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मध्यकाल के प्रान्तीय राजवंश – Madhya Kaal Prantiya Rajvansh

मध्यकाल के प्रान्तीय राजवंश

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मध्यकाल के प्रान्तीय राजवंश

मुहम्मद बिन तुगलक के समय दिल्ली सल्तनत का सर्वाधिक विस्तार व साथ ही साथ विघटन शुरू हुआ। फिरोज तुगलक के समय इसमें तेजी आई व 1398 ई. में तैमूर के आक्रमण के बाद बंगाल, जौनपुर, गुजरात, खानदेश जैसे प्रान्त भी स्वतन्त्र हो गये। 2.उड़ीसा व कश्मीर संपूर्ण सल्तनत काल में दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र ही रहे।

जौनपुर

जौनपुर की स्थापना फिरोज तुगलक ने अपने चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक (जौना खाँ) की स्मृति में 1359-60 ई. में गोमती नदी के तट पर जमनपुर नामक स्थान पर की।

मलिक सरवर नामक हिजड़े को 1394 ई. में मुहम्मद तुगलक ने जीनपुर का गवर्नर नियुक्त किया, जिसकी उपाधि पूर्व का स्वामी श्री और उसे सुल्तान-उस-शर्क व ख्वाजा जहा की उपाधि मुहम्मद बिन तुगलक ने दी।

नासिरूद्दीन महमूद के शासनकाल में तैमूर के आक्रमण के समय मलिक सरवर ने राजनैतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी व जौनपुर में शर्की राज्य की स्थापना की। 4.1399 ई. में मलिक सस्वर की मृत्यु के बाद उसका दत्तक पुत्र मुबारक गौरी शाह शासक बना। इसका मूल नाम मलिक करनफूल था। इसने सर्वप्रथम जौनपुर में सुल्तान की उपाधि धारण की।

इब्राहीम शाह शर्की (1402-1440 ई.) :-

यह जौनपुर का सबसे प्रसिद्ध शासक था।

यह कला व साहित्य का प्रेमी था उसने स्कूलों व मदरसों की स्थापना की देश विदेश के विद्वानों को आमंत्रित किया।

इब्राहीम ने ‘सिराज-ए-हिन्द’ की उपाधि धारण की।

उसके संरक्षण में संगीत शिरोमणि’ नामक संगीत ग्रन्थ की रचना हुई। फतवा-ए-इब्राहीमशाही और बहर-उल-मव्वाज नामक पुस्तकें भी उसके काल में लिखी गई।

इब्राहिम के समय 1408 ई. में कन्नौज में अटाला मन्दिर के स्थान पर अटाला मस्जिद का निर्माण पूरा हुआ। अटाला मस्जिद का निर्माण 1377 ई. में फिरोज तुगलक के समय प्रारम्भ हुआ। फिरोज के सौतेले भाई इब्राहीम बरबक ने अटाला मस्जिद का निर्माण शुरू करवाया।

इब्राहीम शक के अधीन हुई सांस्कृतिक उन्नति के कारण जौनपुर को ‘भारत का सिराज’ कहा जाने लगा। उसके समय जौनपुर की नई शैली शर्की शैली का जन्म हुआ।

1440 ई. में इब्राहिम शाह शर्की की मृत्यु के पश्चात् महमूदशाह शासक बना जो बहलोल लोदी से पराजित हुआ, उसके बाद मुहम्मदशाह शासक बना।

हुसैन शाह शर्की इस वंश का अन्तिम शासक था। उसके समय में बहलोल लोदी ने जौनपुर को 1484 ई. में पराजित करके अपने पुत्र बरबक शाह को गद्दी पर बैठाया, किन्तु जोनपुर का विलय नहीं किया।

बाद में सिकन्दर लोदी ने अपने भाई बरबक शाह को पराजित करके जौनपुर का दिल्ली सल्तनत में विलय कर लिया।

बनारस का युद्ध हुसैनशाह शर्की एवं सिकन्दरशाह के मध्य हुआ था।

हुसैनशाह शर्की ने अलाउद्दीन हुसैन शाह (1493-1519 ई.) नामक बंगाल के शासक के यहाँ शरण ली।

जौनपुर को ढाक ए अमन (शरणस्थली) भी कहा जाता था।

मालवा

दिल्ली सल्तनत के पतन के दौर में मालवा में क्षेत्रीय गौरी एवं खिलजी वंश ने शासन किया। इसी दौरान उत्तर भारत में गुजरात, मेवाड़ एवं लोदियों के बीच मालवा पर वर्चस्व स्थापित करने को लेकर संघर्ष होता रहता था।

गौरी वंश:-

मालवा के गौरी वंश के गवर्नर दिलावर खाँ गौरी (हुसैन खाँ गौरी) ने 1401 ई. में तैमूर के आक्रमण के बाद स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी,लेकिन उसने स्वयं को राजा घोषित नहीं किया।

उसके पुत्र अल्प खाँ (1406-35 ई.) ने हुशंग शाह की उपाधि धारण करके स्वयं को राजा / सुल्तान घोषित किया।

1407 ई. में गुजरात के शासक मुजफ्फर शाह ने मालवा पर आक्रमण कर हुशंग शाह को बन्दी बना लिया व गुजरात ले गया।

हुशंग शाह न मुक्त होकर माण्डू नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाई।

नरदेव सोनी उसका खजांची एवं सलाहकार था। हुशंग शाह ने व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए जैन व्यापारियों को सहायता दी।

हुशंगशाह सूफी सन्त शेख बुरहानुद्दीन का शिष्य था।

उसने नर्मदा के किनारे होशंगाबाद नगर की भी स्थापना की।

अल्प खाँ ने हिन्दुओं के लिए ललितपुर मन्दिर बनवाया, जहां से उसका अभिलेख मिला है, माण्डू में 1425 ई. में हिंडोला महल बनवाया। अल्पखां (हुशंगशाह) का मकबरा माण्डू (मध्यप्रदेश) में है।

माण्डू की जामा मस्जिद का निर्माण हुशंगशाह ने शुरू किया, किन्तु महमूद खलजी प्रथम के समय में इसका निर्माण पूरा हुआ।

अल्प खा (शंग शाह) के पश्चात् सुल्तान मोहम्मद शाह शासक बना।

खलजी वंश:-

महमूद खलजी प्रथम (1436-1469 ई.) :-

इसने हुशंग शाह के पुत्र मोहम्मद शाह गौरी को गद्दी से हटा दिया और 1436 ई. में सुल्तान बना व खलजी वंश की नींव डाली।

महमूद खलजी मालवा का सबसे योग्य व शक्तिशाली शासक था।

उसने गुजरात के अहमद शाह प्रथम, बहमनी सम्राट मुहम्मद शाह तृतीयऔर मेवाड़ के राणा कुम्भा के विरुद्ध युद्ध किया।

महाराणा कुम्भा (मेवाड़) के विरुद्ध युद्ध अनिर्णित रहा क्योंकि राणा कुंभा ने चित्तौड़ में जीत की स्मृति में कीर्ति स्तम्भ बनवाया और महमूद खलजी ने माण्डू में सात मंजिला विजय स्तम्भ बनवाया।

उसने अपना अधिकांश जीवन युद्ध करने में बिताया। ऐसा कोई वर्ष नहीं था जब युद्ध मैदान में न गया हो। फरिश्ता के अनुसार शिविर उसका घर बन गया और युद्ध का मैदान उसका आरामगाह था।

मिस्र के खलीफा ने महमूद खलजी को सुल्तान की उपाधि दी। उसके दरबार में मिस्र के सुल्तान अबु

सईद का एक मिशन भी आया था।

महमूद खलजी ने माण्डू में एक चिकित्सालय व आवासीय महाविद्यालय भी स्थापित किया।

व्यापार वाणिज्य के विकास हेतु जैन पूंजीपतियों को संरक्षण दिया।

गयासुद्दीन (1469-1500 ई.)-

वह धार्मिक प्रवृत्ति का सुल्तान था। शराब व इस्लाम में वर्जित अन्य वस्तुओं का सेवन नहीं करता था।

वह शान्तिप्रिय व्यक्ति था किन्तु उसका पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण था। उसके सबसे बड़े पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार डाला।

गयासुद्दीन ने माण्डू में जहाज महल बनवाया।

नासिरुद्दीन (1500-1510 ई.):-

वह तानाशाह व इन्द्रिय लोलुप शासक था।

उसके हरम में 15000 औरतें थी। उसके द्वारा निर्मित महल बाद में बाजबहादुर व रानी रूपमती के महल कहलाये।

उसने इथोपियाई व तुर्की दासियों की एक अंगरक्षक सेना भी गठित की।

 महमूद खलजी द्वितीय:-

उसने षड्यन्त्रकारी अमीरों को कुचलने के लिये चन्देरी के राजपूत शासक मेदिनी राय को अपना वजीर नियुक्त किया।

वह चित्तौड़ के शासक गुणा सांगा से पराजित हुआ। परन्तु राणा सांगा ने उसे बंदी बनाकर छोड़ दिया। महमूद द्वितीय मालवा का अन्तिम शासक था

1531 ई. में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने माण्डू पर आक्रमण कर महमूद द्वितीय को पराजित कर मालवा को गुजरात में मिला लिया व मालवा का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त हो गया।

1535 ई. में जब हुमायूँ ने गुजरात पर आक्रमण किया तो मालवा दिल्ली साम्राज्य का हिस्सा बन गया, लेकिन शीघ्र ही उसके हाथ से निकल गया।

हुमायूँ प्रथम मुगल बादशाह था, जिसने मालवा जीता।

इस्लामशाह सूर की मृत्यु के बाद मालवा के गवर्नर बाजबहादुर ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। 1561 ई. में अकबर ने बाजबहादुर को पराजित कर मालवा का विलय अपने साम्राज्य में कर लिया। 7.बाजबहादुर के विरुद्ध अकबर के अभियान का नेतृत्व आधम खाँ ने किया बाजबहादुर की पत्नी रूपमती सती हो गई। बाद में बाजबहादुर ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर 2000 का मनसब ग्रहण किया।

बाजबहादुर उच्च कोटि का संगीतकार था।

गुजरात

गुजरात का दिल्ली सल्तनत में विलय अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में किया।

अली मुहम्मद खान की फारसी में लिखित पुस्तक मीरात-ए-अहमदी से भी गुजरात के इतिहास की जानकारी मिलती है।

1401 ई. में सूबेदार जफर खाँ ने मुजफ्फर शाह की उपाधि धारण कर गुजरात में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की।

अहमदशाह प्रथम (1411-1442 ई.) :-

जफर खाँ के पौत्र अल्प खाँ ने जफर खाँ को जहर दिया एवं स्वयं अहमदशाह के नाम से सुल्तान बना।

इसे गुजरात की स्वतन्त्रता का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

अहमद शाह ने साबरमती नदी के किनारे प्राचीन असवाल कस्बे के स्थान पर 1413 ई. में अहमदाबाद नगर की स्थापना की व उसे अपनी राजधानी बनाई।

वह धार्मिक रूप से कट्टर था।

हिन्दुओं पर उसने पहली बार गुजरात में जजिया लगाया। उसने सिद्धपुर के मंदिरों को नष्ट किया।

अहमद शाह ने मालवा के शासक हुशंगशाह को पराजित किया।

अहमद शाह ने इस्लामी व स्थानीय हिन्दू स्थापत्य का समन्वय कर भव्य इमारतों का निर्माण करवाया। अहमदाबाद में जामा मस्जिद एवं तीन दरवाजा का निर्माण करवाया।

मिस्र के विद्वान बद्रुदीन दमामीनी ने अहमदशाह के समय गुजरात की यात्रा की एवं सुल्तान की प्रशंसा करते हुये लिखा है कि वह सुल्तानों में विद्वान व विद्वानों का सुल्तान था।’

गयासुद्दीन मुहम्मद शाह द्वितीय (1442-1451 ई):-

उसमें सैनिक निपुणता नहीं थी अत्यधिक उदर प्रवृति का था।

उसके बाद कुतुबुद्दीन अहमद व दाउद दो अयोग्य शासक बने।

गयासुद्दीन को करीम (दयालु) कहा जाता था।

गयासुद्दीन को जरबख्श (स्वर्णदन करने वाला) भी कहते थे।

महमूद बेगड़ा (1458-1511 ई ) :-

यह अहमदशाह का पौत्र था। इसका मूल नाम अबुल फतेह खाँ या इसने महमूद शाह की उपाधि धारण की इसे गिरनार व चम्पानेर को जीतने के कारण बेगड़ा भी कहा जाता था।

महमूद बेगडा अपने वंश का सबसे महान शासक था।

इसने 1466 ई. में गिरनार के राजा राव मण्डलिक को परास्त कर गिरनार के पास मुस्तफाबाद नामक नगर की स्थापना को, जो गुजरात की दूसरी राजधानी थी।

1482 ई. में चम्पानेर के राजा जयसिंह को परास्त करके चम्पानेर के निकट मुहम्मदाबाद नामक नगर बसाया।

उसने चम्पानेर के निकट बाग-ए-फिरदौस की स्थापना की।

बेगडा के दरबारी कवि उदयराज ने सुल्तान की प्रशंसा में महमूद चरित नामक काव्य की रचना की।

राजविनोद नामक बेगडा की आत्म कथा भी उदयराज ने संस्कृत में लिखी।

बेगड़ा ने द्वारका (जगत) को भी जीता तथा वहाँ कई मन्दिरों को नष्ट किया।

बेगड़ा ने फारस, तुर्की व मिस्र से कूटनीतिक संबंध स्थापित किये।

मिश्र के शासक कनसवा अल गौरी (Qansauh-al-Ghaun) से एक जल-बेडा प्राप्त किया था।

1508 ई. में बेगड़ा ने मिस्र के सुल्तान की मदद से चौल के निकट नौसेना युद्ध में पुर्तगालियों को पराजित किया, किन्तु पुर्तगालियों को दीव में फैक्ट्री स्थापित करने की अनुमति दी।

बारबोसा व बार्थेमा ने बेगड़ा के बारे में रोचक बातें लिखी हैं।

बारबोसा कहता है कि बचपन में उसे जहर का सेवन कराया गया था।

अतः बेगड़ा इतना जहरीला था कि उस पर मख्खी बैठने से वह तुरन्त मर जाती।

वह बहुत पेटू था तथा रात को सोते समय बिस्तर के दोनों तरफ खाना रखकर सोता था व नींद में खा लेता था।

बार्थेमा ने कहा है कि उसकी मूछें इतनी लम्बी थी कि वह उन्हें सिर के पीछे बांधता था।

बार्थेमा यह भी लिखता है कि “कैम्बे के राजकुमार का प्रतिदिन का भोजन एक गधा, बेसिलिस्क और मेढ़क था।” (An ass, basilisk and toad) यह राजकुमार महमूद बेगड़ा ही था

बारबोसा ने महमूद बेगड़ा को विष पुरुष कहा है।

बार्थोमा ने बेगड़ा की कीर्ति को यूरोप में फैलाया।

बेगड़ा के बाद मुजफर द्वितीय (1511-1526 ई.) शासक बना।

बहादुरशाह (1526-1537 ई.) :-

यह गुजरात का अन्तिम शासक था।

उसके काल में गुजरात की शक्ति चरम पर पहुंच गई।

उसने 1531 ई. में मालवा को गुजरात में मिला लिया।

बहादुरशाह ने 1528 ई. में अहमदनगर को जीतकर अपना खुतबा पढ़वाया।

उसने दो रूमी उस्ताद तोपची मुस्तफा (रूमी खाँ) एवं ख्वाजा

जफर (सालमनी) की सेवाएं प्राप्त की थी।

बहादुरशाह ने 1531 ई. में तुर्की नौसेना की सहायता से पुर्तगालियों की नौसेना को दीव में पराजित किया।

बहादुरशाह ने 1534 ई. में मेवाड़ (चित्तौड़) पर भी आक्रमण किया।

मेवाड़ की महारानी कर्णवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता मांगी।

1535 ई. में बहादुरशाह हुमायूँ से पराजित हुआ।

बहादुरशाह की हत्या 1537 ई. में पुर्तगालियों ने धोखे से उस समय कर दी जब वह पुर्तगाली जहाज पर संधि के लिये गया।

वहाँ झगड़ा हो गया व बहादुर शाह पानी में कूद गया या फैंक दिया गया जिससे वह समुद्र में डूबकर मर गया।

इस समय पुर्तगाली गवर्नर नुन्हो डी कुन्हा था।

अन्त में 1572-73 ई. में अकबर ने गुजरात को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

खानदेश

खानदेश नर्मदा घाटी क्षेत्र में नर्मदा एवं ताप्ती नदी के बीच है।

यहाँ स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना मलिक राजा फारूकी ने 1399 ई में की।

उसके नाम पर इस वंश को फारूकी वंश कहा गया खानदेश की राजधानी बुरहानपुर थी।

खानदेश को दक्षिण का प्रवेश द्वार कहा जाता है।

असीरगढ़ खानदेश का प्रसिद्ध किला था।

यहा के आदित्य खान द्वितीय ने गोंडवाना के आस-पास के हिन्दु शासकों को अपने नियंत्रण में लिया।

यहाँ के सुल्ताना द्वारा खान की उपाधि धारण करने के कारण फारूकी साम्राज्य को खानदेश कहा जाने लगा।

मुगल बादशाह अकबर ने 1601 ई. में असीरगढ़ का किला जीता व खानदेश को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

5.मेवाड़

1303 ई. में अलाउद्दीन की चित्तौड़ विजय के साथ गुहिल वंश की रावल शाखा का अन्त हो गया।

गुहिलों की छोटी शाखा सिसोदे गाँव के हम्मीर ने संघर्ष जारी रखा तथा अलाउद्दीन के पतन के बाद सिसोदिया वंश की नींव डाली।

हम्मीर के पहले चित्तौड़ के गुहिल वंश के शासक रावल कहलाते थे।

हम्मीर के समय से वे राणा व महाराणा कहलाये।

राणा हम्मीर सीसोदे के सरदार लक्ष्मण सिंह का पोता था।

चित्तौड़ घेरे के समय लक्ष्मण सिंह सात पुत्रों समेत मारा गया।

उसका एक पुत्र अजय सिंह भाग्यवश जीवित रहा।

हम्मीर अजयसिंह की मृत्यु के बाद सीसोदे का सरदार बना।

क्षेत्रसिंह (1364-82 ई. )-

हम्मीर की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र क्षेत्रसिंह शासक बना।

महाराणा लाखा (1382-1421 ई.)-

लाखा के समय जावर में चाँदी की खान निकल आई जिससे काफी आय हुई।

इसने वृद्धावस्था में राठौड़ राजकुमारी हंसा बाई से विवाह किया।हंसाबाई मारवाड़ नरेश राव चुण्डा की पुत्री तथा रणमल की बहिन थी।

लाखा के बड़े पुत्र चुण्डा को प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि वे हंसाबई के पुत्र के पक्ष में मेवाड़ का राजसिंहासन त्याग देंगे।

इस विवाह से हंसाबाई के पुत्र हुआ जिसका नाम मोकल रखा गया।

चुण्डा को इस प्रतिज्ञा के कारण राजस्थान का भीष्म पितामह कहा जाता है।

मोकल (1421-1433 ई.)-

इसके समय हंसाबाई का भाई रणमल अत्यधिक प्रभावी हो गया।

महाराणा क्षेत्र सिंह की अवैध सन्तान चाचा व मेरा तथा महपा पंवार ने मोकल की हत्या कर दी।

मोकल ने माना, फन्ना एवं विशाल नामक प्रसिद्ध शिल्पकारों तथा कविराज वाणीविलास तथा योगेश्वर नामक विद्वानों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।

महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.) :-

कुम्भा मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी का पुत्र था।

मोकल की हत्या के समय कुम्भा शिविर में उपस्थित था किन्तु किसी तरह बच गया।

कुम्भा ने महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, राजगुरु, दानगुरु, हालगुरु,परमगुरु, हिन्दू सुरताण, अभिनव भरताचार्य आदि उपाधियां धारण की।

एकलिंग महात्य के प्रथम भाग (राजवर्णन) तथा रसिक प्रिया (जयदेव के गीत गोविन्द की टीका) की रचना कुम्भा ने की। इनसे कुम्भा के बारे में जानकारी मिलती है।एकलिंग महात्म्य की रचना कान्ह व्यास ने की।

कुम्भलगढ़ प्रशस्ति व कीर्ति स्तम्भ से भी कुम्भा की राजनैतिक उपलब्धियों के बारे में जानकारी मिलती है।

चित्तौड़ दुर्ग में स्थित कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति को महेश, अत्रि व कवि नामक विद्वानों ने लिपिबद्ध करवाया।

कीर्ति स्तम्भ के निर्माण की योजना जैता तथा उसके पुत्र नापा व पूँजा ने बनाई कीर्ति स्तम्भ का निर्माण 1448 ई. में कुम्भा ने मालवा के महमूद खलजी प्रथम के विरुद्ध विजय की स्मृति में करवाया।

इस स्तम्भ को हिन्दू देवशास्त्र का चित्रित कोश / भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश कहा जाता है।

कीर्तिस्तम्भ नौ मंजिला एवं 122 फीट ऊंचा है।

कीर्ति स्तम्भ पर अरबी में अल्लाह शब्द तीसरी मंजिल पर 9 बार एवं आठवी मंजिल पर 8 बार आया है।

महमूद खलजी प्रथम को सारंगपुर के युद्ध (1437 ई.) में बन्दी बनाकर कुम्भा चित्तौड़ ले आया।

महमूद खलजी ने मोकल के हत्यारे महपा पंवार को शरण दे रखी थी।

1456 ई. में चांपानेरकी सन्धि द्वारा मालवा के महमूद खलजी प्रथम व गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने महाराणा कुंभा के विरुद्ध एक संघ बनाया।

कुम्भा महान् संगीतकार व कुशल वीणावादक भी था।

उसने संगीत पर संगीतराज, संगीत मीमासा, संगीत रत्नाकर आदि ग्रन्थ लिखे।संगीत पर सूड़ प्रबन्ध भी लिखा।

संगीत रत्नाकार की टीका तथा चण्डीशतक की व्याख्या/टीका लिखी।

कविराज श्यामलदास के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग महाराणा कुम्भा ने बनवाये।

इनमें 1458 ई. में निर्मित कुम्भलगढ़ का दुर्ग (राजसमंद जिले में) सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

कुम्भलगढ़ की दीवार 84 किमी लम्बी है जो कि चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दीवार है।

कुम्भलगढ़ का प्रमुख शिल्पी मण्डन था। कुम्भलगढ़ दुर्ग के सबसे ऊंचे भाग पर कुम्भा ने अपना निवास बनवाया जिसे कटारगढ़ कहा जाता है।

मण्डन ने शिल्पशास्त्र पर देवमूर्ति प्रकरण, प्रासाद मण्डन, राजवल्लभ,रूप मण्डन, वास्तुशास्त्र आदि ग्रन्थों की रचना की।

मण्डन के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी और मण्डन के पुत्र गोविन्द ने उद्धार धोरणी, कलानिधि और द्वार दीपिका नामक ग्रन्थों की रचना की।

कुम्भा के समय में रणकपुर का जैन मंदिर, चित्तौड़ में कुम्भस्वामी का मंदिर (मीरा मंदिर) व शृंगार चंवरी मंदिर प्रमुख है।

रणकपुर (पाली) जैन मन्दिर का निर्माण कुम्भा के समय में 1439 ई. में एक जैन व्यापारी धरणक शाह द्वारा कराया गया।

कुम्भा के समय सोमसुन्दर, जयचन्द सूरी व सोमदेव नामक जैन विद्वान भी हुये।

महाराणा कुम्भा की 1468 ई. में इसके पुत्र उदा ने हत्या कर दी।

राणा सांगा (1508-28 ई.) :-

राणा सांगा रायमल के पुत्र एवं कुम्भा के पोते थे।

इनके समय मेवाड़ अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया।

सागा ने बचपन में भाईयों (पृथ्वीराज एवं जयमल) के डर से श्रीनगर (अजमेर) में कर्मचन्द पंवार के यहाँ अज्ञातवास बिताया था।

पृथ्वीराज के द्वारा किये गए हमले में उनकी एक आंख भी गई थी।

1517-18 ई. में घाटोली (खातोली- बून्दी रियासत) के युद्ध में राणा सांगा ने इब्राहीम लोदी को पराजित किया।

वर्तमान में खातोली कोटा जिले में स्थित है।

खातोली के बाद सांगा ने 1518 ई. में बाड़ी (धौलपुर) युद्ध में इब्राहिम लोदी एवं मियां माखन को पराजित किया।

1519 ई. में राणा सांगा गागरोन के युद्ध में मालवा के शासक महमूद खलजी द्वितीय को पराजित कर बन्दी बना चित्तौड़ ले आया।

इस युद्ध में महमूद का पुत्र आसफ खाँ मारा गया।

सांगा ने महमूद खिलजी द्वितीय को परास्त करने की खुशी में चारण हरिदास को चित्तौड़ का सम्पूर्ण राज्य दे दिया था लेकिन हरिदास ने केवल 12 गाँव ही लिए।

सांगा का गुजरात के शासक मुजफ्फर से संघर्ष का कारण इंडर राज्य की गद्दी को लेकर था

मार्च 1527 में राणा सांगा खानवा के युद्ध में बाबर से पराजित हुआ।

घायल होने के कारण बसवा (दौसा) ले जाया गया।

बाबर से पुनः युद्ध करने की जिद्द के कारण कुछ राजपूत सरदारों ने सांगा को इरिची में जहर दे दिया और 30 जनवरी, 1528 को कालपी (झांसी के निकट उत्तरप्रदेश के जालोन जिले में) में इनकी मृत्यु हो गई।

सांगा का माण्डलगढ़ में अन्तिम संस्कार हुआ एवं माण्डलगढ़ में ही इनकी समाधि है।

खानवा युद्ध में बाबर को तोपखाने से काफी मदद मिली।

राणा सांगा के शरीर पर तलवार के 80 घाव लगे हुए थे।

युद्धों में उन्होंने एक टांग, एक आँख व एक हाथ भी खो दिया।

सांगा की मृत्यु के बाद उसकी रानी कर्मावती ने बाबर के पास दूत भेजकर अपने बेटे विक्रमादित्य के लिए उसका समर्थन मांगा था।

मारवाड़

मारवाड़ में राठौड़ शासकों का राज्य था। राठौड़ राष्ट्रकूटों के वंशज थे। इनका मूल पुरुष सीहा था।

चूडा़ (1384-1432 ई.) ने 1394 ई. में मारवाड़ राज्य की नींव डाली, तभी से मारवाड राज्य प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा।

चूड़ा के बाद रणमल एवं जोधा शासक बने।

राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की एवं जोधपुर दुर्ग का निर्माण करवाया।

राव गंगा के पुत्र राव मालदेव के समय मारवाड़ की रियासत अत्यधिक शक्तिशाली थी मालदेव ने 1544 ई. में शेरशाह सूरी से गिरि-सुमेल का युद्ध किया बड़ी मुश्किल से शेरशाह जीता।

शेरशाह ने युद्ध जीतने के बाद कहा कि “मुट्ठी भर बाजरे के लिये मैं हिन्दुस्तान का साम्राज्य लगभग खो चुका था।”

कश्मीर

कश्मीर में सुहादेव ने 1301 ई. में हिन्दू राजवंश की नींव डाली।

1339 ई. में शाहमीर (शाह मिर्जा), जो कश्मीर के राजा का मंत्री था. ने हिन्दू शासक उदयन देव को अपदस्थ करके कश्मीर में मुस्लिम वंश (शाहमीर वंश) की नींव डाली।

उसने जबर्दस्ती अपदस्थ शासक को रानी कोटा देवी से विवाह किया।

वह मूलतः स्वात का रहने वाला था।

शाहमीर कश्मीर का प्रथम मुस्लिम शासक था और इन्दुकोट को राजधानी बनाया।

शाहमीर ने सुल्तान शमसुद्दीन नाम से न्यायपूर्ण शासन किया।

उसने सामन्ती व्यवस्था को समाप्त कर हिन्दू व मुसलमान सेनानायकों को इक्ताएं आवंटित की व तुर्की शासन व्यवस्था प्रचलित की।

उसके चार पुत्रों जमशेद, अलाउद्दीन शिहाबुद्दीन व कुतुबुद्दीन ने एक के बाद एक 46 वर्षों तक शासन किया।

अलाउद्दीन ने राजधानी इन्दुकोट से अलाउद्दीनपुर (श्रीनगर) बनाई।

 शिहाबुद्दीन (1356-1374 ई.) –

इसने संपूर्ण कश्मीर पर प्रभुत्व स्थापित किया।

शिहाबुद्दीन को कश्मीर में मुस्लिम शासन का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

कुतुबुद्दीन (1374-1394 ई.)-

सिकन्दर शाह (1394-1416 ई.)-

कुतुबुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दर शासक बना।

जोनराज ने सिकन्दर शाह को तुरूष्क सूहा कहा है।

सिकन्दर धार्मिक रूप से कट्टर था, उसने सुहाभट्ट नामक ब्राह्मण को अपना प्रधान सेनापति नियुक्त किया।

बाद में सुहाभट्ट ने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

सुहाभट्ट के सुझाव पर सिकन्दर ने कश्मीर के हिन्दुओं (ब्राह्मणों) पर भयंकर अत्याचार किये एवं उन पर जजिया लगाया।

बहुत से मन्दिर नष्ट कर दिये गये व मूर्तियां खंडित कर उन्हें गलाकर सिक्के बना लिये गये। अतः उसे बतशिकन कहा जाता है।

सिकन्दर ने सती प्रथा पर रोक लगाई।

सिकन्दर के समय तैमूर ने कश्मीर पर आक्रमण किया।

इसके काल में ईरानी सूफी सन्त सैय्यद अली हमदानी का पुत्र सैय्यद मुहम्मद हमदानी कश्मीर आया।

सिकन्दर के बाद उसके पुत्र अली शाह (1416-1420 ई.) को गद्दी से अपदस्थ कर अली शाह का छोटा भाई शाह खान सुल्तान बना।

अलीशाह ने वजीर साहू भट्ट के साथ मिलकर सिकन्दरशाह की धर्मान्धता नीति का विस्तार किया।

जैनुल अबीदीन (1420-1470 ई.)-

इसका मूल नाम शाह खान था।

यह अपने पिता सिकन्दर शाह की नीतियों के विरुद्ध उदार व सहिष्णु शासक था।

इसने सिकन्दर द्वारा नष्ट किये गये हिन्दू मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया व कश्मीर से पलायन कर गये ब्राह्मणों को वापस आने के लिये प्रेरित किया।

उसकी उदार नीतियों के कारण उसे कश्मीर का अकबर कहा जाता है।

जैनुल अबीदीन ने गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया, जजिया हटा दिया, हिन्दू भावनाओं का आदर करते हुये सती प्रथा पर प्रतिबन्ध हटा दिया एवं अन्त्येष्टि कर भी हटा लिया।

वह विद्वान व विभिन्न भाषाओं का ज्ञाता था।

वह कुतुब उपनाम से फारसी में कवितायें लिखता था।

उसने शिकायतनामा नामक ग्रन्थ की रचना की।

जैनुल अबीदीन के समय हबीब के नेतृत्व में आतिशबाजी कला एवं तफंग (बंदूक) का विकास हुआ।

उसने महाभारत व राजतरंगिनी का फारसी अनुवाद कराया।

जैनुल अबीदीन को बुडशाह (महान शासक) के नाम से भी जाना जाता है।

उसने कश्मीर में मूल्य नियंत्रण व्यवस्था स्थापित की, अतः उसे कश्मीर का अलाउद्दीन भी कहा जाता है।

जैनुल अबीदीन ने वूलर झील में जैना लंका नामक टापू का निर्माण कराया।

उसने अपने बड़े पुत्र को देश निकाला दे दिया।

हिन्दू श्रेय भट्ट जैनुल अबीदीन का न्यायमंत्री व राजवैद्य था।

जैनुल अबीदीन ने कश्मीर में काँच की बोतल बनाने, कागज बनाने, पुस्तकों पर जिल्द चढ़ाने, बन्दूक व पटाखे बनाने, शाल बनाने, बहुमूल्य पत्थर काटने व पॉलिश करने की कलाओं को प्रोत्साहित किया।

जैनुल अबीदीन यद्यपि महान् योद्धा नहीं था, किन्तु उसने लद्दाख में मंगोल आक्रमणकारियों को पराजित किया। जैनुल अबीदीन संगीत प्रेमी था।

यह जानकर ग्वालियर के राजा मानसिंह ने उसके दरबार में संगीत की दो दुर्लभ पुस्तकें भिजवाई।

यदु भट्ट ने जैन प्रकाश की रचना की जो जैनुल अबीदीन की जीवनी है।

भट्टावतार ने जैन विलास नामक कश्मीर का इतिहास लिखा।

जैनुल अबीदीन की मृत्यु के पश्चात् हाजीखां हैदरशाह एवं हसनशाह शासक बने।

1540 ई. में हुमायूँ के रिश्तेदार मिर्जा हैदर ने कश्मीर को जीता।

1586 ई. में मुगल बादशाह अकबर ने चाक वंश को पराजित कर कश्मीर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

बंगाल

बंगाल को मुहम्मद गौरी के सेना नायक इख्तियारूद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खलजी ने 12वीं सदी के अन्तिम दशक में जीता।

1279 ई. में तुगरिल के विद्रोह को बलबन ने क्रूरता से दबा दिया व अपने पुत्र बुगरा खाँ को बंगाल का गवर्नर बनाया बुगरा खाँ ने दिल्ली से स्वतंत्र नये वंश की नींव डाली।

सल्तनत काल में उत्तरी भारतीय प्रान्तों में सबसे अधिक विद्रोह बंगाल में हुये।

गयासुद्दीन तुगलक ने बंगाल पर प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण हेतु इसे तीन भागों में बांटा जिनकी राजधानियाँ इस प्रकार थी:-

लखनौती (उत्तरी बंगाल), सोनारगाँव (पूर्वी बंगाल) व सतगाँव (दक्षिणी बंगाल)।

मुहम्मद बिन तुगलक के काल में 1338 ई. में उत्तरी बंगाल के गवर्नर अलाउद्दीन ने विद्रोह किया।

1345 ई. में अलाउद्दीन के एक सरदार शमसुद्दीन इलियास खाँ ने सुल्तान शमसुद्दीन इलियास शाह के नाम से गद्दी हथिया ली एवं संपूर्ण बंगाल का शासक बन गया और इलियास वंश की स्थापना की।

बंगाल का विभाजन समाप्त किया। वह बहुत लोकप्रिय हुआ।

फिरोज ने इलियास के समय बंगाल पर प्रथम बार आक्रमण किया।

सिकन्दर शाह इलियास (1357-1389 ई.)-

इसने पाण्डुआ की अदीना मस्जिद का 1368 ई. में निर्माण कराया।

सिकन्दर शाह इलियास एवं फिरोज तुगलक ने कोसी नदी को दोनों राज्यों के बीच सीमा मान लिया।

गयासुद्दीन आजमशाह (1389-1409 ई.) :-

गयासुद्दीन अत्यन्त न्यायप्रिय शासक था।

उसने चीनी सम्राट के दरबार में दूतमण्डल भेजा एवं चीनी सम्राट की मांग पर बौद्ध भिक्षु चीन भेजे।

चीन से भी उसके दरबार में दूतमण्डल आया।

वह प्रसिद्ध कवि हाफिज से पत्र व्यवहार करता था।

गयासुद्दीन के पुत्र शैफुद्दीन हम्जाशाह के काल में राय गणेश नामक जमींदार दरबार में काफी प्रभावी हो गया।

हम्जाशाह की मृत्यु के बाद राय गणेश शासक बना

गणेश ने दनुजमर्दन की उपाधि ली।

बाद में गणेश ने अपने पुत्र जादू के पक्ष में गद्दी त्याग दी। जादु ने इस्लाम ग्रहण कर जलालुद्दीन मुहम्मद शाह के नाम से शासन किया।

जलालुद्दीन ने बृहस्पति मिश्र नामक विज्ञान को संरक्षण दिया, जिसने मेघदूत कुमार संभव, रघुवंश आदि पर टीका लिखी।

1443 ई. में हाजी इलियास के पौत्र नासिरूद्दीन ने पुनः इलियास वंश की स्थापना की।

 रुकनुद्दीन बारबकशाह (1459-1474 ई.) :-

बारबकशाह ने बंगाली साहित्य को प्रोत्साहन दिया।

बारवकशाह के काल में मालाधर बासु ने 1473 ई. में श्री कृष्ण विजय की रचना शुरू की। बारबकशाह ने मालाधर बासु को गुणराज खान को उपाधि व उसके पुत्र को सत्यराज खान की उपाधि प्रदान की। बारवकशाह के काल में कृत्तिवास ने रामायण का बांग्ला अनुवाद किया कृतिवास की रामायण को बंगाल की बाइबिल कहा जाता है।

फरिश्ता के अनुसार उसके पास बहुत अबीसीनियाई दास थे।

उसने सेना में अरबों व अबोसोनियाई दासों को नियुक्त किया।

उसकी मृत्यु के बाद अबीसीनियाई दामों ने राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू किया, जिससे राजनैतिक अस्थिरता हो गई।

1486 ई. में एक अवोसोनियाई दास ने स्वयं को बारबकशाह नाम से सुल्तान घोषित किया।

जलालुद्दीन फतेहशाह इलियास वंश का अन्तिम शासक था।

अलाउद्दीन हुसैनशाह (1493-1519 ई.) :-

इसने नये राजवंश हुसैन वंश की नींव रखी व अबोसोनियाई दासों को निष्कासित किया।

हुसैन शाह बंगाल के मुस्लिम शासकों में श्रेष्ठ व विद्वान था।

वह चैतन्य महाप्रभु का समकालीन था।

उसके बांग्ला साहित्य को प्रोत्साहित किया तथा इसका समय बांग्ला भाषा का स्वर्णकाल था।

उसने हिन्दुओं के प्रति उदार नीति अपनाई व ऊँचे पद दिये। उसने एक हिन्दू को वजीर बनाया।

हुसैन शाह का मंत्री गोपीनाथ बसु, चिकित्सक मुकुन्द दास प्रधान अंगरक्षक केशव क्षत्री तथा टकसाल अधीक्षक अनूप था।

रूप व सनातन नामक दो वैष्णव भाई उसके प्रमुख अधिकारी थे।

हुसैनशाह ने अपने हमनाम जौनपुर के पराजित शर्की सुल्तान को लोदियों के विरुद्ध शरण दी, इसलिए इसे सिकन्दर लोदी से युद्ध करना पड़ा।

हुसैन शाह ने खलीफतुल्ला की उपाधि धारण की। 8.हुसैन शाह ने राजधानी गौड़ से इकदला स्थानांतरित की।

हिन्दुओं के प्रति उदारता के कारण हुसैन शाह को कृष्ण का अवतार नृपति तिलक और जगत भूषण की उपाधियां दी गई।

बाबर ने हुसैनशाह को सैयद कहा था। हुसैनशाह के सेनापति परागंल खाँ ने कविन्द्र परमेश्वर से महाभारत का बांग्ला में अनुवाद करवाया।

मालाधर बसु ने हुसैनशाह एवं नुसरतशाह के संरक्षण में भगवद्गीता का श्रीकृष्ण विजय नाम से बांग्ला में अनुवाद किया।

अलाउद्दीन हुसैन शाह के समय वली मुहम्मद ने छोटा सोना मस्जिद बनवायी।

नुसरतशाह (1519-1532 ई.) :-

नुसरतशाह ने साहित्य व स्थापत्य को संरक्षण दिया।

उसने 1526 ई. में गौड़ में बड़ा सोना मस्जिद व 1530 ई. में कदम रसूल मस्जिद बनवाई।

नुसरतशाह ने भी महाभारत का बंगाली अनुवाद काशीराम से करवाया।

बाबर ने नुसरतशाह को घाघरा के युद्ध में पराजित किया।

गयासुद्दीन महमूदशाह बंगाल का अन्तिम शासक था। शेरशाह सूरी ने इससे 1538 ई. में बंगाल छीन लिया।

इस समय कामरूप की राजधानी कामतपुर थी।

उड़ीसा

उड़ीसा में सूर्यवंशी गजपति राजवंश का शासन था जिसकी स्थापना कपिलेन्द्र गजपति ने अन्तिम गंग शासक भानुदेव चतुर्थ को 1435 ई. में अपदस्थ कर की।

कपिलेन्द्र के बाद क्रमशः पुरुषोत्तम (1470-1497 ई.) और प्रतापरूद्र (1497-1540 ई.) ने शासन किया।

प्रतापरूद्र देव को विजयनगर के कृष्णदेवराय ने तीन बार हराया था, अन्त में प्रतापरूद्र देव ने अपनी पुत्री का विवाह कृष्णदेवराय से कर समझौता कर लिया था।

1541 ई. में भोईवंश ने गजपति वंश का अन्त किया।

अन्त में 1592 ई. में बिहार के सूबेदार मानसिंह ने उड़ीसा विजित कर उसे मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

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