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प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | Bhartiya Itihas ke Srot

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत -Bhartiya Itihas ke Srot

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | Bhartiya Itihas ke Srot – भारत के समान्य ज्ञान की इस पोस्ट में हम प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | Bhartiya Itihas ke Srot के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और नोट्स प्राप्त करेंगे ये पोस्ट आगामी Exam REET, RAS, NET, RPSC, SSC, india gk के दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है

इतिहास शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है। ई.एच. कार (E.H. Carr ) के अनुसार इतिहास, अतीत एवं वर्तमान के बीच होने वाला अनवरत/अन्तहीन संवाद है।’ 

ई.एच. कार (E.H. Carr) के अनुसार ‘इतिहास, इतिहासकार और उसके तथ्यों के बीच चलने वाला अन्तहीन संवाद है।’ जे.बी. ब्यूरी (J.B. Bury) के अनुसार- ‘इतिहास विज्ञान है, न कम, न अधिक।’

बेनेडिटो क्रोचे (Benedetto Croce) के अनुसार– ‘समस्त इतिहास समसामयिक इतिहास है।’

आरजी. कॉलिंगवुड (R.G Collingwood) के अनुसार– सम्पूर्ण इतिहास विचारों का इतिहास है।’

जी. आर. एल्टन के (GR Elton) अनुसार इतिहासकार जिसे लिखता है वही इतिहास है।”

फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) के अनुसार इतिहास हमें बुद्धिमान बनाता है।’

Table of Contents

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत | Bhartiya Itihas ke Srot

व्हाट इज हिस्ट्री? (What Is History?) पुस्तक के लेखक ई.एच.कार (E.H. Carr) हैं।जेम्स मिल (James Mill) ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इण्डिया (History of British India) में भारतीय इतिहास को तीन भागों में विभाजित किया है

  1. प्राचीन काल (हिन्दु काल)
  2. मध्य काल (मुस्लिम काल)
  3. आधुनिक काल

1904 ई. में विन्सेंट आर्थर स्मिथ (Vincent Arthur Smith) ने प्राचीन भारत का पहला सुव्यवस्थित इतिहास दि अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया (The Early History of India) लिखा।

अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) मूलतः मुद्राशास्त्री थे। इनके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ- दि स्तूप ऑफ भरहुत (The Stupa of Bharhut) एवं एशियंट ज्योग्राफी ऑफ इण्डिया (Ancient Geography of India) |

प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के तीन महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

  1. पुरातात्विक स्रोत
  2. साहित्यिक स्रोत
  3. विदेशी यात्रियों के विवरण

पुरातात्विक स्रोत :-

प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन के लिए पुरातात्विक स्रोत सर्वाधिक प्रामाणिक हैं। इनमें मुख्यतः खुदाई में निकली सामग्री, अभिलेख, सिक्के, स्मारक, ताम्र पत्र, भवन, मूर्तियाँ, भित्ति चित्रकारी आदि आते हैं।

पुरातात्विक उत्खनन दो प्रकार से होता है –

लम्बवत एवं क्षैतिज

लम्बवत उत्खनन से किसी संस्कृति के काल मापन का ज्ञान होता है, जबकि क्षैतिज उत्खनन से किसी सभ्यता/संस्कृति के सम्पूर्ण स्वरूप को उजागर किया जाता है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना अलेक्जेण्डर कनिंघम (Alexander Cunningham) के नेतृत्व में 1861 ई. में की गई। कनिंघम इसके प्रथम महानिदेशक थे। कनिंघम को ‘भारतीय पुरातत्व का जन्मदाता’ (Father of Indian Archacology ) कहा जाता है। 1902 ई. में जॉन मार्शल के द्वारा इसका पुनर्गठन हुआ।

अभिलेख :-

  • अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेख-शास्त्र/एपीग्राफी (Epigraphy) कहते हैं।
  •  प्राचीन लिपियों का अध्ययन पैलियोग्राफी (Palacography) कहलाता है।
  • भारत में अधिकतर अभिलेख शिलाओं, स्तम्भों, गुहाओं, दीवारों, प्रतिमाओं, ताम्र पत्रों एवं सिक्कों पर खुदे हुए मिले हैं। 
  • सबसे पुराने अभिलेख हड़प्पा की मुहरों पर मिलते हैं, किन्तु इन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
  • सबसे प्राचीन अभिलेख एशिया माइनर के बोगजकोई (तुर्की) नामक स्थान से 1400 ई.पू. का मिला है। इसकी खोज ह्यूगो विकलर (Hugo = Winckler) ने 1907 ई. में की। बोगजकोई अभिलेख की लिपि कीलक / कीलाक्षर एवं भाषा भारोपीय (हिन्द-यूरोपीय) है
  • बोगजकोई अभिलेख में वैदिक देवताओं इन्द्र (Indra), वरुण (Varuna), मित्र (Mitra) और नासत्य (अश्विनी कुमार ) (Nasatya) के नाम मिले हैं। यह हिट्टइट/हित्ती (Hittite) और मितानी (Mitanni) राजाओं के बीच संधि-पत्र अभिलेख है, जिसमें इन देवताओं को साक्षी माना गया है
  • किक्कुली अभिलेख (Kikkuli inscription) भी बोगजकोई के निकट तुर्की में है।

मिस्र में अल अमर्ना (El Emarna) नामक स्थान से कुछ मिट्टी की मुहरें (Tablets) मिली है, जिनमें बेबिलोनियाई नरेशों के नाम हैं-अर्तमन्य, अर्जविय, यशदत्त, शुत्तर्न आदि। ये नाम वैदिक से लगते हैं। 

भारत में सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक के माने जाते हैं, जो तीसरी शताब्दी ई.पू. के हैं। कुछ विद्वानों ने बस्ती (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त पिप्रा/पिप्रहवा कलश लेख और अजमेर (राजस्थान) से प्राप्त बडली अभिलेख को अशोक से भी पहले का बताया है।

भारत में सबसे पुराना ब्राह्मी लिपि में लिखा गया अभिलेख उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में पिप्रहवा नामक स्थान से मिला है। इसे बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके अस्थि अवशेषों पर शाक्यों ने उत्कीर्ण करवाया था। 

चन्द्रगुप्त मौर्य के गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) स्थित सोहगौरा (Sohgaura) ताम्र-पत्र एवं बोगरा (बांग्लादेश) स्थित महास्थान (Mahasthana) अभिलेख भी अशोक से पहले के हैं, किन्तु अभिलेखों की नियमित परम्परा अशोक के समय से ही शुरू हुई।

भारत में सबसे अधिक अभिलेख मैसूर (कर्नाटक) में मिले हैं। 

पर्सिपोलिस (Persepolis), नक्श-ए-रूस्तम (Naqsh-e Rustam) और बेहिस्तून (Behistun) अभिलेखों से पता चलता है कि ईरानी सम्राट दारा प्रथम (Darius I) ने सिन्धु नदी घाटी पर अधिकार किया था। नक्श-ए-रूस्तम अभिलेख को डीएनए अभिलेख (DNa inscription) भी कहा जाता है। 

अशोक के अभिलेख :-

  • दारा प्रथम (Darius I) से प्रभावित होकर ही मौर्य सम्राट अशोक ने अभिलेख जारी करवाये।
  • अशोक के रायचूर (कर्नाटक) स्थित मास्की (Maski), दतिया (मध्य प्रदेश) स्थित गुजर्रा (Gujarra), बेल्लारी (कर्नाटक) स्थित निटूर (Nittur) एवं बेल्लारी (कर्नाटक) स्थित उदेगोलम (Udegolam) अभिलेखों में अशोक का नाम मिलता है।
  • अशोक के अधिकतर अभिलेख ब्राह्मी लिपि (Brahmi script) में हैं, केवल पश्चिमोत्तर में अर्थात् उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त / खैबर पख्तूनख्वा (पाकिस्तान) स्थित शहबाज गढ़ी (Shahbaz Garhi ) एवं मानसेहरा (Mansehra) अभिलेख खरोष्ठी लिपि (Kharosthi script) में हैं
  • पाकिस्तान स्थित तक्षशिला (Taxila) एवं अफगानिस्तान स्थित लघमान (Laghman) से अरेमाइक लिपि में, अफगानिस्तान स्थित कन्धार के पास (Shar-i-kuna) में यूनानी (Greck) तथा अरेमाइक (Aramaic) लिपि में लिखा द्विभाषीय अभिलेख मिला है।
  • कर्नूल (आन्ध्र प्रदेश) स्थित एर्रगुडी अभिलेख (Erragudi / Yerragudi inscription) खरोष्ठी एवं ब्राह्मी दोनों लिपियों में है। इसे बौस्ट्रोफेडन (Boustrophedon) शैली कहा जाता है और यह लेखन विधि क्रमशः दाएँ से बाएँ तथा बाएँ से दाएँ चलती है। 
  • खरोष्ठी लिपि ईरान में प्रचलित अरेमाइक लिपि से विकसित हुई।
  • अशोक के अभिलेखों की भाषा प्राकृत (Prakrit) है।
  • अशोक के अभिलेख की सर्वप्रथम खोज 1750 ई. में जोसेफ टीफेन्थेलर (Joseph Ticfenthaler) ने की। 1837 ई. में जेपा प्रिंसेप (James Prinsep) ने अशोक के अभिलेखों की ब्राह्मी लिपि पढ़ी। इसके लिए ब्राह्मी एवं ग्रीक द्विभाषीय अभिलेखों की मदद ली।

नोट:-अशोक के अभिलेखों का विस्तृत विवरण मौर्य काल की इकाई में दिया गया है। अधिकांश मौर्य अभिलेख प्राकृत भाषा में है।

रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख

विशुद्ध संस्कृत में लिखित प्रथम अभिलेख उज्जैन के शक महाक्षत्रप रूद्रदामन प्रथम (Rudradaman I) का जूनागढ़ अभिलेख (Junagadh inscription) है। यह संस्कृत भाषा में सबसे बड़ा अभिलेख है, जो कि दूसरी सदी ईस्वी का है।

  • जूनागढ़ अभिलेख  चम्पू शैली (गद्य-पद्य मिश्रित) में लिखा गया पहला अभिलेख है।
  • काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना जूनागढ़ लेख में है। 
  • जेम्स प्रिसेंप ने 1838 ई. में इसका सम्पादन किया। इसकी तिथि शक सम्वत् 72 या 150 ई. है।
  • इस अभिलेख में चन्द्रगुप्त मौर्य एवं अशोक का एक साथ उल्लेख मिलता है। छः प्रकार के करों का उल्लेख, स्वयंवर प्रथा एवं विष्टि का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।

गरूड़ध्वज स्तम्भ लेख :-

बेसनगर (विदिशा, मध्य प्रदेश) से तक्षशिला के हिन्द-यूनानी (Indo Grock) शासक एण्टिआल्किदस (Antialcidas) के यूनानी राजदूत हेलियोडोरस (Heliodorus) का गरूड़ ध्वज स्तम्भ लेख प्राप्त हुआ है। वासुदेव (विष्णु) का यह गरूड़ ध्वज स्तम्भ हेलियोडोरस स्तम्भ भी कहलाता है। इसकी खोज अलेक्जेण्डर कनिंघम ने 1877 ई. में की।

हेलियोडोरस भागवत (वैष्णव) धर्म का अनुयायी हो गया तथा उसने स्वयं को सर्वोच्च देवता वासुदेव (विष्णु) का अनन्य भक्त घोषित किया। इस अभिलेख में हेलियोडोरस को भागवत कहा गया है। वासुदेव को देव-देव (Deva-deva or God of Gods) कहा गया है।

गरूड़ ध्वज स्तम्भ से द्वितीय शताब्दी ई.पू में भारत में भागवत (वैष्णव) धर्म के विकास की जानकारी एवं प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य मिलता है। इसमें ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा का प्रयोग किया गया है। 

बादामी शिलालेख :-

बादामी चट्टान शिलालेख चालुक्य शासक पुलकेशिन प्रथम का है। यह कन्नड़ भाषा में लिखित प्रथम अभिलेख है। इस अभिलेख के अनुसार पुलकेशिन प्रथम ने अश्वमेध यज्ञ किया। 

एहोल अभिलेख :-

संस्कृत भाषा में रविर्कीति (Ravikirti) द्वारा लिखित ऐहोल प्रशस्ति (Aihole Prashasti) का सम्बन्ध पुलकेशिन द्वितीय (Pulakeshin II) से है। इसी अभिलेख में सर्वप्रथम गुर्जर जाति का उल्लेख हुआ है।

हाथीगुम्फा अभिलेख :-

हाथीगुम्फा अभिलेख कलिंग के राजा खारवेल का है। इसको बिशप ए. स्टर्लिंग (A. Stirling) ने 1825 ई. में खोजा। यह ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में एक बिना तिथि वाला लेख है। नहर निर्माण एवं नन्द वंश का उल्लेख करने वाला यह प्राचीनतम् अभिलेखीय साक्ष्य है।

  • ‘महाराज’ उपाधि का प्राचीनतम् उल्लेख खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है, यद्यपि सिक्कों में इस शब्द का उल्लेख इससे पहले के काल के हिन्द-यूनानी राजाओं के लिए भी हुआ है।
  • भारतवर्ष का सर्वप्रथम उल्लेख हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है।
  • राजा मीनेण्डर के अभिलेख खरोष्ठी लिपि एवं प्राकृत भाषा में हैं।

Important Facts

  1. वडनगर प्रशस्ति ( Vadnagar prashasti) गुजरात के चालुक्य के (20) शासक कुमारपाल से सम्बन्धित है। इसके लेखक श्रीपाल (Shripal) हैं।
  2. अश्वमेध का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य धनदेव का अयोध्या अभिलेख है।
  3. सम्पूर्ण चोल वंश में राजाधिराज प्रथम के मणिमंगलम अभिलेख में ही अश्वमेध यज्ञ की जानकारी है।
  4. चोल शासकों में सर्वप्रथम राजराज प्रथम ने अभिलेखों के आरम्भ में ऐतिहासिक भूमिका अर्थात् प्राक्कथन देने की प्रथा चलाई।
  5. गुप्त शासक वैन्यगुप्त (Vainyagupta) के बांग्लादेश से प्राप्त गुणधर अभिलेख (Gunaidhar inscription) में सर्वप्रथम सामन्त एवं महासामन्त शब्द का उल्लेख मिलता है
  6. मध्य प्रदेश के एरण से वराह प्रतिमा पर हूणराज तोरमाण का लेख मिला है।
  7. गुप्त और गुप्तोत्तर काल के अधिकांश अभिलेख संस्कृत में लिखे गये है।

प्राचीन भारत के कुछ प्रमुख अभिलेख

अभिलेख शासक विषय
हाथीगुम्फा अभिलेख (उदयगिरि पहाड़ी-उड़ीसा) खारवेल (कलिंग शासक) खारवेल के शासन की घटनाओं का क्रमिक वर्णन। यह बिना तिथि का अभिलेख है।
जूनागढ़ या गिरनार अभिलेख (गुजरात) रूद्रदामन (उज्जैन का शक क्षत्रप) रूद्रदामन का विवरण व गिरनार की सुदर्शन झील का वर्णन।
नासिक गुहालेख (महाराष्ट्र) गौतमीबल श्री एवं वाशिष्ठी पुत्र पुलुमावी (सातवाहन वंश) गौतमीपुत्र शातकर्णी की सैनिक सफलताओं व अन्य कार्यो का वर्णन
नानाघाट अभिलेख (महाराष्ट्र) नागानिका (सातवाहन शासक शातकर्णी प्रथम की पत्नी) शातकर्णी प्रथम के शासनकाल की जानकारी।
प्रयाग स्तम्भ लेख (उत्तरप्रदेश) समुद्र गुप्त समुद्र गुप्त की विजयों व नीतियों का पूरा विवेचन चम्पू शैली (गद्य-पद्य शैली का मिश्रण) में लिखा है।
मन्दसौर अभिलेख (मध्यप्रदेश) यशोधर्मन (मालव नरेश) यशोधर्मन की सैनिक उपलब्धियों का वर्णन।
ऐहोल अभिलेख (मध्यप्रदेश) पुलकेशिन द्वितीय हर्ष – पुलकेशिन द्वितीय के युद्ध का विवरण (वातापी का चालुक्य शासक)
ग्वालियर अभिलेख (मध्यप्रदेश) मिहिर भोज (प्रतिहार शासक) गुर्जर प्रतिहार शासकों की जानकारी।
जूनागढ़ अभिलेख (गुजरात) स्कन्दगुप्त स्कन्दगुप्त का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रथम अभिलेख जिसमें हूणों को पराजित करने व सुदर्शन झील के पुनः निर्माण का वर्णन है।
भितरी स्तम्भलेख (गाजीपुर- उत्तरप्रदेश) स्कन्दगुप्त पुष्यमित्रों एवं हूणों के साथ युद्ध का वर्णन है।
उत्तरमेरूर अभिलेख (तमिलनाडु) परान्तक प्रथम (चोल शासक)  919 व 921 ई. के दो अभिलेखों से चोलकाल में स्थानीय स्वशासन की जानकारी प्राप्त होती है।
मेहरौली अभिलेख (दिल्ली) चन्द्रगुप्त द्वितीय (गुप्त शासक) चन्द्रगुप्त द्वितीय की सैनिक विजयों की जानकारी।
बिलसद अभिलेख कुमार गुप्त प्रथम (गुप्त शासक) कुमार गुप्त का प्रथम अभिलेख जिसमें कुमार गुप्त तक गुप्त शासकों की वंशावली की प्राप्ति होती है।
अयोध्या अभिलेख (उत्तरप्रदेश) धनदेव (पुष्यमित्र शुंग का अयोध्या का राज्यपाल) पुष्यमित्र शुंग के द्वारा किए गये दो अश्वमेध यज्ञों का वर्णन।

 

सिक्के

सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र ( Numismatics) कहते हैं। मुद्राशास्त्र का जनक जेमा प्रिंसेप है।

भारत के आरम्भिक सिक्के ई.पू. छठी सदी के आहत सिक्के (Punch-marked Coins) है, जो लेख रहित है। ठप्पा मारकर बनाये जाने के कारण इन्हें आहत मुद्रा कहते हैं। इन पर मछली, पहाड़, पेड़, हाथी, अर्धचन्द्र, सौड आदि चिह्न पंच करके ठप्पा लगाकर बनाये जाते थे। ये सिक्के अधिकतर चाँदी के बने होते थे।

आहत मुद्राओं की सर्वप्रथम प्राप्ति 1800 ई. के लगभग कर्नल कोल्डवेल (Coloncl Coldwell) को कोयम्बटूर (तमिलनाडु) से हुई।

भारत में सबसे पुराने पंचमार्क सिक्के पूर्वी उत्तर प्रदेश और मगध में मिले हैं।आरम्भकाल के कुछ पंचमार्क सिक्के तक्षशिला में भी मिले हैं।

आहत मुद्राओं की सबसे बड़ी निधि अमरावती से मिली है।

समस्त आहत सिक्कों पर अनिवार्य रूप से सूर्य का अंकन हुआ है। 

सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप (James Prinscp) ने 1835 ई. में इन सिक्कों को पंच मार्क (Punch-Marked) सिक्के एवं वासुदेव शरण अग्रवाल (Vasudev Sharan Agrawal) ने इन प्रारम्भिक सिक्कों को आहत मुद्रा (Aahat Mudra) नाम दिया। 

पंचमार्क सिक्कों का विस्तृत अध्ययन एवं इनकी व्याख्या ई.जे. रैप्सन (E.J.Rapson) ने की है। 

मुद्रा निर्माण की ठप्पा विधि/पंच मार्क का सर्वप्रथम प्रयोग तक्षशिला में हुआ था।

धातु से बने सिक्के 5वीं- 6ठीं शताब्दी ई.पू. के पहले के नहीं मिले हैं।

मौर्य में सिक्के

चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में ही सिक्कों के निर्माण पर राजकीय नियंत्रण कायम हुआ। इससे पूर्व सिक्कों के निर्माण पर राजकीय नियंत्रण नहीं था। मौर्यकाल से पूर्व सिक्के मुख्यतः व्यापारिक संगठनों श्रेणी, निगम आदि द्वारा बनाये जाते थे। वैशाली से श्रेणियों द्वारा निर्मित पंचमार्क सिक्के मिले हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में टकसाल का उल्लेख हुआ है। मौर्यकाल में मुद्रा एवं टकसाल का अध्यक्ष लक्षणाध्यक्ष जबकि रूपदर्शक नामक अधिकारी मुद्रा का परीक्षण करता था।

सर्वाधिक आहत सिक्के मौर्यकालीन है। प्रारम्भ से लेकर मौर्यकाल तक सर्वाधिक आहत सिक्के पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार से मिले हैं। भारत में सर्वाधिक सिक्के मौर्योत्तर काल के मिलते हैं जो सीसे,पोटीन, ताँबा, चाँदी, काँसे एवं सोने के हैं।

लेख-युक्त सिक्के

ग्रीक प्रभाव के कारण भारत में लेख-युक्त सिक्कों का प्रचलन हुआ। भारत में सर्वप्रथम लेख-युक्त सोने के सिक्के हिन्द-यूनानी (Indo Greek) शासकों ने जारी किये। 

इंडो-ग्रीक शासकों ने भारत में पहली बार सिक्कों पर शासकों के नाम, देवी-देवताओं की आकृतियों और लेख वाले सिक्के चलाने को प्रथा शुरू की। 

इंडो-ग्रीक शासकों ने द्विभाषिक और द्विलिपिक लेख वाले सिक्के चलाये, जिनकी सहायता से 1837 ई. में खरोष्ठी लिपि को पढ़ा जा सका।

भारत में सर्वप्रथम तिथि युक्त सिक्के शक शासक जीवदामन (Jivadaman) ने जारी किए।

इण्डो-ग्रीक शासक अपोलोडोटस (Apollodotus) के सिक्कों पर सर्वप्रथम भागवत धर्म के चिह्न दिखाई देते हैं

इण्डो-ग्रीक शासक अगाथोक्लीज (Agathocles) एवं पेन्टालियन (Pantaleon) ने सर्वप्रथम निकल के सिक्के (Nickel Coins ) चलाए।

अगाथोक्लीज (Agathocles) पहले ऐसे हिन्द-यवन (इण्डो-ग्रीक) शासक थे, जिन्होंने अपनी मुद्रा पर ब्राह्मी लिपि को स्थान दिया। 

इण्डो-ग्रीक शासक स्ट्रेटो द्वितीय (Strato II) ने सीसे के सिक्के चलाए।

सर्वप्रथम इण्डो-ग्रीक शासक मेनाण्डर प्रथम (Menander 1) ने भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्वर्ण सिक्के जारी किए, लेकिन सामान्यतः भारत में स्वर्ण सिक्कों का व्यापक प्रचलन सर्वप्रथम कुषाणों ने किया।

नियमित रूप से शुद्ध सोने के सिक्के कुषाणों ने जारी किए। 

कुषाण शासकों में विम कडफिसेस (Vima Kadphises) ने सर्वप्रथम विशुद्ध सोने के सिक्के चलाये। 

कुषाणों ने चाँदी के सिक्के नहीं चलाये। कुषाणों का चाँदी का कोई सिक्का नहीं मिला है।

भारत में वृहद स्तर पर सोने के सिक्के कुषाणों ने चलाये एवं सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्त शासकों ने चलाई।

भारत में सर्वाधिक ताँबे के सिक्के कुषाण शासकों ने, सर्वाधिक सोने के सिक्के गुप्त शासकों ने तथा सर्वाधिक मात्रा में चाँदी के सिक्के मौर्य शासकों ने चलाये।

सीसे एवं पोटीन के सिक्के सातवाहन शासकों ने चलाये।

सातवाहन शासक यज्ञश्री शातकर्णी के सिक्कों पर जलपोत उत्कीर्ण होने से उसका समुद्र प्रेम एवं समुद्र विजय का अनुमान लगाया जाता है।

जोगलथम्बी मुद्राभाण्ड (महाराष्ट्र) की मुद्राओं से गौतमीपुत्र शातकर्णी द्वारा शक- बहरात शासक नहपान को पराजित करने का साक्ष्य मिलता है।

क्षत्रियजन यौधेय केवल स्कन्द-कार्तिकेय की उपासना करते थे, उनके सिक्कों पर भी स्कन्द-कार्तिकेय (कुमार) का अंकन मिलता है।

रोहतक में यौधेय सिक्कों की टकसाल थी एवं सुनेत से प्राप्त यौधेय सिक्कों पर बैल का प्रतीक तथा जयमंत्र धर लिखा है

भारत में सर्वाधिक सिक्के मौर्योत्तर युग के हैं।

बेंटबार प्रकार के सिक्के गांधार में प्रचलित थे।

पूर्व भाग पर दिये गये राज्य के नाम के अनुरूप देवता का पृष्ट भाग पर अंकन पांचाल वंश की मुद्राओं की विशेषता है।

बसाड़ से मिट्टी की 274 मुहरें मिली है।

समुद्रगुप्त के सिक्कों पर उसे वीणा बजाते दिखाया गया है, जिससे उसका संगीत प्रेम प्रकट होता है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त शासकों में सर्वप्रथम चाँदी के सिक्के चलवाये। उसने पश्चिम भारत में शक शासक रूद्रसिंह तृतीय को पराजित कर शकों के सिक्कों को ही पनुः प्रचलित करवाया। ये चाँदी के सिक्के व्याघ्र शैली के हैं।

गुप्तों के स्वर्ण एवं रजत सिक्के कुषाण एवं शक सिक्कों पर आधारित थे।

गुप्त शासकों में सर्वप्रथम स्वर्ण मुदा चन्द्रगुप्त प्रथम ने जारी की।

गुप्त मुद्राओं की पहली निधि कलकत्ता के कालीघाट (Kalighat) से मिली थी, जबकि सबसे बड़ी निधि बयाना (भरतपुर, राजस्थान) से मिलती है। बयाना (भरतपुर) से चन्द्रगुप्त प्रथम से लेकर स्कन्दगुप्त तक के सिक्के मिले हैं। इस प्रकार बयाना गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों की सबसे बड़ा ढेर / निधि है।

गुप्तकाल में सोने के सिक्कों को दीनार (Dinar) तथा चाँदी के सिक्कों को रूपक / रूप्यक (Rupaka/ Rupyaka) कहते थे।

स्वर्ण रजत सिक्कों का अनुपात शक-सातवाहन काल में 1:35, कुषाण काल में 1:14 तथा गुप्तकाल में 1:16 था।

गुप्तकाल में सामान्य लेन-देन के लिए कौड़ियों (Cowries) का प्रयोग होता था। बसाढ़ (बिहार) से प्राप्त मिट्टी की मुहरों से व्यापारिक श्रेणियों का ज्ञान होता है।

गुप्तोत्तर काल में सिक्कों का प्रचलन बहुत कम हो गया।

पूर्व-मध्यकाल में स्वर्ण सिक्कों के विलुप्त हो जाने के बाद गांगेयदेव कलचुरि (Gangeyadeva Kalachuri) ने उन्हें उत्तर भारत में पुनः प्रारम्भ करवाया। गांगेयदेव के सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति अंकित है।

बलोतरा / बलोत्र गुजरात में प्रचलित एक मुद्रा थी।

देवता हनुमान का अंकन पहली बार चन्देल शासक संल्लक्षणवर्मा की मुद्राओं पर मिलता है।

अभिलेखों एवं सिक्कों के अतिरिक्त मूर्तियों, स्मारकों, भवनों, मन्दिरों, गुफा-चित्रों आदि से भी प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी मिलती है। 50.प्राचीन काल में मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल से प्रारम्भ होता है। कुषाणकालीन गन्धार कला पर विदेशी प्रभाव है, जबकि मथुरा कला स्वदेशी है।

सैन्धव कालीन मुहरों से उनकी धार्मिक अवस्थाओं का ज्ञान होता है।

साहित्यिक स्रोत –

साहित्यिक स्रोत दो प्रकार के हैं।

  1. धार्मिक साहित्य
  2. धर्मेत्तर/लौकिक साहित्य 

धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण एवं ब्राह्मणेत्तर साहित्य शामिल है। ब्राह्मण साहित्य में वेद, उपनिषद्, महाकाव्य, पुराण, स्मृति ग्रन्थ आदि आते हैं। ब्राह्मणेत्तर साहित्य में बौद्ध एवं जैन साहित्य की रचनाएँ शामिल हैं।

धर्मेत्तर साहित्य में ऐतिहासिक ग्रन्थ, विशुद्ध साहित्यिक रचनाएँ, क्षेत्रीय साहित्य, विदेशी विवरण एवं जीवनियाँ आदि शामिल हैं।

ब्राह्मण साहित्य

वेदवेदों की संख्या चार है, जिनके नाम क्रमशः ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद हैं। चारों वेदों का सम्मिलित रूप संहिता (Samhita) कहलाता है। श्रवण परम्परा में सुरक्षित होने के कारण वेदों को श्रुति (Shruti) भी कहा जाता है।

वेदव्यास ने कालांतर में वेदों को संकलित किया तथा इन्हें चार भागों में बांटा।

वेद यज्ञ कराने वाले पुरोहित कार्य
ऋग्वेद होता (होतृ) देवताओं को यज्ञ में बुलाना और ऋचाओं का पाठ करते हुए देवों की स्तुति करना
यजुर्वेद अध्वर्यु याज्ञिक कर्मकांडों का समुचित अनुष्ठान ।
सामवेद उद्गाता / उद्गात्रि ऋचाओं का सस्वर गायन करना।
अथर्ववेद ब्रह्मा यज्ञ का पूरा निरीक्षण करना। यह तीनों अन्य पुरोहितों के यज्ञ संपादन का निरीक्षण भी करता था। यह सर्वोच्च पुरोहित था।

 

ऋग्वेद

ऋग्वेद में कुल दस मण्डल एवं 1028 सूक्त और 10,600 मंत्र हैं। इन 1028 सूक्तों में से 11 बालखिल्य सूक्त हैं, जो कि हस्तलिखित प्रतियों में परिशिष्ट के रूप में हैं। बालखिल्य सूक्त आठवें मण्डल में है। ऋक् का शाब्दिक अर्थ है- छन्दों और चरणों से युक्त मंत्र । ऋग्वेद की रचना 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच मानी जाती है।

  • ऋग्वेद का पहला एवं दसवाँ मण्डल सबसे बाद में जोड़ा गया है।
  • ऋग्वेद का दसवाँ मण्डल सबसे बड़ा एवं द्वितीय मण्डल सबसे छोटा है।
  • ऋग्वेद के 1, 8, 9, 10 मण्डल परवर्ती काल के माने जाते हैं। 
  • सर्वाधिक सूक्त 10वें मण्डल में है, जिसमें पुरुष सुक्त, नदी सूक्त,नासदीय सुक्त, सूर्य सुक्त (विवाह सुक्त) प्रमुख हैं।
  • सबसे प्राचीन मण्डल 2 से 7 एवं नवीनतम् (प्रक्षिप्त/क्षेपक) पहला एवं दसवाँ मण्डल है।

ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ है-

शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन तथा मांडुक्य। इनमें से वर्तमान में शाकल संहिता ही उपलब्ध है।

ऋग्वेद के साकल पाठ में कुल 1017 सूक्त हैं।

ऋग्वेद के सभी मण्डलों के रचयिता अलग-अलग ऋषि हैं- 

मण्डल रचयिता
दूसरा मण्डल गृत्समद भार्गव (विश्व का प्रथम अभियांत्रिक इंजीनियर)
तीसरा मण्डल विश्वामित्र
चौथा मण्डल वामदेव अंगिरस
पांचवा मण्डल अत्रि
छठा मण्डल भारद्वाज भंगिरस
सातवां मण्डल वशिष्ठ

ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मण्डल को वंश मंडल (कुल मण्डल/ ऋषि मण्डल) भी कहा जाता है तथा वंश मण्डल ही सबसे ज्यादा प्रामाणिक है। ये वंश मण्डल अग्नि की स्तुति से आरम्भ होते हैं।इसके बाद इंद्र तथा विश्वदेव के मन्त्र गाये जाते हैं।

  • ऋग्वेद का पहला मण्डल अगिरा ऋषि को एवं आठवा मण्डल कण्व ऋषि को समर्पित है।
  • ऋग्वेद का सातवाँ मण्डल वरूण देवता को समर्पित है। इसमें अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख है।
  • .ऋग्वेद का नवाँ मण्डल सोम देवता को समर्पित है, अतः इसे सोम मण्डल भी कहते हैं।
  • ऋग्वेद के दूसरे मण्डल में इन्द्र की स्तुति, तीसरे मण्डल में विष्णु, अग्नि आदि की स्तुति एवं सातवें मण्डल में पूषन् की स्तुति की गई है।
  • गायत्री मंत्र ऋग्वेद में तथा पृथ्वी सूक्त अथर्ववेद में है।
  • ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में प्रसिद्ध देवी सूक्त है, जिसमें सवित की उपासना गायत्री के रूप में की गई है। यह गायत्री मन्त्र है। इस प्रकार गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में है तथा विश्वामित्र द्वारा रचित हैं।
  • आत्मा के आवागमन, सृष्टि की रचना एवं निर्गुण ब्रह्म का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 129वें सूक्त अर्थात् नासदीय सूक्त या भाववृत्तम सूक्त में मिलता है, जबकि उपनिषदों में आत्मा एवं ब्रह्म की विषद् व्याख्या की गई है।
  • ऋग्वेद के चतुर्थ मण्डल में तीन मन्त्रों की रचना तीन राजाओं-त्रास्य अजमीढ़ और पुरमीढ़ ने की है।
  • लोपामुद्रा, घोषा, शची, पौलोमी एवं काक्षावृति नामक स्त्रियों ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की।
  • ऋग्वेद में ऊषा, अदिति, सूर्या आदि देवियों का उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वेद के एक मंत्र में रुद्र (शिव) को त्र्यम्बक कहा है।
  • ऋग्वेद में ब्रह्मा का उल्लेख नहीं है।
  • लक्ष्मी का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ।
  • देवताओं की उपासना मंत्रों द्वारा स्तुति करके तथा यज्ञ बलि अर्पित करके की जाती थी। स्तुति पाठ पर अधिक जोर था।
  • ऋग्वैदिक लोग अपने देवताओं से सन्तान, पशु, अन्न एवं आरोग्य आदि पाने के लिये उनकी उपासना करते थे।
  • ऋग्वेद में वरूण एवं मित्र को हजारों स्तम्भों वाले महल में निवास करते वर्णन किया गया है।
  • ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 95वें सूक्त में पुरुरवा, ऐल तथा उर्वसी का संवाद है।
  • ऋग्वेद के केशी सूक्त में कुछ जैन तीर्थंकरों के नाम मिलते हैं।
  • ऋग्वेद के 7वें मण्डल के 103वें सूक्त अर्थात् मण्डूक सूक्त में सोमरस निकालने की प्रक्रिया का वर्णन तथा ॠग्वैदिक शिक्षा पद्धति की झलक मिलती है।
  • ऋग्वेद में द्यूत क्रीड़ा का वर्णन है। ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 34वें सूक्त को अक्ष सूक्त कहते हैं। इस सूक्त में अक्ष क्रीड़ा अथात् द्यूत क्रीड़ा की निन्दा की गई है। एक निराश जुआरी की दुर्दशा का वर्णन इसमें किया गया है।
  • ऋग्वेद के 10वें मण्डल का 85वाँ सूक्त अर्थात् विवाह सूक्त ब्रह्म विवाह से सम्बन्धित है। इसमें सूर्य की पुत्री सूर्या और सोम के विवाह का वर्णन है। इसमें विवाह की विधि एवं उद्देश्यों, स्त्री के कर्त्तव्यों का तथा विवाह गीतों का वर्णन मिलता है।
  • विवाह को एक संस्था के रूप में दीर्घतमा ऋषि ने विकसित किया था। 
  • ऋग्वेद का विवाह सूक्त पूषन् देवता को समर्पित है, जिसकी रचना सूर्य ने की, इसलिए इसे सूर्य सूक्त भी कहते हैं। 
  • ऋग्वेद के दो छन्दों में चार समुद्रों- अपर, पूर्ण, सरस्वत, शर्यणावत का उल्लेख है।
  • अयोध्या का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है।
  • ऊँट का उल्लेख ऋग्वेद में है
  • बृहस्पति एवं उसकी पत्नी जूही का उल्लेख ऋग्वेद में है।
  • भारतीय नाटक के आरम्भिक सूत्र ऋग्वेद के संवाद सूक्त में मिलते है।
  • ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 10वें सूक्त में यम-यमी संवाद है।
  • सर्वप्रथम स्तूप (Stupa) शब्द का उल्लेख और ऐन्द्र महाभिषेक का विवरण ऋग्वेद में मिलता है।

सामवेद

साम का शाब्दिक अर्थ गान है। इसके 75 सूक्तों को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद से लिये गये हैं। ये सूक्त गाने योग्य हैं। सामवेद भारतीय संगीत-शास्त्र पर प्राचीनतम् पुस्तक है। इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है।

सामवेद के तीन पाठ है :

  1. गुजरात की कौथुम संहिता 
  2. कर्नाटक की जैमिनीय संहिता
  3. महाराष्ट्र की राणायनीय संहिता

सामवेद का प्रथम दृष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है।गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को वेदों में सामवेद कहा है। 

  • सामवेद में मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं। सामवेद के ताण्ड्य ब्राह्मण में सरस्वती नदी के प्रकट एवं विलुप्त होने का विवरण है।
  • पंचविंश/ ताण्ड्य ब्राह्मण (सामवेद के ब्राह्मणों में सबसे अधिक विस्तृत होने के कारण इसे प्रौढ़ या महाब्राह्मण भी कहा गया है), षड्विंश/ अद्भुत ब्राह्मण, जैमिनीय/तलवकार ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण, वंश ब्रह्मण, सामविधान ब्राह्मण आदि सामवेद के ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं।

यजुर्वेद

यजुर्वेद गद्य एवं पद्य दोनों में लिखा गया है। यह कर्मकाण्ड प्रधान था। इसमें यज्ञ सम्बन्धी सूक्तों का संग्रह है। इसके दो भाग हैं- शुक्ल यजुर्वेद एवं कृष्ण यजुर्वेद ।

शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है, क्योंकि वाजसेन के पुत्र याज्ञवल्क्य इसके द्रष्टा थे।

यजुर्वेद पाँच शाखाओं में विभाजित है-

  1. काठक 
  2. कपिष्ठल 
  3. मैत्रायणी 
  4. तैत्तिरीय
  5. वाजसनेयी

वाजसनेयी यजुर्वेद दो शाखाओं में विभाजित है- 

  1. माध्यन्दिन 
  2. काण्व 

प्रथम चार कृष्ण यजुर्वेद से तथा वाजसनेयी संहिता शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित हैं। शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम अध्याय ईशोपनिषद् है।

  • कृष्ण यजुर्वेद गद्य एवं पद्य दोनों में लिखा गया है, जबकि शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्र हैं। शुक्ल यजुर्वेद को ही अधिकांश विद्वान असली यजुर्वेद मानते हैं।
  • मैत्रेयी सहिता एवं तैत्तिरीय सहिता भी कृष्ण यजुर्वेद से संबन्धित हैं।
  • ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेद को ‘त्रयी’ कहा जाता है। यजु का अर्थ यज्ञ होता है।

अथर्ववेद

इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई। इसे त्रयी से बाहर रखा गया है। अथर्ववेद में जादू-टोना, तंत्र-मंत्र संबंधी जानकारी है। इसमें शल्यक्रिया, औषध-विज्ञान तथा लौकिक जीवन के बारे में जानकारी है। 

अथर्ववेद के दो पाठ उपलब्ध हैं-

  1. शौनकीय (शौनक) 
  2. पैप्लादि (पिप्पलाद)। इनमें शौनक शाखा अधिक प्रामाणिक है।

अथर्ववेद में मगध और अंग जैसे पूर्वी क्षेत्रों का उल्लेख है।

अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा कहा गया है।

अथर्ववेद में आर्य एवं अनार्य विचारों का समन्वय मिलता है।

  • अथर्ववेद में ब्रह्मज्ञान के विषय में जानकारी मिलती है। इसका वाचन ब्रह्मा नामक पुरोहित करता था, अतः अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहा जाता था। अथर्ववेद को पुरोहित वेद एवं श्रेष्ठ वेद भी कहते हैं। 
  • अथर्वा नामक ऋषि इसके प्रथम द्रष्टा थे, अतः उन्हीं के नाम पर इसे अथर्ववेद कहा जाता है। इसके दूसरे द्रष्टा अंगिरस ऋषि के नाम पर इसे अथर्वाङ्गिरसवेद भी कहा जाता है। 
  • आयुर्वेद अर्थात् जीवन के विज्ञान का प्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।
  • अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में पृथ्वी को माता कहा गया है।

माता भूमिः, पुत्रोऽहम पृथिव्याः” अर्थात् भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ, यह उक्ति अथर्ववेद में उल्लिखित है। यजुर्वेद में भी पृथ्वी को माता कहकर पुकारा गया है, यथा – “नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्याः” अर्थात् माता पृथ्वी को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।

वैदिक साहित्य

वेद ब्राह्मण ग्रन्थ आरण्यक उपनिषद्
ऋग्वेद ऐतरेय ( रचयिता-महिदास) कौषीतिकी (शांखायन) ऐतरेय कौषीतिकी ऐतरेय कौषीतिकी
शुक्ल यजुर्वेद शतपथ वृहदारण्यक वृहदारण्यक ईश
कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय तैत्तिरीय कठ मैत्रायणी तैत्तिरीय श्वेताश्वतर
सामवेद पंचविंश (ताण्ड्य) षड्विंश (अद्भुत) जैमिनीय (तलवकार) छान्दोग्य जैमिनीय छान्दोग्य जैमिनीय केन
अथर्ववेद गोपथ कोई आरण्यक नहीं मुण्डक माण्डुक्य प्रश्न

 

चारों वेदों के चार उपवेद है-

वेद उपवेद
ऋग्वेद आयुर्वेद
यजुर्वेद धनुर्वेद
सामवेद गन्धर्ववेद
अथर्ववेद शिल्पवेद

ब्राह्मण ग्रन्थ

वेदों की सरल व्याख्या हेतु ब्राह्मण ग्रंथों की रचना गद्य में की गयी। ब्रह्म का अर्थ यज्ञ है। अतः यज्ञ के विषयों का प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ब्राह्मण कहलाये। प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ हैं। वेद (संहिता) स्तुति प्रधान हैं जबकि ब्राह्मण ग्रंथ विधि प्रधान हैं। इनका मुख्य विषय यज्ञकर्म का विधान है। 

  • ब्राह्मण ग्रन्थों को वेदों का परिशिष्ट माना जाता है।
  • शुनः शेप का आख्यान ऐतरेय ब्राह्मण में उपलब्ध है। ‘चरैवेति चरैवेति’ अर्थात् ‘चलते रहो, चलते रहो’ की सुन्दर शिश्वा भी इसी ब्राह्मण ग्रन्थ में मिलती है।
  • कौषीतिकी ब्राह्मण में रूद्र की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है।
  • षड्विंश ब्राह्मण में इन्द्र तथा अहल्या का आख्यान मिलता है।
  • वैदिक भारत के इतिहास के साधन के रूप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है। ब्राह्मण ग्रन्थों में सबसे अधिक महत्त्वशाली शतपथ ब्राह्मण है।
  • शतपश ब्राह्मण को लघु वेद कहा गया है। इसमें यज्ञ वेदी के स्वरूप की तुलना स्त्री से की गई है।
  • उपनयन संस्कार, राजा दुष्यंत एवं भारत की कथा, अश्विनी कुमार द्वार च्यवन ऋषि को यौवन दान देने जैसे आख्यान शतपथ ब्रह्मण में है।
  • तैत्तिरीय ब्राह्मण में पंच महायज्ञ एवं तीन ऋणों का उल्लेख है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक के नियम तथा कुछ राज्याभिषेक किए गये राजाओं के नाम मिलते हैं।

आरण्यक

इनमें मंत्रों का गूढ़ एवं रहस्यवादी अर्थ बताया गया है। इनका पाठ एकान्त एवं वन में ही संभव है। जंगल में पढ़े जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहा गया है। कुल सात आरण्यक उपलब्ध हैं।

  1. ऐतरेय 
  2. शांखायन 
  3. तैत्तिरीय
  4. मैत्रायणी
  5. माध्यन्दिन वृहदारण्यक
  6. तल्वकार
  7. छान्दोग्य

आरण्यकों से ही कालान्तर में उपनिषदों का विकास हुआ।

आरण्यक को ब्राह्मणों का परिशिष्ट माना जाता है। आरण्यकों को रहस्य कहा जाता है। यज्ञोपवीत का सर्वप्रथम उल्लेख तैत्तिरीय आरण्यक में है। श्रमण का उल्लेख भी इसी में मिलता है।

उपनिषद्

उप का अर्थ समीप और निषद् का अर्थ है बैठना। उपनिषद् वह विद्या है जो गुरु के समीप बैठकर एकान्त में सीखी जाती है। उपनिषद् मुख्यतः ज्ञानमार्गी रचनाएँ है।

  • उपनिषदों में पराविद्या (ब्रह्म विद्या) एवं अपराविद्या का ज्ञान है। इनमें आत्मा, परमात्मा, जन्म, पुनर्जन्म, मोक्ष इत्यादि विषयों पर चर्चा की गयी है।
  • उपनिषदों की रचना मध्यकाल तक चलती रही। माना जाता है कि अल्लोपनिषद् की रचना अकबर के काल में हुई।
  • मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार कुल 108 उपनिषद् हैं।

निम्नलिखित 12 उपनिषद् ही प्रामाणिक माने जाते है।

ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, कौषीतिकी,वृहदारण्यक, श्वेताश्वतर

शंकराचार्य ने दस उपनिषदों पर टीका लिखी है।

उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र तथा गीता को सम्मिलित रूप से ‘प्रस्थान-त्रयी’ भी कहा जाता है।

भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डक उपनिषद् से लिया गया है।

छान्दोग्य उपनिषद् सबसे प्राचीन एवं मैत्रायणी सबसे बाद का उपनिषद् है । माण्डुक्य सबसे छोटा उपनिषद् है एवं वृहदारण्यक उपनिषद् सबसे बड़ा है।

केन एवं प्रश्न उपनिषद् गद्य-पद्य में है।

ऐतरेय, तैत्तिरीय, कौषीतिकी, माण्डूक्य, छान्दोग्य एवं वृहदारण्यक उपनिषद् गद्य में है।

सत्यकाम जाबाल की कथा, जो अनव्याही माँ होने के लांछन को चुनौती देती है, का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद् में है।

छान्दोग्य उपनिषद में धर्म के तीन स्कन्द बताए गए हैं-

  1. यज्ञ, अध्ययन, दान
  2. तप
  3. ब्रह्मचारी
  • उमा हैमवती आख्यान केन उपनिषद् में है।
  • तमसो मा ज्योतिर्गमय (अन्धकार से प्रकाश की ओर चलो) वृहदारण्यक उपनिषद् में है।
  • अतिथि देवो भवः तैत्तिरीय उपनिषद में है एवं सदा सत्य बोलो भी, तैत्तिरीय उपनिषद में है।
  • मैत्रायणी उपनिषद् में सर्वप्रथम त्रिमूर्ति का उल्लेख तथा सर्वप्रथम इसमें निराशावाद के तत्व दिखाई देते हैं।

वेदांग

 वेदों के अर्थ को सरलता से समझने तथा वैदिक कर्मकाण्डों के प्रतिपादन में सहायतार्थ वेदांग नामक साहित्य की रचना की गयी। वेदांग छः हैं।

इन्हें गद्य में सूत्र रूप में लिखा गया है। इन छः वेदांगों के नाम तथा क्रम का वर्णन सर्वप्रथम मुण्डकोपनिषद् में मिलता है। 

शिक्षा (नासिका) –

वैदिक स्वरों की शुद्ध उच्चारण विधि हेतु शिक्षा का निर्माण हुआ। वैदिक शिक्षा संबन्धी प्राचीनतम् साहित्य प्रातिशाख्य है। शिक्षा नामक वेदांग की रचना वामज्य ऋषि ने की। 

कल्प (हाथ)-

इनमें कर्मकाण्ड से संबंधित विधि नियमों का उल्लेख है। सूत्र ग्रंथों को ही कल्प कहा जाता है। कल्प की रचना गौतम ऋषि ने की।

व्याकरण (मुख) –

शब्दों की मीमांसा करने वाला शास्त्र व्याकरण कहा गया है, जिसका संबंध भाषा संबंधी नियमों से है। व्याकरण की सबसे प्रमुख रचना 5वीं शताब्दी ई.पू. की पाणिनी कृत ‘अष्टाध्यायी’ है, जिसमें आठ अध्याय एवं 400 सूत्र हैं। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में कात्यायन ने संस्कृत में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की व्याख्या के लिए ‘वार्तिक’ लिखे। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी (शुंग काल) में पतंजलि ने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखा।

निरूक्त (कान) –

यह भाषा विज्ञान है। क्लिष्ट एवं कठिन वैदिक शब्दों के संकलन निघण्टु की व्याख्या हेतु यास्क ने 5वीं शताब्दी ई.पू. में ‘निरूक्त’ की रचना की, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है। इसमें वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति का विवेचन है।

छन्द (पैर)-

पद्यों को सूत्रबद्ध करने के लिए छन्द की रचना हुई थी। वैदिक साहित्य में गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, त्रिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में सर्वाधिक लोकप्रिय छन्द त्रिष्टुप है। इसका 4253 बार प्रयोग हुआ है। इसके बाद गायत्री छन्द (2467 बार) तथा जगती छन्द (1358 बार) का प्रयोग हुआ है। छन्द – शास्त्र पर पिंगल मुनि द्वारा ‘छन्द सूत्र / शास्त्र’ ग्रन्थ लिखा गया। फिटसूत्र का सम्बन्ध छन्द से है।

ज्योतिष (नेत्र )-

शुभ मुहूर्त में याज्ञिक अनुष्ठान करने के लिए ग्रहों तथा नक्षत्रों का अध्ययन करके सही समय ज्ञात करने की विधि से ज्योतिष की उत्पत्ति हुई। ज्योतिष की सबसे प्राचीन रचना लगध मुनि द्वारा रचित ‘वेदांग ज्योतिष’ है।

वेदांग एक दृष्टि में :-

शिक्षा – वेद की नासिका (नाक)

कल्प – वेद के हाथ

व्याकरण – वेद के मुख

निरूक्त – वेद के श्रोत (कान)

छन्द – वेद के पैर

ज्योतिष – वेद के नेत्र

सूत्र:

सूत्र– वैदिक साहित्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए सूत्र साहित्य की रचना हुई। सूत्र साहित्य गद्य में है।

कल्पसूत्र

कल्पसूत्र में विधि एवं नियमों का प्रतिपादन किया गया है। ये तीन हैं-

  1. श्रोत सूत्र– यज्ञ एवं बलि संबंधी नियम, राज्याभिषेक अनुष्ठान शुल्ब सूत्र में यज्ञवेदी के निर्माण से संबंधित नाप आदि का तथा वेदी के निर्माण आदि के नियमों का वर्णन है। शुल्व का शाब्दिक अर्थ है नापना। ये शुल्व सूत्र श्रोत सूत्र के ही भाग हैं। शुल्व सूत्र से ही सर्वप्रथम भारतीय रेखा गणित की शुरुआत होती है। 
  2. गृह सूत्र– गृहस्थ के लौकिक एवं पारलौकिक कर्तव्यों का विवरण। जातकर्म, नामकरण, उपनयन, विवाह आदि।
  3. धर्म सूत्र- धार्मिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों का उल्लेख चार वर्णों की स्थितियों, कर्त्तव्यों एवं विशेषाधिकारों का वर्णन धर्म सूत्र में है। 

प्रमुख धर्मसूत्रः-

गौतम धर्मसूत्रसबसे प्राचीन धर्मसूत्र है। गौतम के अनुसार राजा सभी वर्गों का शासक हो सकता है, परन्तु ब्राह्मण का नहीं गौतम धर्मसूत्र में ब्राह्मणों को केन्द्र में रखकर आपद्धर्म की चर्चा की गई है। गौतम ने ही सर्वप्रथम वार्ता को शुद्र का वर्णधर्म बताया।

बौधायन धर्मसूत्र

भारतीय रेखागणित (ज्यामिति) का विकास शुल्व सूत्रोंं से हुआ, लेकिन रेखागणित सम्बन्धी सिद्धान्तों का प्रतिपादन बौधायन ने किया, इसलिए शुल्व सूत्रों का प्रतिपादक बौधायन को माना जाता है। बौधायन के अनुसार तीर्थयात्रा को छोड़कर बंग, सौराष्ट्र और मगध की यात्रा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यहाँ के लोग मलेच्छ हैं।

आपस्तम्भ धर्मसूत्र – एकमात्र धर्मसूत्र, जिसकी रचना दक्षिण भारत में हुई।

 गौतम एवं आपस्तम्ब धर्मसूत्र के अनुसार श्रोत्रिय, स्त्री, संन्यासी और ब्रह्मचारी कर से मुक्त थे। 

वशिष्ठ धर्मसूत्र – कुछ परिस्थितियों में स्त्री के पुनर्विवाह की अनुमति देता है। 

विष्णु धर्मसूत्र – सर्वप्रथम इसमें अस्पृश्य शब्द का उल्लेख मिलता है।

सूत्र साहित्य में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है।

स्मृतियाँ या धर्म शास्त्र

ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से लेकर पूर्व मध्यकाल तक विभिन्न स्मृति ग्रन्थों की रचना की गई।

धर्म सूत्रों से ही स्मृति ग्रंथों का विकास हुआ, इसीलिए स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। इनमें प्रमुख स्मृतियाँ है मनुस्मृति,याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, बृहस्पति स्मृति, वशिष्ठ स्मृति, कात्यायन स्मृति, गौतम स्मृति, देवल स्मृति आदि।

स्मृतियों पर टीका (भाष्य) भी लिखे गये।

मनुस्मृति के भाष्यकार –

मेधातिथि, गोविंदराज (11वीं सदी), भारूचि, कुल्लुक भट्ट, रामचन्द्र, सर्वज्ञ नारायण, रघुनन्दन (16वीं सदी) ।

  • मनुस्मृति सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक स्मृति है। इसकी रचना शुंग काल में हुई।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार- विश्वरूप, विज्ञानेश्वर, अपरार्क ।
  • अपरार्क 12वीं शताब्दी में कोंकण के शिलाहार-वंशी राजा थे।
  • विज्ञानेश्वर की टीका का नाम मिताक्षरा है। विज्ञानेश्वर कल्याणी के चालुक्य राजा विक्रमादित्य षष्ठम् के दरबार में थे।
  • नारद स्मृति का टीकाकार असहाय है।
  • सभी स्मृतियाँ विधि विषयक ग्रन्थ हैं, लेकिन देवल स्मृति में, वे हिन्दू जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, उनको पुनः हिन्दु धर्म में प्रवेश दिलाने सम्बन्धी नियम हैं।
  • पाराशर स्मृति में सर्वप्रथम कृषि को ब्राह्मण धर्म की वृति बताया गया है। इस स्मृति के टीकाकार माधवाचार्य (14वीं शताब्दी) थे। माधवाचार्य 14वीं शताब्दी के विद्वान थे। इन्होंने सर्वदर्शन संग्रह नामक पुस्तक लिखी, जिसमें 16 भारतीय दर्शन दिये गये हैं। ध्यान रहे मध्वाचार्य 12वीं शताब्दी के द्वैतवादी दर्शन के संस्थापक थे।
  • विष्णु स्मृति के अतिरिक्त शेष स्मृतियाँ श्लोकों (पद्य) में लिखी गयी गई और इनकी भाषा लौकिक संस्कृत है। विष्णु स्मृति गद्य में है।
स्मृतियाँ काल
मनुस्मृति 200 ई.पू. से 200 ई. (शुंग काल)
याज्ञवल्क्य स्मृति 100 ई. से 300 ई. (मौर्योत्तर काल)
नारद स्मृति 300 ई. से 400 ई. (गुप्त काल)
पाराशर स्मृति 300 ई. से 500 ई. (गुप्त काल)
कात्यायन स्मृति 400 ई. से 600 ई. (गुप्त काल)
बृहस्पति स्मृति 300 ई. से 500 ई. (गुप्त काल)
देवल स्मृति पूर्व मध्यकाल (गुप्त काल)

महाकाव्य

महाभारत –

इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी। इसमें अठारह पर्व हैं। सर्वप्रथम इसमें 8800 श्लोक थे, तब इसका नाम जयसंहिता था। 24,000 श्लोक होने पर इसका नाम भारत हुआ। गुप्तकाल में एक लाख श्लोक होने पर इसे महाभारत (शतसाहस्त्री संहिता) कहा जाने लगा।

  • महाभारत का सर्वप्रथम उल्लेख आश्वलायन  गृह सूत्र में मिलता है। 
  • महाभारत में शक, यवन, हूण, पारसीक आदि जातियों का उल्लेख है।
  • महाभारत को पंचम वेद भी कहा गया है।
  • महाभारत का परिशिष्ट पर्व (खिल पर्व) हरिवंश नाम से जाना जाता है, जिसमें कृष्ण वंश की कथा का वर्णन है।
  • भवगद्गीता महाभारत के छठवें पर्व अर्थात् भीष्म पर्व का ही है। भगवत् गीता को स्मृति प्रस्थान भी कहा जाता है।
  • शान्ति पर्व महाभारत का सबसे बड़ा पर्व है।
  • महाभारत में वर्णित है कि, “धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के विषय में जो सब जगह है, वह तो इसमें भी है, लेकिन जो इसमें है, वह अन्यत्र नहीं है।” महाभारत में हस्तिनापुर के कुरू राजवंश का वर्णन है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।’ 

महाभारत के इस श्लोक का अर्थ है कि जब-जब धर्म की हानि होती है एवं अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं आता हूँ। सज्जन लोगों की रक्षा के लिए एवं दुष्टों के विनाश के लिए मैं आता हूँ, धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूँ और युग-युग में जन्म लेता हूँ।

महर्षि वेदव्यास के तीन नाम

  1. कृष्ण द्वैपायन – द्वीप में पैदा होने वाला
  2. वादरायण – बद्रीनाथ में रहने वाला
  3. वेदव्यास – वेदों का संकलन करने वाला

रामायण

इसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की। इसमें 24,000 श्लोक हैं।अतः इसे चतुर्विशतिसाहस्री संहिता कहा जाता है। इसकी रचना संभवतः ईसा पूर्व पाँचवीं सदी में शुरू हुई।

  • रामायण एवं महाभारत का अंतिम रूप में संकलन गुप्तकाल में 400 ई.के आस-पास हुआ।
  • रामायण में हमें हिन्दुओं तथा यवनों एवं शकों के संघर्ष का विवरण मिलता है। रामायण को भी पंचम वेद कहा गया है।

रामायण सात काण्डों में विभाजित है

  1. बाल कांड 
  2. अयोध्या कांड
  3. अरण्य कांड 
  4. किष्किन्धा कांड 
  5. सुन्दर कांड 
  6. लंका कांड 
  7. उत्तर कांड।
  • बाल कांड एवं उत्तर कांड के अधिकांश भागों को बाद में जोड़ा गया।माना गया है।
  • लंका काण्ड सबसे बड़ा काण्ड है।
  • राम की सुग्रीव से मित्रता एवं राम तथा हनुमान की भेंट किष्किन्धा काण्ड में और हनुमान की सीता से भेंट सुन्दर काण्ड में है।

पुराण

पुराण का शाब्दिक अर्थ प्राचीन आख्यान होता है। इसमें प्राचीन शासकों की वंशावलियाँ मिलती हैं। पुराणों में ऐतिहासिक कथाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। पुराणों के रचयिता लोमहर्ष एवं उनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं।

18 पुराण / महापुराण एवं 18 उपपुराण हैं। 18 पुराणों में से केवल 5 पुराणों में ही (मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्माण्ड,भागवत) प्राचीन राजवंशों का वर्णन है।

  1. राजवंश – पुराण
  2. मौर्य वंश – विष्णु पुराण
  3. शुंग, सातवाहन वंश – मत्स्य पुराण
  4. गुप्त वंश – वायु पुराण

पुराणों में मत्स्य पुराण सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक माना जाता है।

विष्णु पुराण में भारत का वर्णन इस प्रकार है- “समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो स्थित है वह भारत देश है तथा वहाँ की संतानें ‘भारती’ है।”

विष्णु पुराण का परिशिष्ट विष्णु धर्मोत्तर पुराण है। इसकी प्रकृति विश्वकोषीय है। इसमें ब्रह्माण्ड, भूगोल, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, राजनीति, चिकित्सा, व्याकरण, नृत्य, संगीत आदि कलाओं एवं विद्याओं का वर्णन है। इसके चित्रसूत्र नामक अध्याय में चित्रकला का स्वतंत्र अध्याय है।

अमरकोष में पुराणों के पाँच विषय बताये गये हैं:-

  1. सर्ग सृष्टि (जगत की सृष्टि)
  2. प्रति सर्ग सृष्टि (प्रलय के बाद पुनः सृष्टि)
  3. वंश (देवताओं एवं ऋषियों के वंश)
  4. मन्वन्तर (अनेक मनु, महायुग)
  5. वंशानुचरित (राजवंश)

ऐतिहासिक दृष्टि से वंशानुचरित का विशेष महत्व है।

ईसा पूर्व पाँचवीं से चौथी शताब्दी में पुराण अस्तित्व में आ चुके थे।वर्तमान में उपलब्ध पुराण तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्त काल) के आस-पास के हैं।

  • महाभारत युद्ध के पश्चात् जिन राजवंशों ने ईसा से छठी सदी तक शासन किया, उनके विषय में जानकारी का एकमात्र स्रोत पुराण हैं।
  • अग्नि पुराण में कृषि सम्बन्धी प्रक्रिया वर्णन है। 12.”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” (जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है) का उल्लेख भागवत पुराण में है।
  • इतिहास पुराण, रामायण एवं महाभारत को पंचम वेद कहा गया है।
  • पार्जिटर नामक विद्वान ने सर्वप्रथम पुराणों के ऐतिहासिक महत्व को उजागर किया।
  • लिंग पूजा का प्रथम वर्णन मत्स्य पुराण में है।

ब्राह्मणेत्तर साहित्य

ब्राह्मणेत्तर साहित्य में जैन एवं बौद्ध साहित्य शामिल है।

बौद्ध साहित्य:-

  • सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक हैं। इनके नाम हैं:-सुत्त पिटक,विनय पिटक एवं अभिधम्म पिटक। ये पालि भाषा में हैं।
  • त्रिपिटक शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग रिज डेविड्स (Rhys Davids) ने बुद्धिस्ट इंडिया (Buddhist India) में किया है।
  • त्रिपिटकों को सर्वप्रथम लिपिबद्ध श्रीलंका के शासक वतगमनी (Vattagamani) की देखरेख में किया गया।

सुत्तपिटक-

इसमें बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह है।यह त्रिपिटकों में सबसे बड़ा एवं श्रेष्ठ है। इसे बौद्ध धर्म का एनसाइक्लोपीडिया भी कहा जाता है।

 सुत्त पिटक पाँच निकायों में विभाजित है :

  1. दीघ निकाय
  2. मज्झिम निकाय 
  3. संयुक्त निकाय 
  4. अंगुत्तर निकाय 
  5. खुद्दक निकाय

प्रथम चार निकायों में बुद्ध के उपदेश वार्तालाप के रूप में दिये गये हैं, जबकि खुद्दक निकाय पद्यात्मक है।

दीघ निकाय में वर्णित है कि अजातशत्रु बुद्ध के बारे में कहते हैं कि “भगवान क्षत्रिय थे और मैं भी क्षत्रिय हूँ, इसलिए मुझे भी उनके अस्थि अवशेषों का अंश मिलना चाहिए।”

महापरिनिर्वाणसुत्त दीघ निकाय का हिस्सा है।

दीघ निकाय के अन्तिम भाग महापरिनिर्वाण सुत्त में बुद्ध के अन्तिम उपदेश, आनन्द के साथ संवाद एवं कुशीनगर की अन्तिम यात्रा का वर्णन है।

दीघ निकाय पर बुद्धघोष ने सुमंगल-विलासिनी नामक टीका लिखी। मज्झिम निकाय की टीका पपञ्च-सूदनी, संयुक्त निकाय की टीका सारत्थ-पकासिनी/सांख्यप्पकासिनी और अंगुत्तर निकाय की टीका मनोरथ पूरणी है।

बौद्ध ग्रन्थ दीघनिकाय में राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक अनुबन्ध सिद्धान्त दिया गया है।

मज्झिम निकाय में वर्णित है कि प्रसेनजित ने बुद्ध के बारे में कहा कि “भगवपि कोशलको अहमपि कोशलको, अहमपि असिडिको भगवपि असिट्ठिको”, अर्थात् बुद्ध भी कौशल के हैं और मैं भी कौशल का हूँ। बुद्ध भी 80 साल के हैं और मैं भी 80 साल का हूँ।

मज्झिम निकाय में बुद्ध एवं महावीर स्वामी की भेंट का वर्णन है। 

जातक कहानियाँ खुद्दक निकाय का हिस्सा हैं। इसमें बुद्ध के पूर्वजन्म की काल्पनिक कथाएँ हैं। जातकों की रचना का आरम्भ ईसा, पूर्व पहली सदी में हुआ। जातक ग्रन्थ गद्य और पद्य दोनों में लिखे गये हैं। जातकों की संख्या लगभग 550 है।

बुद्ध के ज्ञानी एवं करूणा के रूप का वर्णन जातक कथाओं में है।

खुद्दक निकाय में अन्य कई ग्रन्थ हैं, जैसे- खुद्दक पाठ, धम्म पद, सुत्त निपात, विमान वत्थु, थेरीगाथा, बुद्धवंश आदि। धम्मपद बौद्ध धर्म की गीता कहलाती है।

विनय पिटक

इसमें बौद्ध संघ के नियम, आचार-विचारों एवं विधि निषेधों का संग्रह है। इसके तीन भाग हैं।

  1. पातिमोक्ख – इसमें अनुशासन संबंधी विधि-निषेधों एवं प्रायश्चित्तों का संकलन है। इसे प्रतिमोक्ष्य भी कहते हैं। 
  2. सुत्तविभंग (सुत्तों पर टीका) – इसके दो भाग है। महाविभंग तथा भिक्खुनी विभंग। इसमें प्रतिमोक्ष्य के 227 नियमों पर भाष्य प्रस्तुत किये गये हैं।
  3. खन्धक– इसमें महावग्ग तथा चुल्लवग्ग नामक दो भाग हैं।

परिवार इसमें विनय पिटक का सारांश प्रश्नोत्तर रूप में है।

विनय पिटक में बुद्ध एवं महावीर स्वामी को समकालीन बताया गया है। 

अभिधम्म पिटक –

यह दार्शनिक सिद्धान्तों का संग्रह है। इसमें सात ग्रन्थ हैं। ये प्रश्नोत्तर क्रम में हैं।

  1. धम्म संगणि, 
  2. विभंग, 
  3. धातुकथा, 
  4. युग्गल पंचति, 
  5. कथावत्थु
  6. यमक,
  7. पट्ठान।
  • अभिधम्म पिटक तीन पिटकों में सबसे बाद में लिखा गया।
  • संस्कृत भाषा का प्रयोग सबसे पहले अभिधम्म पिटक में मिलता है। 
  • अभिधम्म पिटक में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कथावत्थु है। इसकी रचना तृतीय संगीति के समय मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इन त्रिपिटकों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद हुई पिटक शब्द का शाब्दिक अर्थ है- टोकरी।

पालि भाषा के अन्य ग्रंथ :-

  1. मिलिन्दपन्हो (मिलिन्द प्रश्न) नागसेन द्वारा रचित। इसमें यवन राजा मीनेण्डर एवं बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक वार्तालाप का वर्णन है। इसमें सात सर्ग है।
  2. दीपवंश तथा महावंश– ये सिंहली अनुश्रुतियाँ हैं। इनकी रचना क्रमशः चौथी एवं पाँचवीं शताब्दी ई. में हुई। इनमें मौर्य-कालीन इतिहास की जानकारी मिलती है।

संस्कृत में बौद्ध ग्रंथ :-

  1. महावस्तु एवं ललित विस्तार में महात्मा बुद्ध के जीवन (जीवनी) का वर्णन मिलता है। ललित विस्तार वैपुल्य सूत्र का ग्रन्थ है। 
  2. वैपुल्य सूत्र में बुद्ध के विस्तारित उपदेश हैं। ये उपदेश सुत्तपिटक को अपेक्षा अधिक विस्तृत हैं। अतः ये वैपुल्य सूत्र के नाम से जाने जाते हैं।

 वैपुल्य सूत्रों में कुछ प्रसिद्ध धर्म ग्रन्थ हैं- 

  1. अष्टसहस्र प्रज्ञा पारमिता 
  2. सधर्म पुण्डरीक, 
  3. सुवर्ण प्रभास, 
  4. गोडव्यूह, 
  5. तथागत गुहूगक,
  6. दसभूमिस्वर, 
  7. सम्माधिराज

Note – ललित विस्तार में प्राचीन भारत में प्रचलित 64 लिपियों का वर्णन है।

अन्य संस्कृत बौद्ध ग्रन्थ

  1. बुद्धचरित (महाकाव्य) – अश्वघोष
  2. सौन्दरानन्द (महाकाव्य) – अश्वघोष
  3. सारिपुत्र प्रकरण (नाटक) – अश्वघोष
  4. सूत्रालंकार – अश्वघोष
  5. विभाषाशास्त्र – वसुमित्र 
  6. अभिधर्मकोष – वसुबंधु
  7. विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि – वसुबंधु
  8. वज्रछेदिका – वसुबंधु
  9. योगाचार भूमिशास्त्र – मैत्रेयनाथ
  10. धर्म धर्मता विभंग – मैत्रेयनाथ
  11. मनुष्यान्त विभंग – मैत्रेयनाथ
  12. पंच भूमि – असंग
  13. अभिधर्म समुच्चय – असंग
  14. महायान संग्रह, महायान सूत्रालंकार – असंग
  15. माध्यमिककारिका – नागार्जुन
  16. युक्ति षष्टिका – नागार्जुन
  17. शून्यता सप्तति, शतसहस्त्रिता – नागार्जुन
  18. विग्रहव्यावर्तनी – नागार्जुन
  19. अष्टसहस्र प्रज्ञापारमिताशास्त्र – नागार्जुन
  20. चतुः शतक – आर्यदेव
  21. शिक्षा समुच्चय – शांतिदेव
  22. सूत्र समुच्चय – शांतिदेव
  23. बोधिचर्यावतार – शांतिदेव
  24. तत्व संग्रह – शांति रक्षित
  25. माध्यमिकालंकारकारिका – शांति रक्षित
  26. प्रमाण समुच्चय – दिङ् नाग
  27. विसुद्धिमग्ग – बुद्धघोष
  • अष्टसहस्र प्रज्ञापारमिता में बौद्धिसत्वों द्वारा विकसित आध्यात्मिक सिद्धान्तों का संग्रह है।
  • अश्वघोष ने बुद्धचरित लिखा, जो बौद्धों का रामायण कहा जाता है। इसे अश्वघोष का कीर्ति स्तम्भ भी कहते हैं।
  • दिव्यावदान में परवर्ती मौर्य शासकों एवं पुष्यमित्र शुंग का वर्णन है। 
  • आर्यमंजूश्रीमूलकल्प में गुप्त सम्राटों का वर्णन है। यह हर्षकालीन इतिहास की कुछ जानकारी देता है। सर्वप्रथम गणपति शास्त्री ने 1925 ई. में इसे प्रकाशित किया था।
  • ललित विस्तार को आधार बनाकर मैथ्यू अरनोल्ड ने Light of Asia (एशिया का ज्योति पुंज) लिखा।
  • बुद्धचरित में काव्य रूप में बुद्ध के जीवन का सरल वर्णन, सौन्दरानन्द में बुद्ध के सौतेले भाई सुन्दरनन्द के संन्यास ग्रहण करने तथा सारिपुत्र प्रकरण में बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र के बौद्ध धर्म ग्रहण करने का वर्णन है।
  • तिब्बत के बौद्ध लामा तारानाथ ने 12वीं सदी में कंग्युर तथा तंग्युर नामक दो ग्रन्थ लिखे, जिनमें भारत के बारे में जानकारी मिलती है। दुल्वा नामक ग्रन्थ भी लामा तारानाथ का लिखा हुआ है।

जैन साहित्य

जैन साहित्य को आगम (सिद्धान्त) कहा जाता है। कुल 46 आगम ग्रन्थ हैं। आगम के अन्तर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूल सूत्र, अनुयोग सूत्र तथा नन्दि सूत्र आते हैं। 

आगमों में 12 अंग सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। ये हैं-

  1. आचरांग सुत्त, 
  2. सुमगदांग सुत्त (सूत्रकृतांग), 
  3. स्थानांग, 
  4. समवायंग सुत्त, 
  5. भगवती सुत्त, 
  6. नायधम्मकहा सुत्त,
  7. उवासगदसाओं,
  8. अन्तगडदसाओं
  9. अणुत्तरोव वाउदसाओं/अनुत्तरोपपातिक दशा,
  10. प्रश्न व्याकरण,
  11. विवागसुयम्,
  12. दृष्टिवाद

आचरांग सुत्त में जैन भिक्षुओं द्वारा पालन किये जाने वाले नियमों का उल्लेख है।

  • उवासगदसाओं में जैन उपासकों के विधि नियमों का संग्रह है। 
  • उवासगदसाओ (उपासक दशा)- तपोबल से मोक्ष प्राप्त 10 व्यापारियों का उल्लेख है। 
  • नायधम्मकहा सुत्त में महावीर की शिक्षाओं का वर्णन है।
  • प्रत्येक अंग का एक उपांग है। उपांगों की विषय-वस्तु ब्रह्माण्ड का वर्णन, प्राणियों का वर्गीकरण, खगोल-विद्या, काल-विभाजन, मरणोत्तर जीवन का वर्णन आदि है। 

छेद सूत्र- 

  1. निशीथ, 
  2. महानिशीथ, 
  3. व्यवहार,
  4. आचारदशा,
  5. कल्प,
  6. पंचकल्प

छेदसूत्रों में जैन धर्म के भिक्षुओं के लिए उपयोगी नियमों का संकलन है। उपर्युक्त ग्रन्थ श्वेताम्बर संप्रदाय के लिए हैं। दिगम्बर संप्रदाय इनकी प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते।

  • अंगो एवं उपांगों पर जो भाष्य लिखे गये हैं, उन्हें नियुक्ति, चूर्णिया टीका कहते हैं। नियुक्ति सबसे पुरानी टीका है।
  • भद्रबाहु द्वारा संस्कृत भाषा में रचित कल्पसूत्र से जैन धर्म का प्रारम्भिक इतिहास मालूम होता है। इसकी रचना चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में हुई। श्वेताम्बर मत के ग्रन्थ अर्धमागधी भाषा में लिखे गये हैं, जो अंगकहलाये। 
  • जैन ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई।
  • रत्ननन्दी द्वारा रचित भद्रबाहुचरित में चन्द्रगुप्त मौर्य के बारे में जानकारी मिलती है।
  • जैन ग्रंथों में सबसे महत्त्वपूर्ण हेमचन्द्र कृत परिशिष्टपर्व है, जिसकी रचना 12वीं शताब्दी में हुई। इनमें चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की जानकारी मिलती है।
  • कालिकापुराण भी जैन धर्म से संबंधित है। 16.भगवती सुत्त में सोलह महाजनपदों का उल्लेख है एवं जैन धर्म के सिद्धान्त भी मिलते हैं। 
  • भगवती सुत्त में महावीर की जीवनी के साथ उसके अन्य समकालिकों के साथ सम्बन्ध का वर्णन है और महावीर एवं उसके शिष्य इन्दुभुति के बीच वार्तालाप का वर्णन है।
  • पूर्व-मध्यकाल में जैन धर्म की रचनाएँ हरिभद्रसूरि द्वारा रचित समरादित्कथा (समराइच्चकहा), मूर्खाख्यान, कथाकोश, अनेकान्तविजय, धर्मबिंदू
  • उद्योतनसूरि की कुवलयमाला (8वीं सदी) से हूण शासक तोरमाण के बारे में जानकारी मिलती है।
  • जिनसेन का आदि पुराण एवं गुणभद्र का उत्तर पुराण भी जैन ग्रन्थ हैं।
  • प्रकीर्ण प्रमुख जैन ग्रन्थों के परिशिष्ट हैं।
  • मूलसूत्रों में जैन धर्म के उपदेश, भिक्षुओं के कर्त्तव्य, विहार जीवन, पथ नियम आदि का वर्णन है।
  • नन्दी सूत्र तथा अनुयोगद्वार जैनियों के स्वतंत्र ग्रन्थ तथा विश्वकोष हैं। 
  • जैन अनुश्रुति के अनुसार महावीर स्वामी की आदि शिक्षाएँ 14 पूर्वी में संकलित थी। वल्लभी में 14 पूर्वी को 11 पूर्वी में संकलित किया गया।
  • मुनि सर्वनन्दि ने 458 ई. में लोक विभंग की रचना की।
  • प्रशस्ति संग्रह भी जैन पुस्तक है।
  • उतराध्यानसूत्र में पारवनाथ मत के अनुयायी केसी एवं इन्द्रभूति केबीच हुए वार्तालाप का वर्णन है
  • चुल्लिकासूत्र संख्या में 2 हैं- अनुयोगसूत्र एवं नन्दिसूत्र,
  • जैन धर्म में कुल 63 शलाका पुरुषों (महान् पुरुषों) की मान्यता है।हेमचन्द्र की त्रिषष्टिशलाका पुरुषचरित्र में इनका विवरण है।
  • जैन साहित्य में पुराणों को चरित कहा गया है।

लौकिक साहित्य

भास (ईसा पूर्व चौथी शताब्दी) को कालिदास से पूर्व का प्रथम नाटककार माना जाता है। भास ने 13 नाटक लिखे।

  1. स्वप्नवासवदत्ता, 
  2. उरूभंग, 
  3. प्रतिमका, 
  4. अभिषेक, 
  5. पंचरात्र, 
  6. मध्यम व्यायोम, 
  7. दूत घटोत्कच, 
  8. कर्णभार, 
  9. दूतवाक्य, 
  10. बालचरित,
  11. दरिद्रचारूदत्त, 
  12. अविमारक, 
  13. प्रतिज्ञायौगन्धरायण

स्वप्नवासवदत्ता पहला संपूर्ण नाटक माना जाता है। शूद्रक (गुप्तकालीन) ने संस्कृत भाषा में मृच्छकटिकम् (मिट्टी की गाड़ी / The clay cart) नाटक में पहली बार राजपरिवार के स्थान पर समाज के मध्यमवर्ग के लोगों को पात्र बनाया। इसमें शूद्र एवं महिलाएँ संस्कृत के स्थान पर प्राकृत बोलते हैं। दरिंद्र ब्राह्मण चारूदत्त इसका मुख्य पात्र है, जो वसन्तसेना नामक गणिका से प्रेम करता है। मृच्छकटिकम् में समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी प्रकाश पड़ता है तथा कथा का केन्द्र उज्जैन है। .

  • क्षेमेन्द्र द्वारा रचित वृहत्कथामंजरी (11वीं सदी) गुणाढ्य द्वारा पैशाची भाषा में लिखित वृहत्कथा का संस्कृत रूपान्तरण है। इसी पर सोमदेव ने 11वीं शताब्दी में कथासरित्सागर लिखा। 
  • गार्गी संहिता शुंग काल का एक ज्योतिष ग्रंथ है। इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का वर्णन है। गार्गी संहिता युग पुराण का एक हिस्सा है। 
  • वाक्पति के गौड़वहो में कन्नौज के राजा यशोवर्मन द्वारा बंगाल (गौड़) शासक का वध कर बंगाल विजय करने का वर्णन है। यह प्राकृत भाषा में लिखा है।
  • पद्मगुप्त ‘परिमल’ के नवसाहसांकचरित में परमार वंश के शासक सिंधुराज की जीवनी है। 
  • कौटिल्य की भांति बृहस्पति ने भी 10वीं शताब्दी के लगभग एक अर्थशास्त्र की रचना की।
  • कामन्दक की नीतिसार भी अर्थशास्त्र से अनुप्रेरित ग्रंथ है। इसकी रचना 8वीं सदी में हुई।
  • मेरूतुंग की प्रबंध चिंतामणि अर्थशास्त्र पर टीका है। 
  • सोमेश्वर की कीर्तिकौमुदी, राजशेखर के प्रबंधकोश तथा मेरूतुंग की प्रबन्ध चिंतामणि से गुजरात के इतिहास की जानकारी मिलती है।
  • पंचतंत्र एवं हितोपदेश नीति-विषयक ग्रंथ हैं। पंचतंत्र का अनुवाद 50 से अधिक भाषाओं में किया जा चुका है। पंचतन्त्र की कहानियों की रचना विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को नीति-परक शिक्षा देने के लिए की।
  • भट्टभुवनदेव कृत अपराजितपृच्छा वास्तुशास्त्र पर लिखित एक ग्रन्थ है

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