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गुप्त काल में अर्थव्यवस्था Economy in the Gupta period

गुप्त काल में अर्थव्यवस्था Economy in the Gupta period

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राजस्व व्यवस्था

प्राचीन परम्परा के अनुसार राजा भूमि का स्वामी होता था। अर्थशास्त्र में भी राजा को भूमि का स्वामी माना गया है। मनु व गौतम ने भी राजा को भूमि का अधिपति बताया है।

राजा भूमिकर के रूप में उपज का छठा हिस्सा लेता था। इस कर को भाग कहा जाता था।

मनुस्मृति में भोग नामक कर का उल्लेख हुआ है। यह राजा को प्रतिदिन दी जाने वाली फल-फूल इत्यादि की भेंट थी।

उद्रंग व उपरिकर अन्य भूमिकर थे उद्रंग स्थाई किसानों से तथा उपरिकर अस्थाई किसानों से लिया जाता था।

गुप्तकाल में भूमिकर में वृद्धि हुई तथा व्यापारिक करों में कमी हुई।

.कृषक अपना भूमिकर हिरण्य (नकद) व मेय (अन्न के रूप में) दोनों रूपों में दे सकते थे।

राज्य में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं एवं आयात की जाने वाली वस्तुओं पर लगा कर ‘भूतोवातप्रत्याय’ कहलाता था।

शुल्क या विक्रीकर भी एक कर था।

गुप्त काल में अर्थव्यवस्था

भूपति कृषकों व उनकी स्त्रियों से बेगार भी ले सकता था। बेगार को विष्टि कहा जाता था। विष्टि का उल्लेख वाकाटक अभिलेख एवं कामसूत्र में मिलता है, लेकिन गुप्त लेखों में उल्लेख नहीं है।

वणिकों व शिल्पियों को भी विष्टि देनी पड़ती थी।

राजस्व का एक अन्य स्रोत भूमि रत्न, गड़ा हुआ गुप्त धन, खान, नमक इत्यादि थे।

अगर गुप्त खजाना दान दी हुई भूमि में से निकले तो इस धन पर दानगृहीता का अधिकार माना जाता था।

भूमिदान के साथ गांवों से उत्पन्न होने वाली आय भी गृहीता को सौंप दी जाती थी। अतः सामन्ती व्यवस्था में राजस्व पर केन्द्रीय नियन्त्रण कमजोर होता जा रहा था।

कुटुम्बिन स्वतंत्र किसान एवं कीनाश बटाई पर कृषि करने वाले किसान थे।

गुप्त काल के अन्तिम दिनों में अपराधियों को दण्ड देने व झगड़ों में न्याय करने का अधिकार भी भूमिदान के साथ ब्राह्मणों तथा दानगृहीताओ को स्थानान्तरित किया जाने लगा।

गुप्त काल के प्रारम्भिक दिनों में केन्द्रीय प्रान्तों में राजा की अनुमति के बिना सामन्त को भूमिदान देने का अधिकार नहीं था परन्तु छठी शताब्दी से राजा की अनुमति के बिना भी भूमिदान देने की परम्परा शुरू हो गई।

मंदिरों तथा ब्राह्मणों को शैक्षणिक व धार्मिक उद्देश्यों से जो कर मुक्त भूमि दान में दी जाती थी उसे अग्रहार कहा जाता था। सामान्य तौर पर अनुदान स्थायी होते थे।

ब्राह्मणों के भरण पोषण हेतु प्रदत्त कर मुक्त भूमि ब्रह्मदेय थी।

बाद में गुप्तशासकों ने राजकीय कर्मचारियों को भी वेतन के बदले भूमिदान देना शुरू कर दिया तथा अनुदान व राजकीय पद वंशानुगत होने लगे।

भूमिकर संग्रह (धान्य में राजा का अंश) के लिये ध्रुवाधिकरण नामक अधिकारी होता था।

भूमि अभिलेखों को सुरक्षित करने के लिये महाअक्षपटलिक तथा करणिक नामक अधिकारी होते थे।

भूमि सम्बन्धी विवादों के निपटारे के लिये ‘न्यायाधिकरण’ नामक अधिकारी होते थे।

ब्राह्मणों को राजकीय अनुदान के साथ राजस्व/कर मुक्त भूमि दिए जाने का स्पष्ट उल्लेख सिर्फ बृहस्पति स्मृति में है।

किसी भी गुप्त शासक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से भूमिदान का एकमात्र साक्ष्य स्कन्दगुप्त का भीतरी लेख है, जिसमें विष्णु मन्दिर को भूमिदान दिया था।

आर्थिक जीवन

गुप्तकाल में कृषि लोगों का मुख्य व्यवसाय था। कालिदास के अनुसार राष्ट्रीय आर्थिक विकास में कृषि व पशुपालन का बहुत महत्त्व है।

वृहत्संहिता के अनुसार वर्ष में तीन फसलें होती थी। कृषि अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर थी।

वृहत्संहिता में मौसम के विषय में अनेक भविष्यवाणियां हैं।

अमरकोश में हलों की बनावट (पाँच प्रकार की लौह की फाल का (हल) का पूरा वर्णन दिया है तथा भूमि का अलग-अलग फसलों के लिये विभाजन किया गया है।

“अष्टांग संग्रह’ में चावल की 44 किस्मों का वर्णन है।

इत्सिंग के अनुसार चावल व जौ प्रमुख फसलें थी।

कालिदास ने गन्ना (ईख) व चावल (धान) की खेती का उल्लेख किया है।

कालिदास के अनुसार कालीमिर्च और इलायची मलय पर्वत (नीलगिरी) के पास बहुत होते थे।

कॉस्मास ने भी मलय पर्वत को कालीमिर्च का देश बताया है।

बृहस्पति व नारद के अनुसार परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद उसकी भूमि उसके पुत्रों में बाँट दी जाती थी।

वराहमिहिर ने दुर्भिक्ष (अकाल) का वर्णन किया है। .

सिंचाई व्यवस्था:-

स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में लिखा है कि अत्यधिक वर्षा के कारण सुदर्शन झील का पानी चारों ओर फैल गया था। इसके कारण वहां के निवासियों के लिये दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

  • सुदर्शन झील सिंचाई हेतु काम में ली जाती थी। जूनागढ़ अभिलेख गुप्तकालीन सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण है।
  • अमरकोश से ज्ञात होता है कि गुप्तकाल में नदियों से नहरे निकाली गई और तालाब भी बनाये गये।
  • अग्नि पुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिये सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख आठ कर्तव्यों में से एक है।
  • सिंचाई रहट (अरघट्ट) से भी होती थी।

भूमि के प्रकार:

आर्थिक उपयोगिता की दृष्टि से भूमि के कई प्रकार बताये गये हैं।

  1. क्षेत्र- खेती के लिये उपयुक्त भूमि।
  2. वास्तु-निवास करने योग्य भूमि
  3. खिल-जो भूमि जोती नहीं जाती थी।
  4. अप्रहत- बिना जोती गई जंगली भूमि

‘हलदण्डकार’ हल रखने वाले प्रत्येक कृषक द्वारा दिया जाने वाला एक कर था।

‘अदेवमातृक’ भूमि वह भूमि थी जिस पर कृषि वर्षा पर आधारित न होकर कृत्रिम साधनों द्वारा की गई सिचाई पर निर्भर थी, अर्थात् वह भूमि जिस पर बिना वर्षा के अच्छी खेती हो सके।

अमरकोश में 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख है

  1. ऊर्वरा
  2. ऊसर (बंजर)
  3. मरू
  4. अप्रहत
  5. सवल (घास के मैदान)
  6. पंकिल (कीचड़ की जमीन)
  7. जलप्रायमनुपम (पानी भरी हुई)
  8. कच्छ (पानी के निकट की)
  9. शर्करा (कंकरीली)
  10. शकांवती (रेतीली)
  11. नदीमातृक (नदी से सींची जाने वाली)
  12. देवमातृक (वर्षा के जल से सींची जाने वाली)

भूधारण पद्धतिः-

गुप्त काल में भूधारण पद्धति पर प्रकाश डालने वाली छः शब्दावलियां मिलती हैं

  1. नीवी धर्म
  2. अक्षय नीवी धर्म
  3. नीवी धर्म क्षय
  4. अप्रदा धर्म
  5. अप्रदा नीवी धर्म
  6. भूमि छिद्र न्याय

नीवी धर्म का अर्थ है कि मूलधन सदा उतना ही रहेगा अर्थात भूमि को सदा अक्षुण्ण रखने की अनुमति

अक्षयनीवी धर्म से तात्पर्य ऐसी भूमि से है जिससे अनवरत भू राजस्व प्राप्त होता रहे। इसमें दान गृहीता को भू राजस्व का स्थाई रूप से दान कर दिया जाता था। इस दान का प्रचलन कुषाण काल में शुरू हुआ, किन्तु यह पद्धति गुप्त व गुप्तोत्तर काल में अत्यधिक लोकप्रिय हुई।

नीवी धर्म क्षय- इससे आशय है नीवी धर्म को समाप्त कर उस भूमि खण्ड को दूसरे व्यक्ति को देना।

अप्रदा धर्म- इसका अर्थ है कि दान पाने वाला व्यक्ति उस भूमि खण्ड का स्वयं तो उपभोग कर सकता है, पर किसी अन्य व्यक्ति को दान में नहीं दे सकता।

अप्रदा नीवी का अर्थ है कि अनुदान पाने वाला व्यक्ति तो पूरा उपभोग कर सकता है, किन्तु किसी अन्य व्यक्ति को देने का अधिकार नहीं था एवं राज्य कभी भी वापस ले सकता था।

भूमिछिद्र न्याय– इससे अभिप्राय यह है कि जो व्यक्ति भूमि को सबसे पहले खेती योग्य बनाये, वही उस भूमिखण्ड का स्वामी बन जाता है। हालांकि भूमि के अन्दर के खनिजों पर राजा का अधिकार रहेगा। इस भूमि को कोई बेच नहीं सकता था।

अक्षय नीवि स्थाई पूजी न्यास भी होती थी जिसे दानी व्यक्ति श्रेणियों में धार्मिक व शैक्षणिक कार्यों हेतु जमा कराते थे। इस जमा पूंजी के ब्याज से श्रेणियां अपने को सौंपे गये कार्य अनवरत रूप से करती थी।

भूमि के नाप:

‘नल’ भूमिमाप में प्रयुक्त होने वाली धातु की छड़ या उसी लम्बाई की रस्सी को कहा जाता था।

‘पाटक’ भूमि का बड़ा नाप था। धनु व दण्ड भी भूमि नाप थे।

आढ़वाप, द्रोणवाप, कुल्यवाप, नल, निवर्तन एवं अंगुल भी भूमि के नाप थे। अंगुल सबसे छोटा भूमि माप था।

  • 4 आढवाप 1 द्रोणवाप
  • 8 द्रोणवाप 1 कुल्यवाप
  • 5 कुल्यवाप 1 पाटक

भूमि नापने वाले अधिकारी को क्षेत्रकर कहा जाता था।

भूमि बिक्री से पहले पुस्तपाल व विषयपति से अनुमति लेनी पड़ती थी।

पशुपालन जीविका का अन्य प्रमुख साधन था। अमरकोश में पालतू पशुओं की सूची दी गई है।

व्यापारिक श्रेणियां:

वस्त्र निर्माण इस काल का प्रमुख उद्योग था। अमरकोश में कताई, बुनाई, हाथकरघा, धागे इत्यादि का उल्लेख आया है।

कालिदास अपने नाटकों में महीन कपड़ों का उल्लेख करता है।

कुषाण काल में सिले हुए कपड़ों का प्रचलन हो गया था।

गुप्तकाल में नालन्दा, वैशाली आदि स्थानों में श्रेणियों, सार्थवाहों, प्रथम कुलिकों आदि की मुहरे शिल्पियों व व्यापारिक श्रेणियों के संगठन व गतिविधियों को प्रदर्शित करती है।

बृहस्पति के अनुसार नवीन श्रेणियों के निर्माण के समय सदस्यों की कुछ पूंजी जमाकर एक दूसरे में विश्वास व्यक्त करना पड़ता था।

अपने व्यावसायिक कार्यों के अतिरिक्त, श्रेणी को सामाजिक कार्य भी करने पड़ते थे।

श्रेणियां बैंकों का भी काम करती थी।

कुमारगुप्त प्रथम के अधिकारी बंधुवर्मन के मंदसौर अभिलेख से पता चलता है कि रेशम बुनकरों (पट्टवाय) की एक श्रेणी ने मंदसौर में 437-38 ई. में भव्य सूर्य मन्दिर का निर्माण कराया था 473-74 में इसकी मरम्मत कराई गई।

कुछ धनी लोग श्रेणियों के पास पूंजी जमाकर उसके ब्याज से धार्मिक कार्य इन्हीं श्रेणियों द्वारा कराते थे। गढ़वा अभिलेख के चन्द्रगुप्त द्वितीय ने स्वयं इसी प्रकार की पूंजी जमा कराई।

नारद व बृहस्पति स्मृति में श्रेणियों की प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।

तक्षशिला विदिशा व कौशाम्बी नगर की श्रेणी अपने सिक्के जारी करती थी।

तक्षशिला का शासन व्यापारियों के एक निगम द्वारा संचालित किया जाता था।

  • पूग– एक ही जाति के व्यापारियों का समूह
  • श्रेणी– विभिन्न जातियों के व्यापारियों का समूह
  • निगम– एक ही नगर के व्यापारियों का समूह
  • श्रेष्ठकुलिकनिगम– श्रेष्ठयों, शिल्पियों व श्रेणियों का केन्द्रीय निगम।  ‌
  • जेठक (जेष्ठक)– श्रेणियों का मुखिया

प्राचीन एवं पूर्वमध्यकालीन साहित्य में श्रेणियों के प्रमुख को जेट्ठक कहा जाता था, जबकि अभिलेखों में इसे माहर या महत्तक कहा गया है।

व्यापारियों की समिति को निगम कहा जाता था।

निगम का प्रधान श्रेष्ठ कहलाता था।

व्यापारियों के समूह को सार्थ तथा उनके नेताओं को सार्थवाह कहा जाता था।

श्रेष्ठ बैंकरों एवं साहूकार के रूप में कार्य करते थे।

नगर प्रशासन के बारे में नगर श्रेष्ठी एवं सार्थवाह का उल्लेख उत्तरी बंगाल स्थित पुण्ड्रवर्धन से प्राप्त गुप्त अभिलेखों में हुआ।

सिक्के:-

गुप्त साम्राज्य के विभिन्न भागों से सिक्कों के 16 ढेर मिले हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बयाना (भरतपुर, राजस्थान) से मिले हुए सि के ढेर हैं।

गुप्त शासकों ने प्राचीन भारत में सर्वाधिक सोने के सिक्के चलाये।

सोने के सिक्कों को गुप्त अभिलेखों में दीनार कहा जाता है।

दीनार लेटिन भाषा के डेनेरिश शब्द से बना है।

चॉंदी का सिक्का रूपक एवं तांबे का सिक्का माषक था।

गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं पर राजाओं के स्पष्ट चित्र है। इन स्वर्ण मुद्राओं (दीनार) का उपयोग भूमि की खरीद बिक्री में अधिक होता था।

स्वर्ण मुद्राओं के रूप में सेना व प्रशासन के उच्च अधिकारियों को भी वेतन दिया जाता था।

रामगुप्त को छोड़कर चन्द्रगुप्त द्वितीय से पूर्व के तांबे के सिक्के नहीं के बराबर हैं।

कुषाण शासकों ने जहां ताँबे के अधिक सिक्के चलाये, वहीं गुप्तों के ताँबे के सिक्के बहुत ही कम मिले हैं। अतः जन सामान्य में मुद्रा का प्रयोग कुषाण काल की तुलना में गुप्तकाल में काफी कम हो गया।

फाह्यान के अनुसार साधारण लोग दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं के लिए वस्तु विनिमय करते थे अथवा कौड़ियों से काम चलाते था।

गुप्तकाल में सर्वप्रथम चाँदी के सिक्के चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिमी भारत में शकों के विरुद्ध विजय के पश्चात प्रारम्भ किये।

चाँदी के सिक्कों का प्रयोग स्थानीय लेन देन में किया जाता था।

बसाद (प्राचीन वैशाली) से प्राप्त अनेक मिट्टी की मुहरों पर श्रेणिसार्थवाह- कुलिकनिगम, श्रेष्ठ कुलिक निगम, श्रेष्ठ निगम, कुलिक निगम और प्रथम कुलिक का उल्लेख है।

प्रथम कुलिक से तात्पर्य शिल्पियों के प्रधान तथा कुलिक निगम से तात्पर्य शिल्पियों के निगम से है।

व्यापार

कुषाण काल की तुलना में गुप्त युग में लम्बी दूरी के व्यापार में गिरावट आई ग्राम आत्मनिर्भर इकाई के रूप में उभरकर सामने आ रहे थे।

सिक्कों की जो बहुलता पूर्व गुप्तकाल में है, वह गुप्तकाल में नहीं है। अतः मुद्रा प्रणाली का भी पतन हो रहा था।

विदेशी व्यापार के क्षेत्र में भी पाश्चात्य देशों से संपर्क की अब कुषाण सातवाहन युगीन स्थिति नहीं रही।

364 ई. में रोमन साम्राज्य का विभाजन हो गया तथा पाश्चात्य देशों से हो रहे व्यापार में गिरावट आई।

प्रोकोपियस के वर्णन (छठी शताब्दी) से पता चलता है कि फारसवासियों ने रेशम के व्यापार पर एकाधिकार कर लिया था।

फारस की रोमन साम्राज्य से शत्रुता के कारण भारतीय व्यापार को नुकसान हुआ।

महत्वपूर्ण जानकारी

कुमारगुप्त के काल में मन्दसौर अभिलेख में कहा गया है कि लाट (गुजरात) विषय में रेशम बुनकरों की एक श्रेणी (पट्टवाय या तंतुवाय श्रेणी) अपना काम छोड़ कर पश्चिमी मालवा में आ गई।

550 ई. के आस-पास पूर्वी रोमन साम्राज्य ने चीन से रेशम उगाने की कला सीख ली जिससे रेशम व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ।

गुप्तकाल में चीन तथा बाइजेन्टाइन (पूर्वी रोमन) साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध थे।

कॉसमास (यूनानी लेखक) के वर्णन में भारत चीन व्यापार में सिंहल द्वीप (श्रीलंका) एक महत्वपूर्ण बिचौलिये का काम करता था।

फाह्यान स्वयं एक व्यापारी जहाज पर चीन गया था।

कालियस ने चीनांशुक (चीन का रेशम) का उल्लेख किया था।

भारत चीन व्यापार वस्तुओं की अदला-बदली पर आधारित था क्योंकि सिक्के दोनों देशों में ही नहीं मिले है।

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से व्यापार का श्रेय गुप्त नरेशों को नहीं दिया जा सकता।

बाइजेन्टाइन साम्राज्य को निर्यात को जाने वाली वस्तुओं में रेशम और मसाले प्रमुख थे।

ताम्रलिप्ति प्रमुख बन्दरगाह , जहां से चीन, श्रीलंका एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ व्यापार होता था।

पश्चिमी तट के प्रमुख बन्दरगाह भड़ौच से पाश्चात्य देशों के साथ व्यापार होता था

गुप्तकाल में सुदूर पश्चिम में व्यापारिक केन्द्र पैठन था।

कॉस्मास ने कल्याण (कलिआन) का व्यापारिक केन्द्र के रूप में उल्लेख किया है।

गुप्तकाल में भारत यूरोप से जलयान निर्माण में आगे था।

कामसूत्र में 64 कलाओं के अन्तर्गत धातुकला को भी स्थान दिया गया है।

गुप्त काल में सूती वस्त्र प्रमुख उद्योग था।

वाराणसी रेशमो कपडे का सर्वोत्तम उत्पादक था।

अमरकोष में कीमती तथा अर्द्धबहुमूल्य रत्नों की सूची दी गई है।

कुषाण युग के समृद्ध गंगाघाटी के शहर अब अपनी रौनक खो चुके थे।

पाटलिपुत्र भी ह्वेनसांग के काल में गांव बन चुका था।

पश्चिमी जगत से मंदिरा, बहुमूल्य रत्न, औषधियां और जड़ी बूटियाँ आदि आयात की जाती थी।

408 ई. में हूण आक्रमणकारी एलेस्कि ने रोम को मुक्त किया तो उसने रोम के निवासियों से 3000 पीण्ड कालीमि 4000 रेशम के थान मांगे थे।

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