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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1885-1947 ) Bhartiya Rashtriya Andolan

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1885-1947 ) Bhartiya Rashtriya Andolan
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Table of Contents

अंग्रेजी शासन के विरूद्ध महत्त्वपूर्ण विद्रोह –

आंदोलन समय संबंधित नेता प्रभावित क्षेत्र
संन्यासी विद्रोह 1760-1800 ई. केना सरकार, दिर्जिनारायण बिहार, बंगाल
फकीर विद्रोह 1776-77ई. मजनूंशाह एवं चिराग अली बंगाल
पहाड़िया विद्रोह 1778 ई. तिलका मांझी बिहार (भागलपुर)
चुआरो विद्रोह 1798 ई. करणगढ़ की रानी सिरोमणि एवं दुर्जन सिंह बाँकुड़ा (बंगाल)
चेरो का ब्रिदोह 1800 ई. भूषण सिंह झारखण्ड (पलामू)
पॉलीगरों का विद्रोह 1799-1801ई. वीर.पी. काट्टावाम्मान तमिलनाडु
वेलाटम्पी विद्रोह 1808-09 ई. मेलुथाम्पी ट्रावणकोर / केरल
भील विद्रोह 1825-31 ई. सेवाराम पश्चिमी घाट
रामोसी विद्रोह 1822-29 ई. चित्तर सिंह पश्चिमी घाट
पागलपंथी विद्रोह 1825-27ई. टीपू असोम
अहोम विद्रोह 1828 ई. गोमधर कुँवर असोम
बहावी आंदोलन 1831 ई. सैय्यद अहमद तुतीमीर बिहार, उत्तरप्रदेश
कोल आंदोलन 1831-32 ई. गोमधर कुँवर छोटानागपुर (झारखण्ड)
भूमिज विद्रोह 1832 ई. गंगा नारायण हंगामा झारखण्ड (रांची)
खासी विद्रोह 1833 ई. तीरत सिंह असोम
कंध विद्रोह 1837 ई. चक्र बिसोई ओड़िशा
फरायजी आंदोलन 1838-48 ई. शरीयातुल्ला टूटू मियां बंगाल
नील विद्रोह 1854-62 ई. तिरुत सिंह बंगाल एवं बिहार
संथाल विद्रोह 1855-56 ई. सिद्ध-कान्हू बंगाल एवं बिहार
मुंडा विद्रोह 1899-1900. बिरसा मुंडा झारखण्ड
पाइक विद्रोह 1904 ई. बख्शी जगबन्धु ओड़िशा
नील आंदोलन 1859-60 ई. दिगम्बर बंगाल
पाबना विद्रोह 1873-76 ई. ईशानचन्द्र राय एवं शंभूपाल पावना (बंगाल)
दक्कन विद्रोह 1874-75 ई. महाराष्ट्र
मोपला विद्रोह 1920-22 ई. अली मुसलियार मालाबार (केरल)
कूका आंदोलन भगत जवाहर मल पंजाब
रंपाओ का विद्रोह 1879-1922. सीताराम राजू आंध्रप्रदेश
ताना भगत आंदोलन 1914. जतरा भगत बिहार
तेंभागा आंदोलन 1946 ई. कम्पाराम सिंह एवं भवन सिंह बंगाल
तेलंगाना आंदोलन 1946 ई. आंध्रप्रदेश

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1885-1947 )

प्रथम चरण (1885-1905 ई. तक), द्वितीय चरण (1905 से 1919 ई. तक), तृतीय एवं अन्तिम चरण (1919 से 1947 ई. तक)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश का शासन ईस्ट इंडिया के हाथों से सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन हो गया था, तो वहीं 1857 की क्रांति को अंग्रेजों द्वारा निर्ममता से कुचले जाने के बाद देश के जनमानस में राष्ट्रीय भावना की जड़ें पुनः पुष्पित-पल्लवित होने लगीं। अंग्रेजों के विरूद्ध बढ़ते आक्रोश के फलस्वरूप देश के कई भागों में राजनीतिक संगठन बने।

सर्वप्रथम पूना में 2 अप्रेल, 1870 ई. को पूना सार्वजनिक सभा गठन हुआ। 26 जुलाई, 1876 ई. को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कलकत्ता में इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की, जिसने सिविल सेवा परीक्षा प्रणाली में सुधार, जमींदारों के विरूद्ध कृषकों के अधिकारों की सुरक्षा, विदेशी चाय बागान मालिकों के विरूद्ध उसके मजदूरों के अधिकारों की रक्षा आदि के लिए विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया।

1884 ई. में मद्रास महाजन सभा तथा 1885 में बम्बई प्रेसीजेन्सी एसोसिएशन तथा 1 दिसम्बर, 1866 को लंदन में दादा भाई नौरोजी द्वारा ईस्ट इंडिया एसोसिएशन का गठन हुआ। इन सभी संस्थानों ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा आगे जाकर कांग्रेस की स्थापना के लिए आधार तैयार किया।

भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन की शुरूआत 1885 ईस्वी में कांग्रेस की स्थापना से मानी जाती है।

राष्ट्रीय आन्दोलन को तीन चरणों में बांटा जाता है–

( 1 ) प्रथम चरण (1885 से 1905 ई.), (2) द्वितीय चरण (1905 से 1919 ई.) तथा (3) तृतीय चरण (1919 में 1947 ई.) ।

कांग्रेस का शाब्दिक अर्थ ‘लोगों का समूह’ होता है। शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ‘ संयुक्त राज्य अमेरिका’ में हुआ। भारत में इस संस्था का यह नाम ‘दादाभाई नौरोजी’ ने दिया। ए.ओ. ह्यूमने 1884 ई. में भारतीय राष्ट्रीय संघ की स्थापना की थी, अतः उन्हें कांग्रेस का पिता/जनक माना जाता है। इसका प्रथम अधिवेशन 28 दिसम्बर, 1885 में बम्बई में ‘गोकुल दास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में व्योमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता [UPTET-2016] में आयोजित हुआ। हालांकि यह सम्मेलन प्रारम्भ में पुणे में होने वाला था लेकिन प्लेग फैलने के कारण इसे बम्बई स्थानांतरित किया गया, दादाभाई नौरोजी के से भारतीय राष्ट्रीय संघ का नाम बदलकर इसी सम्मेलन में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ कर दिया गया।

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में कुल 72 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इन सदस्यों में दादाभाई नौरोजी, फिरोज शाह मेहता, दिनशा वाचा, काशीनाथ तेलंग, वी.राघवाचेरियार, एन.जी. चन्द्रावकर, एस. सुब्रह्मण्यम प्रमुख नेता थे।

इसके प्रथम सचिव ‘ए.ओ. ह्यूम’ थे। ह्यूम सर्वाधिक समय (1906 ई. तक) तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव पद पर रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एकमात्र गरम दल के नेता ‘लाला लाजपत राय  कलकत्ता अधिवेशन (1920 ई.) में अध्यक्ष बने। भारतीय राष्ट्रीय | कांग्रेस में सर्वाधिक समय तक अध्यक्ष रहने का गौरव जवाहर लाल | नेहरू एवं दादाभाई नौरोजी’ (3-3 बार) को प्राप्त है।

  • प्रथम फारसी अध्यक्ष – दादाभाई नौरोजी
  • प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष – बदरूद्दीन तैय्यबजी
  • स्थापना के समय वायसराय – डफरिन
  • प्रथम महिला अध्यक्ष – एनी बेसेन्ट 1917 में कलकत्ता
  • प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष – जॉर्ज यूल
  • कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन – कलकत्ता में
  • कांग्रेस का तीसरा अधिवेशन – मद्रास में
  • प्रथम भारतीय महिला – सरोजनी नायडू
  • प्रथम सचिव – एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (सर्वाधिक समय तक)

गवर्नर जनरल लॉर्ड डफरिन के समय बनी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ‘लॉर्ड डफरिन’ ने ‘नगण्य अल्पमत का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था’ कहा था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरोध में ‘सर सैय्यद अहमद खाँ’ ने सन् 1888 में ‘एंग्लो मुस्लिम डिफेंस एसोसिएशन’ का गठन किया।

1.आन्दोलन का प्रथम चरण (1885-1905)

उदारवादी युग-इस चरण में कांग्रेस पर उदारवादी राष्ट्रीय नेताओं का वर्चस्व था, जैसे-दादाभाई नौरोजी, एम.सी. रानाडे, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, दिनशा वाचा इत्यादि थे, इनकी राजनीति उदारवादी व संयम का समन्वय थी। अंग्रेजी राज को इन्होंने ‘ईश्वर की अनन्य कृपा’ माना । उदारवादी दलों की कार्य प्रणाली के कारण उग्रवादी नेताओं ने इनके प्रयासों को राजनीतिक ‘भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा दी।

उदारवादी दलों की कार्यप्रणाली को देखते हुए गोपाल कृष्ण गोखले ने (उदारवादी दल के नेता) ने कहा था कि, “हमारी पीढ़ी ने अपनी असफलता से भारत की सेवा की, आगे की पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वो सफलता से भारत की सेवा करे।”

1.बंगाल विभाजन, 1905

लॉर्ड कर्जन का काल भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का उच्च बिन्दु था। इसने सर्वप्रथम 1905 ई. में बंगाल के विभाजन की घोषणा की क्योंकि बंगाल इस समय का सबसे बड़ा प्रान्त था। इसमें पश्चिमी व पूर्वी बंगाल सहित बिहार व ओड़िशा भी शामिल थे। असोम 1874 ई. में बंगाल से अलग हो ही गया था। अविभाजित बंगाल को बंगाल तथा पूर्वी बंगाल में विभाजित किया गया।

नवगठित बंगाल प्रान्त (प. बंगाल, ओड़िशा व बिहार) की राजधानी ‘कलकत्ता’ को बनाया गया तथा दूसरे प्रान्त (पूर्वी बंगाल और असम), जिसमें मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों की संख्या अधिक थी, की राजधानी “ढाका’ को बनाया गया। 19 जुलाई, 1905 ई. को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा हुई और 16 अक्टूबर, 1905 ई. को बंगाल विभाजन लागू हुआ।

इसके विरोध में बंगाल में ‘राष्ट्रीय शोक दिवस’ के रूप में मनाया गया। पूर्वी बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ‘बेमफायल्ड फुल्लर’ ने मुसलमानों को अपनी चहेती पत्नी’ के रूप में उल्लेख किया। इस प्रकार बंगाल विभाजन धार्मिक आधार पर भी हुआ।

स्वदेशी स्वराज 1905 व 1906 ई.-लाल-बाल पाल व अरविन्द घोष के प्रयासों के कारण कांग्रेस ने स्वदेशी व स्वराज की मांग रखी। 1905 ई. बनारस अधिवेशन में गोखले की अध्यक्षता में कांग्रेस ने स्वदेशी की मांग रखी। 1906 ई. कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने स्वराज्य की मांग रखी। 1911 ई. में बंगाल विभाजन लॉर्ड हार्डिग द्वारा रद्द किया गया।

ध्यातव्य रहे-बाल गंगाधर तिलक को वेलेण्टाइल शिरोल ने। अशांति का जनक कहा।

2.आन्दोलन का दूसरा चरण (1906-1919)

उग्रवादी या नव राष्ट्रवाद का युग-राष्ट्रीय आन्दोलन के इस चरण में स्वदेशी आन्दोलन (आंध्रप्रदेश में स्वदेशी आंदोलन को वन्दे मातरम् आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है [CTET 2014]) तथा क्रान्तिकारी आतंकवाद की शुरुआत हुई। कांग्रेस की प्रारम्भिक उदारवादी नीतियों से उग्रवादियों के रूप में प्रसिद्ध युवा नेताओं का मोह भंग हो गया। उग्रवादी नेताओं ने कांग्रेस की अनुनय विनय की प्रवृत्ति को ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा दी।

कांग्रेस के उग्रवादी नेताओं में लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल) और अरविन्द घोष प्रमुख थे। 22 जून, 1897 ई. को दामोदर एवं बालकृष्णन चापेकर ने प्लेग कमीशन से संबंधित अधिकारी रैण्ड की हत्या कर दी। इन क्रांतिकारी घटनाओं का जिम्मेदार मानते हुए तिलक को 1908 ई. में राजद्रोह के अपराध में 6 वर्ष का कठोर कारावास दिया गया। इन्होंने माण्डले जेल में रहते हुए ‘द-आर्कटिक होम्स ऑफ आर्यन्स‘ नामक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें आर्यों का मूल निवास स्थान अंटार्कटिक (उत्तरी ध्रुव) माना।

उग्रवाद की मशाल तिलक ने जलाई। तिलक ने राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए धार्मिक रूढ़िवाद का सहारा लिया। तिलक दादाभाई नौरोजी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। तिलक ने नारा दिया ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और मैं इसे लेकर रहूँगा‘ तथा बंकिमचन्द्र चटर्जी ने ‘वन्दे मातरम्‘ गीत से भारतीय जनता में देश प्रेम की भावना जगायी, तो वहीं तिलक ने केसरी और मराठा समाचार पत्रों का प्रकाशन और महाराष्ट्र में गणपति उत्सव भी प्रारम्भ किये, जो राष्ट्रीयता के प्रतीक बन गये।

सूरत अधिवेशन

नरम दल और गरम दल के बीच फूट वर्ष 1907 ई. में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन (अध्यक्ष – रासबिहारी बोस) में पड़ी थी। नरम दल का नेतृत्व सुरेन्द्र नाथ बनर्जी एवं गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक ने किया। वर्ष 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में तिलक और एनी बेसेन्ट के प्रयासों से ये दोनों धड़ पुनः एक हुये।

1.मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 ई.

बंगाल विभाजन की घोषणा के बाद मुसलमानों का एक शिष्ट मण्डल आगा खाँ के नेतृत्व में 1 अक्टूबर, 1906 को शिमला में वायसराय लॉर्ड मिन्टो से मिला, जिसमें केन्द्रीय, प्रान्तीय व स्थानीय निकायों में मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचन मण्डल की मांग की। ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने 30 दिसम्बर, 1906 को ढ़ाका में एक बैठक में ‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग’ की स्थापना की घोषणा की।

नवाब सलीमुल्लाह मुस्लिम लीग के संस्थापक अध्यक्ष तथा वकार उल मुल्क मुस्ताक हुसैन इसके प्रथम अध्यक्ष थे और 1908 में आगा खाँ इसके स्थायी अध्यक्ष बने। मुस्लिम लीग की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के प्रति मुसलमानों की निष्ठा बढ़ाना और मुसलमानों के राजनैतिक अधिकारों की रक्षा करना था। मुस्लिम लीग के 1908 ई. में अमृतसर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचन मण्डल की मांग की गई।

2.मार्ले मिन्टो सुधार 1909 ई.

1909 ई. के सुधारों का उद्देश्य कांग्रेस के उदारवादी नेताओं को खुश करना व राष्ट्रवाद के उगते पौधे को नष्ट करना था।

इसलिए मार्ले मिन्टो सुधारों में मुसलमानों को पृथक् साम्प्रदायिक निर्वाचन दिया गया, जिसने भारत में सांप्रदायिकता और भावी विभाजन के बीज बो दिये। इसके संदर्भ में लॉर्ड मार्ले ने वायसराय मिन्टो को एक पत्र में पृथक निर्वाचन के बारे में लिखा कि ‘हम नागदन्त बो रहे हैं जिसकी फसल अत्यंत कड़वी होगी।’

3.दिल्ली दरबार 1911 ई.

ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम और महारानी मैरी दिसम्बर, 1911 में भारत आये। उनके स्वागत में दिल्ली में दरबार का आयोजन किया गया, इस दरबार में 12 दिसम्बर, 1911 को सम्राट ने बंगाल विभाजन रद्द करने की घोषणा की तथा कोलकाता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की, 1 अप्रैल, 1912 को कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली भारत की राजधानी बनी।

राजधानी उद्घाटन के उपलक्ष में निकाले गये जुलूस पर उग्रवादियों ने बम फेंका, जिसमें लॉर्ड हार्डिंग घायल हो गया तथा उसका महावत मारा गया। इस बम घटना से राजस्थान के जोरावर सिंह बारहठ जुड़े हुए थे। जॉर्ज पंचम ब्रिटिश शासन काल में भारत आने वाले एकमात्र ब्रिटिश सम्राट थे।

4.कामागाटामारू प्रकरण 1914 ई.

कामागाटामारू प्रकरण कनाड़ा में भारतीयों के प्रवेश के बारे में विवाद था। जिसके विरोध से उत्साहित होकर गुरदीत सिंह (भारतीय मूल के सिंगापुर के व्यापारी) ने कामागाटामारू नामक जापानी जहाज को किराये पर लेकर दक्षिण पूर्व एशिया के करीब 376 यात्रियों को वैंकूवर ले गया था। कनाडा सरकार ने इन यात्रियों को उतरने से मना कर दिया।

यात्रियों के अधिकार के लिए लड़ने के लिए वैंकूवर में बलवन्त सिंह, सोहन लाल पाठक तथा हुसैन रहीम की अध्यक्षता में ‘शोर कमेटी’ का गठन हुआ, इसी समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ जाने । के कारण जहाज को वापस भारत भेज दिया। कलकत्ता बंदरगाह पर इसे अंग्रेज सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया। इससे यात्री अत्यधिक क्रोधित हो गये और अंग्रेज सैनिकों से झगड़ बैठे, जिसमें अनेक यात्रियों की मृत्यु हो गई। यह घटना बजबज नामक स्थान पर हुई।

5.होमरूल आन्दोलन 1914 ई.

जून, 1914 ई. में तिलक 6 वर्ष के कारावास के बाद ‘मांडले’ जेल से भारत आये तथा एनी बेसेन्ट के साथ मिलकर होमरूल आन्दोलन शुरू किया। तिलक ने 28 अप्रैल, 1916 ई. को बेलगाँव (पूना) में होमरूल लीग की स्थापना की, जिसके अध्यक्ष जोजेफ बैपटिस्ट व एन.सी. केलकर सचिव बनाए गए।

सितम्बर, 1916 ई. में एनी बेसेन्ट ने मद्रास में अखिल भारतीय होमरूल लीग की स्थापना की। दोनों ने आपस में अपने क्षेत्रों का विभाजन कर लिया, जिसमें तिलक ने बम्बई के अलावा महाराष्ट्र एवं उत्तर भारत के राज्यों में तथा एनी बेसेन्ट ने बम्बई सहित सम्पूर्ण भारत को अपना अधिकार क्षेत्र बनाया। एनी बेसेन्ट ने जॉर्ज अरुंडेल को अपना सचिव नियुक्त किया।

लीग ने सम्पूर्ण भारत में राजनैतिक चेतना जागृत की। इस आंदोलन में जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास आदि चोटी के नेताओं ने भाग लेकर अपना समर्थन व्यक्त किया। बढ़त आंदोलन के कारण एनी बेसेन्ट को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी के विरोध में सम्पूर्ण देश में विरोध प्रकट हुआ तथा सर.एस सुब्रह्मण्यम अय्यर ने इस गिरफ्तारी के विरोध में नाइटहुड की उपाधि त्याग दी। वे नाइटहुड की उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय थे

6.लखनऊ समझौता (1916)

1916 ई. में कांग्रेस व मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस व मुस्लिम लीग के मध्य एकता स्थापित करने वाला समझौता हुआ, जिसमें कांग्रेस की तरफ बाल गंगाधर तिलक व एनी बेसेन्ट तथा लीग की तरफ से मोहम्मद अली जिन्ना ने विशेष प्रयास किया तथा इस समझौते में मुस्लिम लीग ने स्वशासन की कांग्रेसी मांग का समर्थन किया था और कांग्रेस ने लीग की साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की मांग स्वीकार कर ली, तो वहीं लखनऊ समझौते ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग स्वीकार कर भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के बीज बो दिये।

ध्यातव्य रहे – कांग्रेस के इस अधिवेशन के अध्यक्ष ए.सी. मजूमदार थे। मई, 1917 ई. में मेसोपोटामिया आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें भारत सरकार के कार्यों की आलोचना की गई तथा प्रथम विश्वयुद्ध में हुई भारतीय सेना की पराजय लिए भारत सचिव चैम्बरलिन के नियन्त्रण वाली भारत सरकार को जिम्मेदार माना गया। अत: चैम्बरलिन को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी जगह मांटेग्यू को भारत सचिव नियुक्त किया गया।

7.मांटेग्यू घोषणा 1917 ई.

1917 ई. में कांग्रेस व होमरूल लीग द्वारा भारत में सत्याग्रह | प्रारम्भ करने की घोषणा की गई। जिसके विरुद्ध मांटेग्यू ने 20 अगस्त, 1917 ई को हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना होने की घोषणा की।

मांटेग्यू घोषणा पत्र को उदारवादियों नेताओं ने ‘भारत के मैग्नाकार्टा’ की संज्ञा दी। हालांकि तिलक ने सुधारों को असन्तोषप्रद, निराशाजनक तथा बिना ‘सूरज का सवेरा’ बताया। इन सुधारों की घोषणाओं को लेकर कांग्रेस के नेताओं में वैचारिक विभाजन सामने आता है तथा इसके फलस्वरूप 1918 ई. में कांग्रेस का दूसरा विभाजन हो गया।

8.भारत सरकार अधिनियम 1919 ई.

1919 ई. के अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ‘प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना’ थी। द्वैध शासन का सूत्रपात 1 अप्रैल, 1921 को आठ प्रांतों में हुआ तथा यह शासन व्यवस्था वर्ष 1937 तक चलती रही। ली आयोग की सिफारिश पर 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए केन्द्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।

पहली बार केन्द्रीय बजट को राज्य के बजट से अलग कर दिया गया। प्रान्तीय सूची को दो भागों में विभाजित किया गया- हस्तान्तरित विषय व आरक्षित विषय । केन्द्र में पहली बार द्विसदनीय व्यवस्था स्थापित की गई। उच्च सदन राज्य परिषद् (कार्यकाल 5 वर्ष) तथा निम्न सदन केन्द्रीय विधानसभा (कार्यकाल 3 वर्ष) कहलाया, इन दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा होता था।

इस अधिनियम में आरक्षण का दायरा बढ़ाकर सिक्ख, एंग्लो इंडियनों को भी प्रदान किया गया। नरेश मण्डल (चैम्बर ऑफ प्रिन्सेज) के गठन का निर्णय लिया गया जिसकी 8 फरवरी, 1921 को दिल्ली में स्थापना की गई तथा मण्डल का प्रथम चांसलर बीकानेर महाराजा गंगासिंह को बनाया गया। लंदन में एक हाई कमिश्नर (5 वर्ष हेतु) की नियुक्ति की व्यवस्था की गई, तो वहीं प्रथम हाई कमिश्नर की नियुक्ति 1920 में हुई। सुभाष चन्द्र बोस ने इस अधिनियम को भारतीयों के लिए ‘बेड़ियों का नया जाल’ कहा।

क्रान्तिकारी आतंकवाद

22 जून, 1897 को दो युवा चापेकर बन्धुओं दामोदर तथा बालकृष्ण ने पूना के प्लेग कमीश्नर “रैण्ड तथा एयर्स्ट’ की हत्या कर भारत में क्रान्तिकारी आतंकवाद की नींव रखी। विनायक दामोदर सावरकर ने 1899 ई. में ‘मित्रमेला’ नामक संस्था स्थापित की जिसे 1904 में ‘अभिनव भारत समाज’ का नाम दिया था।

क्रान्तिकारी आतंकवाद का प्रमुख केन्द्र बंगाल, पंजाब तथा महाराष्ट्र था। 30 अप्रैल 1908 का मुजफ्फरपुर जिले (बिहार) के न्यायाधीश किंगफोर्ड की हत्या के प्रयास में प्रफुल्ल चाकी एवं खुदीराम बोस से भूलवश बम श्री कैनेडी की गाड़ी पर गिर गया, जिससे दो अंग्रेज महिलाओं की मृत्यु हो गई। चाकी ने आत्महत्या कर ली एवं खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई।

हार्डिंग बम कांड

23 दिसम्बर, 1912 को कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानान्तरित करने का दिन तय किया गया। इस दिन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग अपने परिवार के साथ जुलूस के रूप में दिल्ली में प्रवेश कर रहे थे। चाँदनी चौक में हार्डिंग पर बम फेंका गया जिसमें वे घायल हो गये। हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बंगाल के क्रान्तिकारी ‘रास बिहारी बोस’ ने बनाई थी। वे गिरफ्तारी से बचने के लिए जापान चले गये। इस मामले में अवध बिहारी, अमीरचन्द, लाल मुकुन्द तथा बसन्त कुमार को गिरफ्तार कर लिया तथा उन पर ‘दिल्ली षड्यन्त्र केस’ के तहत मुकदमा चलाया गया।

अजमेर के निवासी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में इंडिया हाऊस की स्थापना की, जो क्रांतिकारियों का आश्रय स्थल एवं क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। इसी हाऊस में निवास करने वाले मदन लाल ढींगरा ने कर्नल वाईली की गोली मारकर हत्या की तथा यहीं निवासरत बी.डी. सावरकर को नासिक षड्यंत्र केस के तहत् गिरफ्तार कर भारत लाया गया और इन्हीं घटनाओं के कारण इंडिया हाऊस को बंद कर दिया गया।

श्यामजी कृष्ण वर्मा की सहयोगी मैडम भीखाजी रूस्तम कामा (पारसी महिला), जिन्हें Mother of Indian Revolution भी कहा जाता है, ने भारत की स्वतन्त्रता के प्रचार हेतु 1902 ई. में यूरोप व अमेरिका का दौरा किया तथा भारत छोड़ दिया। मैडम भीखाजी रूस्तम कामा ने पेरिस में क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया व पेरिस में ‘इंडिया सोसायटी’ की स्थापना की। स्टुअर्ट (जर्मनी) में ही मैडम कामा ने पहली बार हरा, पीला और लाल रंग का राष्ट्रीय झण्डा फहराया।

1918 ई. में पेश की गई विद्रोही समिति की रिपोर्ट में महाराष्ट्र के पुणे जिले के चित-पावन ब्राह्मणों को भारत में आतंकवाद शुरू करने का श्रेय दिया गया। 1922 में गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन अचानक समाप्त करने पर युवा वर्ग अत्यधिक निराश हुआ और पुनः क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गया।

3.गाँधीजी : राष्ट्रीय आन्दोलन 1919-47 ई. (तृतीय चरण)

महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास कर्मचंद गांधी था, जिनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को काठियावाड (गुजरात) के पोरबन्दर नामक स्थान पर पिता कर्मचंद गांधी एवं माता पुतली बाई के घर हुआ। 30 जनवरी, 1948 को नई दिल्ली में स्थित बिरला भवन के सामने नाथूराम गोडसे ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। ये लियो टॉलस्टॉय की रचनाओं से प्रभावित थे।

गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में टॉलस्टॉय फार्म की स्थापना भी की थी। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी द्वारा प्रकाशित पत्रिका का नाम इंडियन ओपेनियन था। गाँधी जी अपना राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले को मानते थे।

गांधीजी 9 जनवरी, 1915 को दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत आये। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में सरकार के युद्ध प्रयासों में मदद की जिसके लिए सरकार ने उन्हें ‘केसर-ए-हिन्द‘ की उपाधि से सम्मानित किया। इन्हें भर्ती करने वाला सार्जेन्ट भी कहा गया था। प्रारम्भ में इन्होंने भारत की सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया क्योंकि वे देखना चाहते थे, कि राजनीति की दिशा कैसे तय करें ?

चम्पारन सत्याग्रह

1915. गांधीजा ने अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे ‘सत्याग्रह आश्रम’ (कोचरब, अहमदाबाद) की स्थापना की तथा गांधीजी ने साबरमती नदी के किनारे साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) की स्थापना भी 1915 ई. में ही की थी। 1917 ई. में चम्पारन सत्याग्रह का सफल नेतृत्व किया और इसी जगह पहली बार गाँधीजी ने सत्याग्रह का प्रयोग किया।

ट्रेड यूनियन आन्दोलन

वर्ष 1918 में अहमदाबाद में महात्मा गाँधी ने सफलतापूर्वक मिल मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया था। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना 1920 ईस्वी में बम्बई में ट्रेड यूनियन आन्दोलन के अग्रणी नेता नारायण मल्हार जोशी के प्रयासों से हुई। उल्लेखनीय है कि अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर यूनियन को छोड़कर सभी ट्रेड यूनियनों का वर्ष 1930 में एकीकरण हो गया था।

ध्यातव्य रहे-1918 ई. के खेड़ा सत्याग्रह को हार्डीमन ने भारत का पहला वास्तविक किसान सत्याग्रह कहा है। 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में राजस्थान मूल के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री घनश्यामदास बिड़ला ने स्वराज्य के लिए आन्दोलन में कांग्रेस की सहायता करने हेतु गांधीजी को लगभग पाँच लाख रूपये भेंट किये थे।

रौलेट एक्ट

क्रान्तिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए सरकार ने 1917 ई. में न्यायाधीश ‘सिडनी रौलेट’ की अध्यक्षता में आतंकवाद को कुचलने की योजना बनाने के लिए एक समिति नियुक्त की जिसने 1919 ई. में ‘रौलेट एक्ट‘ पास किया रौलेट एक्ट के तहत् अंग्रेज सरकार बिना मुकदमा चलाये किसी भी व्यक्ति को जेल में रख सकती थी। रौलेट एक्ट को ‘बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील का कानून’ कहा गया। इस एक्ट को काला कानून भी कहा जाता है।

“स्वाद का वास्तविक स्थान जिह्वा नहीं, बल्कि मन है’- महात्मा गाँधी।

‘साधन ही उद्देश्यों का औचित्य बनाते हैं’ महात्मा गाँधी ।

‘सत्य परम तत्व है और वह ईश्वर है’-महात्मा गाँधी।

जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई तब अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, ‘कोई विश्वास नहीं करेगा कि ऐसे शरीर और आत्मा वाला कोई आदमी कभी इस धरती पर चला था।’

महात्मा गाँधी को दार्शनिक अराजकतावादी माना जाता है। गाँधीजी खादी को आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानते थे। ‘ऐसे जिओ जैसे यह आपका आखरी दिन है, ऐसे सीख आप हमेशा जीवित रहेंगे।’- महात्मा गाँधी।

जब जनभावना एवं उत्साह अपने महत्तम उबाल पर है, ऐसे में इस आंदोलन को वापस लेना किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं है।’ गाँधीजी द्वारा एकपक्षीय ढंग से फरवरी, 1922 में असहयोग आंदोलन को वापस लेने पर यह कथन सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था। सरोजनी नायडू ने इरविन और गाँधीजी को ‘दो महात्मा’ कहा। 25 साल के लिए महात्मा गाँधी के निजी सचिव महादेव देसाई थे। गांधीजी के बड़े पुत्र का नाम हरिलाल था।

जब 15 अगस्त 1947 ई. को भारत ने अपनी पहली आजादी का जश्न मनाया तब महात्मा गाँधी कलकत्ता में थे। गांधीजी 1919 के रौलेक्ट एक्ट के विरूद्ध थे, क्योंकि यह किसी भी व्यक्ति को बिना जांच’ रोकने’ का अधिकार सरकार को देता था। Means justif the ends’ का विचार महात्मा गाँधी ने व्यक्त किया था। ‘फीनीक्स फार्म’ की स्थापना महात्मा गाँधी ने की।

महात्मा गाँधी ने कहा कि उनकी ‘सबसे गहन धारणाएँ ‘अन टू दिस लास्ट‘ नामक पुस्तक “कुछ में प्रतिबिम्बित होती है और इस पुस्तक ने उनके जीवन को बदल डाला। इस पुस्तक का वह संदेश ‘व्यक्ति का जीवन सबके कल्याण में निहित है’ था, जिसने महात्मा गाँधी को बदल डाला। सितम्बर, 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में गाँधी ने यह घोषणा की कि, ‘भारत में ब्रिटिश राज इस महान देश में नैतिक, भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश लेकर आया है। मैं इस शासन को अभिशाप मानता हूँ। मैं शासन की इस व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने आया हूँ।  राजद्रोह मेरा धर्म हो गया है।

1.जलियांवाला हत्याकाण्ड (1919 ई.)

6 अप्रैल,1919 को रौलेट एक्ट [HTET-2014] की विरोध में सम्पूर्ण देश में राष्ट्रीय अपमान दिवस मनाया गया था। पंजाब में रौलेट एक्ट का विरोध करने वाले दो स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ‘डॉ. सत्यपाल’ और ‘डॉ. सैफुद्दीन किचलू’ को 9 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया, जिसके विरोध में 10 अप्रैल को रैली निकाली गई जिस पर गोली बारी में कुछ आन्दोलनकारी मारे गये।

इसी गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल, 1919 को बैशाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में सार्वजनिक सभा बुलाई गई, जिस पर पंजाब के लेफ्टिनेंट एक गवर्नर माइकल ओ डायर ने निहत्थी भीड़ पर गोलीबारी करवा जिसमें करीब 1000 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गये। इस घटना दी अंग्रेजों के भारत छोड़ने की कब्र में आखिरी कील साबित होना कहते को हैं। यानी इस घटना के बाद पूरे भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन एवं रोष उत्पन्न हो गया। इस हत्याकांड की जाँच करने के लिए कांग्रेस ने मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार जनरल डायर को दोषी माना गया, जबकि सरकार ने हंटर कमेटी नियुक्त की। हंटर समिति की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने जनरल डायर को केवल भारत में सेवा न करने योग्य ठहराया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसके विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी।

ध्यातव्य रहे– पंजाब के क्रान्तिकारी नेता ऊधमसिंह ने जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड का बदला लेने के लिए माइकल ओ डायर की लंदन में मार्च, 1940 में हत्या कर दी थी।

2.खिलाफत आन्दोलन (1919 ई.)

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्कियों पर किये गये अत्याचारों व टर्की विभाजन व वहाँ के खलीफा पद को समाप्त कर देने के विरोध में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया, जिसमें अली बन्धु, हकीम अजमल खाँ, डॉ. अन्सारी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, हसरत मोहानी आदि । प्रमुख तुर्की समर्थक व खिलाफत नेता थे।

इनके नेतृत्व में सितम्बर 11919 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी’ का गठन किया, दिल्ली।  सम्मेलन के दौरान इसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की। मोहम्मद अली  जिन्ना ने खिलाफत आन्दोलन का समर्थन नहीं किया। गांधीजी ने खिलाफत कमेटी को असहयोग आन्दोलन करने का सुझाव दिया, जिसे मान लिया गया व जून, 1920 ई. में इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी की मीटिंग में गांधीजी से असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व संभालने का आग्रह किया गया।

ध्यातव्य रहे – ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस: स्थापना – 31 अक्टूबर, 1920 ई., अध्यक्ष – लाला लाजपत राय, अकाली आन्दोलन प्रारम्भ हुआ।

3.असहयोग आन्दोलन (1919-1922 ई.)

खिलाफत आंदोलन एवं भारत में उत्तरदायी शासन न करने के विरोध में गाँधीजी ने भारत में असहयोग आन्दोलन करने की घोषणा की। दिसम्बर, 1920 ई. नागपुर में कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन में इसका प्रस्ताव रखा तथा सितम्बर, 1920 ई. में कलकत्ता के विशेष अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव की पुष्टि कर दी।

यह आन्दोलन 1 अगस्त, 1920 ई. से शुरू किया गया [UPTET 14]। इसी दिन प्रातःकाल तिलक का देहान्त हो गया। असहयोग आंदोलन के दौरान नकारात्मक एवं रचनात्मक कार्यों की सूची बनाई जिसमें सम्पूर्ण देश में कांग्रेस की कमेटियों का निर्माण किया गया। विरोध स्वरूप विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई तथा स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने को कहा गया। इसी दौरान राष्ट्रीय स्कूल एवं काॅलेज की स्थापना की गई।

17 नवम्बर, 1921 ई. को प्रिन्स ऑफ वेल्स के भारत आगमन के दिन पूरे देश में हड़ताल का आयोजन किया गया। दिसम्बर, 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने की अनुमति दी गई। 5 फरवरी, 1922 ई. में ‘चौरी-चौरा’ (गोरखपुर उत्तर प्रदेश) नामक स्थान पर हिंसक भीड़ ने पुलिस थाने को जला दिया, जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई, इन हिंसक घटनाओं के कारण असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने की घोषणा कर दी [HTET-2014] तथा 12 फरवरी, 1922 को बारदोली आंदोलन गांधीजी के द्वारा वापस ले लिया गया।

गांधीजी के आन्दोलन को वापिस लेने के निर्णय का तीव्र एवं व्यापक विरोध हुआ, तो वहीं जिन्ना ने असहयोग आन्दोलन को गांधी की हिमालयी भूल कहा। गांधीजी के असहयोग आन्दोलन का सबसे सफल प्रभाव विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कार्यक्रम था। कांग्रेस ने हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। खादी का प्रयोग एवं स्वदेशी का प्रचार आगामी आन्दोलन का भाग बन गया। कांग्रेस अब राष्ट्रव्यापी संस्था बन चुकी थी

ध्यातव्य रहे-गाँधी जी की अध्यक्षता में एकमात्र AICC (ऑल में इंडिया कांग्रेस कमेटी) अधिवेशन, 1924 में बेलगाम में आयोजित किया गया था।

4.स्वराज पार्टी

26-31 दिसम्बर, 1922 को हुए कांग्रेस के गया अधिवेशन में • विधान परिषद् चुनावों का बहिष्कार करने की कांग्रेसी नीति से असहमत होकर चितरंजनदास की अध्यक्षता में मोतीलाल नेहरू, विठ्ठलभाई पटेल, मदनमोहन मालवीय [HTET-2014] आदि कांग्रेसी नेताओं के द्वारा 1 जनवरी, 1923 को स्वराज पार्टी का गठन किया गया था, तो वहीं इनकी मान्यता थी कि राष्ट्रवादियों को विधान परिषदों का | बहिष्कार करने की बजाय उनमें प्रवेश कर सरकारी नीतियों का सक्रिय विरोध करते हुए उनमें बाधा उत्पन्न करनी चाहिए।

5.हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (1924 ई.)

1924 में ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ (HSRA) की स्थापना कानपुर में हुई, जिसके प्रमुख सदस्य शचीन्द्र नाथ सान्याल, भगत सिंह, शिव वर्मा, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद इत्यादि थे। दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में सितम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आजाद ने हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन का नाम बदलकर ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोएिशन’ कर दिया।

6.कांकोरी काण्ड (1925 ई.)

उग्रवादी गतिविधियों के लिए धन प्राप्त करने के उद्देश्य को लेकर 9 अगस्त, 1925 ई. को जब रेलगाड़ी से सरकारी खजाना सहारनपुर से लखनऊ की ओर जा रहा था, तो इसे उत्तर प्रदेश के लखनऊ सहारनपुर संभाग में कांकोरी नामक स्टेशन पर लूट लिया गया, इसे ही ‘कांकोरी कांड’ कहा गया। सरकारी खजाना लूटने का विचार ‘रामप्रसाद बिस्मल’ का था। सरकार ने इस कांड में शामिल लोगों की घरपकड़ कर रामप्रसाद विस्मल, अशफाक उल्ला खाँ, रोशनलाल एवं राजेन्द्र लाहिड़ी को दिसम्बर, 1927 ई. में फाँसी दे दी एवं शचीन्द्र सान्याल को आजीवन कारावास की सजा मिली। मन्नमथनाथ गुप्त को 14 वर्ष की कैद हुई।

इसमें शामिल चन्द्रशेखर आजाद पुलिस मुठभेड़ में 27 फरवरी, 1931 ई. को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए। रामप्रसाद बिस्मिल आजादी के प्रसिद्ध आह्वान गीत ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है’ के लेखक थे। बन्दी जीवन सान्याल की आत्मकथा है जो भारतीय क्रान्तिकारियों की बाइबिल कहलाई 19 अगस्त के दिन को भगतसिंह द्वारा कांकोरी काण्ड स्मृति दिवस के रूप में मनाना प्रारम्भ किया गया।

ध्यातव्य रहे 1926 ई. प्रथम ट्रेड यूनियन अधिनियम पारित हुआ तथा 1927 ई. बटलर कमेठी: सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में इंडियन स्टेट्स कमेठी (भारतीय रियासत समिति/राजाओं की परिषद्) का गठन हुआ।

साइमन कमीशन, 1927 ई.

1919 ई. में पारित भारत सरकार अधिनियम की जाँच करने के लिए ‘सर जॉन साइमन’ के नेतृत्व में छ: अंग्रेज सदस्य वाले आयोग का गठन 1927 में किया गया, इस आयोग में एक भी भारतीय नहीं होने के कारण इसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने काले झंडे दिखाकर घोर विरोध किया। साइमन कमीशन 3 फरवरी, 1928 को भारत आया, इसे ‘वाइट मैन कमीशन’ भी कहते हैं तथा इसका विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज किया गया, जिसमें लाला लाजपतराय की 17 नवम्बर, 1928 ई. में लाहौर में प्रदर्शन करते समय घायल हो जाने से मृत्यु हो गई। उन्होंने घायल हो जाने के दौरान कहा था, कि ‘मेरे ऊपर पड़ने वाली एक-एक लाठी अंग्रेजी शासन के ताबूत में आखरी कील साबित होगी।’

लाला लाजपत राय की मृत्यु से क्षुब्ध होकर भगतसिंह, राजगुरु व चन्द्रशेखर आजाद ने मिलकर 17 दिसम्बर, 1928 ई. को लाहौर के पुलिस कप्तान ‘सॉण्डर्स’ की गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना को ‘लाहौर षड्यन्त्र’ कहते हैं। ‘पब्लिक सेफ्टी बिल पास होने के विरोध में 8 अप्रैल, 1929 ई. को बटुकेश्वर दत्त व भगतसिंह ने ‘सेण्ट्रल लेजिस्टलेटिव असेम्बली’ में बम फेंका। इस कार्य का मुख्य उद्देश्य सोई हुई अंग्रेजी सरकार को नींद से जगाना / आतंकित करना’ था। इन घटनाओं से अंग्रेजी सरकार काफी परेशान हो गई और भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरु को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन पर केस चलाकर 23 मार्च, 1931 को फाँसी की सजा दे दी गयी। 23 मार्च को प्रतिवर्ष ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

ध्यातव्य रहे– वर्ष 1927 में ब्रुसेल्स में दलित राष्ट्रवादियों की कांग्रेस में राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से जवाहर लाल नेहरू ने भाग लिया। 1928 ई. में चन्द्रशेखर आजाद ने सशस्त्र क्रान्ति को संगठित करने के उद्देश्य से स्थापित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में पुनः नामकरण किया तथा वर्ष 1928 में ही बम्बई में हुई कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल भारतीय इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल थी।

नेहरू रिपोर्ट 1928

साइमन कमीशन के विरोध के बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को ने सम्पूर्ण देश के लिए तथा सर्वसम्मति से एक संविधान बनाने की चुनौती पेश की। मई 1928 में इसी चुनौती के आधार पर मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी का निर्माण किया गया। समिति के प्रमुख सदस्य तेजबहादुर सप्रू, , अली इमाम, सुभाषचन्द्र बोस, एन. एम. जोशी, एम. आर. जयकर आदि थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट जुलाई, 1928 में जारी की जिसे समिति ने अगस्त, 1928 में लखनऊ में आयोजित सर्वदलीय कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया। इसे नेहरू रिपोर्ट या भारतीय संविधान का ब्ल्यू प्रिंट भी कहा जाता है।

इस रिपोर्ट में भारत के संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत की गई जिसमें औपनिवेशिक शासन व्यवस्था का प्रावधान किया गया था। इसमें केन्द्र में पूर्ण उत्तरदायी शासन, प्रान्तों में स्वायत्तता तथा साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति समाप्त करने के साथ अल्पसंख्यकों की रक्षा की बात कही गई थी। नेहरू रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार की चुनौती का सटीक जवाब थी, तो वहीं सुभाष चन्द्र बोस ने इस रिपोर्ट के बारे में कहा था- ‘नेहरू समिति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि संविधान के विधानमण्डलों के अन्दर हिन्दु, मुसलमान व सिक्खों के प्रतिनिधित्व के प्रश्नों का समाधान था।’ लेकिन अंग्रेजों की कूटनीति के कारण मुस्लिम लीग के प्रधान मोहम्मद अली जिन्ना ने इसे अप्रजातांत्रिक और मुस्लिम हितों के विरूद्ध बताया तथा उसने मुसलमानों का एक अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाकर अपनी 14 सूत्रीय योजना रखी।

इस प्रकार मुस्लिम लीग और जिन्ना ने ब्रिटिश सरकार को नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकृत करने का अधिकार दे दिया, तो वहीं कांग्रेस के द्वारा ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी गई कि 31 दिसम्बर, 1929 तक रिपोर्ट स्वीकार नहीं की गई तो ऐसी हालत देश में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया जायेगा। नेहरू रिपोर्ट के अनुसार स्वतंत्र उपनिवेश के स्वरूप की सरकार देने के लिए दिया गया एक वर्ष का समय जब समाप्त हो गया, तो ऐसी हालत में 31 दिसम्बर, 1929 को कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन के अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू थे।

दीपावली घोषणा: 31 अक्टूबर, 1929 को वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा ब्रिटिश प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड (लेबर पार्टी) की ओर से की गई घोषणा, कि भारत को औपनिवेशिक दर्जा प्रदान किया जाएगा।’

कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन, 1929

1929 ई. के कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘पूर्ण। स्वराज्य’ का अपना लक्ष्य घोषित किया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे। 31 दिसम्बर, 1929 ई. को रात के 12 बजे जवाहरलाल नेहरू ने ‘रावी नदी’ के तट पर नवगृहीत तिरंगे झण्डे को फहराया। इसी अधिवेशन में 26 जनवरी प्रथम ‘स्वाधीनता दिवस’ के रूप में मनाने का निश्चत किया गया। इसी के साथ प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाए जाने की परम्परा शुरू हुई [UPTET-2013, CTET-2013]|

ध्यातव्य रहे: मेरठ षड्यन्त्र

ब्रिटिश सरकार ने 1929 ई. में साम्यवादी नेताओं को गिरफ्तार कर मेरठ में मुकदमा चलाया (1929-1933 ई.), जिसमें मुज्जफर अहमद को सबसे लम्बी सजा (काला पानी) मिली तथा इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन 1929 ई. में एन.एम.जोशी की अध्यक्षता में गठित, तो वहीं 13 सितम्बर, 1929 को 64 दिन के अनशन के बाद जतिनदास की मृत्यु लाहौर जेल में हुई थी तथा वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिनकी अनशन से जेल में मृत्यु हुई थी ।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन व दाण्डी यात्रा

जनवरी, 1930 में महात्मा गांधी ने 11 सूत्रीय प्रस्ताव रखा, जिस पर सरकार से कोई सकारात्मक जवाब न मिलने के कारण महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने की धमकी दी, जिसका प्रमुख उद्देश्य ‘नमक कानून’ को तोड़ना था। क्योंकि अंग्रेजी सरकार ने उस समय नमक पर कर लगा दिया था, जो आम जनता की एक जरूरत थी। वायसराय का सकारात्मक जवाब न मिलने पर महात्मा गांधी ने लॉर्ड इरविन को पत्र लिखा ‘मैंने रोटी मांगी थी मुझे पत्थर मिला, इन्तजार की घड़ियाँ समाप्त हुई।

12 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी ने अहमदाबाद में स्थित साबरमती आश्रम से अपने 78 आश्रमवासियों के साथ दाण्डी यात्रा प्रारम्भ की | CTET-2012]| दाण्डी ग्राम (गुजरात के नौसारी जिले में स्थित) पहुँचकर महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल, 1930 को समुद्र तट पर सांकेतिक रूप से नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ा इसे ‘नमक सत्याग्रह’ भी कहा जाता है। दक्षिण में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व में सी. राजगोपालाचारी ने किया।

इसी नमक सत्याग्रह की घटना के बाद सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत हुई। इस आन्दोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। नमक सत्याग्रह के दौरान घरसाणा में महिलाओं का नेतृत्व ‘सरोजनी नायडू’ के द्वारा किया गया। धरसाणा धरने के दौरान अंग्रेजी सैनिकों द्वारा लाठी चार्ज किया गया था, जिसका मार्मिक विवरण अमेरिकी समाचार पत्र फ्रीमैन के संपादक मिलर ने अपने पत्र में किया है।

ध्यातव्य रहे– 18 अप्रैल, 1930 में सूर्यसेन के नेतृत्व में चिटगांव (तत्कालीन) बंगाल शस्त्रागार पर धावा बोला गया था, तो वहीं सूर्यसेन के साथ प्रीतिलता बाडेदर एवं कल्पना दत्ता जैसी क्रान्तिकारी महिलाएं भी थीं। अगस्त 1930 ई. में रुदीनवागाँव में जंगल सत्याग्रह हुआ | CGTET-2011||

उत्तर-पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र में ‘सीमान्त गांधी के नाम से प्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में पठानों ने खुदाई खिदमतगार’ नामक संगठन का गठन कर सविनय अवज्ञा आन्दोलन में हिस्सा लिया। इसे लालकुर्ती आंदोलन भी कहते हैं। सरकार ने दमनकारी कार्यवाही करते हुए कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930-31-12 नवम्बर, 1930 से 13 जनवरी, 1931 तक लंदन में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रैम्जे मैकडोनाल्ड की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले प्रमुख भारतीय नेताओं में तेजबहादुर सप्पु, श्रीनिवास शास्त्री, बीकानेर के गंगासिंह, अलवर के महाराजा जयसिंह, मुहम्मद अली, मुहम्मद सफी, आगा खाँ इत्यादि थे। यह पहली ऐसी वार्ता थी जिसमें ब्रिटिश शारकों द्वारा भारतीयों को बराबरी का दर्जा दिया गया। कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया।

गाँधी इरविन समझौता 1931-5 मार्च, 1931 को गांधी व वायसराय इरविन के मध्य हुई वार्ता के बाद गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस एवं द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार कर लिया गया था।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 1931-7 सितम्बर, 1931 से दिसम्बर, 1931 तक लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी व भारतीय महिलाओं के प्रतिनिधि के रूप में सरोजिनी नायडू ने भाग लिया। इस सम्मेलन का आयोजन लंदन के ‘सेंट पैलेस’ में किया गया। इसी समय चर्चिल ने महात्मा गांधी को ‘अर्द्ध-नग्न फकीर’ कहा।

इसी सम्मेलन में सर आगा खाँ द्वारा मुस्लिम लीग के लिए साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को स्थायी बनाने और डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दलित वर्ग के लिए पृथक् निर्वाचन मण्डल की मांग की गई। अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण मुद्दे पर मोहम्मद अली जिन्ना एवं अन्य साम्प्रदायिक दलों के प्रतिनिधियों की हठधर्मिता से सम्मेलन असफल हो गया।

जनवरी, 1932 में कांग्रेस के द्वारा महात्मा गाँधी के देश को इस | आह्वान के साथ ‘देश अग्नि परीक्षा के लिए तैयार रहे’ सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः प्रारम्भ कर दिया गया। वायसराय लॉर्ड वेलिंगटन के द्वारा सत्याग्रहियों पर अमानुषिक एवं दमनात्मक कार्यवाही की गई। मई, 1934 तक आन्दोलन वापस ले लिया गया, परन्तु इस आन्दोलन के माध्यम से कांग्रेस बड़े पैमाने पर देशवासियों को स्वतंत्रता के आन्दोलन में सम्मिलित करने में सफल रही।

रानी गिंडाल्यू भारत की प्रसिद्ध महिला क्रान्तिकारियों में से एक थी जिन्हें नागालैण्ड की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है तथा इनको सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान 17 अप्रैल, 1932 को गिरफ्तार कर लिया गया व 14 वर्ष की सजा दी गई। नागा महिला रानी गिंडाल्यू को पं. जवाहरलाल नेहरू ने रानी की उपाधि दी | REET 2011| व कहा एक दिन ऐसा आयेगा जब भारत इन्हें स्नेहपूर्ण स्मरण करेगा।

साम्प्रदायिक पंचाट

भारतीय समाज की एकता तोड़ने एवं निर्वाचन पद्धति में अन्य भारतीय जातियों को आरक्षण देने के सिलसिले में 16 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने ‘कम्युनल अवॉर्ड’ जारी कर पंचाट में पृथक् निर्वाचन पद्धति न केवल मुसलमान अपितु दलित वर्ग पर भी लागू कर दिया। इसके विरोध में गांधीजी ने यरवदा जेल में ही 20 सितम्बर, 1932 को आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया। मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सी. राजगोपालाचारी के प्रयत्नों से पाँच दिन बाद 26 सितम्बर, 1932 ई को महात्मा गांधी व डॉ. भीमराव अम्बेडकर के मध्य ‘पूना पैक्ट’ हुआ जिसके द्वारा साम्प्रदायिक घोषणा को अस्वीकार कर दिया गया तथा हिन्दुओं को आवंटित सीटों में से दलितों के लिए 148 सीटें आरक्षित कर दी। यही पूना पैक्ट स्वतन्त्र भारत में आरक्षण का आधार बना।

तृतीय गोलमेज सम्मेलन

1932-17 नवम्बर, 1932 से 24 दिसम्बर, 1932 तक तृतीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें केवल राजभक्तों और साम्प्रदायिकतावादियों ने ही भाग लिया। कांग्रेस ने इस सम्मेलन में अपनी ओर से कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा।

तीनों गोलमेज सम्मेलनों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने मार्च, 1933 में एक ‘श्वेत पत्र’ प्रकाशित किया, जिसके आधार पर ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया गया।

ध्यातव्य रहे-गोलमेज सम्मेलन के तीन दौर लंदन में आयोजित हुये थे। 1933 ई. में परतंत्र भारत की अंतिम भारतीय कांग्रेसी महिला अध्यक्षा श्रीमती नलिनी सेन गुप्ता थी, तो वहीं 1933 ई. में बीनादास ने दीक्षान्त समारोह में उपाधि ग्रहण करते समय गवर्नर पर गोली चलाई।

भारत सरकार अधिनियम, 1935

संवैधानिक सुधारों की दृष्टि से भारत सरकार अधिनियम 1935 ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित अब तक का सबसे बड़ा पारित विधान था। यह अधिनियम संवैधानिक सुधारों की श्रृंखला में अन्तिम अधिनियम था। इस अधिनियम के द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना की गई तथा एक संघीय संघ बनाने का सुझाव भी दिया गया। रिज़र्व बैंक की स्थापना का प्रावधान भी अधिनियम में था।

दिल्ली में 1 अक्टूबर, 1937 को संघीय न्यायालय की स्थापना की गई। इस अधिनियम द्वारा भारत परिषद् को समाप्त कर दिया गया, बर्मा को भारत से पृथक कर दिया गया, ब्रिटिश प्रान्तों की संख्या 11 कर दी गई तथा पृथक रेलवे वैधानिक सत्ता की स्थापना की गई। इस अधिनियम का सभी राजनैतिक दलों ने विरोध किया। जवाहर लाल नेहरू ने इस अधिनियम को ‘दासता का नया चार्टर’ कहा। उन्होंने इसके सम्बन्ध में टिप्पणी की कि ‘हमें ऐसी कार दे दी गई है, जिसके ब्रेक तो ठीक हैं, परन्तु इंजन नहीं है।’

1935 ई. के भारत अधिनियम द्वारा प्रस्तावित फेडरल यूनियन में ●राजसी प्रान्तों को शामिल करने के पीछे अंग्रेजों की असली मंशा राष्ट्रवादी नेताओं को साम्राज्यवाद विरोधी सिद्धांतों को व्यर्थ करने के लिए राजाओं का इस्तेमाल करने की थी।

प्रथम अखिल भारतीय किसान सम्मेलन अप्रैल, 1936 में लखनऊ में बुलाया गया, जहाँ इसका नाम अखिल भारतीय किसान सभा रखा गया तथा स्वामी सहजानन्द को इसका अध्यक्ष चुना गया। वर्ष 1937 के चुनावों में कांग्रेस को बंगाल, पंजाब और सिंध में पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था। पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग तथा बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी एवं मुस्लिम लीग की सरकार गठित हुई। सिंध में भी गैर कांग्रेसी मंत्रिमण्डल का गठन हुआ था।

1938 में हरिपुरा कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के लिए सुभाषचन्द्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। इस समय सुभाष चन्द्र बोस ने। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय योजना समिति’ की स्थापना की। 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान अध्यक्ष पद के लिए सुभाष चन्द्र बोस पुनः चुन लिये गये। उन्होंने गाँधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैया को हराया था।

पट्टाभि सीतारमैया की हार पर गाँधीजी ने कहा था, कि पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है। सुभाष चन्द्र बोस एवं गाँधीजी के बीच वैचारिक दूरियाँ आने के कारण बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया। 3 मई, 1939 को सुभाषचन्द्र बोस ने ‘फारवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की।

26 अक्टूबर, 1939 में लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय विधानमण्डल की सहमति बिना ही भारत को ‘द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल कर दिया, जिससे 15 नवम्बर, 1939 को सभी प्रान्तीय कांग्रेस मन्त्रिमण्डलों ने इस्तीफा दे दिया और साथ ही नारा दिया ‘न कोई भाई, न कोई पाई। इस्तीफा देने पर मुस्लिम लीग एवं भीमराव अम्बेड़कर ने 22 दिसम्बर, 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया।

पाकिस्तान प्रस्ताव

सर्वप्रथम पृथक् मुस्लिम राष्ट्र की बात’ इकबाल’ द्वारा 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहबाद अधिवेशन में कही गयी। 23 मार्च, 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर के वार्षिक अधिवेशन में पृथक् पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित किया गया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता मुहम्मद अली जिन्ना ने की, जिसमें जिन्ना द्वारा ‘द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त’ दिया गया। द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त (भारत-पाकिस्तान) सर्वप्रथम रहमत अली ने 1933 में अपनी पुस्तक में Now or Never’ व्यक्त किया था।

अगस्त प्रस्ताव

अगस्त, 1940 में ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस का द्वितीय विश्व युद्ध में समर्थन पाने के लिए यह प्रस्ताव रखा गया जिसमें भारत को द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् औपनिवेशक स्वशासन प्रदान करने तथा भारतीयों द्वारा नये संविधान की रूपरेखा तैयार करने की बात को स्वीकारा गया था, लेकिन कांग्रेस ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह

भारतीयों की इच्छा के विरूद्ध भारत को अंग्रेजी सरकार द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के विरोध में देश में हड़ताल एवं प्रदर्शन हुए गांधीजी के प्रस्ताव पर 17 अक्टूबर, 1940 से कांग्रेस ने प्रतीकात्मक विरोध स्वरूप व्यक्तिगत सत्याग्रह पवनार से प्रारम्भ किया गया, तो वहीं पहले सत्याग्रही विनोबा भावे, दूसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू एवं तीसरे सत्याग्रही श्री ब्रह्मदत्त बने तथा इस आन्दोलन में लगभग 30 हजार सत्याग्रही जेल गये। ये सत्याग्रह जनवरी, 1942 तक चला। जिसमें विनोबा भावे एवं नेहरू के अलावा राजगोपालाचारी, सरोजिनी नायडू और अरुणा आसफ अली जैसे नेता भी जेल गये।

क्रिप्स मिशन (प्रस्ताव ) 1942

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री सविल पर दबाव डाला कि वह भारतीयों को युद्ध में सहयोग प्राप्त ‘करने के लिए बातचीत करे। इसलिए भारत में राजनैतिक और वैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए युद्धकालीन मंत्रिमंडल के सदस्य ‘स्टैफर्ड क्रिप्स’ के नेतृत्व में एक मिशन भारत भेजा।

इस मिशन का प्रमुख प्रस्ताव था- द्वितीय युद्ध के पश्चात् भारत में एक निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जायेगा, जिसमें भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे, भारत को डोमिनियन स्टेट्स प्रदान किया जायेगा तथा किसी भी प्रान्त को संविधान स्वीकार या अस्वीकार करने का पूर्ण अधिकार होगा व ऐसे प्रान्त अपने स्वयं का पृथक संविधान निर्मित कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया। गांधीजी ने इसे दिवालिया बैंक के नाम जारी किया गया, चैक की संज्ञा दी (Post Dated Cheque) तथा जवाहर लाल नेहरू ने इसमें यह जोड़ दिया था, कि जो अब टूटने के कगार पर है।

भारत छोड़ो आन्दोलन (अगस्त क्रान्ति, 1942 )

क्रिप्स मिशन के असफल होने व वापस लौटने के बाद महात्मा गांधी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें अंग्रेजों को भारत छोड़ने की अपील की। महात्मा गाँधी ने कांग्रेस अधिवेशन के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन प्रारम्भ करने का प्रस्ताव रखा और नहीं मानने पर धमकी दी, कि मैं बालू से भी कांग्रेस से बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकता हूँ। तब 8 अगस्त, 1942 की अर्द्धरात्रि को बंबई में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी द्वारा भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया गया। गांधीजी ने कहा कि या तो हम भारत को हम पूर्ण स्वतंत्र करायेंगे या फिर इस प्रयास में मर मिटेंगे। इसी अधिवेशन में महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया एवं कहा कि अब कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य से कम के किसी भी सरकारी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगी।

बंबई के ‘ग्वालिया टैंक मैदान’ (अब अगस्त क्रान्ति मैदान) में मौलाना आजाद की अध्यक्षता में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश किया गया। इस आंदोलन का मुस्लिम लीग, यूनियनिस्ट पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी और भीमराव अम्बेडकर ने विरोध किया।

भारत छोड़ो आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक सभाएँ करना, लगान नहीं देना, हड़ताल करना तथा सरकार के कार्यों में असहयोग देना था। इस आंदोलन के दूसरे ही दिन कांग्रेस के चोटी के नेताओं महात्मा •गाँधी, जवाहर लाल नेहरू आदि को गिरफ्तार कर लिया गया, महात्मा गांधी को पुणे के आगा खाँ महल में बन्दी बनाकर रखा गया और ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन का दमन तेज कर दिया। इस दमन के विरोध में महात्मा गाँधी ने अनशन करने का निर्णय लिया। सम्पूर्ण देश में गाँधीजी के प्रति सहानुभूति जाग गयी और आंदोलन हिंसक होने लगा। ब्रिटिश सरकार पर अन्य देशों के प्रमुखों का गांधीजी को रिहा करने का दबाव बढ़ने लगा परंतु अंग्रेज महात्मा गांधी की मौत चाहते थे।

भारत छोड़ो आन्दोलन अब तक का सबसे बड़ा अहिंसक आन्दोलन नहीं, बल्कि हिंसक आन्दोलन था जिसमें अंग्रेजी सरकार ने भी हिंसक दमन चक्र ‘Operation Zero Hour’ चलाया। इस आन्दोलन के फलस्वरूप गांधीजी सहित सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जयप्रकाश नारायण को हजारी बाग सेन्ट्रल जेल में रखा गया। कालान्तर में जयप्रकाश नारायण जेल की दीवार फाँदकर फरार हो गये तथा उन्होंने ‘आजाद का गठन किया। इसी दौरान उषा मेहता, राम मनोहर लोहिया, प्रिंटर व अन्य ने एक भूमिगत रेडियो स्टेशन का संचालन किया, जिसके माध्यम से आंदोलन का प्रचार एवं रूपरेखा आम जनता तक पहुँचाते थे। इसी दौरान बलिया (उत्तरप्रदेश), सतारा (महाराष्ट्र), तामलुक (प. बंगाल) में समानांतर सरकारें स्थापित हुई। वहाँ अंग्रेजी शासन को समाप्त कर स्थानीय शासन को लागू किया गया।

सी.राजगोपालाचारी फॉर्मूला

श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने मार्च 1944 में यह योजना प्रस्तुत की जिसमें मुस्लिम लीग द्वारा देश की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करते हुए अस्थाई सरकार बनाने में कांग्रेस का सहयोग करने तथा युद्धोंपरान्त उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मुस्लिम बहुसंख्यक प्रान्तों में जनमत संग्रह कराने की बात कही गई। रास बिहारी बोस ने दक्षिणी-पूर्वी एशिया में रह रहे भारतीयों के सहयोग से जापान में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की तथा लीग ने जनरल सोहन सिंह के सहयोग से भारत को आजाद कराने हेतु भारतीय युद्ध बंदियों को लेकर इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया।

आजाद हिन्द फौज (इंडियन नेशनल आर्मी-INA )

4 जुलाई, 1943 को नेताजी सुभाषचन्द्र ने सिंगापुर में जापानी सेना द्वारा युद्धबंदी बनाये भारतीय सैनिकों को शामिल करते हुए इंडियन नेशनल आर्मी का पुनर्गठन किया एवं तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा के नारे के साथ सभी भारतीयों को अंग्रेजी दासता से मुक्ति प्रदान करने हेतु विद्रोह का आह्वान किया, तो वहीं लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में नेताजी ने आजाद हिन्द फौज की रानी झाँसी महिला रेजीमेन्ट का गठन किया।

21 अक्टूबर, 1943 को उन्होंने सिंगापुर में भारत की अस्थाई सरकार के गठन की घोषणा की जिसे जापान, जर्मनी एवं इटली द्वारा तुरन्त मान्यता प्रदान कर दी गई और नवम्बर, 1943 में जापान सरकार द्वारा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूहों को भारत की इस अस्थाई सरकार को सौंप दिया गया, तो वहीं नेताजी ने अण्डमान जाकर भारत का झण्डा फहराया तथा आजाद हिन्द फौज को दिल्ली चलो का नारा दिया, परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के कारण आजाद हिन्द फौज को वापस लौटना पड़ा।

नेताजी सिंगापुर से जापान चले गये तथा फिर फारमोसा में एक वायुयान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई, तो वहीं आजाद हिन्द फौज के तीन उच्चाधिकारियों (पी.के.सहगल, गुरूबख्शसिंह ढिल्लो शाह नवाज) पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया गया, परन्तु बाद में इन्हें रिहा करना पड़ा।

अक्टूबर, 1943 में ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड वेवेल को भारत का वायसराय और गवर्नर नियुक्त किया। उसने 6 मई, 1944 को बीमारी के कारण गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया। 14 जून, 1945 को उसने अपनी योजना प्रकाशित की जो वेवेल योजना’ कहलाई। वेवल योजना का मुख्य उद्देश्य एक नवीन कार्यकारी परिषद् के गठन का प्रस्ताव था, जिसमें वायसराय, कमांडर-इन-चीफ के अलावा सभी सदस्य भारतीय होने का प्रावधान था।

इस जना पर बातचीत करने के लिए 24 जून, 1945 ई. को शिमला में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें सभी दलों और वर्गों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जिसे अस्वीकार कर दिया गया।

10 जुलाई, 1945 को लेबर पार्टी की सरकार ने क्लीमेन्ट एटली के नेतृत्व में इंग्लैण्ड की राजसत्ता संभाली और लॉर्ड पैथिक लॉरेन्स भारत के राज्य सचिव बने। 19 फरवरी, 1946 को ब्रिटेन में प्रधानमन्त्री एटली ने इंग्लैण्ड के ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए भारतीयों को आत्म निर्णय का अधिकार प्रदान किया।

फरवरी, 1946 का नौसेना विद्रोहः 18 फरवरी, 1946 को बम्बई स्थित सिग्नल स्कूल के नौसैनिक अधिकारियों ने भूख हड़ताल कर दी जो शीघ्र ही पूरे पश्चिमी तट पर फैल गई। 23 फरवरी, 1946 को सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से सैनिकों ने विद्रोह समाप्त किया।

9 अप्रैल, 1946 को मुस्लिम लीग के सम्मेलन में मुसलमानों के एकमात्र लक्ष्य पाकिस्तान को लेकर निम्न प्रस्ताव पास हुआ ‘भारत के उत्तर-पूर्व में बंगाल और आसाम, उत्तर पश्चिम में पंजाब, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत, सिन्ध और बलूचिस्तान के क्षेत्र जिन्हें पाकिस्तान क्षेत्र कहते हैं और जहाँ मुसलमान वर्चस्व रखने वाले बहुसंख्या में है, एक स्वतंत्र राज्य के रूप में निर्मित होने चाहिए और बिना किसी विलम्ब के पाकिस्तान की स्थापना के क्रियान्वयन के लिए एक असंदिग्ध वचनबद्धता दी जानी चाहिए।”

एटली द्वारा की गई अपनी घोषणा के अनुसार उसने अपने मन्त्रिमण्डल के तीन सदस्यों पैथिक लॉरेन्स, सर स्टेफोर्ड क्रिप्स और सर ए.वी. एलेक्जेन्डर को कैबिनेट मिशन’ के रूप में 24 मार्च, 1946 ई. को भारत भेजा। कैबिनेट मिशन योजना में घोषणा की गई कि संविधान के निर्माण तक प्रमुख राजनीतिक दलों की एक अन्तरिम सरकार बनायी जायेगी, जिसमें 14 सदस्य सम्मिलित होंगे और संविधान निर्माण के उपरान्त ब्रिटिश सरकार सार्वभौम सत्ता का अधिकार देशी रियासतों को सौंप देगी।

29 जुलाई, 1946 ई. को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट योजना को पूर्णत: अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इस योजना में पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद 16 अगस्त, 1946 ई. को मुस्लिम लीग ने ‘सीधी कार्यवाही दिवस’ के रूप में मनाया और खूनी संघर्ष (साम्प्रदायिक दंगे) आरम्भ कर दिये। गाँधीजी ने इस योजना को भारत में अब तक आये मिशनों की योजनाओं से बेहतर माना।

अंतरिम सरकार के निर्माण के लिए भारत में चुनावों की घोषणा की गई, जिसमें कांग्रेस ने अधिकतम सीटें अर्जित कर सरकार बनाने की योग्यता हासिल की, परंतु मुस्लिम लीग द्वारा प्रत्यक्ष कार्यवाही में भाग लेने के कारण अंतरिम सरकार में भाग लेने के लिए मनाही कर दी। जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री बनने के लिए आमंत्रित किया गया और 2 दिसम्बर, 1946 को उनके नेतृत्व में भारत की पहली अंतरिम राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया।

ब्रिटेन में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एटली के नेतृत्व में उदारवादी सरकार का गठन हुआ, जिसने घोषणा की, कि जल्दी से जल्दी भारत से ब्रिटिश आधिपत्य को समाप्त कर दिया जायेगा, इस कार्य को पूरा करने के लिए वायसराय वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाकर भेजा गया।

माउन्टबेटन ने भारत आकर कांग्रेस के उच्च नेताओं से भारत की आजादी के संदर्भ में बातचीत की, लेकिन इसी समय नोआखली के साम्प्रदायिक दंगों के कारण जिन्ना ने भारत विभाजन की मांग को जोर-शोर से उठाया।

कोई भी योजना कारगार होती नहीं दिखने के कारण माउन्टबेटन ने भारत विभाजन के संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आदि से बातचीत की और महात्मा गाँधी को मनाने का दबाव दिया परंतु महात्मा गाँधी ने कह दिया था, कि भारत का विभाजन मेरी लाश के ऊपर से होगा। परंतु नेहरू ने भारत के विभाजन की अनिवार्यता बताते हुए गाँधीजी को मना लिया। तब 3 जून, 1947 ई. को माउंटबेटन ने भारत के विभाजन के साथ सत्ता हस्तान्तरण की योजना प्रस्तुत की। इसे ‘माउंटबेटन योजना / तीन जून योजना/डिकी बर्ड प्लान’ कहते हैं। पं. गोविन्द वल्लभ पंत ने इस घटना को ‘भारत की आत्महत्या’ बताया।

प्रधानमन्त्री एटली ने ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में 3 जून, 1947 ई. की योजना की घोषणा की। मोहम्मद अली जिन्ना ने इसे सिर कटे और पतंगों द्वारा जर्जरीकृत पाकिस्तान के रूप में बताया। 4 जुलाई, 1947 ई. को माउण्टबेटन योजना के आधार पर भारतीय स्वतन्त्रता का विधेयक ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया जो 18 जुलाई को पारित हो गया। इसी विधेयक के आधार पर 14 अगस्त, 1947 ई. को ‘पाकिस्तान’ का जन्म हुआ और 15 अगस्त, 1947 ई. को ‘भारत’ आजाद हो गया। 17 अगस्त, 1947 ई. को ब्रिटेन के प्रसिद्ध वकील ‘सर रिचर्ड्स रैडक्लिफ’ ने इन दोनों देशों के मध्य एक कृत्रिम सीमा का निर्धारण कर तारबंदी करवाई। तत्कालीन भारत सचिव हरबर्ट सैमुअल ने ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतन्त्रता विधेयक को बिना युद्ध का शान्ति समझौता’ कहा।

लॉर्ड माउंटबेटन स्वतन्त्र भारत के प्रथम अंतिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल वायसराय थे, जबकि सी. राजगोपालाचारी भारत के एकमात्र भरतीय गवर्नर जनरल थे [CTET-2018] लॉर्ड लिस्टोवेल भारत के अंतिम राज्य सचिव थे। स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू’ (चाचा नेहरू) तथा प्रथम राष्ट्रपति ‘डॉ. राजेन्द्र प्रसाद’ बने तथा पाकिस्तान की संविधान सभा ने 11 अगस्त, 1947 ई. को अपनी पहली बैठक में ‘मोहम्मद अली जिन्ना’ को राष्ट्रपति चुना।

ध्यातव्य रहे– भारत की आजादी के समय कांग्रेस के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी थे।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख कारण

  • 1857 का स्वतंत्रता संग्राम
  • पश्चिमी संस्कृति एवं शिक्षा का प्रभाव
  • इल्बर्ट बिल विवाद
  • लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीति
  • सामाजिक व धार्मिक आंदोलन
  • आर्थिक शोषण
  • विदेशी घटनाओं एवं विदेशी संपर्क का प्रभाव

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