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गुप्त काल का सामाजिक जीवन (gupt kaal ka samajik jivan)

गुप्त काल का सामाजिक जीवन (gupt kaal ka samajik jivan)

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नगरीकरण

  • नगरों का क्रमिक पतन गुप्तकाल की विशेषता थी।
  • आर. एस. शर्मा ने भारतीय उपमहाद्वीप में मोर्योत्तर काल को नगरीकरण का स्वर्ण काल माना था।
  • बृहतसंहिता में भविष्यवाणी की गई है कि विभिन्न शहर या ती नष्ट हो जायेगे या उनके बुरे दिन आएंगे।
  • कालिदास के रघुवंश में भी नगरों के पतन की व्याख्या लम्बी दूरी व्यापार के पतन के साथ की गई है।

गुप्त काल का सामाजिक जीवन (gupt kaal ka samajik jivan)

वर्ण व्यवस्था:गुप्तकालीन समाज परम्परागत चार वर्णों में विभाजित था। वर्णों का आधार गुण व कर्म न होकर जन्म ही था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता में चारों वर्णों के लिये अलग-अलग बस्तियों का विधान किया है।

भूमि अनुदान द्वारा बहुत सी आदिवासी जातियों का ब्राह्मण समाज में आत्मसातीकरण हुआ, जिससे जातियों की संख्या बढ़ी।

प्रायः कारीगरों की श्रेणियाँ भी जाति का रूप ले लेती थी। इससे जातियों की संख्या बढ़ी जातियों व श्रेणियों में गतिशीलता अधिक थी।

न्याय संहिताओं में कहा गया है कि ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रियों को अग्नि से, वैश्य को जल से तथा शूद्र की विष से ली जानी चाहिये।

कात्यायन के अनुसार मुकदमें में अभियुक्त के विरुद्ध गवाही समान जाति का व्यक्ति ही दे सकता था किन्तु नारद के अनुसार सभी वर्णों से साक्षी लिये जा सकते थे।

नारद के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण का अपराध सबसे अधिक व शुद्र का अपराध सबसे कम था।

ब्राह्मण

ब्राह्मणों ने भी अन्यवर्ण के कर्म अपना लिये थे। ब्राह्मण क्षत्रिय व वैश्य कर्म भी करते थे।

मृच्छकटिकम के अनुसार ब्राह्मण चारूदत्त व्यापार वाणिज्य करता था।

ऐसे ब्राह्मण जिन्होंने क्षत्रिय कर्म अपना लिया था वे ब्रह्म क्षेत्र कहलाते थे।

मानव्य गोत्र के मयूरशर्मन नामक ब्राह्मण ने काँची के पल्लव राजा के क्षेत्र पर अधिकार कर वनवासी को राजधानी बनाया तथा कदम्ब वंश के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की।

मयुरशर्मन ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में अठारह बार अश्वमेध यज्ञ किये।

गुप्तकाल में समाज

मनु के अनुसार दसवर्षीय ब्राह्मण सौ वर्षीय क्षत्रिय से श्रेष्ठ था।

याज्ञवल्क्य के अनुसार ब्राह्मण यदि द्विजों से अन्न प्राप्त करके अपनी जोविका न चला सके तो वह शूद्रों से भी अन्न ग्रहण कर सकता था, जबकि प्रारम्भिक स्मृतिकार विशेषतः मनु के अनुसार बाह्मण शूद्र से अन्न ग्रहण नहीं कर सकता था।

मृच्छकटिक में कहा गया है कि ब्राह्मण व शूद्र एक हो कुएं से पानी है। भरते थे।

गुप्तकाल में भूमिदान के कारण स्थानीय कृषकों की कीमत पर ब्राह्मण भूमिपतियों (Pricstiy landlords) का उदय हुआ।

इससे मध्यभारत के आदिवासी क्षेत्रों में कृषि का विस्तार हुआ।

हूण पांचवी सदी के अन्त में आये। हूणों को भी राजपूतों के क्षत्रिय कुलों में एक मान लिया गया।

ह्वेनसाग ने क्षत्रियों की कर्मनिष्ठा की प्रशंसा की है। उसने क्षत्रियों को निर्दोष, पवित्र, सरल व मितव्ययी कहा है।

पूर्व गुप्त काल में भारी संख्या में विदेशी जातियों के आगमन एवं अन्तर्जातीय विवाह से वर्णसंकर जातियों की संख्या बढ़ी।

विदेशो विजेताओं को समाज में क्षत्रिय का स्थान मिला।

वैश्य वर्ण

वैश्य वर्ण के कर्म कृषि और व्यवसाय थे। गुप्त युग में उन्हें वणिक,श्रेष्ठ व सार्थवाह कहा गया है।

अमरकोश में कृषक के पर्याय वैश्य वर्ग में गिनाये गये हैं।

गुप्त तथा गुप्तोत्तरकाल में वैश्य तथा शूद्र वर्ग की स्थिति में अधिक अन्तर न था।

महाभारत के अनुसार मद्य, मांस, लोहा व चमड़ा वैश्यों द्वारा बेचना निषिद्ध था।

शूद्र

गुप्त काल में शूद्र सैनिक कार्य भी करने लगे थे।

मनु के अनुसार शूद्रों का कार्य तीनों वर्गों की सेवा था, किन्तु में याज्ञवल्क्य शूद्रों को व्यापारी, कारीगर तथा कृषक होने की अनुमति देता है।

ह्वेनसांग ने शूद्रों को कृषक कहा है।

इस काल में शूद्रों की आर्थिक दशा में सुधार होने लगा तथा वैश्यों की स्थिति में गिरावट आई।

सौराष्ट्र, अवन्ति और मालवा के शूद्र राजाओं की चर्चा इस काल में मिलती है। सिन्ध व कश्मीर के मलेच्छ राजाओं को भी शूद्र कहा गया है।

शुद्रों को रामायण, महाभारत व पुराण सुनने का अधिकार मिला। वे कृष्ण नामक नये देवता की पूजा भी कर सकते थे।

अमरकोश में शिल्पियों की सूची शुद्र वर्ग में है।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार दान देना व यज्ञ करना शूद्र का कर्त्तव्य बताया गया है।

मत्स्य पुराण के अनुसार अगर शूद्र भक्ति करे व इन्द्रियों को वश में रखकर निर्भय रहे तो उसे भी मोक्ष मिल सकता है।

वर्ण व्यवस्था में चाण्डाल जाति का स्थान सबसे निम्न था।

फाह्यान के अनुसार वे गांव से बाहर रहते थे तथा शहर में प्रवेश करने पर ढोल 7 बजाते हुए चलते थे ताकि लोग उनसे दूर हट जायें।

अतः समाज में अस्पृश्यता विकसित हुई।

चाण्डालों की संख्या में गुप्तकाल में वृद्धि हुई।

चाण्डाल मांस व लहसुन खाते थे तथा मछली पकड़ने, शिकार करने एवं मांस बेचने का कार्य भी करते थे।

अस्पृश्यों की स्थिति शूद्रों से भिन्न थी किन्तु अमरकोश में वर्ण और अस्पृश्यों को शूद्र जाति में रखा गया है।

कायस्थ वर्ग

गुप्तकाल में कायस्थ जाति का भी उल्लेख मिलता है।

कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में तथा एक जाति के रूप में सर्वप्रथम उल्लेख औशनम स्मृति में मिलता है।

गुप्त अभिलेखों में कायस्थों को ‘प्रथम कायस्थ’ या ‘ज्येष्ठकायस्थ कहा गया है।

गुप्त काल तक कायस्थ एक वर्ग के रूप में ही थे।

गुप्तकालीन स्मृतियों में उनका जाति के रूप में उल्लेख नहीं है।

कायस्थ शब्द का उल्लेख गुप्तकालीन नाटक मुद्राराक्षस में भी मिलता है।

कायस्थ लेखाकरण, गणना, आय व्यय भूमिकर आदि के अधिकारी थे।

महत्तार– उत्तरी भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम वृद्ध व मुखिया लोगों का वर्ग जिसे भू स्थानान्तरण की सूचना दी जाती थी।

दास प्रथा:

नारद ने 15 प्रकार एवं मिताक्षरा ने भी 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है, जबकि मनु ने सात प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।

गुप्त काल में दासों की स्थिति पूर्वकाल की तुलना में दयनीय थी।

दास मुक्ति का विधान सर्वप्रथम नारद ने किया है।

कात्यायन के अनुसार ब्राह्मण कभी दास नहीं बन सकता।

मनुस्मृति पर भारूचि की टीका में दासों के संपत्ति विषयक अधिकारों की चर्चा की गई है।

गुप्तकाल में दास प्रथा कमजोर हुई।

बंटवारे व धार्मिक अनुदानों के कारण भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गई अतः छोटे कृषि क्षेत्रों में अधिक दास रखने की आवश्यकता नहीं थी।

अतः अधिकांश दासों की छंटनी कर दी गई। यह दास प्रथा के कमजोर होने का मुख्य कारण था।

स्त्रियों की दशा :

गुप्त काल में साहित्य व कला में नारी का आदर्श चित्रण किया गया है, परन्तु व्यवहार में उसकी स्थिति पहले से दयनीय हो गई।

कालिदास स्त्री को स्त्रीरत्न कहते हैं।

याज्ञवल्क्य– ‘महिला का विवाह ही उनका उपनयन है, इसलिए उसे शिक्षा का कोई अधिकार नहीं है।’

नारद– ‘यदि कोई स्त्री परगमन की दोषी हो तो उसके सिर के बाल मुण्डवा देने चाहिए।’

नारद ने विधवा को पति की सम्पत्ति की अधिकारिणी नहीं माना है।

महाभारत में पत्नी के बिना जीवन शून्य माना गया है।

स्त्री शिक्षा का प्रचलन था। अमरकोश में शिक्षिकाओं के लिये उपाध्याया व आचार्या शब्द काम में आये है।

दहेज प्रथा व पर्दाप्रथा नहीं थी।

वैश्यावृत्ति प्रचलित थी व बाल विवाह की प्रथा प्रारम्भ हुई।

सामाजिक जीवन

सती प्रथा सैनिक जातियों में विद्यमान थी। सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य एरन अभिलेख में 510 ई. में मिला है। इसमें भानुगुप्त के सेनापति गोपराज की स्त्री के सती होने का उल्लेख है।

याज्ञवल्क्य स्मृति स्त्रियों के सम्पत्ति के अधिकारों का समर्थन करती है।उसके अनुसार पुत्र के अभाव में पुरुष की संपति पर उसकी पत्नी का सर्वप्रथम अधिकार होगा।

कात्यायन- भी स्त्रीधन के समर्थक थे। कात्यायन के अनुसार स्त्री अपनी अचल संपत्ति व स्त्रीधन को बेच या गिरवी रख सकती थी।

प्रायः सभी स्मृतिकारों ने स्त्रीधन के उत्तराधिकार में प्रथम अधिकार पुत्रियों का माना है।

उत्तर गुप्त कालीन स्मृति लेखकों ने स्त्रियों को कुछ विशेष परिस्थितियों में पुनर्विवाह की अनुमति दी। ये हैं:-

  1. अगर पति मर गया हो
  2. नष्ट हो गया हो (अशास्त्रीय आचरण के कारण बंधु बांधवों से परित्यक्त)
  3. संन्यायी बन गया हो
  4. पतित हो (धर्माचरण से भ्रष्ट)
  5. नपुंसक हो गया
  6. राजद्रोही हो

लम्बे समय तक विदेश से वापस न आये।

विधवाओं की स्थिति दयनीय थी। नारद व पाराशर स्मृति में विधवा विवाह का समर्थन मिलता है तथा बृहस्पति स्मृति में विधवा विवाह को निषिद्ध माना गया है।

नारद

नारद के अनुसार राजा का यह कर्त्तव्य है कि वह विधवा का भरण पोषण करे। नारद ने इसे सनातन धर्म माना है।

देवदासी प्रथा का भी उल्लेख पुराणों व मेघदूत में मिलता है। कालिदास ने उज्जैन के महाकाल मन्दिर में नृत्य करने वाली देवदासियों का वर्णन दिया है।

वात्स्यायन के कामसूत्र में गणिकाओं को दिये जाने वाले प्रशिक्षण का वर्णन है। कामसूत्र के सात खण्ड हैं।

उच्च वर्ग के पास अधिक भूमि होने के कारण गुप्त काल में उच्चवर्ग के पुरुष बहुविवाह करते थे जिससे स्त्री को एक संपत्ति के रूप में देखा जाने लगा।

वैश्य व शूद्र वर्ग की महिलाओं को अधिक स्वतन्त्रता थी जबकि उच्च वर्णों की महिलाओं को जीवनयापन के लिये कार्य करने की आर्थिक स्वतन्त्रता नहीं थी।

धार्मिक दशा

गुप्तकाल ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म) का पुनरूत्थान काल माना जाता है। हिन्दू धर्म के पुनरूत्थान की प्रक्रिया गुप्त साम्राज्य की स्थापना से पूर्व आरम्भ हो गई थी। गुप्त काल में यह विकास चरम सीमा पर पहुंच गया। मंदिरों में मूर्ति पूजा का विकास गुप्तकाल से हुआ।

कुमार गुप्त के मन्दसौर शिलालेख से सूर्य उपासना की जानकारी मिलती है।

स्कन्दगुप्त का इंदौर ताम्रलेख सूर्य पूजा से आरम्भ होता है। इससे पता चलता है कि देव विष्णु नामक ब्राह्मण ने इन्द्रपुर (इन्दौर) के तेलियों की श्रेणी के पास पूंजी जमा कराई जिससे सूर्य मन्दिर में दीपक जलाया जाता है।

हिन्दू धर्म के दो मुख्य संप्रदाय विकसित हुए: 1. वैष्णव 2. शैव

वैष्णव धर्म:

गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे गुप्त सम्राटों ने सिक्कों पर अपने नाम के साथ परमभागवत विशेषण का प्रयोग किया है।

विष्णु के साथ लक्ष्मी का सर्वप्रथम उल्लेख जूनागढ़ अभिलेख में है।

प्रयाग-प्रशस्ति में वैदिक देवताओं धनद, वरुण, इन्द्र यम का उल्लेख है।

बादामी गुफाओं में हरिहर का प्राचीनतम प्रतिमाशास्त्रीय अंकन है।

गाजीपुर जिले के भितरी स्थान से प्राप्त चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा समुद्रगुप्त के सिक्कों पर विष्णु के वाहन गरूड की प्रतिमा अंकित है।

गुप्त सिक्कों पर लक्ष्मी का चित्र विष्णु की पत्नी के रूप में अपरिहार्य रूप से अंकित है।

स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख तथा बुद्धगुप्त का एरण स्तम्भलेख विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ होते हैं।

भगवत गीता में अवतारवाद का उपदेश भी गुप्तकालीन है। विष्णु के दस अवतार निम्नलिखित हैं: मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन,परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि

हरिहर की मूर्ति (विष्णु के साथ शिव की मूर्ति) का निर्माण गुप्त काल में शुरू हुआ।

देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मन्दिर गुप्तकाल में वैष्णव धर्म का  महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह मंदिर पंचायतन श्रेणी का है। इसमें विष्णु को शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हुये दिखाया गया है। पहले इसका नाम केशवपुर था

गुप्तकाल में नारायण, संकर्षण, लक्ष्मी जैसे अवैदिक देवताओं को वैष्णव धर्म का अभिन्न अंग बना लिया गया।

 शैव धर्म-

गुप्त शासकों की धार्मिक सहिष्णुता से शैवधर्म का भी प्रचार हुआ।

शिव पार्वती की संयुक्त मूर्तियाँ इसी काल में बननी शुरू हुई।

अर्द्धनारीश्वर की प्रथम मूर्ति भीटा से प्राप्त हुई है।

गुप्तकाल में (छठी शताब्दी तक ) ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति की पूजा आरम्भ हुई।

शैव धर्म के चार संप्रदाय भी गुप्तकाल में विकसित हुये। 1. शैव 2. पाशुपत 3. कापालिक 4. कालामुख

चन्द्रगुप्त द्वितीय कालीन मधुरा स्तम्भ लेख में आर्योदिताचार्य नामक पाशुपत मतानुयायी का उल्लेख मिलता है, जिसने दो शिवलिंगों की स्थापना करवायी। इस लेख में भगवान कुशिक का उल्लेख है जिन्हें लकुलीश का शिष्य माना जाता है।

स्कन्दगुप्त ने बैल की आकृति के सिक्के चलाये जो शैवधर्म में उसकी आस्था दर्शाते हैं।

कुमारगुप्त के सिक्कों पर मयूर पर आरूढ़ कार्तिकेय (स्कन्द) की प्रतिमा है।

अर्द्धनारीश्वर के रूप में शक्ति व शिव दोनों संप्रदायों का एकीकरण हुआ।

भगवान शिव के एकमुखी व चतुर्मुखी लिंग का निर्माण सर्वप्रथम गुप्तकाल में हुआ।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के मंत्री वीरसेन ने उदयगिरि पर एक शिव मन्दिर का निर्माण कराया।

कालिदास के कुमारसंभव काव्य में कुमार या स्कन्द के जन्म का वर्णन है।

कालिदास की रचनाओं में गोकर्ण के शिव, काशी के विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल ज्योर्तिलिंग के संकेत है।

नचनाकुठारा का पार्वती मन्दिर व भूमरा (नागोद) का शिव मन्दिर गुप्त काल के है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग की शिव की पत्नी दुर्गा के सम्मुख बलि दी जाने वाली थी किन्तु अचानक आये तूफान की वजह से वह बच गया।

कुमारगुप्त प्रथम के मंत्री पृथ्वीसेन ने शिव मन्दिर को दान दिया।

बौद्ध धर्म :

फाह्यान के अनुसार गुप्तकाल में कश्मीर, अफगानिस्तान और पंजाब बौद्ध धर्म के केन्द्र थे।

गुप्तशासक कुमारगुप्त प्रथम के काल में नालन्दा के बौद्ध विहार की स्थापना हुई। ह्वेनसांग के अनुसार इसे 100 गाँवों का राजस्व प्राप्त होता था।

गुप्तकाल में महायान संप्रदाय अधिक लोकप्रिय हुआ।

महायान के अन्तर्गत माध्यमिक व योगाचार जैसे संप्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ।

आर्यदेव, असंग, वसुबन्धु, मैत्रेयनाथ तथा दिङ् नाग गुप्तकाल में महायान शाखा के बौद्ध आचार्य थे। दिङ् नाग को तर्कपुंगव की उपाधि मिली थी।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने आम्रकाईव नामक एक बौद्ध को उच्च पद दिया। उसने काकनादबार (साँची) के महाविहार को पच्चीस दीनार दान में दी थी। साँची लेख से यह जानकारी मिलती है।

वैशाली, श्रावस्ती व कपिलवस्तु गुप्त युग में बौद्ध धर्म के समृद्ध केन्द्र नहीं रहे। फाह्यान ने कपिलवस्तु, श्रावस्ती व कुशीनगर को उजड़ी हुई अवस्था में पाया।

इत्सिंग के अनुसार श्रीगुप्त ने मृगशिखावन के पास चीनी तीर्थयात्रियों के लिए मन्दिर बनवाया। इत्सिंग ने श्रीगुप्त का नाम चेलिकेतो बताया है।

नालन्दा का दूसरा नाम मृगशिखावन था।

फाह्यान के अनुसार मगध में बहुत सारे नगर थे तथा यहां के धनी नागरिक बौद्ध धर्म का समर्थन करते थे।

जैन धर्म :

फाह्यान ने जैन धर्म का उल्लेख नहीं किया है परन्तु गुप्त काल में यह व्यापारियों में प्रचलित था।

उत्तर भारत में जैनधर्म को राजकीय प्रश्रय नहीं मिला किन्तु दक्षिण के कदम्ब एवं गंग राजाओं ने इसे आश्रय प्रदान किया।

मथुरा व वल्लभी श्वेताम्बर जैन धर्म के केन्द्र थे। 513 ई. में वल्लभी में जैन सभा हुई। वल्लभी सभा का सभापति जैन आचार्य देवधिंगणि (क्षमाश्रमण) था।

बंगाल में पुण्ड्रवर्धन दिगम्बर संप्रदाय का केन्द्र था।

कहौम के लेख के अनुसार स्कन्दगुप्त के काल में मद्र नामक व्यक्ति ने पाँच जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां स्थापित कराई।

जैन मुनि सर्वनन्दी ने 458 ई. में लोकविभग नामक ग्रन्थ लिखा।आचार्य सिद्ध सेन ने न्यायवार्ता की रचना की जिससे जैनदर्शन व न्याय दर्शन के विकास में योगदान मिला।

मगध से लेकर कलिंग, मथुरा, उदयगिरि व तमिलनाडु तक जैन धर्म का प्रचार था, परन्तु मगध अब इसका केन्द्र नहीं था।

गुप्त काल में ही देवनन्दि नामक एक जैन आचार्य ने सर्वार्थसिद्धि नामक ग्रन्थ लिखा। देवनन्दि ने प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ जैनेन्द्र व्याकरण भी लिखा।

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