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गहड़वाल वंश (Gahadavala dynasty)

गहड़वाल वंश (Gahadavala dynasty)

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गहड़वाल वंश

प्रतिहारों के पतन के बाद चन्द्रदेव ने 1080 से 1085 ई. के मध्य कन्नौज एवं बनारस में गहड़वाल राजवंश की नींव रखी। इसकी राजधानी भी कन्नौज थी। यह चन्द्रवंशी थे। त्रिचनापल्ली के गंगैकोंड चोलपुरम मन्दिर से प्राप्त अभिलेख में गहड़वाल शासकों की वंशावली दी।

गोविन्द चन्द्र (1114 से 1155 .) :

चन्द्रदेव का पौत्र गोविन्द चन्द्र इस वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था उसने पालों से मगध जीता।

गोविन्द चन्द्र का शान्ति एवं युद्ध मंत्री लक्ष्मीधर प्रकाण्ड विद्वान था उसने कृत्यकल्पतरू (कल्पद्रुम) नामक ग्रन्थ की रचना की।

यह कानून व नियमों पर एक पुस्तक है। लक्ष्मीधर को मंत्र महिमा का आश्चर्य कहा गया है। तीर्थ विवेचन काण्ड भी लक्ष्मीघर ने लिखा।

गोविन्द चन्द्र की पत्नी पाल राजकुमारी कुमारदेवी बौद्ध थी।

कुमारदेवी ने सारनाथ में धर्मचक्रजिन विहार बनवाया। कुमारदेवी ने अशोक द्वारा सारनाथ में निर्मित धर्मराजिका स्तूप का छठा परिवर्धन करवाया।

कुमारदेवी के सारनाथ लेख में गोविन्दचन्द्र को विष्णु का अवतार कहा गया है।

गहड़वाल वंश का गोविन्द चन्द्र स्वयं बड़ा विद्वान था उसने “विविधविद्याविचारवाचस्पति’ की उपाधि ग्रहण की।

उसने उड़ीसा के बौद्ध भिक्षु शाक्य रक्षित तथा चोल राज्य के बौद्ध वागेश्वर रक्षित का स्वागत किया और उनके द्वारा संचालित जेतवन विहार को 6 गाँव दान में दिये।

गोविन्द्र चन्द ने कल्चुरी सिक्को की नकल पर बैठी हुई लक्ष्मी शैली के सोने, चाँदी एवं तांबे के सिक्के चलाए।

इससे पूर्व गहड़वालों के सिक्के सोने के नहीं थे।

गोविन्द चन्द्र गहड़वाल के 800 स्वर्ण सिक्के 1887 ई. में उत्तरप्रदेश में बहराइच जिले के ननपारा स्थान से मिले।

सिक्कों से चार भुजाओं वाली लक्ष्मी की बैठी हुई आकृति मिली।

गोविन्द चन्द्र के पुत्र विजय चन्द्र (1155 से 1170 ई.) के समय दिल्ली के क्षेत्र पर चौहानों ने अधिकार कर लिया।

विजयचन्द ने जौनपुर में अटाला देवी के मन्दिर का निर्माण करवाया। बाद में मुसलमानों ने यहां अटाला देवी मस्जिद का निर्माण कराया।

जयचन्द (1170 से 1194 .):

जयचन्द इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक था। इसकी पुत्री संयोगिता का अपहरण दिल्ली व अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने किया था। यह घटना चौहान व गहड़वाल वंश के मध्य शत्रुता का कारण बनी। जयचन्द का कमौली अभिलेख बनारस से प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख है।जयचन्द ने राजसूय यज्ञ भी किया। 1194 ई. में वह चन्दावर के युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा पराजित हुआ व मारा गया। जयचन्द ने कश्मीर निवासी संस्कृत के प्रख्यात कवि श्री हर्ष को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने नैषधीयचरित एवं खण्डनखण्डखाद्य की रचना की।

विद्यापति ने पुरूष परीक्षा नामक नाटक लिखा।

फतेहपुर के असनी में जयचन्द का राजकोषागार था।

जयचन्द ने स्वयं रम्भामंजरी नाटक लिखा।

जयचन्द को दलपुंगल भी कहा गया है, क्योंकि उसकी विशाल सेना सदैव विचरण करती रहती थी।

हरिशचन्द्र इस वंश का अन्तिम शासक था।

गहड़वाल शासकों की मुहरों पर गरूड़की आकृति है तथा इनके अभिलेखों में इन्हें परम माहेश्वर कहा गया है।

गहड़वाल शासकों ने मुस्लिम व्यापारियों पर तुरुष्कदण्ड या मल्लकर नामक कर लगाया।

इसका उल्लेख गोविन्द चन्द्र के मनेर ताम्रपत्र लेख में है।

गहड़वाल अभिलेखों में जलकर (उदक भाग) लगाने का साक्ष्य भी है।

पत्ताल व पाठक गहड़वालों की प्रशासनिक इकाइयाँ थी।

गहड़वाल अभिलेखों में प्रवणि कर का उल्लेख है, जो फुटकर व्यापारियों से लिया जाता था।

गहड़वाल वंश FAQ

1 गहरवार वंश का गोत्र क्या है?

Ans – गहरवार

2 गढ़वाल वंश का सबसे पराक्रमी शासक कौन था?

Ans गोविन्दचन्द्र: मदनपाल के पश्चात उसकी रानी राल्हादेवी से उत्पन्न पुत्र गोविन्दचन्द्र (1114-1155 ई.) गहड़वाल वंश का शासक बना । वह इस वंश का सर्वाधिक योग्य एवं शक्तिशाली शासक था ।

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