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चन्देल वंश का इतिहास (Chandel Vansh History in Hindi)

चन्देल वंश का इतिहास (Chandel Vansh History in Hindi)

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चन्देल वंश का इतिहास (Chandel Vansh History in Hindi)

इनका उदय 9वीं शताब्दी में हुआ। चन्देल शक्ति का केन्द्र आधुनिक बुन्देलखण्ड था।

इससे पहले ये प्रतिहारों के सामन्त थे।

इस वंश की स्थापना 831 ई. में नन्नुक ने की थी।

वाक्पति, जयशक्ति, विजयशक्ति, राहिल और हर्ष अन्य प्रारम्भिक शासक थे।

जयशक्ति अथवा जेजा के नाम से यह क्षेत्र जेजाकभुक्ति (बुन्देलखण्ड) भी कहलाया तथा इनकी राजधानी खजुराहो थी।

यशोवर्मन (925 से 950 .):

यशोवर्मन (लक्ष्मणवर्मन) इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक था।

इसने खजुराहो के विशाल विष्णु मन्दिर (चतुर्भुज) का निर्माण करवाया।

यशोवर्मन ने प्रतिहार देवपाल से बैकुण्ठ मूर्ति प्राप्त कर विष्णु मन्दिर में स्थापित करवाई।यशोवर्मन ने सर्वप्रथम प्रतिहारों के अधीन कन्नौज पर आक्रमण किया, तत्पश्चात् राष्ट्रकूटों से कालिंजर दुर्ग जीता।

यशोवर्मन को खजुराहों लेख में मालवों के लिए काल के समान बताया गया है।

धंग (950 से 1002 .):

यशोवर्मन का पुत्र धंग था जिसका वर्णन खजुराहो एवं नन्योरा अभिलेख करता है।

इसने ही प्रतिहारों से पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की।

धंग की ग्वालियर विजय के पश्चात् ही चन्देल प्रतिहारों की अधीनता से मुक्त हुए इसलिए धंग को चन्देलों की स्वाधीनता का वास्तविक जन्मदाता कहा जाता है।

धंग ने सर्वप्रथम कालिंजर को राजधानी बनाया लेकिन बाद में राजधानी खजुराहो स्थानान्तरित कर दी। धंग ने तुलापुरूष दान किया था।

चंदेल पूर्व मध्यकाल में हिन्दी की देवनागरी लिपि का अपने अभिलेखो में प्रयोग करने वाले प्रथम शासक थे।

धंग 100 साल से अधिक जीवित रहा।

उसने 1002 ई. में प्रयाग में डूब कर अपनी जीवन लीला समाप्त की।

धंग ने खजुराहो में वैद्यनाथ, विश्वनाथ एवं जिननाथ के प्रसिद्ध मंदिर बनवाए।

धंग के मंत्री प्रभास और न्यायाधीश भट्ट यशोधर अपनी विद्वता के लिए प्रसिद्ध थे।

सुबुक्तगीन के विरूद्ध शाही वंश के शासक जयपाल ने जो हिन्दू राजाओं का संघ बनाया, उसमें धंग सम्मिलित हुआ था।

धंग के पश्चात् उसका पुत्र गण्ड शासक बना।

गजनवी के विरूद्ध शाही वंश के शासक आनन्दपाल ने जो हिन्दू राजाओं का संघ बनाया,उसमें गण्ड सम्मिलित हुआ था।

विद्याधर (1017 से 1029 .):

धंग का पौत्र विद्याधर सर्वाधिक शक्तिशाली चन्देल शासक था। उसे विदा एवं नन्द नाम से भी जाना जाता है।

विद्याधर ने गुर्जर प्रतिहार शासक राज्यपाल का सिर्फ इसलिए वध कर दिया कि उसने गजनवी का मुकाबला नहीं किया।

विद्याधर ने मालवा के परमार शासक भोज एवं कलचुरि गांगेय देव को अपनी अधीनता मानने के लिए बाध्य किया। विद्याधर के समय गजनवी ने चन्देलों पर आक्रमण किया लेकिन गजनवी उन्हें परास्त नहीं कर सका।

प्रबोधचन्द्रोदय का रचयिता श्री कृष्णा मिश्र चन्देल शासक कीर्तिवर्मा (1060 ई. से 1100 ई.) का राज कवि था। इस नाटक में विष्णु भक्ति का वर्णन है।

अन्तिम चन्देल शासक परमर्दि देव (परमल 1163 से 1202 ई.) था। परमर्दि देव को दशाणिधपति भी कहा जाता है। 1203 ई. में कुतुबद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर आक्रमण कर चन्देल शक्ति को पूर्णतः समाप्त कर दिया। अन्ततः 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने चन्देल राज्य को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

चन्देल कला का केन्द्र खजुराहो था। यहां 900 ई. से 1050 ई. के बीच अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ। इनसे कन्दरिया महादेव मन्दिर (विद्याधर द्वारा निर्मित), जगदम्बिका मन्दिर, विष्णु का चतुर्भुज मन्दिर,पार्श्वनाथ मंदिर, (जैन मंदिर) प्रसिद्ध है। चन्देल दुर्गों में कालिजर का दुर्ग प्रसिद्ध है।

खजुराहों में शैव, वैष्णव व जैन मन्दिर तो है लेकिन चंदेल शासकों द्वारा किसी बौद्ध मन्दिर का निर्माण नहीं हुआ।

चन्देल शासक मदनवर्मा का पनवार (रीवा) से सिक्कों का ढेर प्राप्त हुआ है।

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