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Bhartiya Sanskriti ka Prachar | भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रसार (वृहत्तर भारत)

Bhartiya Sanskriti ka Prachar | भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रसार (वृहत्तर भारत)

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Bhartiya Sanskriti ka Prachar | भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रसार (वृहत्तर भारत)

सर्वप्रथम मत्स्य पुराण में वृहत्तर भारत की अवधारणा मिलती है, में जिसमें भारतवर्ष के साथ दक्षिण पूर्वी एशिया के आठ द्वीपों को शामिल किया है।

वृहत्तर भारत का सर्वप्रथम प्रयोग राधाकुमुद मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘भारत की मौलिक एकता’ में किया। वे क्षेत्र जहा भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार व्यापार, धर्म प्रचार एवं भारतीय मूल के लोगों द्वारा साम्राज्य स्थापना से हुआ, उसे वृहत्तर भारत कहा जाता है। इसमें सर्वाधिक योगदान व्यापार का था।

  • अग्नि पुराण में भारत को ‘जम्बू द्वीप’ कहा गया है।
  • फाह्यान ने लिखा कि काबुल से अन्नाम (चम्पा) तक समूचे क्षेत्र को शिन- तु/देवताओं का देश कहा जाता था।
  • अग्निपुराण के अनुसार समुद्रपार के भारतीय प्रदेशों को दीपान्तर कहा जाता था।
  • समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में सर्वद्वीपासिभि शब्द का उल्लेख मिलता है जिससे आशय दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों से है।
  • गुप्तकाल में वृहत्तर भारत की अवधारणा पूर्ण हुई थी।
  • बौद्ध धर्म के व्याकरणाचार्य चन्द्रगोमिन के प्रभाव से शैलेन्द्र वंशीय शासक बौद्ध बने।

मध्य एशिया एवं चीन-

1.चीन, भारत एवं ईरान के मध्य स्थित प्रदेश को मध्य एशिया अथवा चीनी तुर्किस्तान कहा जाता है। इसके अन्तर्गत काश्गर, यारकन्द, खोतान,शानशान, तुर्फान, कूची, करशहर (अग्निदेश) आदि राज्य शामिल थे।

2.बौद्ध धर्म के माध्यम से भारतीय लिपि तथा भाषा का मध्य एशिया में प्रवेश हुआ।

खोतान-

बौद्ध परम्परा के अनुसार अशोक के पुत्र कुणाल (कुस्तन) ने खोतान में हिन्दू राज्य की स्थापना की। कुणाल का पौत्र विजितसम्भव था। इसके पश्चात् खोतान के सभी राजाओं के नामों का प्रारम्भ विजित से ही मिलता है।

  • विजितसंभव के समय में वैरोचन नामक आचार्य ने खोतान में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
  • फाह्यान ने खोतान का वर्णन किया है। गोमती विहार खोतान में महायान बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।
  • गोमती विहार विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मठ माना जाता है।
  • फाह्यान के अनुसार प्रत्येक नागरिक अपने घर के सामने एक छोटा पगोड़ा बनाता था।
  • खोतान से खरोष्ठी लिपि में धम्मपद, उदान वर्ग तथा सद्धर्मपुण्डरीक नामक ग्रन्थों की पाण्डुलिपि मिली है।
  • 5वीं सदी में धर्मक्षेम नामक बौद्ध भिक्षु महापरिनिर्वाणसुत्र की पाण्डुलिपि की खोज में चीन से खोतान गया था।

कूची:-

कूची भी बौद्ध सभ्यता का केन्द्र था। पुराणों में इसे कुशद्वीप कहा गया। है। यहां के राजा स्वर्ण पुष्प, हरिपुष्प, हरदेव, सुवर्ण देव आदि हुए। भारतीय विद्वान कुमारायन अपनी प्रतिभा के बल पर कूची के राजा का गुरू बन गया। कुमारायन ने जीवा नामक कन्या से विवाह किया। इन दोनों से कुमारजीव (343-413 ई.) उत्पन्न हुआ।

  • कुमारजीव ने कश्मीर में बंधुदत्त से बौद्ध धर्म के सार्वास्तिवादी मत की शिक्षा ग्रहण की।
  • कुमारजीव पहला व्यक्ति था जिसने चीनी भाषा में महायान दर्शन की व्याख्या की।

ह्वेनसांग के अनुसार कूची शहर के बाहर बुद्ध की 90 फीट ऊँची दो विशाल प्रतिमाएं थी जिनके सामने प्रति पांचवें वर्ष धार्मिक समारोह का आयोजन होता था।

बामियान:-

अफगानिस्तान में बामियान व बैग्राम में बुद्ध की अनेक मूर्तियां व विहार. मिले हैं। बामियान में बुद्ध की एक विशाल मूर्ति थी जो ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों की है। दुर्भाग्यवश 2001 में अफगानिस्तान के तालिबान शासकों ने इसे तोड़कर नष्ट कर दिया। अफगानिस्तान को श्वेत भारत भी कहा जाता था।

काश्गर (शैल देश) एवं तुर्फान:-

फाहियान जब काश्गर पहुंचा तो यहाँ पंचवर्षीय बौद्ध महोत्सव मनाया जा रहा था। यह कनिष्क साम्राज्य का महत्वपूर्ण भाग था। तुर्फान में भी 5वीं सदी में बौद्ध धर्म का प्रसार हो चुका था। यहां से खुदाई में बौद्ध बिहार, स्तूप आदि मिले हैं। आठवीं सदी में इस्लाम के प्रसार के बाद यहां भारतीय संस्कृति तेजी से विलुप्त हुई।

  • तुर्फान के राजा चाऊ ने 5वीं सदी में मैत्रेय का मन्दिर बनवाया।
  • तुर्कान में अश्वघोष द्वारा रचित सारिपुत्रप्रकरण नामक नाटक का अन्तिम अध्याय एक भोजपत्र पर प्राप्त हुआ है।

तिब्बत-

8वीं शताब्दी में तिब्बत में सन गेम्पों नामक शक्तिशाली राजा हुआ।जिसने मध्य एशिया पर आक्रमण कर अधिकार स्थापित किया।

राजा सनगेम्पो (Trisong Detsen) ने 8वीं सदी में नालन्दा से शान्त रक्ति एवं औदन्तपुरी से पद्मसंभव को तिब्बत में आमन्त्रित किया। शान्तरक्षित को तिब्बत का प्रधान धर्माधिकारी एवं महापुरोहित नियुक्त किया गया।

  • पद्म संभव ने तिब्बत में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा को लोकप्रिय बनाया।
  • पद्म संभव को तिब्बत में द्वितीय या ‘रिन-पो-चे’ कहा जाता है।
  • मगध से कमलशील को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए तिब्बत आमन्त्रित किया। कमलशील को भी तिब्बत में दूसरा बुद्ध कहा जाता है।

11वीं शताब्दी में पाल वंश के समय विक्रमाशिला विश्वविद्यालय से दीपंकर श्रीज्ञान नामक बौद्ध विद्वान तिब्बत गये। दीपंकर को अतिशा भी कहा जाता है। दीपंकर ने तिब्बत में बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाया। वैरोचन नामक मिक्षु ने भी बौद्ध धर्म का तिब्बत में प्रचार किया।

चीन

चीनी स्त्रोतों के अनुसार 65 ई. में हान वंश के राजा मिंगती ने सपने में एक स्वर्णिम पुरुष के दर्शन किये, जिसकी पहचान महात्मा बुद्ध से की गई। मिंगतो के राजदूत धर्मरत्न एवं कश्यपमातंग नामक दो बौद्ध मिथुओं को भारत से चीन ले गये। चीनी सम्राट ने उनके रहने के लिए राजधानी में श्वेत अश्व विहार का निर्माण कराया। यह चीन का प्राचीनतम बौद्ध विहार था।

  • कूची के कुमारजीव ने चीन में बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार किया।
  • कुमारजीव ने चीनी भाषा में अश्वघोष का जीवन चरित्र लिखा।
  • तांग वंश के काल में प्रभाकर मित्र, दिवाकर, बोधिरूचि, अमोघमित्र एवं वज्रमित्र जैसे बौद्ध प्रचारक चीन गए।
  • गुप्तकाल में कश्मीर से संघ भूति, धर्मयश, बुद्धयश, विमलाक्ष, बुद्धजीव, धर्ममित्र एवं गुणवर्मन चीन गए।
  • अन्तिम रूप से भारत से चीन जाने वाले बौद्ध विद्वान धर्मदेव (937) ई.), मंजूश्री एवं ज्ञानश्री (1053 ई.) थे।

दक्षिणी-पूर्वी एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रसार-

दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्तर्गत हिन्द चीन क्षेत्र के कम्बोडिया, चप्पा, बर्मा, स्याम, मलयद्वीप तथा पूर्वी द्वीपसमूह के सुमात्रा, जावा बोर्निया, बाली आदि आते हैं। प्राचीन भारतवासी इन सम्पूर्ण क्षेत्रको विशेषकर जावा एवं सुमात्रा को सुवर्णभूमि एवं स्वर्णद्वीप के नाम से जानते थे।

सुमात्रा, जावा, बोर्नियो एवं बाली वर्तमान इण्डोनेशिया में है।

(A) पूर्वी द्वीपसमूह

जावा (यवद्वीप): जावा में 65 ई.पू. भारतीयों ने अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए थे। फाहयान के अनुसार जावा में 5वीं सदी तक हिन्दू धर्म फेल चुका था। 5वीं सदी में जावा में गुणवर्मा के नेतृत्व में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। 15वीं सदी में कुबल खाँ के आक्रमण के बाद यहां इस्लाम का प्रसार हुआ।

जावा में कलसन मन्दिर राजा पर्णकरण ने 778 ई. में बनाया।

फाह्यान

फाह्यान के अनुसार जावा में केवल ब्राह्मण धर्मावलम्बी रहते थे तथा राजाओं के नाम वर्मन से समाप्त होते थे।

जावा से प्राप्त संस्कृत अभिलेखों में राजा पूर्ण वर्मा (छठी सदी) का उल्लेख हुआ है।

जावा, सुमात्रा एवं मलाया को मिला कर बने श्रीविजय साम्राज्य आठवी सदी में शलेन्द्र राजवंश का नियंत्रण हो गया।

नोट- श्रीविजय साम्राज्य चौथी सदी में सुमात्रा में स्थापित हुआ था।

जावा (इण्डोनेशिया) के बोरोबुदूर में सबसे विशाल बौद्ध मन्दिर है। यह आठवीं शताब्दी में जावा के शैलेन्द्र शासकों ने बनवाया।

आर. सी. मजुमदार ने बोरोबुदूर स्तूप को संसार का आठवां महान आश्चर्य माना है।

बोरोबुदुर स्तूप का निर्माण शैलेन्द्र राजा भूमि संभार एवं समर तुंग के संरक्षण में 750 से 850 ई. के मध्य हुआ। इसकी खोज 1885 ई. में सर टॉमस रैफलेन ने की थी।

बंगाल का एक बौद्ध कुमारघोष शैलेन्द्र का गुरु था, जिसके आदेश पर शैलेन्द्र राजा द्वारा तारा का मुहर मन्दिर (श्रीविजय, सुमात्रा) और जावा का बोरोबुदूर मंदिर बनवाया गया।

शलेन्द्र शासक महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।

श्रीविजय का वर्तमान नाम पेलबंग है।

जावा की राजकुमारी रारा /लोरो जोंगरंग (Rara Jonggrang) की स्मृति में दुर्गा/चण्डी के हजार मन्दिर एक रात में बनाए गए। जिन्हें सेवु मन्दिर (Sewu Temple) कहा जाता है।

प्रम्बनम (Prambanan) में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के तीनों के आठ मन्दिर (त्रिमूर्ति मन्दिर) प्रसिद्ध हैं। प्रम्बनम मन्दिर समूह इंडोनेशिया के सबसे विशाल हिन्दू मन्दिर तथा दक्षिण पूर्ण एशिया के दूसरे सबसे बड़े मन्दिर है। प्रम्बनम में सैकड़ों अन्ये छोटे मन्दिर हैं।

13वीं सदी में पूर्वी जावानी राज्य के कडिरि तथा सिंहसारि राजवंश तथा 14वीं सदी में मजपाहित (Majapahit) साम्राज्य के उदय से श्री विजय साम्राज्य समाप्त हो गया।

जावा के बौद्ध अभिलेखों में नागरी लिपि का प्रयोग होता था।

जावा में महाभारत के कथानक पर आधारित अनेक ग्रन्थों की रचना हुई ये हैं अर्जुन विवाह, भारत युद्ध।

कालिदास के रघुवंश के आधार पर सुमन सान्तक तथा कुमार संभव के आधार पर स्मर दहन की रचना हुई।

वयंग– जावा के छाया नाटक जिनका कथानक रामायण एवं महाभारत से लिया गया है, वयंग कहलाते हैं।

भारत में कहावत थी कि ‘जावा जाने वाले वापस नहीं आते।’

सुमात्रा:-

इण्डोनेशिया के सुमात्रा को प्राचीन काल में स्वर्ण द्वीप के नाम से जाना जाता था। इसका प्रसिद्ध नाम श्रीविजय था। यहां चौथी से सातवीं सदी तक श्रीविजय साम्राज्य था। राजेन्द्र चोल का भी यहां प्रभुत्व था।

  • 7वीं सदी में सुमात्रा में जयनाग नामक बौद्ध का शासन था।
  • इत्सिंग ने 7वीं सदी में सुमात्रा की यात्रा की तथा श्रीविजय को बौद्ध अनुशीलन का केन्द्र बताया।

बाली:-

इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में चौथी सदी में हिन्दू राज्य की स्थापना हुई। आज भी यहां हिन्दू संस्कृति है, हिन्दू एवं बौद्ध धर्म का प्रभाव है। यहाँ के प्रमुख मन्दिर हैं-

  1. बैसाख मन्दिर
  2. उलुवादु मन्दिर
  3. तनाह लोट मन्दिर
  4. सरस्वती मन्दिर

बाली का राजवंश कौडिण्य कुल से सम्बन्धित था।

बोर्नियोः-

  • चौथी सदी में इण्डोनेशिया के बोर्नियो (बकलपुर) में भी हिन्दू राज्य था। मूलवर्मा यहाँ का शासक था।
  • मूलवर्मा ने बाहुसुवर्णकम यज्ञ किया।
  • बोर्नियों से महकम नदी तट से संस्कृत के चार अभिलेख मिले हैं।

(B) हिन्द चीन

कम्बोडिया:- कम्बोडिया (कम्बौज) में ईसा की प्रथम शताब्दी में कौण्डिन नाम ब्राह्मण ने राज्य स्थापित किया। कौन्डिन्य ने नागी जाति की कन्या सोभा से विवाह किया। कौन्डिन्य को वृहत्तर भारत में हिन्दू राजवंशों का संस्थापक माना जाता है।

  • चीनी साहित्य में कम्बोडिया को फूनान कहा गया है। छठी शताब्दी के बाद कम्बोडिया पर शैलेन्द्र राजाओं का अधिकार हो गया।
  • प्रारम्भ में कम्बोडिया के राजा शैलराज या श्रीशैल कहलाते थे।

जयवर्मा द्वितीय ने कम्बोडिया को शैलेन्द्र साम्राज्य से मुक्त कराया।

जयवर्मा द्वितीय ने कम्बुज राजेन्द्र उपाधि धारण की जयवर्मा द्वितीय को खमेर राज्य का संस्थापक माना जाता है।

9वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जयवर्मा के वंशों के काल में कम्बोडिया में संस्कृत भाषा, दर्शन, साहित्य, गणित, ज्योतिष आदि का प्रसार हुआ।

  • जयवर्मा तृतीय (यशोवर्मन) की तुलना पाणिनी से की जाती है। उसने पतंजलि के महाभाष्य पर टीका लिखी।
  • कम्बोडिया में राजा सूर्यवर्मा द्वितीय (1113-1145 ई.) ने अंकोरवाट का विष्णु मंदिर बनवाया।
  • अंकोरवाट मन्दिर 1125 ई. में बना। अंकोरवाट मन्दिर खमेर एवं चोल वास्तु शैली का मिश्रण है।
  • अंकोरवाट मन्दिर मेकांग नदी के किनारे है तथा विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मन्दिर है।

जयवर्मा सप्तम (सूर्यवर्मा सप्तम 1181-1218 ई.) ने अंगकोरथोम नामक एक और वैष्णव मन्दिर बनवाया। यहां कई नगरों के नाम भारतीय नगरों के समान थे, जैसे- ताम्रपुर, आढ्यपुर, विक्रमपुर। यहां मन्दिरों में भारतीय देवी-देवताओं शिव, विष्णु, सरस्वती, लक्ष्मी,गणेश, ब्रह्मा आदि की उपासना प्रचलित थी।

अंगकोर थोम का बेयोन मन्दिर भी सूर्यवर्मन सप्तम ने बनवाया। यह स्तूप बौद्ध वास्तु का उदाहरण है।

चम्पा (अन्नाम ):-

वायु पुराण में चम्पा को अंग द्वीप कहा गया है।

कम्बोडिया के पूर्वी भाग को चम्पा कहा जाता था। यह आधुनिक वियतनाम है। यहाँ का पहला राजा श्रीमार हिन्दू था भद्रवर्मा, गंगराज, पाण्डुरंग, भृगु हरिवमां आदि अन्य राजा थे। चम्पा में भारतीय वर्णव्यवस्था एवं विवाह पद्धति प्रचलित थी।

यहां यज्ञोपवीत धारण करना, सती प्रथा आदि प्रचलित थी। चम्पा की राजभाषा संस्कृत थी।

भद्रवर्मा ने माइसन में एक शिव मन्दिर बनवाया।

यहाँ के मन्दिरों में चालुक्यों की स्थापत्य निर्माण शैली का अनुसरण किया जाता था।

चम्पा में बाद में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ।

  • चम्पा से शेषशायी विष्णु प्रतिमा प्राप्त हुई है।
  • पोनगर का शिव मन्दिर एवं डॉग-ड्यूआंग के बौद्ध मन्दिर प्रसिद्ध हैं।

मलाया-

मलाया (मलेशिया) में कर्मरंग, कलशपुर, कटाह, पहंग, लांग-क्यासू आदि प्रमुख राज्य थे। यहाँ के राजाओं के नाम गौतम, समुद्र विजयवर्मन आदि मिलते हैं चोल वंश के राजा राजेन्द्र प्रथम का मलाया द्वीप समूह पर व्यापारिक नियंत्रण था।

  • पाटलिपुत्र के राजकुमार मरोड़ ने मलाया में लंकाशुक नामक उपनिवेश स्थापित किया।
  • पेराक नगर से महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति मिली है तथा पेराक के शलिनसिड़ नामक स्थान से गरूड़ पर सवार विष्णु की मूर्ति मिली है।
  • भारत से महानाविक बुद्धगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु मलाया में धर्मप्रचार हेतु गया था।
  • मलाया में प्रमुख व्यापारिक स्थल तक्कोल था।

स्याम (थाईलैण्ड ):-

दूसरी से 13वीं सदी तक यहाँ भारतीय प्रभाव था। यहाँ हिन्दू धर्म एवं महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव रहा। द्वारावती, विदेह, अयोध्या, कौशाम्बी जैसे भारतीय नामों वाले राज्य यहाँ स्थापित हुए।

बर्मा (प्यांमार)-

बर्मा में अराकान, पीगू, तागोंग, श्री क्षेत्र, यातोन आदि में हिन्दू जीवन शैली विकसित थी। बर्मा के कई लेख संस्कृत एवं पालि भाषा में हैं।बर्मा का बागन नामक स्थान पर स्थित आनन्द मन्दिर (बौद्ध मन्दिर) भारतीय शिल्पकारों द्वारा निर्मित है। आनन्द मन्दिर का निर्माण 1105 ई. में क्यानसिथा/ Kyansittha (श्री भुवनादित्य) ने किया। बर्मा का एक अन्य नाम इन्द्रद्वीप था।

  • 9वीं-10वीं शताब्दी में बर्मा में पेगन राज्य की स्थापना हुई।
  • अनिरूद्ध पेगन/पागन राज्य का प्रसिद्ध राजा थे। पेगन वंश के समय ब्राह्मण धर्म का स्थान बौद्ध धर्म ने ले लिया।
  • ग्रम्म नामक जाति ने बर्मा में पेगन राजवंश की स्थापना की।
  • लंका के राजा विजयबाहु ने चोल शासक कुलोतुंग प्रथम के विरुद्ध अनिरूद्ध से सहायता मांगी।
  • चोलों की पराजय के बाद विजयबाहु ने अनिरूद्ध को बुद्ध के दांत का अवशेष भेंट किया।
  • बर्मा को पेगोड़ों (बौद्धों का पूजा गृह/चैत्य) का देश कहा जाता है।

लवदेश:-

वर्तमान में यह लाओस नाम से प्रसिद्ध है। भगवान राम के पुत्र लव के नाम पर लवपुरी बसाया गया। लवदेश का आदिदेवता भद्रेश्वर है। यहां शैव धर्म का प्रभाव है। लवदेश का प्रथम राजा श्रुतवर्मन था। उसका पुत्र श्रेष्ठवर्मन था, जिसने श्रेष्ठपुर बसाया। यहां शालिवाहन संवत का प्रसार था।

श्रीलंका:

प्राचीनकाल में श्रीलंका को ताम्रपणि एवं सिंहल द्वीप के नाम से जाना जाता था। अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु लंका भेजा। पांचवी सदी में बुद्धघोष ने लंका की यात्रा की एवं श्रीलंका में बस गए। श्रीलंका में हीनयान (थेरवादी) बौद्धमत प्रचलित था।

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