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गुप्त काल में कला, साहित्य और विज्ञान Kla or Sahitya

गुप्त काल में कला, साहित्य और विज्ञान Kla or Sahitya

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गुप्त काल में कला, साहित्य और विज्ञान Kla or Sahitya

  • कला एवं साहित्य के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहा गया है।
  • कला एवं साहित्य में गोपियाँ कृष्ण की अग गुप्तकाल में बनी थी।

गुप्त काल में वास्तु कला :

1: मन्दिर

गुप्तकालीन मन्दिरों की विशेषताएँ:

  1. गुप्तकाल में ही मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ।
  2. गुप्तयुगीन मन्दिर नागर शैली में बने हैं।
  3. गुप्तकाल में पंचायतन शैली के मन्दिर बनने शुरू हुए। पंचायतन शैली का प्राचीनतम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मन्दिर है।
  4. शिखर युक्त मंदिर का निर्माण गुप्त युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। देवगढ़ का दशावतार मन्दिर शिखरयुक्त मन्दिर का प्रथम उदाहरण है।
  5. .वक्ररेखीय शिखर, जो नागर शैली का अनिवार्य लक्षण है, का प्राचीनतम उदाहरण नचनाकुठार का पार्वती मन्दिर एवं सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर है।
  6. गुप्तकाल में मंदिर निर्माण में छोटी ईंटों व पत्थरों का प्रयोग हुआ है। भीतर गाँव (कानपुर) का मन्दिर ईंटों से निर्मित है तथा वगांकार चबूतरे पर बना है।

नोट– गुप्तकाल के अधिकांश मन्दिर पाषाण निर्मित है।

गुप्तकाल में वर्गाकार चबूतरों पर मन्दिरों का निर्माण शुरू हुआ, जिस पर चढ़ने के लिए चारों ओर सीढ़ियाँ बनाई जाती थी।

गुप्तकला विदेशी प्रभावों से मुक्त थी पर्सी ब्राउन ने लिखा है कि ‘भारत में राजनैतिक एकता, प्रशासनिक स्थिरता एवं राज्याश्रय का सर्वाधिक प्रभाव गुप्तयुगीन वास्तुकला पर दिखाई देता है।

मन्दिर वास्तु के विकास के साथ-साथ इसके शास्त्रीय नियम भी निर्धारित हुए।

आधारपीठिका, गर्भगृह, सभामण्डप, शिखर, अन्तराल, प्रदक्षिणापथ (गर्भगृह के चारों ओर ऊपर से आच्छादित मार्ग) तथा द्वार पर गंगा यमुना की मूर्तियाँ गुप्तयुगीन मन्दिरों की सामान्य विशेषता है।

मन्दिर के भीतर एक चौकोर कक्ष बनाया जाता था, जिसमें मूर्ति रखी जाती थी। मन्दिर के इस सबसे महत्वपूर्ण भाग को गर्भगृह कहा जाता था। प्रारम्भ में गर्भगृह की दीवारें सादी होती थी, किन्तु बाद में उन्हें मूर्तियों से सजाया जाने लगा।

प्रमुख गुप्तकालीन मन्दिर

देवगढ़ का दशावतार मन्दिर – छठी शताब्दी का देवगढ़ का दशावतार मन्दिर (ललितपुर, उत्तरप्रदेश), जो वेत्रवती (बेतवा) नदी के तट पर स्थित है, भारतीय मंदिर निर्माण में शिखर का संभवतः पहला उदाहरण है। इसमें मन्दिर की दीवारों पर शेषशायी विष्णु, नर नारायण की तपस्या एवं गजेन्द्र मोक्ष के दृश्य उत्कीर्ण  किये गये है। दशावतार मन्दिर में शिव को योगी के रूप में दर्शाया गया हैं।

नचना- कुठारा का पार्वती मन्दिर (अजयगढ़, मध्यप्रदेश) – नचना कुठारा के पार्वती मन्दिर में शिव-पार्वती संगीत वाद्यों के साथ उकेरे गए हैं। शिल्प में रामकथा/ रामायण का सर्वप्रथम अंकन नचना कुठार पार्वती मन्दिर में है।

भूमरा का शिव मन्दिर (सतना, मध्यप्रदेश) – भूमरा शिव मन्दिर के द्वार स्तम्भ के दाएं मकरवाहिनी गंगा एवं बायें कूर्मवाहिनी यमुना उत्कीर्ण है। इसमें शिवजी रतन जड़ित मुकुट पहने हुए दिखाये गये हैं।

  • खोह का शिव मन्दिर (सतना, मध्यप्रदेश)
  • साँची का मन्दिर संख्या 17- यह प्रारम्भिक गुप्तकालीन मन्दिर है। इसकी योजना आयताकार थी।
  • तिगवा का विष्णु मन्दिर (जबलपुर, मध्यप्रदेश)
  • एरण का विष्णु मन्दिर (सागर, मध्यप्रदेश)

वराह की वास्तविक आकार की मूर्ति एरण से प्राप्त हुई जिसका निर्माण धन्यविष्णु ने किया।

एरण विष्णु मन्दिर के सम्मुख बुद्धगप्त के काल में 485 ई. में एक गरूड़ ध्वज स्थापित हुआ।

भीतरगांव (कानपुर) का ईंटों का मन्दिर – भीतर गाँव शिखर में भारत में सर्वप्रथम मेहराबों का प्रयोग किया गया। ये मेहराव चैत्याकार हैं। भीतर गाँव का शिखर भारत में शिखर का दूसरा उदाहरण है तथा ईंटों से निर्मित सबसे प्राचीन मन्दिर है।

भीतर गाँव का मन्दिर किसी देवता को समर्पित नहीं है, किन्तु इसमें शिव, विष्णु, गणेश, दुर्गा, महिषासुरमर्दिनी आदि की मूर्तियाँ है।

सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर सिरपुर लक्ष्मण मन्दिर (महासमुन्द, छत्तीसगढ़) एवं पहाड़पुर (बांग्लादेश) मन्दिर भी ईटों से निर्मित है।

उदयगिरि का गुहा मन्दिर – उदयगिरि (विदिशा) में ब्राह्मण गुहा मन्दिर का निर्माण हुआ। इसका निर्माण चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के सेनापति वीरसेन ने कराया। उदयगिरि के गुहा मन्दिर में विष्णु के वराह अवतार की विशाल मूर्ति स्थापित को गई है। वराह अवतार को समुद्र से पृथ्वी का उद्धार करते हुए अंकित किया गया है।

  • दीनाजपुर का वैग्राम मन्दिर हुआ।
  • गुप्तकाल में ब्राह्मण एव बौद्ध गुहा मन्दिरों का भी निर्माण हुआ।

नोट-गुप्तकाल में मन्दिरों के सबसे ज्यादा साक्ष्य मध्यप्रदेश से प्राप्त होते हैं।

मूर्तिकला

विशेषता:

  1. गुप्तकाल में मूर्तिकला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- मथुरा, सारनाथ और पाटलिपुत्र।
  2. गुप्तकालीन मूर्तिकारों ने मथुरा शैली से प्रभावित होकर मूर्तियाँ बनाई।
  3. गंगा यमुना की मूर्ति गुप्तकाल की देन है।
  4. गुप्तकाल में मूर्तियाँ धातु, पत्थर एवं मिट्टी की बनाई जाती थी।
  5. परिधानों की महत्ता, अलंकृत प्रभामण्डल, विशेष केश सज्जा, मुद्रा आसन, आध्यात्मिकता, सरलता एवं भारतीयकरण गुप्तकालीन मूर्तिकला की प्रमुख विशेषताएं हैं।
  6. शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की रचना भी गुप्त काल में हुई।
  7. गुप्त मूर्तिकला का सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ की मूर्तियाँ है।
  8. सारनाथ से प्राप्त बौद्ध मूर्तियों का निर्माण चुनार के सफेद बालूदार पत्थर से हुआ।
  9. कांगड़ा से बुद्ध की धर्मचक्रप्रर्वतन मुद्रा में पीतल की मूर्ति प्राप्त हुई है।
  10. सुल्तानगंज से बुद्ध की 7½ फीट ऊँची अभय मुद्रा में तांबे की प्रतिमा मिली है।
  11. देवगढ़ के दशावतार मन्दिर में विष्णु की मूर्ति, उदयगिरि के वराह अवतार की मूर्ति तथा सूर्य की काशी व कौशाम्बी से मिली मूर्तियाँ गुप्तकाल की मूर्तिकला की परिपक्वता को दर्शाती हैं।
  12. सारनाथ से बैठे बुद्ध की मूर्ति तथा मथुरा से खड़े बुद्ध की समभंग मुद्रा में मूर्ति मिली है।
  13. मथुरा से महावीर एवं विष्णु की मूर्तियाँ मिली हैं।
  14. विष्णु के वराह अवतार की मूर्तियाँ उदयगिरि एवं एरण से मिली हैं।

गुप्तकालीन गुहा स्थापत्य, स्तूप, विहार एवं चित्रकला :

  • चित्रकला के क्षेत्र में गुप्तकाल में असाधारण उन्नति हुई।
  • गुप्तकाल में सारनाथ में मूलगंधकुटी विहार का निर्माण हुआ, जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है।
  • गुप्तकाल में धमेख स्तूप का निर्माण हुआ, जो एक चबूतरे पर बना है। धमेख स्तूप ईंटों का बना गोलाकार स्तूप है।
  • सिन्ध के मीरपुरखास स्तूप का निर्माण गुप्तकाल में हुआ।
  • अजन्ता की गुफा संख्या 16, 17 तथा 19 गुप्तकाल की हैं।
  • बाघ की गुफायें भी गुप्तकाल की गुफा स्थापत्य का उदाहरण है।
  • अजन्ता व बाघ की गुफाओं में बने चित्र गुप्तकालीन चित्रकला की प्रगति को दर्शाते हैं।

अजन्ताः

अजन्ता की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में बाघोरा नदी के किनारे सहाद्रि पहाड़ियों को काटकर बनाई गई है। अनिस्ठा (अनिष्ठा) गाँव गुफाओं से दो मील दूर है। इसी गाँव के नाम पर इन गुफाओं का नाम अजन्ता पड़ा।

अजन्ता गुफाओं की खोज 1819 ई. में मद्रास रेजिमेन्ट के एक सैनिक विलियम एरिस्कन ने की। अजन्ता में कुल 29 गुफायें हैं।

इन गुफाओं में 9, 10, 19 व 26 नम्बर की गुफायें चैत्य गुफायें हैं, शेष 25 गुफायें विहार हैं। गुफा संख्या 13 सबसे प्राचीन है।

8वीं से 13वीं गुफा तक की छः गुफायें हीनयान संप्रदाय की हैं।

अब 17वीं गुफा में सबसे अधिक चित्र हैं। पहले 16वीं गुफा में सर्वाधिक चित्र थे, पर अधिकांश नष्ट हो गये।

गुफा संख्या 17 को राशिचक्र गुफा एवं चित्रशाला कहा जाता है। इसमें सर्वश्रेष्ठ चित्र माता एवं शिशु का है, अधिकतर चित्र बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित है जैसे महाभिनिष्क्रमण, महापरिनिर्वाण के दृश्य आदि।

चित्रों के विषय गुफा नं.

 

1. बैठी स्त्री का चित्र नौ
2. पुजारियों के दल का स्तूप की ओर जाते चित्र नौ
3. जातक कथाओं के चित्र दस
4. स्त्रियों से घिरे राजा के जुलूस का चित्र दस
5. उपदेश सुनते भक्तगण सोलह
6. गौतम बुद्ध के वैराग्य उत्पन्न होने के चार दृश्य सोलह
7. मरणासन्न राजकुमारी              यह 16वीं गुफा का सबसे प्रसिद्ध चित्र है सोलह
8. महाहंस जातक कथा का चित्र जिसमें राजा स्वर्ण हंस से कथा सुन रहा है। सत्रह
9. राहुल समर्पण का चित्र व बुद्ध का गृह त्याग का चित्र सत्रह
10. मार विजय का चित्र प्रथम
11. चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय की सभा में आये फारसी नरेश खुसरो परवेज द्वितीय के दूत के स्वागत का दृश्य प्रथम
12. बोधिसत्व पद्मपाणि व वज्रपाणि के चित्र प्रथम
13. साड़ों की लड़ाई प्रथम
14. विदुर पण्डित जातक का चित्र द्वितीय
15. बुद्ध जन्म द्वितीय
16. माया का स्वप्न द्वितीय
17. झूला झूलती राजकुमारी द्वितीय

 

गुफा संख्या 19 सर्वाधिक बड़ी स्तूप गुफा है।

नवीं और दसवीं गुफा के चित्र सबसे प्राचीन है। ये चित्र प्रथम शताब्दी ई. के समय सातवाहन शासकों के संरक्षण में बनाये गये थे।

गुफा संख्या 16, 17 एवं 19 गुप्तकालीन हैं। इन गुफाओं को वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के सामन्त व्याघ्र देव (वराह देव) ने बनवाया था, इसमें वाकाटक विन्ध्यशक्ति का नाम भी अंकित है।

गुफा संख्या 1 तथा 2 के चित्र छठी सातवीं शताब्दी में वातापी के चालुक्य शासक पुलकेशन द्वितीय के काल में बने ।

अजन्ता की गुफाओं में तीन तरह के चित्र हैं-

  1. आलेखन, 2. वर्णन, 3. अलंकरण

चित्र निर्माण में टेम्पेरा और फ्रेस्को विधि का प्रयोग किया गया है।

बाघ के चित्रों का विषय लौकिक जीवन से संबंधित था जबकि अजन्ता के चित्रों का विषय धार्मिक था।

यहाँ चित्रकला में कुल 6 रंगों का प्रयोग हुआ है- लाल, पीला, नीला,काला, सफेद एवं हरा।

बाघ की गुफाएं:-

ये मध्यप्रदेश में बाघिनी नदी तट पर हैं। इनकी खोज 1818 ई. में डेंजरफील्ड (Dangerfield) ने की थी।

यहाँ कुल 9 गुफाएं हैं। वर्तमान में केवल गुफा संख्या 4 एवं 5 में सुरक्षित चित्र है, जिन्हें संयुक्त रूप से रंगमहल गुफा कहते हैं। गुफा संख्या 2 पाण्डव गुफा सबसे बड़ी है, गुफा संख्या 3 को हाथीखाना कहते हैं।

ऐलोरा (औरंगाबाद) से भी सातवों से नौवीं शताब्दी के बीच राष्ट्रकूटों द्वारा निर्मित 34 शैलकृत गुफाएं मिली हैं। इनमें 1 से 12 तक बौद्ध,13 से 29 तक हिन्दू व 30 से 34 तक जैन गुफाएँ हैं।

एलीफेन्टा गुफा शैव एवं बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है।

साहित्य

पुराणों का जो रूप अब प्राप्त होता है उसकी रचना गुप्त काल में हुई।

रामायण व महाभारत को अन्तिम रूप गुप्त काल में दिया गया।

इस काल में अनेक स्मृतियों व सूत्रों पर भाष्य लिखे गये।

नारद, कात्यायन, पाराशर व बृहस्पति स्मृति की रचना इसी काल में हुई। नारद व बृहस्पति स्मृति प्रधानतः विधि विषयक हैं जबकि कात्यायन स्मृति मुख्यतः आर्थिक विषयों पर लिखी गई है।

गुप्तकाल में संस्कृत के महान विद्वान कालिदास हुये, जिन्हें भारत का शेक्सपियर कहा जाता है। कालिदास ने चार काव्य व तीन नाटकों की रचना की।

कालिदास की शैली को वैदर्भी शैली कहा जाता है।

कालिदास रचित ‘ऋतुसंहार’ और ‘मेघदूत’ खण्ड काव्य हैं।

कुमार संभव व रघुवंश महाकाव्य है।

कालिदास के तीन नाटक विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्र और अभिज्ञान शाकुन्तलम् (कालिदास की सर्वश्रेष्ठ रचना) है।

क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रन्थ बृहत्कथामंजरी में कालिदास की एक अन्य रचना ‘कुन्तलेश्वरदौत्यम्’ का एक श्लोक ऊद्धृत किया है किन्तु यह ग्रन्थ अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।

ऋतुसंहार– कालिदास की प्रथम काव्य रचना है जो 6 सर्गों का एक खण्ड काव्य है।

मेघदूत पूर्वमेध तथा उत्तरमेघ में विभक्त। इसमें यक्ष की विरहगाथा का विवरण है।

कुमार संभव– यह 17 सर्गों का महाकाव्य है, जिसमें शिव पार्वती के पुत्र कुमार (कार्तिकेय) के जन्म की कथा का वर्णन है।

रघुवंश– 19 सर्गों का महाकाव्य, जिसमें राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक चालीस ईक्ष्वाकु राजाओं का चरित्र चित्रण है।

मालविकाग्निमित्र– पाँच अंकों में कालिदास की प्रथम नाट्य रचना, जिसमें शुंग राजा अग्निमित्र और मालविका की प्रणय कथा है।

विक्रमोर्वशीय– पुरुरवा व उर्वशी की प्रणय कथा, जो पाँच अंकों में है। इस नाटक का दृश्यांकन झुंसी (प्रतिष्ठानपुर) में किया गया।

अभिज्ञान शाकुन्तलम्– कालिदास की सर्वोत्कृष्ट रचना, सात अंकों में हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त व कण्व ऋषि की पालिता पुत्री शकुन्तला के संयोग व वियोग का विवरण है। यह कालिदास का तीसरा व अन्तिम  नाटक है। जर्मन कवि गेटे ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् की प्रशंसा की है।

कालिदास ने मेघदूत की रचना वाकाटक नरेश प्रवरसेन द्वितीय के दरबार में की।

गुप्तकालीन नाटक मुख्यतः प्रेमप्रधान एवं सुखान्त होते थे। गुप्तकालीन नाटकों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उच्च सामाजिक स्तर के पात्र संस्कृत बोलते थे, जबकि निम्न सामाजिक स्तर के पात्र तथा स्त्रियाँ प्राकृत भाषा का प्रयोग करती थी। इस समय की अलंकृत संस्कृत को समाज के अन्य वर्गों के लोग नहीं समझ सकते थे, क्योंकि तत्कालीन बोलचाल की भाषा प्राकृत थी।

शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् में स्त्रियाँ व शूद्र प्राकृत बोलते हैं। मृच्छकटिकम में ब्राह्मण व्यापारी चारूदत्त एवं गणिका बसन्तसेना की प्रणय कथा है। इसमें तत्कालीन समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार पर प्रकाश डाला गया है।

भास ने 13 नाटक लिखे, जिनमें स्वप्नवासवदता छः अंकों का नाटक है। यह प्रथम सम्पूर्ण नाटक माना जाता है।

विशाखदत्त की मुद्राराक्षस नायिका विहीन नाट्य रचना है।

माघ, भारवि एवं श्री हर्ष को संस्कृत काव्य के शीर्घत्रयी कहा जाता है, एवं इनकी रचनाएं क्रमशः शिशुपालवध, किरातार्जुनीयम एवं नैषधीयचरितम् को वृहत्त्रयी कहते हैं।

अमरकोश के प्रसिद्ध टीकाकार क्षीरस्वामीभट्ट हैं।

षड्दर्शन का पूर्ण विकास गुप्तकाल में हुआ।

काव्यालंकार भामह ने लिखा दशावतार क्षेमेन्द्र की रचना है।

गुप्तकाल की अन्य महत्त्वपूर्ण रचनायें-

पुस्तक

 

लेखक
देवीचन्द्रगुप्तम् मुद्राराक्षस विशाखदत
काव्यदर्शन (काव्यादर्श), दशकुमारचरित दण्डिन
किरातार्जुनियम (18 सर्ग हैं) भारवि
रावणवध वत्सभट्टि / भट्टीका
अमरकोष (लिंगानुशासन) अमरसिंह
न्यायावतार सिद्धसेन
पंचतन्त्र विष्णु शर्मा

 

कामसूत्र वात्स्यायन
चन्द्रव्याकरण चन्द्रगोमिन
विसुद्धिमग्ग बुद्धघोष
मृच्छकटिकम् (मिट्टी की गाड़ी)

 

शूद्रक

 

अमरकोश को संस्कृत का विश्वकोश कहा जाता है।

विज्ञान

  • गुप्तकाल में शून्य का सिद्धान्त तथा दशमलव प्रणाली का विकास में हुआ।
  • शून्य का आविष्कार अज्ञात भारतीय ने किया था।
  • शून्य का आविष्कार ईसा पूर्व दूसरी सदी में भारतीयों ने किया। अरबों ने शून्य का प्रयोग भारत से सीखा व इसे यूरोप में फैलाया।
  • अंग्रेजी में भारतीय अंकमाला को अरबी अंक (Arabic Numer-als) कहते हैं, किन्तु अरब लोग भारतीय अंकों को हिन्दसा कहते हैं। अरबों ने ही भारतीय अंकन पद्धति को अपना कर पश्चिमी दुनिया में फैलाया।
  • दशमलव पद्धति का प्रयोग सबसे पहले भारतीयों ने किया। चीन ने दशमलव पद्धति भारतीय बौद्ध धर्म प्रचारकों से सीखो तथा यूरोप ने अरबों से सीखी।

आर्यभट्ट:

आर्यभट्ट ( 5वीं शताब्दी) कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) के निवासी थे। आर्यभट्ट ने कहा कि ‘पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है।’ आर्यभट्ट बीजगणित के जनक थे व इन्होंने सूर्य सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। आर्यभट्ट को प्रथम ऐतिहासिक खगोलशास्त्री कहा जाता है।

इस सम्बन्ध में उनका कथन- “मैंने खगोलशास्त्रीय सिद्धान्तों के गहरे समुद्र में गोता लगाया एवं सत्यज्ञान से डूबे रत्न को अपनी बौद्धिकता की नाव से उबारा।”

आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम् नामक गणित की पुस्तक लिखी। आर्यभट्टीयम् के चार भाग है

  1. दशगीतिकापाद,
  2. गणितपाद,
  3. कालक्रियापाद,
  4. गोलापाद

आर्यभट्ट ने चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या की। आर्यभट्ट ने त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने का सूत्र दिया। आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि का अनुमानित माप व पाई (R) का माप दिया, जो आज भी सही माना जाता है। आर्यभट्ट ने बेबिलोनियाई विधि से ग्रह स्थिति की गणना की। आर्यभट्ट की कृति आर्यभट्टीयम् का 800 ई. में ‘जीज-अल्-अर्जबहर’ नाम से अरबी भाषा में अनुवाद किया गया।

वराहमिहिर:

गुप्तकाल में अवन्ति / पश्चिम मालवा (उज्जैन) निवासी वराहमिहिर (छठी शताब्दी) ने खगोल शास्त्र व ज्योतिष विद्या पर अनेक ग्रन्थ लिखे। इनमें पंचसिद्धान्तिका, लघुजातक, वृहज्जातक, बृहत्संहिता,योगयात्रा एवं योगमाया प्रमुख हैं।

पंचसिद्धान्तिका के टीकाकार भटोत्पल हैं। इसमें पाँच ज्योतिष सिद्धान्त है- पितामह, वशिष्ठ, रोमक, पोलिश, सूर्य

रोमक एवं पौलिश पर यूनानी प्रभाव है।

वशिष्ठ सिद्धान्त ने एक वर्ष को 366 दिन के स्थान पर 365.25 दिन का बताया।

वराहमिहिर– “चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है एवं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है।”

वृहत्संहिता में ज्योतिष के अलावा भारत के तात्कालिक भूगोल, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक जीवन तथा स्थापत्य व मूर्तिकला की भी विस्तृत जानकारी दी गई है। इस दृष्टि से वृहत्संहिता गुप्तयुगीन संस्कृति के ज्ञान का महाकोष है।

वृहत्संहिता प्रथम विश्वकोषीय ग्रन्थ माना जाता है।

वराहमिहिर ने वर्गमूल एवं घनमूल निकालने की पद्धति दी थी।

भाष्कर प्रथम (600 ई.) ने महाभास्कर्य व लघुभास्कर्य तथा भाष्य लिखे, इन्होंने आर्यभट्टीयम् पर आर्यभट्टीय भाष्य (अश्मक तंत्र) टीका लिखी।

नोट– भास्कर द्वितीय (भास्कराचार्य)- 12वीं सदी के गणितज्ञ थे। सिद्धान्त शिरोमणि इनकी प्रसिद्ध रचना है, जिसके चार भाग लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित एवं गोला हैं। लीलावती को पाटीगणित भी कहते है।

महावीराचार्य ने गणितसार संग्रह ग्रन्थ की रचना की।

भीनमाल (जालौर, राजस्थान) में जन्मे गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त (598 ई.) ने खण्डखाद्यक, ब्रह्मसिद्धान्त/ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त एवं ध्यानगर्भ की रचना की तथा वेदांग ज्योतिष एवं ध्यान ग्रह लिखा।

ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त में खगोलीय उपकरणों का पहला सुव्यवस्थित विवरण मिलता है।

ब्रह्मगुप्त को सर्वप्रथम अरबों में ज्योतिष के प्रचार का श्रेय है।

ब्रह्मस्फुट एवं खण्डखाधक का अरबी अनुवाद अलफजारी एवं अल्बरूनी ने सिन्द हिन्द एवं अलात अरकन्द नाम से किया।

ब्रह्मगुप्त ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए कहा कि पृथ्वी सभी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।

सुश्रुत गुप्तकाल में शल्यचिकित्सक थे इनकी पुस्तक सुश्रुत संहिता के उपदेष्टा धनवंतरी है, जिसमें 121 उपकरणों का उल्लेख है।

धन्वंतरि नामक आयुर्वेद का चिकित्सक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में था, जिसने निघण्टु ग्रन्थ लिखा।

वाग्भट्ट ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अष्टांग हृदय’ एवं अष्टांग संगह की रचना की।

चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट्ट को आयुर्वेदत्रयी एवं इनकी रचनाओं को वृहतत्रयी कहा जाता है।

भारत में पशु चिकित्सा के जनक शालिहोत्र ऋषि ने घोड़ों की चिकित्सा के लिए अश्वशास्त्र / शालिहोत्र सहिता/होल शास्त्र लिखा।

परमार भोज ने अश्व चिकित्सा पर शालिहोत्र ग्रन्थ लिखा था।

पाल्काप्य नामक पशु चिकित्सक ने हस्त्यायुर्वेद नामक ग्रन्थ लिखा,जो हाथियों की चिकित्सा से संबंधित था।

श्रीधर ने गणित की पुस्तक त्रिशति लिखी।

नवनीतकम् नामक आयुर्वेद ग्रन्थ की रचना भी इसी काल में हुई।

महरौली का ‘लौह स्तम्भ’ गुप्तकालीन धातु कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

इस्पात बनाने की कला सबसे पहले भारत में विकसित हुई। विदेशों में भारतीय इस्पात का निर्यात ईसा पूर्व चौथी सदी में होने लगा। बाद में भारतीय इस्पात उठ्ज (Wootz) कहलाने लगा।

वैशेषिक शाखा के ‘अणु सिद्धान्त’ का प्रतिपादन भी हुआ। गुप्तकाल में नागार्जुन ने रस चिकित्सा प्रणाली द्वारा सोने, चाँदी, ताँबे आदि धातुओं की भस्म से रोगों की चिकित्सा की।

गुप्तकालीन शब्दावली

वापी,तडांग तालाब
अवल्गक आक्रमण के समय प्रजा द्वारा राजा क लिए खाद्य सामग्री का प्रबन्ध

 

वात- भूत वायु व पानी के देवताओं की पूजा के लिए लिया जाने वाला कर

 

शुल्क व्यापारियों से ली जाने वाली चुंगी
पूग नगर में निवास करने वालों की समिति
कुटुम्बिन परिवार का मुखिया
अष्टकुलाधिकारी आठ कुलों का मुखिया
महत्तर ग्राम प्रशासन का एक अधिकारी
भुक्ति गुप्तकालीन प्रान्तों का नाम
विषय गुप्तकालीन जनपद (जिला)

 

अदायिक मृत व्यक्ति की संपत्ति, इसका मालिका राजा होता था।

 

गुप्तनिधि राजकीय संपत्ति
मृत्तिकार कुंभकार
गंधव्य इत्र बनाने वाले गंधी
कासवन नाई
कंकार बर्तन बनाने वाला ठठेरा
भिल्ल आखेट से जीविका चलाने वाला वर्ग
अन्तपीलक तेल निकालने वाला तेली
कुटुम्बी भू स्वामी स्वतन्त्र किसान
सीरिन बटाई पर खेती करने वाले किसान
आर्धीक फसल बटाई करने वाली पृथक् जाति

 

मेलबार मन्दिरों को अग्रहार गांवों से होने वाली आय

 

ब्राह्मदेय ब्राह्मणों को दी जाने वाली कर मुक्त भूमि
देवदान देवालयों को दी गई कर मुक्त भूमि
परिहार देवदान भूमि जो राज्य करों से मुक्त हो

 

भोग राजा को फलों व सब्जियों के रूप में प्राप्त होने वाला कर

 

कल्पत ब्रिकी कर
दसक मछुआरा
ताम्बुल पान

 

गुप्तकालीन अभिलेख

अभिलेख शासक
प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद) समुद्रगुप्त
महरौली लौह स्तम्भ लेख (दिल्ली) चन्द्र (चन्द्रगुप्त II)
उदयगिरि गुहालेख (भिलसा, म.प्र.) चन्द्रगुप्त।।
मथुरा स्तंभ लेख (उत्तर प्रदेश) चन्द्रगुप्त II
बिलसड़ अभिलेख (एटा उ.प्र.) कुमारगुप्त।
करमदण्डा अभिलेख (फैजाबाद) कुमारगुप्त।
मन्दसौर अभिलेख, 473 ई. (म.प्र. ) कुमारगुप्त II

 

 

दामोदर पुर ताम्रपत्र (बंगाल) कुमारगुप्त I
गढ़वा शिलालेख (इलाहाबाद) कुमारगुप्त I
भितरी स्तम्भ लेख (गाजीपुर, उ.प्र.) स्कन्दगुप्त
कहौम स्तम्भ लेख (गोरखपुर, उ.प्र.) स्कन्दगुप्त
जूनागढ़ अभिलेख (गुजरात) स्कन्दगुप्त
गढ़वा शिलालेख (इलाहाबाद) स्कन्दगुप्त
सुपिया अभिलेख (रीवा, म.प्र.) स्कन्दगुप्त
पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र प्रभावती गुप्ता

 

राष्ट्रकूट शासकों के निम्नलिखित तीन ताम्रपत्रों से भी गुप्त वंश की जानकारी मिलती हैं

1. संजन ताम्र अभिलेख अमोघवर्ष प्रथम
2. काम्बै ताम्र अभिलेख गोविन्द चतुर्थ
3. संगली ताम्र अभिलेख गोविन्द चतुर्थ

राष्ट्रकूट ताम्र लेखों से रामगुप्त के बारे में जानकारी मिलती है।

सूर्य पूजा

1.सूर्य की सबसे प्राचीन मूर्ति भरहुत (मध्यप्रदेश) से उपलब्ध हुई है, जो तीसरी सदी ई.पू. की है। भारत में सूर्य-पूजा का सूत्रपात ईरान के प्रभाव से हुआ।

2.प्राचीनतम सूर्य मन्दिर तक्षशिला का सूर्य मन्दिर है, जो पहलव शासक गोण्डोफर्नीज के समय का है।

3.मुल्तान (मूलस्थान) सूर्य-पूजा का प्रसिद्ध केन्द्र था।

4.मुल्तान में सूर्य पूजा का उल्लेख ह्वेनसांग, अबू जईद, अलमसूदी,अलबरूनी तथा इश्तखरी ने किया है।

5.ह्वेनसांग के अनुसार मुल्तान के सूर्य मन्दिर का निर्माण साम्ब द्वारा करवाया गया था।

6.माडास्यात (बुलन्दशहर) का सूर्य मन्दिर गुप्तकालीन है।

7.मोडेरा (गुजरात), औसिया (जोधपुर), कोणार्क (उड़ीसा) आदि प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर हैं।

8.राजस्थान में सूर्य का सबसे प्राचीन मन्दिर चित्तौड़ दुर्ग में स्थित कालिका माता का मन्दिर है।

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