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गुर्जर-प्रतिहार राजवंश (Gurjara-Pratihara dynasty)

Gurjara-Pratihara dynasty (गुर्जर-प्रतिहार राजवंश)

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गुर्जर-प्रतिहार राजवंश (Gurjara-Pratihara dynasty)

अग्नि कुंड से उत्पन्न चार राजपूत वंश यथा प्रतिहार, चालुक्य, चौहान और परमार में से सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिहार वंश था जिसे गुर्जर प्रतिहार भी कहा जाता है।

कक्कुक के घटियाले अभिलेख में प्रतिहारों को ब्राह्मण बताया गया है।

पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख हुआ है एवं बाण के हर्षचरित में भी गुर्जर जाति का उल्लेख मिलता है।

  • प्रतिहारों की कुल 26 शाखाएं थी, जिनमें सबसे प्राचीन मण्डोर के प्रतिहार थे।
  • प्रतिहारों का प्रथम केन्द्र मंडोर (जोधपुर) था। यहां से वे क्रमशःभीनमान, उज्जैन एवं कन्नौज गए।
  • इस वंश का आदिपुरूष हरिशचन्द्र (रोहिलद्धि) नामक व्यक्ति था।
  • हरिशचन्द्र नामक ब्राह्मण ने इस वंश की स्थापना की, जिसके कारण हरिशचन्द्र को प्रतिहार का आदिपुरूष कहा जाता है।

नागभट्ट प्रथम (730-756 ):

प्रथम महत्त्वपूर्ण शासक नागभट्ट प्रथम था नागभट्ट प्रथम प्रतिहारों की भीनमाल (जालौर) एवं उज्जैन शाखा का संस्थापक था।

नागभट्ट प्रथम ने राजधानी मण्डौर से मेड़ता स्थानान्तरित को मण्डौर को दूसरों राजधानी तथा भीनमाल को तीसरी राजधानी बनाया।

इसके बाद उज्जैन को प्रतिहारों का केन्द्र बनाया।

नागभट्ट प्रथम ने अरबों को पराजित किया। अरबों का नेतृत्व जुनैद का रहा था।

मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम को “मलेच्छों (अरब) का नाशक“, नारायण अवतार तथा प्रतिहारों को लक्ष्मण (सौमित्र) का वंशज बताया गया है।

मिहिरभोज के ग्वालियर अभिलेख का लेखक बालादित्य था।

राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि दन्तिदर्श ने एक महादान (हिरण्य गर्भदान यज्ञ) किया जिसमें उसने गुर्जर प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम को अवन्ति/उज्जैन में प्रतिहार (द्वारपाल) बनाया।

वत्सराज (783 से 795 .):

वत्सराज को प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। वत्सराज के समय से कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष शुरू हुआ।

उसने पाल शासक धर्मपाल को मुंगेर (मुद्गगिरी) के युद्ध में पराजित किया। किन्तु राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित हुये।

वानीडिन्डोरी तथा राधानपुर लेखों से ज्ञात होता है कि ध्रुव ने वत्सराज को पराजित करके राजपूताना में शरण लेने को विवश किया और वे दो राजछत्र भी छीन लिए जिसे उन्होंने गौडराज से छीना था।

नागभट्ट द्वितीय (795 से 833 .) :

वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज पर अधिकार कर उसे प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।

नागभट्ट द्वितीय राष्ट्रकूट शासक गोविन्द तृतीय से पराजित हुआ।

ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार नागभट्ट द्वितीय ने तुरूष्कों (मुसलमानों) को पराजित किया।

नागभट्ट द्वितीय को बकुला / बुचकला अभिलेख में परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर कहा गया है।

चन्द्रप्रभासूरि के प्रभावथ प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि नागभट्ट द्वितीय ने 833 ई. गंगा में जल समाधि ली थी।

ग्वालियर लेख के अनुसार अल्ल नामक व्यक्ति ने एक विष्णु मन्दिर का निर्माण कराया।

मिहिरभोज प्रथम (836 से 885 .):

रामभद्र के तीन वर्ष के निर्बल शासन के पश्चात् मिहिरभोज प्रथम शासक बना। यह इस वंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था। कल्हण एवं अरब यात्री सुलेमान भी हमें उसके समय की जानकारी देते हैं। सुलेमान मिहिरभोज के काल में भारत आया।

अरब यात्री सुलेमान कहता है कि मिहिरभोज के पास विशाल अश्वसेना है और वह इस्लाम का बड़ा शत्रु है। उसका साम्राज्य समृद्ध है जिसमें सोने चांदी की बहुत सी खानें है। राज्य चोरी डकैती से मुक्त है।

शून्य का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिहिरभोज (भोज प्रतिहार) के ग्वालियर अभिलेख से मिलता है।

मिहिरभोज पाल नरेश देवपाल व राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम के सामन्त ध्रुव से पराजित हुआ

मिहिरभोज ने पाल शासक देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों विग्रहपाल एवं नारायणपाल को पराजित किया।

राष्ट्रकूट वंश के अमोधवर्ष एवं कृष्ण द्वितीय मिहिरभोज के समकालीन थे।

कृष्ण द्वितीय को मिहिरभोज ने नर्मदा तट पर पराजित किया।

भोज वैष्णव धर्म का अनुयायी था।

उसने आदिवाराह (ग्वालियर अभिलेख) तथा प्रभास (दौलतपुर अभिलेख) आदि उपाधियाँ धारण की।

भोज ने आदिवराह द्रम्म नामक सिक्का भी चलाया। इसके एक तरफ वराह की आकृति होती थी।

महेन्द्रपाल प्रथम (885 से 910 .)

मिहिरभोज के पश्चात उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम शासक बना।

प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर महेन्द्रपाल प्रथम के राजगुरु थे। राजशेखर ने कर्पूर मंजरी, बालरामायण, बालभारत (प्रचंड पांडव), विद्धसाल भंजिका (ये सभी नाटक हैं), काव्यमीमांसा, हरविलास और भुवनकोष (ये तीनों काव्य ग्रन्थ हैं) आदि ग्रन्थों की रचना की। कर्पूर मंजरी प्राकृत भाषा में लिखा गया है। अन्य सभी रचनाएँ संस्कृत में हैं।

राजशेखर ने कपूरंमन्जरी की रचना अपनी पत्नी अवन्तिसुन्दरी के आग्रह पर की थी।

ब्राह्मण राजशेखर ने क्षत्रिय कन्या अवन्ति सुन्दरी से विवाह किया।

राजशेखर ने प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल को निर्भयराज, रघुकुल तिलक व रघुकुल चूड़ा मणि तथा महिपाल प्रथम को रघुवंश मुकुट मणि तथा रघुकुल मुक्ता मणि कहा है।

राजशेखर ने नर्मदा नदी को आर्यावर्त एवं दक्षिणापथ की सीमा माना है।

महीपाल प्रथम (912 से 943 .):

राजशेखर महीपाल का भी राजगुरु था राजशेखर ने महीपाल को आर्यावर्त का महाराजाधिराज तथा रघुकुल मुक्तामणि कहा है।

महीपाल प्रथम के समय बगदाद निवासी अलमसूदी भारत आया।

अलमसूदी की पुस्तक मुरूजल जहाब है।

अलमसूदी ने महीपाल प्रथम को बऊर/बौरा कहा है।

महीपाल प्रथम के बाद गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का विघटन शुरू हो गया 963 ई. में कृष्ण तृतीय (राष्ट्रकूट शासक) ने प्रतिहार राजाओं को पराजित किया।

महमूद गजनवी ने 1018 ई. में निर्बल प्रतिहार शासक राज्यपाल को तथा 1019 ई. में उसके पुत्र त्रिलोचनपाल को पराजित किया।

महमूद गजनवी से पराजित होकर राज्यपाल ने कन्नौज छोड़कर बारी को राजधानी बनाया।

प्रतिहारों के सामन्त गुजरात के चालुक्य, जेजाकभुक्ति के चन्देल, ग्वालियर के कच्छपघात, डाहल के कलचुरि, मालवा के परमार व शाकंभरी के चौहान, गहड़वाल आदि स्वतन्त्र हो गये।

इस वंश का अन्तिम शासक यशपाल (1036 ई.) था।

अल मसूदी, सुलेमान व अबूजेद आदि अरब यात्रियों ने गुर्जर प्रतिहारों को जुज्र कहा है अल मसूदी ने गुर्जर प्रतिहार राज्यों को अल-जुजर कहा है।

सुलेमान की पुस्तक- सिलसिलात उत तवारीख है।

पंजाब के पेहोवा अभिलेख से घोड़ों के क्रय विक्रय हेतु लगने वाले बाजारों का उल्लेख है।

सास बहू अभिलेख महीपाल द्वितीय (955 ई.) का है।

प्रतिहार शिलालेखों में पदाधिकारियों (नौकरशाही) को राजपुरूष कहा गया है।

893 ई. के एक प्रतिहार अभिलेख से दण्डपाशिक नामक पुलिस अधिकारी का उल्लेख मिलता है।

प्रतिहारों की अश्वसेना तत्कालीन भारत में सर्वश्रेष्ठ थी।

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