शामिल थे।

उतबी ने मथुरा के वैभव के बारे में लिखा है कि महमूद ने एक ऐसा शहर देखा जिसका वैभव स्वर्ग के समान है।

कृष्ण का जन्म स्थान होने के कारण मथुरा को हिन्दुओंका बेथलहम कहा जाता है।

महमूद के भारत आक्रमण के अभियान (तुर्क आक्रमण)

अभियान की क्र.सं. वर्ष स्थान
प्रथम आक्रमण 1000-01 ई. हिन्दूशाही राज्य पर
द्वितीय आक्रमण 1001-02 ई. हिन्दूशाही राज्य पर (वैहिन्द पर अधिकार)
तृतीय आक्रमण 1004 ई. उच्छ के शासक वाजिरा पर आक्रमण
चतुर्थ आक्रमण 1005 ई़ मुल्तान
पंचम आक्रमण 1007 ई़ ओहिन्द (पंजाब)
छठा आक्रमण 1008 ई़ पंजाब एवं नगरकोट
सातवां आक्रमण 1009 ई. नारायणपुर (अलवर)
आठवां आक्रमण 1010ई़ मुल्तान
नवां आक्रमण 1013 ई़ थानेश्वर
दसवां आक्रमण 1013ई़ हिन्दूशाही राज्य
ग्यारहवां आक्रमण 1015 ई. कश्मीर
बारहवां आक्रमण 1018ई़ मथुरा एवं कन्नौज
तेरहवां आक्रमण 1020 ई़ बुन्देलखण्ड
चौदहवां आक्रमण 1021 ई. ग्वालियर एवं कालिंजर
पन्द्रहवां आक्रमण 1024 ई. अन्हिलवाड़ (गुजरात) एव लोदोर्ग (जैसलमेर)
सोलहवां आक्रमण 1025 ई़ सोमनाथ मन्दिर (गुजरात)
सतरहवां आक्रमण 1027ई़ सिन्ध

सोमनाथ पर तुर्क आक्रमण

सोमनाथ के आक्रमण के समय गुजरात का शासक भीम प्रथम था।

उतबी लिखता है कि सोमनाथ के शिवमंदिर पर आक्रमण से महमूद को इतनी धन राशि प्राप्त हुई जितनी अन्य सभी अभियानों से भी नहीं हुई।

1015 ई. में कश्मीर में लोहकोट दुर्ग को जीतने का असफल प्रयास किया, यह गजनवी की सेना की प्रथम पराजय थी।

सिन्ध के जाटों (खोखर) के विरुद्ध 1027 ई. में महमूद ने भारत पर अन्तिम आक्रमण किया। 1030 ई. में महमूद की मृत्यु हुई।

महमूद ने लाहौर व मुल्तान सहित पंजाब को गजनी साम्राज्य में मिला लिया।

उत्तर-पश्चिम भारत में जारी किये गए गजनवी सिक्कों पर अरबी व कश्मीर में प्रचलित शारदा लिपि में लिखे गए द्विभाषीय लेख हैं।

गजनवी ने संस्कृत लेखयुक्त चांदी के सिक्के चलाए, जिन पर ‘अव्यक्तमेक मुहम्मद अवतार नृपति महमूद’ शारदा लिपि में उत्कीर्ण हैं।

महमूद व उसके उत्तराधिकारी मसूद ने हिन्दूओं को बड़ी संख्या में रोजगार दिया। इनमें सेवन्दराय और तिलक के नाम प्रमुख हैं जो उच्च पदों पर नियुक्त किये गये।

महमूद गजनवी के दरबार में अलबरूनी, बैहाकी, उतबी, फिरदौसी एवं उंसारी जैसे कवि व विद्वान थे। फारस का कवि उजारी, खुरासान का विद्वान तुसी, विद्वान अस्जदी व फारूखी भी उसके दरबार में थे।

अलबरूनी :-

अलबरूनी की अरबी भाषा में लिखित किताबुल हिन्द तत्कालीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।

इसमें भारतीय भूगोल, विज्ञान, गणित, इतिहास, खगोल व दर्शन का वर्णन है। यह पुस्तक 11वीं सदी के भारत का दर्पण कहलाती है।

अलबरूनी पुराणों का अध्ययन करने वाला प्रथम मुसलमान था।

महमूद ख्वारिज्म अभियान में अलबरूनी को लाया था।

अलबरूनी का उपनाम अबू रेहान मुहम्मद था किताबुल हिन्द का हिन्दी अनुवाद रजनीकान्त शर्मा ने किया। अंग्रेजी अनुवाद एडवर्ड सचाऊ ने किया था।

अलबरूनी धर्मनिरपेक्ष लेखक नहीं था।

उसका ग्रन्थ उस समय के जीवित भारत से प्रभावित था।

अलबरूनी के अनुसार भारत में चतुर्वर्ण व्यवस्था के नीचे 8 अन्त्यज थे, जिनमें धोबी, मोची, कुम्हार, जादूगर, नाविक, मछुआरा शामिल थे।

अलबरूनी ने भारत में प्रचलित विभिन्न लिपियों की चर्चा की है।

सिद्धमात्रिका सर्वाधिक लोकप्रिय लिपि थी, जो कश्मीर, वाराणसी एवं कन्नौज में थी।

भैक्षुकी लिपि बौद्धों की थी।

फिरदौसी :-

फिरदौसी को महमूद ने प्रत्येक छन्द रचना के लिए एक सोने की मुहर देने का वायदा किया किन्तु बाद में मना कर दिया। दरबार में अपमानित किये जाने के कारण फिरदौसी ने आत्महत्या कर ली। फारसी में फिरदौसी ने शाहनामा की रचना की। फिरदौसी को पूर्व का होमर (फारसी का होमर) कहा जाता है।

उतबी :-

  • उतबी ने तारीखे यामिनी की रचना की।
  • इसे किताबुल यामिनी भी कहा जाता है।
  • यह अरबी में लिखी गई थी।
  • उतबी महमूद का सचिव था।

बैहाकी :-

  • सुबुक्तगीन के दरबारी कवि बैहाकी ने “तारीख-ए-सुबुक्तगीन” की रचना की।
  • बैहाकी महमूद गजनवी के दरबार में भी थे।
  • बैहाकी को लेनपुल ने पूर्व का पेप्स की उपाधि दी।

गजनवी के आक्रमण के प्रभाव एवं परिणाम:-

महमूद के आक्रमण ने उत्तर व पश्चिमी भारत की राजनैतिक संरचना को हिला दिया। खैबर दर्रा, जो कि भारत प्रवेश द्वार था, हमेशा के लिये विदेशियों के हाथों में चला गया। भारतीयों को आपसी फूट व सैन्य कमजोरी प्रकट हो गई एवं भारी मात्रा में धन सम्पदा की लूट व नर संहार हुआ।

गजनवी के आक्रमणों के फलस्वरूप लाहौर शहर फारसी संस्कृति का केन्द्र बन गया।

महमूद के आक्रमणों का स्थायी परिणाम यह हुआ कि पंजाब तुर्कों के नियन्त्रण में चला गया।

तुकों द्वारा विशेष प्रकार का धनुष काम में लिया जाता था जिसे फारसी में नांवक कहते हैं।

गजनवी के दरबारी कवि फारूखी ने गजनवी द्वारा लाहौर में बनवाये गये निगारखाना का उल्लेख किया है, इसमें गजनवी का रूपचित्र/व्यक्तिचित्र (Portrait) है।

मोहम्मद हबीब ने उत्तर भारत में तुकों की विजय को नगरीय क्रान्ति कहा है।

सोमनाथ के पुनर्निर्माण का इतिहास:-

महमूद द्वारा ध्वस्त सोमनाथ के शिव मन्दिर का पुनर्निर्माण 1026 ई. में चालुक्य शासक भीम पाल प्रथम तथा 1169 ई. में कुमारपाल ने करवाया।

अलफ खान ने 1297 ई. में, अहमदशाह ने 1314 ई. में शम्स खाँ ने 1318 ई. में, मुजफ्फर खाॅं द्वितीय ने 1394 ई. में, तातार खाँ ने 1520 ई. में तथा औरंगजेब ने 1669 ई. में सोमनाथ के मन्दिर को तोड़ा।

अहिल्या बाई होल्कर ने 1765 ई. में तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1950 ई. में सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

महमूद की सबसे बड़ी दुर्बलता उसका कुशल शासक प्रबन्धक न होना था।

तुर्की शासन व्यवस्था जनजातीय संगठन पर आधारित थी।

महमूद को बुतशिकन (मूर्ति भंजक) कहा जाता है।

लाहौर में गजनवी वंश का अंतिम शासक खुसरव मलिक था जिसे मुहम्मद गौरी ने कैद कर 1192 ई. में मार दिया।

मुहम्मद गौरी (मुइज्जुद्दीन मुहम्मद बिन साम)

गौरी साम्राज्य का केन्द्र उत्तरी-पश्चिमी अफगानिस्तान था।

मुहम्मद गौरी शंसबनी वंश का था। पहले गौरी वंश के लोग बौद्ध मतावलम्बी थे।

1155 ई. में गौर के अलाउद्दीन हुसैन ने गजनी पर आक्रमण कर उसे बुरी तरह लूटा और पूर्णतः जलाकर नष्ट कर दिया, इसलिए उसका नाम जहाँ-सोज (विश्व को जलाने वाला) पड़ गया।

1163 ई. में अलाऊद्दीन हुसैन का चचेरा भाई गियासुद्दीन गौर का शासक बना।

गियासुद्दीन का छोटा भाई शिहाबुद्दीन (गौरी) था, जिसने 1173 ई. में गजनी जीता था।

गौरी का नाम शिहाबुद्दीन (धर्म का ज्वलंत लक्षण) भी था।

गौरी स्वतंत्र शासक होते हुए भी स्वयं को अपने बड़े भाई गियासुद्दीन अधीन मानता था।

1203 ई. में गियासुद्दीन की मृत्यु के पश्चात गौरी ने स्वतंत्र शासक के रूप में मुइजुद्दीन की उपाधि धारण की थी।

मिनहाज की तबकात ए नासिरी में गौरी की भारत विजय का विवरण है।

गौरी के भारत पर आक्रमण के कारण:-

  1. साम्राज्य स्थापना
  2. इस्लाम का प्रचार
  3. धन प्राप्ति
  4. बड़े भाई गियासुद्दीन से हुआ समझौता कि वह पूर्व की ओर साम्राज्य विस्तार करेगा।

गौरी के आक्रमण के समय उत्तर-पश्चिम भारत में 3 स्वतंत्र मुस्लिम राज्य थे, लाहौर में खुसरोशाह, मुल्तान में करमाथी एवं सिन्ध में सुमय वंश।

गौरी गोमल दर्रें से भारत आया था।

शंसबनी वंश के मुहम्मद गौरी का भारत पर प्रथम आक्रमण 1175 में मुल्तान पर हुआ।

यहां करमाथी मुसलमान शासन कर रहे थे।

1178 ई. में गौरी ने गुजरात पर आक्रमण किया पर मूलराज द्वितीय के हाथों माउन्ट आबू के युद्ध में पराजित हुआ।

यह भारत में मुहम्मद गौरी की पहली पराजय थी।

इस युद्ध का नेतृत्व मूलराज द्वितीय की विधवा माँ नायिका देवी ने किया

नोट- 1178 ई. में ही मूलराज द्वितीय की मृत्यु के बाद भीम द्वितीय शासक बना।

1179 ई. में गौरी ने गजनी वंश (यामीनी वंश) के भारत में अन्तिम शासक खुसरोशाह को परास्त कर लाहौर को जीत लिया।

इस अभियान के समय जम्मू के राजा विजयदेव ने गौरी का सहयोग किया था।

1188 ई. में गौरी का भटिण्डा अभियान एवं तवरहिन्द के किले को जीतना तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) का प्रमुख कारण था।

पृथ्वीराज चौहान तृतीय

1191ई में तराइन के प्रथम युद्ध (थानेश्वर के पास) में पृथ्वीराज चौहान तृतीय (रायपिथौरा) ने गौरी को परास्त किया।

तराइन के दूसरे युद्ध से पहले मुहम्मद गौरी ने क्विाम-उल-मुल्क नामक दूत को पृथ्वीराज चौहान के पास गौरी की अधीनता स्वीकार करवाने के लिए भेजा।

तराइन के दूसरे युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान तृतीय मुहम्मद गौरी से पराजित हुआ।

पृथ्वीराज चौहान तृतीय का सेनापति खाण्डेराव था, जिसने तराइन के युद्धों में सेना का नेतृत्व किया।

हसन निजामी ने ताजुल मासिर में लिखा है कि “पृथ्वीराज को कैद कर अजमेर ले जाया गया जहां उसने गौरी के अधीनस्थ कुछ वर्षों तक शासन किया।”

हसन निजामी के इस कथन की पुष्टि संस्कृत ग्रंथ ‘किसलविधिविद्धमसा से भी होती है एवं पृथ्वीराज तृतीय के कुछ सिक्कों के पृष्ठ भाग पर श्री मोहम्मद साम लिखा होना भी यही सिद्ध करता है।

मिन्हाज के अनुसार पृथ्वीराज की मृत्यु सिरसा (सरसुती) में हुई।

चन्दरवरदाई के पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज को कैद कर गजनी ले जाया गया और वहाँ गौरी की हत्या के अपराध में उसका वध कर दिया गया।

तराइन का दूसरा युद्ध भारतीय इतिहास का निर्णायक युद्ध था।

इस युद्ध के बाद उत्तरी भारत में तुर्की सत्ता की स्थापना हुई।

गौरी के आक्रमण के समय कन्नौज का गहड़वाल राज्य उत्तर भारत में सबसे विस्तृत था।

मुहम्मद गौरी ने 1194 ई. में चन्दावर के युद्ध में कन्नौज एवं बनारस के गहड़वाल शासक जयचन्द्र को पराजित किया एवं गहड़वाल सिक्कों पर भारतीय चिह्न लक्ष्मी तथा नागरी लिपि को अपनाया चन्दावर इटावा जिले में यमुना नदी के तट पर है।

1206 ई. में पंजाब में खोखरों ने विद्रोह कर दिया गौरी ने अपने आखिरी अभियान में इल्तुतमिश (ऐबक का दास) के सहयोग से खोखरों का कत्ल किया था।

इल्तुतमिश के शौर्य से प्रभावित होकर गौरी ने ऐबक (गौरी का दास) को आदेश दिया था कि वह इल्तुतमिश को दासता से मुक्त कर दे।

अतः दास (इल्तुतमिश) अपने स्वामी (ऐबक) से पहले ही दासता से मुक्त हो गया था।

मुहम्मद गौरी के सिक्कों पर एक तरफ कलिमा खुदा रहता था तथा दूसरी तरफ लक्ष्मी एवं नन्दी की आकृति अंकित रहती थी।

कुछ सिक्कों के पृष्ठ भाग पर देवनागरी में मुहम्मद बिन साम भी लिखा रहता था। इन सिक्कों को देहलीवाल सिक्के कहा जाता था।

ये देहलीवाल सिक्के भारत में तुर्क विजय के समय प्रचलित थे।

15 मार्च, 1206 को दमयक नामक स्थान पर सिन्धु के तट पर नमाज पढ़ते समय गौरी की हत्या कर दी गयी।

कुछ इतिहासकार इस हत्या का श्रेय खोखरो को देते हैं, तो कुछ करमाथी जाति के शिया मुस्लमानों को देते हैं।

मुहम्मद गौरी के कोई सन्तान नहीं थी।

1206 ई. में गौरी की मृत्यु के बाद उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में नए राजवंश की नींव डाली, जिसे गुलाम वंश कहा जाता है।

1206 ई. से ही दिल्ली सल्तनत की शुरुआत हुई।

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती मुहम्मद गौरी के साथ 1192 ई. में भारत आये व अजमेर बस गये।

फखरूद्दीन गाजी तथा निजामी उरूजी आदि कवि गौरी के दरबार में थे।

भारत में सर्वप्रथम मुहम्मद गौरी ने इक्ता प्रथा चलाई किन्तु इल्तुतमिश ने इसे संस्था का रूप दिया।

दिल्ली: एक परिचय:-

ऐतिहासिक दृष्टि से दिल्ली का संस्थापक अनंगपाल तोमर (11वीं सदी) को माना जाता है।

पृथ्वीराज रासो में इसे ढिल्ली या ढिल्लिश कहा गया है।

1276 ई. के पालम बावली अभिलेख में दिल्ली का एक और नाम योगिनीपुर मिलता है।

दिल्ली 1193 ई. में भारत के गौरी साम्राज्य की राजधानी बनी।

इससे पहले कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1192 ई. में दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ को राजधानी बनाया।

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भारत पर तुर्क आक्रमण के प्रभाव

मुस्लिम आक्रमण के समय एक बार फिर भारत में विकेंद्रीकरण और विभाजन की स्थितियाँ सक्रिय हो गई थीं। इस समय देश की स्थिति वैसी ही थी जैसी किसी शक्तिशाली साम्राज्य के पतन के बाद हो जाती है।

देशी शक्तियों के साथ-साथ मुल्तान और सिंध के कुछ हिस्सों में दो विदेशी राज्य भी स्थापित किए गए।

पूरा देश कई छोटे और बड़े राज्यों में बंटा हुआ था जो एक दूसरे की कीमत पर अपनी शक्ति और साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे।

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