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चौहान वंश का इतिहास (Chauhan Vansh History in Hindi)

चौहान वंश का इतिहास (Chauhan Vansh History in Hindi)

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चौहान वंश का इतिहास (Chauhan Vansh History in Hindi)

शाकम्भरी, नाडौल आदि स्थानों पर चौहान वंश की शाखा थी।

चौहानों का उदय जांगल देश में हुआ, जिसे बाद में सपादलक्ष (सवा लाख गाँव) कहा गया। इनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर थी।

इनमें 551 ई. में वासुदेव द्वारा स्थापित शाकम्भरी का चौहान राज्य महत्वपूर्ण है। वे सूर्यवंशी थे।

चन्दबरदाई के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई।

बिजौलिया लेख में वासुदेव को सांभर झील का निर्माता कहा गया है।

वासुदेव के बाद शासक बने सामन्तराज को बिजौलिया लेख में वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है।

सोमेश्वरके बिजोलिया अभिलेख (1169-70 ई. के इस अभिलेख के प्रशस्तिकार गुणभद्र हैं) में चौहानों की पूरी वंशावली मिलती है। सीकर (राजस्थान) स्थित 973 ई. के हर्ष अभिलेख (विग्रहराज द्वितीय) से चौहानों की प्रारम्भिक वंशावली मिलती है।

गुवक प्रथम ने सीकर के हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण करवाया।

चन्दनराज की रानी रूद्राणी महान शिवभक्त थी, वह आत्मप्रभा योगिनी के रूप में प्रसिद्ध थी। उसने पुष्कर झील के किनारे 1000 दीपक एवं शिवलिंगों की स्थापना की।

वाक्पतिराज प्रथम ने सर्वप्रथम चौहानों में महाराज की उपाधि धारण की।

प्रारम्भिक चौहान कन्नौज के प्रतिहारों के सामन्त थे लेकिन दसवीं शताब्दी में सिद्धराज (सिंहराज) ने साम्राज्य विस्तार कर सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

सिंहराज के समय चौहान प्रतिहारों की अधीनता से मुक्त हुए।

सिद्धराज के पश्चात विग्रहराज द्वितीय, विग्रहराज तृतीय व पृथ्वीराज प्रथम राजा हुए।

विग्रहराज द्वितीय ने भृगुकच्छ (भड़ौच) में आशापुरी देवी का मन्दिर बनवाया।

पृथ्वीराज प्रथम ने सर्वप्रथम परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की एवं सोमनाथ मन्दिर के मार्ग पर अन्नसय (Alms House) स्थापित करवाया एवं रणथम्भौर के जैन मन्दिर पर स्वर्ण कलश चढाया।

अजयराज:

पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज ने 1113 ई. में अजमेर (अजयमेरू) नगर की स्थापना की व इसे अपनी राजधानी बनाई तथा गढ़बीठला (तारागढ़) दुर्ग की स्थापना की।

श्री सोमल्ल देवी चौहान शासक अजयराज (अजय पाल) की रानी थी जिसके रजत सिक्के मिलते हैं।

अजयराज के काल को चौहानों के साम्राज्य निर्माण का काल कहा जाता है। अजमेर में उसने एक विशाल टकसाल गृह की स्थापना की।

अर्णोराज:

अजयराज के बाद अर्णोराज राजा बना।

अर्णोराज ने मालवा के परमार शासक नरवर्मा को पराजित किया एवं पुष्कर में वराह मन्दिर तथा अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया।

अर्णोराज ने अपनी पुत्री जल्हण का विवाह कुमारपाल से किया जबकि जयसिंह सिद्धराज की पुत्री कांचन देवी से स्वयं अर्णोराज ने विवाह किया। अणराज के समय धर्मबोध सूरि एवं देवबोध प्रसिद्ध विद्वान थे।

विग्रहराज चतुर्थ:

अजयराज का पौत्र विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेव (1153 से 1163 ई.) चौहान वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली शासक था।

विग्रहराज कवि एवं लेखक भी था। उसे जयानक भट्ट ने कविबान्धव भी कहा है। उसने संस्कृत में ‘हरकेलिनाटिका’ की रचना की इस नाटक के कुछ अंश ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ की दीवारों पर उत्कीर्ण हैं।

उसके दरबार के कवि सोमदेव ने ललित विग्रहराज नाटक की रचना की।

उसने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की।

इसकी दीवारों पर हरकेलि नाटिका व ललित विग्रहराज उत्कीर्ण करवाये।

कालान्तर में इल्तुतमिश ने इसे तोड़ डाला व इसकी सामग्री से अढाई दिन का झोंपड़ा’ नामक मस्जिद बनाई।

विग्रहराज चतुर्थ का काल चौहानों का स्वर्णकाल कहलाता है। इसके समय चौहान साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।

बीसलदेव ने तुर्क शासक खुसरूशाह को परास्त किया। प्रबन्धकोष में बीसलदेव को तुरूस्कजित कहा गया है।

बीसलदेव ने तोमर वंश के तंवर को पराजित करके ढिल्लिका (दिल्ली) एवं असिका (हांसी) पर अधिकार किया।

पृथ्वीराज तृतीय:

1177 ई. में सोमेश्वर का पुत्र पृथ्वीराज तृतीय शासक हुआ जिसे इतिहास में ‘रायपिथौरा’ भी कहा गया है। इसने चन्देल शासक परमर्दिदेव को 1182 ई में पराजित किया जिसमें परमर्दिदेव के प्रसिद्ध सेनापति आल्हा और उदल मारे गये।

जगनिक ने आल्हा खण्ड लिखा।

शाकम्भरी को साम्भर या सपादलक्ष भी कहते हैं। इसमें सवा लाख गाँव होने के कारण इसे सपादलक्ष कहा जाता है।

पृथ्वीराज तृतीय की माता कर्पूर देवी, जो त्रिपुरी के कलचुरि राजा अचलराज की पुत्री थी, एक वर्ष के लिए प्रधानमंत्री कैम्बास की सहायता से पृथ्वीराज तृतीय की संरक्षिका बनी। पृथ्वीराज चौहान का प्रधानमंत्री कदम्बवास/ कैम्बास सभाव्यास कहलाता था।

पृथ्वीराज तृतीय को हिन्दु गौरव का अन्तिम सूर्य कहा जाता है। उसने दलपुंगल (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की।

भुवनैकमल्ल पृथ्वीराज तृतीय का सेनापति था।

पृथ्वीराज तृतीय के चचेरे भाई नागार्जुन (विग्रहराज चतुर्थ के पुत्र) ने पृथ्वीराज के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

1182 ई. में गुड़गांव हिसार के आस-पास भण्डानकों का दमन किया।

पृथ्वीराज तृतीय ने 1187 ई. में गुजरात के चालुक्य शासक भीम द्वितीय से भी युद्ध किया।

तराईन के प्रथम युद्ध से पहले गौरी ने चौहान सीमा में स्थित तबरहिन्द (भटिण्डा) पर अधिकार करके, वहां काजी जियाउद्दीन को नियुक्त किया।

तराइन का प्रथम युद्ध

1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय ने मुहम्मद गौरी को पराजित किया किन्तु 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज पराजित हुआ तथा उसे बन्दी बनाने के बाद हत्या कर दी गई।

पृथ्वीराज तृतीय तराईन के युद्ध में नाटयरम्भा नामक घोड़े पर सवार था।

तराईन के युद्धों में उसका मुख्य सेनापति खाण्डेराव था।

तराईन के द्वितीय युद्ध से पहले गौरी ने कासिम उल मुल्क रूकनुहीन हमजा को अपना दूत बनाकर पृथ्वीराज चौहान के पास भेजा।

अबुलफजल एवं चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु गजनी में बताई है।

मिनहाजुद्दीन सिराज के अनुसार पृथ्वीराज को तुरन्त मार दिया गया। किन्तु हसन निजामी (ताज उल मासिर के लेखक) के अनुसार पृथ्वीराज के को कैद कर अजमेर ले जाया गया।

जहाँ उसने गौरी के अधीन कुछ वर्षों तक शासन किया।

हसन निजामी के अनुसार पृथ्वीराज तृतीय समस्त विश्व को जीतने की महत्त्वकांक्षा रखता था।

विरूद्ध विधि विध्वस संस्कृत ग्रन्थ में पृथ्वीराज चौहान का युद्ध स्थल में ही मृत्यु होना लिखा है।

हरिराज चौहान ने तुर्कों के आक्रमण के कारण आत्महत्या की थी।

तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास में एक निर्णायक घटना थी।

इसके बाद भारत में तुर्कों राज्य की स्थापना हुई और राजपूत युग समाप्त हो गया।

पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद गौरी ने उसके पुत्र गोविन्द को अजमेर का के शासक बनाया।

जयानक ने पृथ्वीराज विजय नामक संस्कृत काव्य की रचना की।

पृथ्वीराज विजय में तराईन युद्ध का वर्णन नहीं है।

चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज रासो नामक महाकाव्य अपभ्रंश में लिखा।

पृथ्वीराज तृतीय के दरबार में जयानक, चन्दबरदाई, विश्वरूप, वागीश्वर,जनार्दन, विद्यापति गौड, आशाधर तथा पृथ्वीभट्ट आदि विद्वान रहते थे।

नयचन्द्र के हम्मीर महाकाव्य से चौहान वंश के इतिहास की जानकारी मिलती है।

दशरथ शर्मा की पुस्तक ‘अर्ली चौहान डायनेस्टी’ चौहान वंश पर प्रसिद्ध पुस्तक है।

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