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Morya Samrajya in Hindi – मौर्य साम्राज्य (322 ई.पू. 185 ई.पू.)

मौर्य साम्राज्य (322 ई.पू. 185 ई.पू.) – भारत के समान्य ज्ञान की इस पोस्ट में हम Morya Samrajya in Hindi – मौर्य साम्राज्य (322 ई.पू. 185 ई.पू.) के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और नोट्स प्राप्त करेंगे ये पोस्ट आगामी Exam REET, RAS, NET, RPSC, SSC, india gk के दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है

Table of Contents

मौर्य वंश की जानकारी के स्रोत

साहित्य, ब्राह्मण साहित्य, बौद्ध साहित्य, जैन साहित्य, संगम साहित्य, विदेशी विवरण, पुरातत्व

1. साहित्य

(i) ब्राह्मण साहित्य– कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र पर भट्टस्वामी की प्रतिपदापचिका टीका, सोमदेव कृत कथासरित्सागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, पतंजलि का महाभाष्य, विष्णु पुराण, विष्णु पुराण पर श्रीधरस्वामी की टीका, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, दसवीं शताब्दी का मुद्राराश्वस का टीकाकार ढूंढ़िराज।

मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा चाणक्य की सहायता से नन्द शासक में धनानन्द को अपदस्थ करने एवं पतंजलि के महाभाष्य में चन्द्रगुप्त सभा (परिषद् सभा) का उल्लेख है।

(ii) बौद्ध साहित्य :-

ग्रन्थ– दीपवंश, महावंश, महावंश की टीका वंसत्थपकासिनी (Vamsatthappakasini), दिव्यावदान, महाबोधिवंश, दीर्घनिकाय ।

(iii) जैन साहित्य :-

प्रमुख ग्रन्थ– भद्रबाहु का कल्प सूत्र, हेमचन्द्र का परिशिष्टपर्व ।

(iv) संगम साहित्य :-

मामूलनार रूद्रशर्मन द्वारा लिखित अहनानूर (Agananuru) एवं कपिलर द्वारा लिखित परणार

2. विदेशी विवरण:-

स्ट्रेबो, कर्टिअस, डिओडोरस, प्लिनी, एरियन, जस्टिन, प्लूटार्क, नियार्कस, ओनेसिक्रिटस, एरिस्टोब्युलस आदि यूनानी लेखकों का वर्णन। मेगस्थनीज की इंडिका तो अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसके उद्धरण परवर्ती लेखकों की रचनाओं में उपलब्ध हैं।

3. पुरातत्व:-

महास्थान अभिलेख (बोगरा, बांग्लादेश) एवं सौहगोरा ताम्रपत्र (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश) – इनमें अकाल से सामना करने के लिए अन्न के भंडार के विषय में जानकारी मिलती है। महास्थान अभिलेख में महास्थान को पुण्ड्रनगर कहा गया है।

महास्थान अभिलेख के अनुसार पुण्ड्रनगर के महामात्र को अकाल राहत कार्यों के लिए प्रभारी बनाया गया। यहाँ से शुंगकालीन टेराकोटा (मृण्मूर्ति) आकृतियाँ भी मिली हैं।

सौहगोरा सम्पूर्ण मौर्य काल का एकमात्र लेख है, जो ताम्र-पत्र पर अंकित है।

अशोक के अभिलेख

अशोक के अभिलेख की सर्वप्रथम खोज 1750 ई. में टीफेन्थेलर (Tiefenthaler) ने दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख के रूप में की, परन्तु 1837 ई. में टकसाल अधिकारी जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) ने अशोक के अभिलेखों की लिपि दिल्ली- टोपरा स्तम्भ लेख में पढीं

1915 ई. में सी. बीडन (C. Beadon) ने मास्की में अशोक के लेख की खोज की।

टर्नर ने यह बताया कि सिंहली ग्रन्थ दीपवंश में प्रियदर्शी देवनांप्रिय का प्रयोग अशोक के लिए हुआ है।

अशोक के अभिलेखों में चार लिपियों यथा- ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक (यूनानी) एवं अरामेइक तथा तीन भाषाओं यथा प्राकृत, ग्रीक एवं अरामेइक का प्रयोग हुआ है।

अभिलेखों का प्राचीनतम् से नवीन का क्रम है- लघु शिलालेख, वृहत् (दीर्घ) शिलालेख, स्तम्भ लेख ।

अशोक का सबसे लम्बा अभिलेख भाब्रू लघु शिलालेख है।

अशोक का सबसे छोटा अभिलेख रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख है।

सबसे लम्बा स्तम्भ लेख संख्या-7 है।

अशोक के शिलालेखों से उसके शासन के 8वें वर्ष से 29वें वर्ष तक की घटनाओं की जानकारी मिलती है।

अशोक के अभिलेखों का विभाजन निम्न वर्गों में किया जा सकता है-

  1. शिलालेख
  2. स्तम्भ लेख
  3. गुहालेख

शिलालेख

शिलालेखों को दो भागों में बांटा गया है- 1.बृहत्त 2.लघु

वृहत् या मुख्य शिलालेख (8 स्थान, 14 लेख):-

14 विभिन्न लेखों का समूह आठ अलग-अलग स्थानों से प्राप्त किया गया है।

1.ये स्थान निम्नलिखित हैं:-

स्थान वर्ष खोजकर्ता
2. मानसेहरा (हजारा, पाकिस्तान) 1889ई. कनिंघम
3. गिरनार (गिरनार, गुजरात) 1822ई. कर्नल
4. धौली (पुरी, उड़ीसा) 1837ई. किट्टो
5. जौगढ़ (गंजाम, उड़ीसा) 1850ई. इलियट
6. कालसी (देहरादून, उत्तराखण्ड) 1860ई. फॉरेस्ट
7. सोपारा (थाना, महाराष्ट्र) 1882ई. भगवान लाल
8.एर्रगुडि (कर्नूल, आन्ध्र प्रदेश) 1929ई. अनुघोष

धौली एवं जौगढ़ के शिलालेखों पर 11, 12, 13 नंबर के शिलालेखों के स्थान पर दो पृथक् कलिंग अभिलेख मिलते है।

प्रथम शिलालेख गिरनार संस्करण एवं 13वाँ शिलालेख शाहबाज गढ़ी संस्करण कहलाता है।

सबसे सुरक्षित गिरनार शिलालेख है

लघु शिलालेख (स्थान 18) :-

ये चौदह शिलालेखों के मुख्य वर्ग के अतिरिक्त हैं तथा लघु शिलालेखों को लघु शिलालेख संख्या 1 एवं लघु शिलालेख संख्या 2 में बाँटा गया है।

लघु शिलालेख संख्या 1 में अशोक के व्यक्तिगत जीवन की जानकारी मिलती है।

लघु शिलालेख संख्या 2 से अशोक के धम्म के बारे में जानकारी मिलती है।

ये लघु शिलालेख निम्नलिखित स्थानों से प्राप्त हुए हैं-

  1. रूपनाथ (जबलपुर, मध्य प्रदेश)
  2. गुजर्रा (दतिया, मध्य प्रदेश)
  3. सहसराम (बिहार)
  4. माब्रू (बैराठ, जयपुर)
  5. मास्की (रायचूर, कर्नाटक)
  6. ब्रह्मगिरी (चित्तलदुर्ग, कर्नाटक)
  7. सिद्धपुर (चित्तलदुर्ग, कर्नाटक)
  8. जटिंगरामेश्वर (चित्तलदुर्ग, कर्नाटक) 9. एर्रगुडि (कर्नूल, आन्ध्र प्रदेश)
  9. गोविमठ (मैसूर, कर्नाटक)
  10. पालकिगुण्डु (मैसूर, कर्नाटक)
  11. राजुल मंडगिरी (कर्नूल, आन्ध्र प्रदेश)
  12. अहरौरा (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश)- बनारस से 35 किमी दक्षिण में मगध से पश्चिम की ओर जाने वाले रास्ते पर लगवाया गया था।
  13. सारोमारो (शहडोल, मध्य प्रदेश)
  14. नेट्टूर (मैसूर, कर्नाटक)
  15. उदेगोलम् (बेलारी, कर्नाटक)
  16. सन्नाती (गुलबर्गा, कर्नाटक)
  17. पनगुडरिया (बुधनी, मध्य प्रदेश)

पनगुडरिया लघु शिलालेख में अशोक को ‘महाराज कुमार’ कहा गया है।

सन्नाती से अशोक का नवीनतम् शिलालेख मिला है, जिसमें 12वें एवं 13वें वृहत् शिलालेख के कुछ अंश मिलते हैं।

भाब्रू के दो शिलालेख जयपुर के बैराठ में बीजक की पहाड़ियों से 1837 ई. में कैप्टन बर्ट (Captain Burt) द्वारा खोजे गये। यह अशोक को बौद्ध प्रमाणित करने का सबसे बड़ा अभिलेखीय साक्ष्य है। इसमें बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों बुद्ध, धम्म एवं संघ में आस्था प्रकट करते हैं। 7.भाब्रू अभिलेख वर्तमान में कलकत्ता संग्रहालय में है।

हेनसांग 634 ई. में बैराठ आया था एवं बैराठ में आठ बौद्ध मठों का उल्लेख किया है।

अहरौरा लघु शिलालेख में अशोक 256 रातें स्तूप निर्माण हेतु भ्रमण में बिताने का उल्लेख करता है।

रूपनाथ लघु शिलालेख में अशोक कहता है कि “अभी ढाई वर्ष बीते हैं, जब मैं संकल्पित रूप से एक शाक्य बना हूँ, प्रारम्भ में मैं समर्पित नहीं था, किन्तु पिछले एक वर्ष में मैं संघ के काफी नजदीक आ गया हूँ।”

अशोक का सबसे दक्षिणी अभिलेख एर्रगुडि लघु शिलालेख है।

अशोक के एर्रगुडि लघु शिलालेख में करगिक नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है, जो लेखाधिकारी का कार्य करता था।

सबसे दक्षिणी स्तम्भ लेख अमरावती वृहत् शिलालेख है। अमरावती वृहत् शिलालेख जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिला है।

अशोक के अरेमाइक लिपि एवं भाषा के लघु शिलालेख:

तक्षशिला शिलालेख:- इसकी खोज 1915 ई. में जॉन मार्शल ने की।

लघमान प्रथम (पुल-ए-दरुन्त Pul-i-Daruntch):- इसकी खोज अफगानिस्तान में लम्पक घाटी में 1932 ई. में की गई। सिकन्दर के आक्रमण से पहले अरामेइक / अरेमाइक हखामनी साम्राज्य (Hakhamani Empire) की राजभाषा थी।

लघमान द्वितीयः– ये भी अगफानिस्तान में लम्पक घाटी से खोजा गया।

कन्धार अरामेइक शिलालेख:-

इसकी खोज 1963 ई. में हुई तथा 1966 ई. में आन्द्रे डूपोन्ट सोमर (Andre Dupont Sommer) ने इसे प्रकाशित किया। इसकी खोज अशोक के ग्रीक अभिलेखों के साथ ही हुई थी, जिससे लगता है कि अशोक के ग्रीक एवं अरामेइक अभिलेख जुड़े हुए हैं। यह अशोक द्वारा 260 ई.पू. में लिखवाया गया। कन्चार अरामेइक शिलालेख में भारतीय भाषा के शब्दों को अरामेइक लिपि में लिखा गया है। ये शब्द सातवें वृहत् स्तम्भ लेख में मिलते हैं, जिससे यह शिलालेख अशोक के सातवें वृहद् स्तम्भ लेख का रूपान्तरण लगता है।

कन्धार द्विभाषीय लघु शिलालेख:-

यह कन्धार (Kandahar) के पास शर-ए-कुना (Shar-i-kuna) नामक स्थान से मिला है। यह ग्रीक एवं अरामेइक (Greek and Aramaic) दोनों लिपियों एवं भाषाओं में है। यह शासन के दसवें वर्ष (260 ई.पू.) में लिखवाया गया और अशोक का पहला अभिलेख माना जाता है। इसकी खोज 1958 ई. में हुई। कन्धार द्विभाषीय लघु शिलालेख में अशोक ‘धम्म’ के लिए ‘इउसेबिया’ (Euscbia) शब्द काम में लेता है।

कन्धार के इस द्विभाषीय लघु शिलालेख के अनुसार अशोक के धम्म का प्रभाव बहेलियों (शिकारियों) एवं मछुआरों पर भी पड़ा।

अशोक के ग्रीक लिपि एवं भाषा के लघु शिलालेख-

कन्धार (शर-ए-कुना) द्विभाषीय लघु शिलालेख:- इसका वर्णन ऊपर अरामेइक अभिलेख में कर दिया गया है।

कन्धार ग्रीक शिलालेख:-

यह कन्धार द्विभाषीय लघु शिलालेख से 1% किमी दक्षिण में 1963 ई. में मिला है। यह 45 × 9½ सेमी के पाषाण खण्ड पर है। इसमें बारहवें वृदह शिलालेख का अन्तिम भाग एवं 13वें वृहद् शिलालेख का प्रारम्भिक भाग मिलता है। 13वें वृहद् शिलालेख के भाग में अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के पश्चाताप का ग्रीक भाषा में उल्लेख है।

कन्धार ग्रीक शिलालेख को जर्मन डॉ. सेरिंग (Dr Seyring) द्वारा कन्धार के बाजार से खरीदा गया। इसके बाद यह कन्धार म्यूजियम में रखा गया, लेकिन 1992-94 ई. में कन्धार म्युजियम की लूट के बाद इसका कोई पता नहीं है।

स्तम्भ लेख

स्तम्भ लेख दो प्रकार के प्राप्त हुए हैं- वृहत्त स्तम्भ लेख एवं लघु स्तम्भ लेख।

वृहत्त स्तम्भ लेख (6 स्थान, 7 लेख):-  अशोक के वृहत् स्तम्भ लेखों की संख्या सात है। ये केवल ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में हैं, जो छः भिन्न-भिन्न स्थानों से पाषाण स्तम्भों पर उत्कीर्ण पाये गये है।

दिल्लीटोपरा स्तम्भ लेख-

यह मूलतः अम्बाला (हरियाणा) में था, किन्तु फिरोज शाह तुगलक ने इसे दिल्ली में गड़वा दिया। में केवल दिल्ली-टोपरा स्तम्भ लेख पर सात अभिलेख (1 से 7 तक सभी) पूरे मिलते हैं। अन्य सभी पर केवल 1 से 6 तक ही लेख उत्कीर्ण मिलते हैं।

दिल्ली टोपरा के सातवें स्तम्भ लेख में आजीवकों, निर्ग्रन्थों आदि का संघ के साथ उल्लेख मिलता है।

दिल्ली टोपरा को अशोक की बड़ी लाट, फिरोज शाह तुगलक की लाट, भीमसेन की लाट एवं दिल्ली शिवालिक लाट कहा जाता है।

फिरोज शाह तुगलक ने इसे स्वर्ण स्तम्भ या स्वर्ण मीनार कहा था।

दिल्ली टोपरा पर विग्रहराज चतुर्थ के तीन लेख उत्कीर्ण हैं।

शम्स-ए-सिराज ‘अफीफ’ (Shams-i-Siraj Afif ) की तारीख ए-फिरोजशाही (Tarikh-i-Firozshahi) में उल्लेख है कि फिरोज ने टोपरा एवं मेरठ से दो स्तम्भ मंगवाए, जबकि सीरत-ए-फिरोजशाही (अज्ञात लेखक) में इन स्तम्भों के लाने का सचित्र वर्णन है।

दिल्लीमेरठ स्तम्भ लेख-

  1. मेरठ से फिरोज शाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया।
  2. दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख को अशोक की छोटी लाट कहते हैं।
  3. लौरिया- अरराज स्तम्भ लेख- बिहार के चम्पारन जिले में स्थित है।
  4. लौरिया- नन्दनगह स्तम्भ लेख बिहार के चम्पारन जिले में स्थित है।

इस पर औरंगजेब (Aurangzch) का एक लेख एवं अंग्रेज सर्वेक्षक रियूबेन बरो (Reuben Burrow) का भी लेख है। लौरिया नन्दनगढ़ स्तम्भ लेखों में सबसे सुरक्षित एवं सुन्दर है। इस पर एक नागरी लेख (Nagari inscription) भी है, जिसमें राजा अमर सिंह (Raja Amar Singh) का जिक्र भी है।

  • रामपुरवा स्तम्भ लेख- बिहार के चम्पारन जिले में स्थित इस लेख की खोज 1872 ई. में ए.सी. कार्लाइल (A.C. Carlyle) ने की थी।
  • प्रयाग स्तम्भ लेख- इसे अकबर द्वारा कौशाम्बी से लाकर इलाहाबाद के किले में लगवाया गया।

लघु स्तम्भ लेख:

अशोक की राजकीय घोषणाएँ (Royal stone letter) जिन स्तम्भों पर उत्कीर्ण हैं, उन्हें लघु स्तम्भ लेख कहा जाता है। ये भी केवल ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा हैं। ये निम्न स्थानों से मिले हैं-

  • साँची संघ भेद रोकने संबंधी आदेश
  • सारनाथ- संघ भेद रोकने संबंधी आदेश
  • कौशाम्बी- संघ भेद रोकने संबंधी आदेश

कौशाम्बी के लघु स्तम्भ लेख (इलाहाबाद) में अशोक की रानी कारूवकी (चारूवाकी) द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है। अतः इसे रानी का अभिलेख भी कहा गया है। इसमें अशोक एवं कारूवकी के पुत्र तीवर का भी उल्लेख है।

प्रयाग (कौशाम्बी) लघु स्तम्भ लेख में कौशाम्बी के महामात्रों को संघ भेद रोकने के आदेश दिये गये, जिससे स्पष्ट होता है कि पहले यह कौशाम्बी में लगाया जाना था, परन्तु बाद में प्रयाग में लगा दिया गया। ये अशोक को बौद्ध सिद्ध करते हैं।

रूम्मिनदेई लघु स्तम्भ लेख-

अशोक द्वारा शासन के 20वें वर्ष में इस स्थान की धर्म यात्रा का उल्लेख है तथा उनके द्वारा लुम्बिनी के भूमिकर को घटाकर 1/8 कर दिया गया एवं धार्मिक कर (उदबलिक) से पूर्णतः मुक्त कर दिया। रूम्मिनदेई का पुराना नाम लुम्बिनी था। यह नेपाल की सीमा में है। रूम्मिनदेई लेख में बुद्ध को शाक्यमुनि कहा गया है। ह्वेनसांग के अनुसार रुम्मिनदेई स्तम्भ पर घोड़े की मूर्ति थी, जो कि आकाशीय बिजली से नष्ट हो गयी थी तथा स्तम्भ भी बीच से टूट गया था। वर्तमान में स्तम्भ का निचला भाग सुरक्षित खड़ा है तथा ऊपरी भाग दो हिस्सों में टूटा हुआ है तथा शीर्ष नहीं है। 1.अशोक ने रूम्मिनदेई में प्रस्तर की विशाल दीवार बनवाई और एक स्तम्भ लगवाया।

रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख, जिसे पडरिया लेख (Paderia inscription) भी कहा जाता है, की खोज 1895-96 ई. में एलोइस एंटन फ्यूहरर (Alois Anton Fuhrer) ने की।

निग्लिवा (निगाली सागर) लघु स्तम्भ लेख-

यह मूल रूप से कनकमुनि स्तूप के पास था। इसमें कनकमुनि के स्तूप संवर्द्धन की चर्चा और अशोक द्वारा कनकमुनि स्तूप की यात्रा का उल्लेख है। ह्वेनसांग लिखता है कि उसने यात्रा के दौरान कनकमुनि स्तूप के पास यह स्तम्भ लेख देखा था, जो कि कपिलवस्तु से लगभग 10 किमी दूर था तथा स्तम्भ लेख के शीर्ष पर शेर की मूर्ति थी, लेकिन वर्तमान में इस स्थान पर न तो स्तूप है और न ही स्तम्भ लेख पर शेर की मूर्ति है। यहाँ तक कि स्तम्भ लेख भी रूम्मिनदेई के पास किसी समय लगा दिया गया।

  • निग्लिवा सागर की खोज भी 1895 ई. में एलोइस एंटन फ्यूहरर (Alois Anton Fuhrer) ने की।
  • रुम्मिनदेई एवं निग्लिवा सागर को स्मृति लेख कहा जाता है।
  • राज्याभिषेक के 14वें वर्ष में कनकमुनि स्तूप को दूसरी बार संवर्द्धित करवाया तथा बीसवें वर्ष में कनकमुनि की यात्रा की।
  • निग्लिवा (निगाली सागर) लेख में बुद्ध को कनकमुनि कहा गया है।
  • रूम्मिनदेई एवं निग्लिवा स्तम्भ लेख नेपाल की तराई से प्राप्त हुए हैं।
  • अशोक के सभी अभिलेखों का विषय प्रशासनिक था, केवल रूम्मिन्देई लेख का विषय आर्थिक था। इससे मौर्यकालीन कर नीति की जानकारी मिलती है।

गुहालेख

  • ये केवल ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में हैं।
  • गया जिले में बराबर की पहाड़ी की गुफाओं की दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीर्ण मिले हैं। इनमें अशोक द्वारा आजीवक साधुओं को निवास हेतु गुहादान करने का उल्लेख है।
  • अशोक ने आजीवकों के निवास हेतु तीन गुफाओं का निर्माण करवाया जिनके नाम हैं- कर्ण चौपार, सुदामा तथा विश्व झोपड़ी ।
  • नागार्जुनी गुहालेख अशोक के पौत्र दशरथ ने उत्कीर्ण कराये।
  • मास्की एवं गुजर्रा लेख में अशोक का व्यक्तिगत नाम देवनांप्रिय मिलता है, जबकि नेटूर लेख में अशोक के अपने नाम का उल्लेख मिलता है।
  • तक्षशिला (पाकिस्तान), कन्धार एवं लघमान (लंपक) से अरामेइक लिपि में लिखे गये अभिलेख मिले हैं। लघमान वर्तमान अफगानिस्तान में है।
  • शर-ए-कुना (कन्धार) के द्विभाषीय अभिलेख में यूनानी एवं अरामेइक भाषाओं एवं लिपियों का प्रयोग किया गया है। पुल ए दुरन्त भी शर-ए-कुना के पास है, जहाँ से अशोक का अभिलेख मिला है।
  • केवल शाहबाज गढ़ी एवं मानसेहरा  अभिलेखों की लिपि खरोष्ठी है, किन्तु इन दोनों में भाषा प्राकृत है।
  • एर्रगुडी लघु शिलालेख एकमात्र अभिलेख है जो खरोष्ठी एवं ब्राह्मी दोनों लिपि में है।
  • खरोष्टी लिपि अरामेइक लिपि (ईरान)) से उत्पन्न हुई।
  • ब्राह्मी  लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी, जबकि खरोष्ठी लिपि दाएँ से बाएँ (उर्दू की तरह) लिखी जाती थी।
  • डी. आर. भण्डारकर ने मात्र अशोक के अभिलेखों के आधार पर ही अशोक का इतिहास लिखा है।

अशोक के अभिलेखों को लिखवाने का क्रमः-

वर्ष अभिलेख
10वाँ वर्ष

 

कन्धार द्विभाषीय शिलालेख (ग्रीक एवं अरामेइक)।

लघमान लघु शिलालेख (अरामेइक) । तक्षशिला लघु शिलालेख (अरामेइक ) ।

 

11वाँ वर्ष एवं पश्चात

 

पनगुडरिया, मास्की तथा पालकिगुण्डु के पहले, दूसरे एवं तीसरे नम्बर के लघु शिलालेख ।गोविमठ (गविमठ), बहापुर ( श्रीनिवासपुरी), बैराठ, अहरौरा, गुजर्रा, सासाराम / सहसराम, राजुलमण्डगिरि, एरंगुडि, उदेगोलम्, निट्टर, ब्रह्मगिरि, सिद्धपुर, जटिंगरामेश्वर ।

 

12वाँ वर्ष एवं पश्चात्

 

बराबर गुहालेख।

कन्धार का ग्रीक शिलालेख (इसमें 12वें एवं 13वें वृहत् शिलालेख के अंश मिले हैं।) लघु स्तम्भ लेख- सारनाथ, साँची, इलाहाबाद के संघ-भेद रोकने वाले आदेश/राजाज्ञा।

लुम्बिनी एवं निगाली सागर के लघु स्तम्भ लेख सभी वृहत शिलालेख ।

 

26वाँ एवं 27वाँ वर्ष एवं पश्चात्

 

वृहद् स्तम्भ लेख 1 से 7 तक।

 

 

अशोक के विभिन्न नाम एवं उपाधि

अशोक

 

व्यक्तिगत नाम जिसका उल्लेख मास्की, गुजर्रा, नेट्टूर एवं उदेगोलम अभिलेख में है। सबसे पहले मास्की से 1915 ई. में अशोक का नाम पढ़ा गया।

 

देवानांपिय

 

राजकीय उपाधि
प्रियदर्शी

 

अधिकारिक नाम
मगध का राजा

 

भाब्रू अभिलेख में

 

अशोक मौर्य

 

जूनागढ़ अभिलेख (रूद्रदामन द्वारा लिखित)

 

अशोक वर्द्धन

 

पुराण

यूनानी स्रोतों में अशोक का वर्णन नहीं है।

चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 .पू.)

चन्द्रगुप्त मौर्य को ग्रीक साहित्य में सेण्ड्रोकोट्स या एण्ड्रोकोट्स कहा गया है।

स्ट्रेबो मेगस्थनीज एवं जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सेण्ड्रोकोट्स, एरियन एवं प्लूटार्क ने एण्ड्रोकोट्टस तथा फिलार्कस ने सेण्ड्रोकोप्टस कहा है।

सर्वप्रथम विलियम जोन्स ने सेण्ड्रोकोट्स की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य से की एवं पालिब्रोथा का समीकरण पाटलीपुत्र से किया है।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु चाणक्य सहायता से अन्तिम नन्द शासक धनानन्द को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना की। मुद्राराक्षस में चाणक्य की इस योजना का एवं चन्द्रगुप्त मौर्य का विशिष्ट वर्णन है।

चन्द्रगुप्त मौर्य को प्रथम भारतीय साम्राज्य का संस्थापक, भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम नायक, भारत का मुक्तिदाता कहा जाता है।

ब्राह्मण साहित्य में चन्द्रगुप्त मौर्य को शूद्र जैन एवं बौद्ध साहित्य में क्षत्रिय तथा ग्रीक साहित्य में उसे निम्न कुल का नहीं, बल्कि निम्न परिस्थिति में जन्मा हुआ बताते हैं।

विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में उसे वृषल (निम्न कुल का) कहा गया है।

स्पूनर ने चन्द्रगुप्त मौर्य को पारसिक/ईरानी बताया है।

ढुण्डिराज एवं श्रीधरस्वामी ने चन्द्रगुप्त मौर्य को मुरा नामक महिला से उत्पन्न बताया है।

बौद्ध ग्रन्थ महापरिनिब्बनसुत्त में मौर्यों को पिप्पलीवन के क्षत्रिय बताया गया है।

जब चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य से मिला था, तब वह राजकीलम खेल में व्यस्त था।

पतंजलि के महाभाष्य में चन्द्रगुप्त मौर्य की राजसभा का उल्लेख है।

महावंश के अनुसार कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को जम्बू द्वीप (भारत) का शासक बनाया।

चन्द्रगुप्त मौर्य का विजय अभियान:-

  • इनका प्रथम आक्रमण मगध पर था, जो असफल हुआ, जिसकी जानकारी महाबोधिवंश में वर्णित है।
  • पंजाब विजय एवं मगध पर आक्रमण कर नन्द वंश का अन्त किया,जिसकी जानकारी महावंश की टीका वशंथप्रकाशिनी से मिलती है।
  • नन्द वंश के विरूद्ध रक्तपात से भरे युद्ध का वर्णन मिलिन्द पन्हो में है। इस युद्ध में धनानन्द के अमात्य शकटार ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता की थी।
  • मुद्राराश्वस में वर्णित है कि ‘चन्द्रगुप्त का साम्राज्य चतुः समुदुपर्यन्त था।
  • अहनानूर में वर्णन है कि मौयों ने एक विशाल सेना लेकर दक्षिण क्षेत्र में राजा मोहर पर आक्रमण किया। इस अभियान में कौशर एवं वाडुगर नामक जातियों ने मौर्यों की मदद की थी।
  • प्लूटार्क एवं जस्टिन के अनुसार ‘चन्द्रगुप्त ने सम्पूर्ण भारत पर अधिकार कर लिया था।’
  • प्लूटार्क एवं जस्टिन ने चन्द्रगुप्त की सिकन्दर से भेंट का उल्लेख किया है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के बारे में कहा जाता है कि उसने समुद्रों के मध्य की भूमि को जीता था।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने दूरी निर्देशक प्रस्तर स्थापित करवाए।
  • यूनानी लेखक प्लूटार्क के अनुसार ‘चन्द्रगुप्त मौर्य ने छः लाख की सेना लेकर संपूर्ण भारत को रौंद डाला।’

सेल्यूकस से युद्धः-

305 ई.पू. चन्द्रगुप्त मौर्य ने सीरिया के ग्रीक शासक सेल्यूकस ‘निकेटर’ को परास्त किया। सन्धिस्वरूप सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त से किया, चार प्रान्त एरिया (हेरात), अराकोसिया (कन्धार), जेड्रोसिया (बलुचिस्तान/मकरानतट) तथा पेरोपनिसडाई (काबुल) दहेज में दिये तथा मेगस्थनीज को अपने राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा। बदले में चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को 500 हाथी दिये। सेल्यूकस के साथ हुए चन्द्रगुप्त के इस युद्ध एवं सन्धि का वर्णन एप्पियानस, स्ट्रेबो एवं प्लुटार्क ने किया है।

एप्पियानस एवं स्ट्रेबो ने इस वैवाहिक संबंध का वर्णन किया है। विशाखदत्त के नाटक मुद्राराक्षस में भी इस युद्ध एवं हेलन से चन्द्रगुप्त के विवाह का वर्णन है।

“चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तर पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत तक अपनी सीमा का विस्तार कर सर्वप्रथम भारत की वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त किया, जिसके लिए 18वीं-19वीं शताब्दी में अंग्रेज भी संघर्षरत रहे।” यह कथन विन्सेन्ट स्मिथ का है।

चन्द्रगुप्त ने प्रारम्भिक साम्राज्य विस्तार में हिमालय क्षेत्र के पर्वतक नामक शासक से सहायता प्राप्त की।

दक्षिण में उसका साम्राज्य मैसूर तक फैला हुआ था तथा अपने अन्तिम समय में चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन मुनि भद्रबाहु से दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला (मैसूर) में 298 ई.पू. सल्लेखण (उपवास) द्वारा देह का त्याग किया।

परिशिष्ट पर्व के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म स्वीकार किया।

उसकी दक्षिण विजय की जानकारी तमिल ग्रन्थ अहनानूर से होती है।  मामूलनूर/मामूलनार रूदशर्मन नामक संगमकालीन कवि इस ग्रन्थ का लेखक था।

चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन के अन्तिम वर्षों में मगध में 12 वर्षों तक भीषण अकाल पड़ा, जिसकी पुष्टि जैन ग्रन्थों से होती है। चन्द्रगुप्त मौर्य के महास्थान एवं सौहगरा अभिलेख भी अकाल से निपटने के प्रबन्धों (राशनिंग प्रणाली) पर प्रकाश डालते हैं।

महास्थान अभिलेख से चन्द्रगुप्त की बंगाल विजय की पुष्टि होती है।

महास्थान अभिलेख में काकिणी (काकिनो) नामक मुद्रा का उल्लेख भी मिलता है।

चन्द्रगुप्त मौर्य के सौराष्ट्र के गवर्नर (राष्ट्रीय) पुष्यगुप्त वैश्य ने इतिहास प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण कराया। इससे चन्द्रगुप्त के पश्चिम भारत पर प्रभाव की जानकारी मिलती है

मौर्य की चन्द्रगुप्त संज्ञा का प्राचीनतम् अभिलेखीय साक्ष्य रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है।

बिन्दुसार (298 ई.पू. से 274 ई.पू.)

बिन्दुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था। बिन्दुसार को वायु पुराण में मद्रसार तथा जैन ग्रन्थों में सिंहसेन कहा गया है। जैन ग्रन्थों के अनुसार बिन्दुसार की माता का नाम दुर्धरा था। विन्दुसार का सीजेरियन तकनीक (सर्जरी) से जन्म हुआ था।

यूनानी लेखों में इसे अमित्रोकेडस एवं स्ट्रेबो ने अलित्रोकेडस कहा है, जबकि पंतजलि के महाभाष्य में अमित्रघात नाम है।

मौर्य शासक बिन्दुसार के विभिन्न नाम

नाम स्रोत
अमित्रोचेट्स

 

यूनानी लेखक

 

अमित्रघात

 

संस्कृत ग्रन्थ (पतंजलि)

 

अमिट्रोकेड्स

 

स्ट्रेबो

 

मद्रसार वायु पुराण

 

सिंहसेन

 

जैन ग्रन्थ

 

बिन्दुपाल

 

फा प्येन चुलीन (चीनी ग्रंथ)

 

यूनानी शासकों से सम्बन्धः-

प्लिनी के अनुसार मिस्र के शासक टालमी द्वितीय ‘फिलाडेल्फस’ ने डायनोसिस (डायोनिसिस) नामक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा।

टालमी द्वितीय ‘फिलाडेल्फस’ ने सिकन्दरिया में भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद को सुरक्षित रखने हेतु एक पुस्तकालय की स्थापना की।

स्ट्रेबो के अनुसार सीरिया के शासक एण्टियोकस प्रथम ने डायमेकस नामक दूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा।

डाइमेकस मेगस्थनीज के बाद नियुक्त होने वाला दूसरा राजदूत था।

एथीनियस नामक यूनानी लेखक के अनुसार बिन्दुसार ने सीरिया के शासन एण्टियोकस प्रथम को मैत्रीपूर्ण पत्र लिखकर तीन वस्तुओं की माँग की, जो हैं:-

  1. मदिरा
  2. सूखी अंजीर
  3. दार्शनिक

सीरियाई शासक ने दार्शनिक के अलावा अन्य वस्तुएँ भिजवा दी तथा दार्शनिक के बारे में यह कहा कि यूनानी कानून के अनुसार दार्शनिक का विक्रय नहीं किया जा सकता।

तक्षशिला विद्रोहः-

दिव्यावदान के अनुसार बिन्दुसार के समय तक्षशिला में दो विद्रोह हुए, जिनके दमन हेतु प्रथम बार अशोक उस समय तक्षशिला का गवर्नर सुसीम था और दूसरी बार विद्रोह का दमन करने सुसीम को भेजा गया।

तक्षशिला का प्रथम विद्रोह जनता का एवं दूसरा राजदरबार के षड़यंत्र का परिणाम था। प्रथम विद्रोह के दमन के समय अशोक उज्जैन/अवन्ति के गवर्नर के रूप में गया था।

तारानाथ के अनुसार ‘बिन्दुसार ने 16 प्रदेशों पर विजय पाई एवं अपना साम्राज्य एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक फैलाया।’

महावंश के अनुसार बिन्दुसार ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। उसने 60 हजार ब्राह्मणों के प्रति उदारता दिखाई।

बिन्दुसार आजीवक धर्म का अनुयायी था। चाणक्य बिन्दुसार का भी प्रधानमंत्री था। चाणक्य के बाद राधागुप्त प्रधानमंत्री बना। दिव्यावदान के अनुसार बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मंत्रिपरिषद् थी, जिसका प्रधान खल्लाटक था।

अशोक (273 ई.पू. से 232 ई.पू.)

सिहली अनुश्रुति ( महावंश) के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर सिंहासन प्राप्त किया। चार वर्ष तक चले इस उत्तराधिकार युद्ध के पश्चात् अशोक ने 269 ई.पू. विधिवत राज्याभिषेक करवाया।

महाबोधिवंश एवं तारानाथ के अनुसार सत्ता प्राप्ति हेतु अशोक ने गृहयुद्ध में अपने भाइयों की हत्या कर दी।

बिन्दुसार ने अशोक के बड़े भाई सुसीम को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, लेकिन अशोक प्रधानमंत्री राधागुप्त की सहायता से सम्राट बनने में सफल रहा। उसने राधागुप्त को अपना प्रधानमंत्री बनाया।

आजीवक मुनि पिंगलवत्सजीव (बिन्दुसार के दरबार भविष्यवाणी की थी कि अशोक राजसिंहासन पर बैठेगा। 5.अशोक को भाब्रू शिलालेख में मगधाधिराज (मगध का राजा) कहा गया है।

कनगनहल्ली लेख में रान्यो/राजा अशोक कहा है।

अशोक ने गुजर्रा अभिलेख में स्वयं को राजा अशोक कहा है।

अशोक को धर्मराज भी कहा गया है।

पुराणों में अर्थात विष्णु पुराण में अशोक वर्धन कहा गया है।

अशोक को उज्जैनीकरमोली भी कहा गया है।

अशोक के जीवन की प्रारम्भिक जानकारी बौद्ध ग्रन्थों दिव्यावदान एवं सिंहली अनुश्रुति से मिलती है।

बौद्ध ग्रन्थों में अशोक की माता का नाम सुभद्रागी मिलता है। अन्य नाम धर्मा एवं जनपद कल्याणी थे। वह चम्पा के ब्राह्मण की बेटी थी।

अशोक की माता सुभदांगी आजीवक धर्म की अनुयायी थी। आजीवक जनसान उसके कुलगुरु थे।

अभिलेखों में अशोक को ईरानी शैली में देवनांप्रिय तथा देवनांपियदस्सि जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है।

अशोक को अभिलेख लगवाने का विचार ईरानी शासक दारा से मिला तथा दारा की भाँति उसने ‘देवनांप्रिय’ जैसी उपाधियाँ धारण की। अशोक के अलावा उसके पौत्र दशरथ तथा श्रीलंका के शासक तिस्स ने भी देवनाप्रिय की उपाधि धारण की।

देवनाप्रिय की उपाधि धारण करने वालों प्रथम अजातशत्रु फिर अशोक,तिस्स, दशरथ आदि हैं, जबकि प्रियदर्शी की उपाधि चन्द्रगुप्त मौर्य एवं अशोक ने धारण की।

मास्की, गुजर्रा, निट्टूर एवं उदेगोलम के अभिलेखों में ही अशोक नाम मिलता है। सर्वप्रथम मास्की अभिलेख में अशोक का नाम पढ़ा गया है।

बुद्धघोष द्वारा रचित सामन्तपासादिका एवं सुमंगल विलासिनी से एवं आर्यमंजूश्रीमूलकल्प से अशोक के जीवन की घटनाएँ मिलती हैं।

अशोकावदानमाला में उपगुप्त द्वारा अशोक को दिये गये धर्मोपदेश की जानकारी मिलती है।

राज्याभिषेक से पूर्व अशोक उज्जैन का गर्वनर था।

राजतंरगिणी के अनुसार अशोक ने वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे श्रीनगर की स्थापना की तथा अशोक शिव का उपासक था। कल्हण अशोक को कश्मीर का प्रथम मौर्य शासक बताता है।

सारनाथ लेख के अनुसार नेपाल अशोक के साम्राज्य में था।

अशोक की पुत्री चारूपती ने नेपाल में देवपतन एवं अशोक ने ललितपतन नगर बसाया।

राज्याभिषेक से संबंधित लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को बुद्धशाक्य कहा है।

अशोक ने मोग्गलिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में तीसरी बौद्ध संगीति बुलाई।

मौग्गलिपुत्ततिस्स ने अभिधम्म पिटक के कथावस्तु की रचना की।

डॉ. स्मिथ के अनुसार अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के स्थलों की तीर्थयात्रा का क्रम- लुम्बिनी, कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, बौधगया एवं कुशीनगर था।

अशोक ने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष अर्थात् 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया, जिसमें करीब एक लाख लोग मारे गये।

कलिंग युद्ध से पूर्व अशोक चण्डाशोक के रूप में विख्यात था

कलिंग युद्ध एवं उसके परिणामों का वर्णन तेरहवें शिलालेख में मिलता है।

अशोक ने कलिंग में दो प्रशासनिक केन्द्र स्थापित किए-

  1. उत्तरी केन्द्र (धौली)-तोसालि
  2. दक्षिणी केन्द्र (जौगढ़) – समपा

प्लिनी के अनुसार अशोक ने व्यापारिक कारणों हेतु कलिंग पर आक्रमण किया।

हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार उस समय कलिंग पर नन्दराज नामक कोई शासक शासन कर रहा था।

असम मौर्य साम्राज्य से बाहर था।

कनगनहल्ली (कर्नाटक) से अशोक की पाषाण पर बनी प्रतिमा नाम के साथ मिली है।

अशोक एवं बौद्ध धर्म –

दीपवंश एवं महावंश के अनुसार अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष निग्रोध नामक भिक्षु ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। मोग्गलिपुत्ततिस्स के प्रभाव में वह पूर्ण रूप से बौद्ध हो गया।

दिव्यावदान के अनुसार बालपण्डित (समुद्र) नामक भिक्षु के प्रभाव के कारण अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया एवं उपगुप्त ने अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।

अशोक ने शासन के दसवें वर्ष में बोधगया की यात्रा की रूम्मिनदेई अभिलेख के अनुसार वह अभिषेक के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी ग्राम गया तथा लुम्बिनी को धर्म कर मुक्त घोषित कर भूमिकर को 1/6 से घटाकर 1/8 कर दिया। राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष अशोक निगालीसागर भी गया तथा 14वें वर्ष कनकमुनि बुद्ध के स्तूप का दूसरी बार संवर्द्धन कर आकार दो गुना किया।

रूम्मिनदेई अभिलेख से मौर्यकालीन कर-नीति एवं अर्थव्यवस्था की जानकारी मिलती है।

भाब्रू शिलालेख में अशोक बुद्ध, धम्म तथा संघ के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करता है। यह अशोक के बौद्ध होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसमें 7 महत्वपूर्ण बौद्ध पुस्तकों की सूची दी गई है।

अशोक ने बौद्ध धर्म का ज्ञान लोगों को कराने के उद्देश्य से बौद्ध ग्रन्थों को भी भाबू शिलालेख में अंकित कराया। 7.मास्की लघु शिलालेख में अशोक ने स्वयं को ‘बुद्धशाक्य’ (बुद्धोपासक) कहा है।

मोग्गलिपुत्ततिस्स ने अशोक के पुत्र महेन्द्र को भी बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।

तारानाथ ने अशोक का धर्म तान्त्रिक बौद्ध एवं उसे मातृदेवी का उपासक बताया है।

स्मिथ के अनुसार अशोक एक साथ भिक्षु एवं सम्राट दोनों था।

इत्सिंग के अनुसार उसने बौद्ध भिक्षु के वेश में अशोक की मूर्ति देखी थी।

अहरौरा अभिलेख के अनुसार अशोक ने 256 रातें धम्मयात्रा में बिताई।

बौद्ध साहित्य में भिक्षुगतिक शब्द का प्रयोग होता है। भिक्षुगतिक का अर्थ है- बौद्ध संघ में प्रविष्ठ होने के लिये उन्मुख होना।

अशोक का धम्म :

अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों एवं नियमों की संहिता प्रस्तुत की है, उसे अभिलेखों में ‘धम्म’ कहा गया है। अशोक ने धम्म की परिभाषा दीर्घ निकाय के ‘राहुलोवाद सुत्त’ (सिंगालोवाद सुत) से ली है।

अशोक का धम्म मूलतः उपासक बौद्ध धर्म था। इसका चरम लक्ष्य स्वर्ग प्राप्ति था।

सातवें अभिलेख में अशोक द्वारा जनता को दिया गया धर्म सन्देश धर्मश्रावण कहलाया।

दूसरे स्तम्भ लेख में अशोक पूछता है कि ‘धम्म क्या है?’ फिर दूसरे एवं सातवें स्तम्भ लेख में इसका उत्तर देते हुए कहता है कि अपासिनव (पाप से मुक्ति), लोगों का कल्याण, दया, दान, सत्य एवं शुद्धि ही धम्म है।’

इन चीजों को व्यवहार में लाने के लिये, प्राणियों को क्षति न पहुँचाना, माता-पिता की सेवा करना, वृद्धों की सेवा, गुरुजनों का सम्मान, मित्रों, परिचितों, ब्राह्मणों तथा श्रमणों से अच्छा व्यवहार, दासों से अच्छा व्यवहार,कम खर्च, कम संचय आदि आवश्यक है।

इसके अलावा क्रोध, निष्ठुरता, घमण्ड, ईर्ष्या आदि पर नियन्त्रण भी आवश्यक है।

अशोक द्वारा धर्मप्रचार हेतु भेजे गये बौद्ध भिक्षु

धर्म प्रचारक

 

देश
मज्झन्तिक

 

कश्मीर तथा गांधार

 

महारक्षित यवन देश

 

मज्झिम

 

हिमालय देश

 

धर्म रक्षित

 

अपरान्तक (पश्चिम भारत)

 

महाधर्म रक्षित

 

महाराष्ट्र

 

महादेव

 

महिष्मंडल (मैसूर)

 

रक्षित

 

बनवासी (उत्तरी कन्नड़)

 

सोन तथा उत्तर

 

सुवर्ण भूमि

 

महेन्द्र तथा संघमित्रा

 

लंका

रोमिला थापर के अनुसार अशोक के धम्म का उद्देश्य देश की राजनैति एकता की प्राप्ति था।

विदेशी शक्तियों (यवन, कम्बोज आदि) का उल्लेख अशोक के 5वें तथा 13वें शिलालेख में मिलता है।

अशोक ने राज्याभिषेक के 13वें वर्ष में धम्म महामात्र की नियुक्ति की।

प्रादेशिक राजुक तथा युक्तों को प्रति पांचवें वर्ष धर्म प्रचार हेतु यात्रा पर भेजा जाता था, जिसे अनुसंधान कहा गया है, जबकि उज्जैन एवं तक्षशिला में प्रति तीसरे वर्ष इन्हें यात्रा हेतु भेजा जाता था।

यूनानी भाषा में धम्म के लिए इउसेबिया शब्द प्रयुक्त हुआ है।

अशोक 600 योजन तक धम्म विजय का दावा करता है।

अशोक के धम्म का स्वरूप

विद्वान उनके विचार

 

फ्लीट

 

राजधर्म
स्मिथ, राधाकुमुद मुखर्जी सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति /सार्वभौम धर्म

 

रमाशंकर त्रिपाठी

 

सार्वभौम धर्म

 

भण्डारकर

 

उपासक बौद्ध धर्म

 

फादर हेरास, मेकफेल

 

ब्राह्मण धर्म

 

रोमिला थापर

 

अशोक का अपना आविष्कार

 

सेनार्ट

 

पूर्णतया बौद्ध धर्म ।

 

नीलकण्ठ शास्त्री

 

नैतिक आचार संहिता

 

 

अशोक का परिवार-

महावंश के अनुसार असन्धिमित्रा (प्रधान महिषी) अशोक की पटरानी थी। दिव्यावदान के अनुसार इसकी मृत्यु के बाद तिक्ष्यरक्षिता पटरानी के बनी, जिसने कुणाल को अन्धा करवा दिया एवं बोधि वृक्ष को भी हानि पहुँचाई।

कुणाल अशोक की एक अन्य रानी पद्मावती का पुत्र था। कुणाल का प्रारम्भिक नाम धर्मविवर्धन था।

अशोक के अभिलेखों में उसकी सिर्फ एक रानी कारूवकी का उल्लेख हुआ है। यह तीवर की माँ थी। अभिलेखों में उल्लिखित अशोक का एकमात्र पुत्र तीवर है।

मौर्य अभिलेखों में उसके पौत्र दशरथ का उल्लेख मिलता है।

अशोक की एक अन्य रानी देवी/महादेवी, जो विदिशा के व्यापारी की पुत्री थी, से महेन्द्र एवं संघमित्रा (पुत्र एवं पुत्री) उत्पन्न हुए।

अशोक ने महेन्द्र एवं संघमित्रा को लंका में धम्म प्रचार हेतु भेजा।

इसके पुत्र महेन्द्र ने थेरवादी (स्थविरवादी) बौद्ध धर्म का श्रीलंका में प्रचार किया।

अशोक का समकालीन लंका नरेश देवनांप्रिय तिष्य था।

तिष्य ने अशोक के दरबार में अपने भतीजे अरिठ्ठा को दूत के रूप में भेजा।

अशोक के उत्तराधिकारी-

वायु पुराण के अनुसार अशोक के बाद कुणाल शासक बना। राजतरंगिणी के अनुसार जालौक कश्मीर का शासक बना।

वायु पुराण एवं मत्स्य पुराण के अनुसार संप्रति से पहले अशोक का दूसरा पौत्र दशरथ (कुणाल का पुत्र) शासक बना। इसकी पुष्टि आजीवकों को दान दी गई नागार्जुनी गुफाओं से भी होती है। दशरथ आजीवक धर्म का अनुयायी था।

डॉ. स्मिथ के अनुसार कुणाल की मृत्यु के बाद संभवतः मौर्य साम्राज्य का विभाजन हो गया। पूर्वी भाग का शासक दशरथ बना तथा पश्चिमी भाग का शासक सम्प्रति बना।

दशरथ की मृत्यु के बाद अशोक का पौत्र एवं कुणाल का पुत्र सम्प्रति 216 ई.पू. में सिंहासन पर बैठा। उसने 207 ई.पू. तक शासन किया। सम्प्रति ने पाटलिपुत्र के अलावा उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।

बौद्ध एवं जैन साहित्य के अनुसार के अनुसार सम्प्रति अशोक का उत्तराधिकारी हुआ।

सम्प्रति को आचार्य सुहस्तिन् ने जैन धर्म में दीक्षित किया।

संप्रति जैन धर्म का अनुयायी था एवं उसके शासन का केन्द्र उज्जैन था।

सम्प्रति की उपाधि त्रिखण्डाधिपति थी।

सम्प्रति के बाद शासक बने शालिशुक को गार्गी संहिता में दुष्टात्मा कहा गया है। इसके समय यवन एण्टियोकस तृतीय का काबुल घाटी पर आक्रमण हुआ।

तारानाथ के अनुसार गांधार का शासक वीरसेन अशोक का पुत्र था।

पुराणों में अशोक के उत्तराधिकारियों के नाम इस प्रकार मिलते हैं-

  1. कुणाल
  2. बन्धुपालित
  3. इन्द्रपालित
  4. दशोन
  5. दशरथ
  6. सम्प्रति
  7. शालिशुक
  8. देवधर्मन
  9. शतधनुष
  10. बृहद्रथ

अशोकावदान के अनुसार बौद्ध संघ को अत्यधिक दान देने के कारण मंत्रियों ने अशोक को अपने पौत्र संप्रति (कुणाल का पुत्र) के पक्ष में सिंहासन छोड़ने को मजबूर किया।

मौर्य वंश का अन्तिम शासक बृहद्रथ था, जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में कर दी। बाणभट्ट का हर्षचरित एवं पुराण इस घटना का वर्णन करते हैं। बृहद्रथ अशोक का सातवाँ उत्तराधिकारी था।

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण

इतिहासकार

 

कारण
1. हेमचन्द्र राय चौधरी अशोक की अहिंसक एवं शान्तिप्रिय नीति

 

2. डी.डी. कौशाम्बी आर्थिक संकट

 

3. हरप्रसाद शास्त्री धार्मिक नीति (ब्राह्मण विरोधी नीति)

 

4. डी. एन. झा

 

कमजोर उत्तराधिकारी

 

5. रोमिला थापर

 

(क) केन्द्रीय प्रशासन

(ख) अप्रशिक्षित नौकरशाही

(ग) राष्ट्रीय चेतना का अभाव

 

6. निहाररंजन रे जनता का विद्रोह।

 

7. आर. एस. शर्मा मगध की नवीन प्रौद्योगिकी का अन्य क्षेत्रों में प्रसार

 

8. राधाकुमुद मुखर्जी ज्येष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार के नियम का होना

 

पॉंच सीमांत यूनानी राजा जहां अशोक ने अपने दूत भेजे

अन्तियोग (सीरिया) एन्टियोकस द्वितीय थियोस

 

तुरमय (मिस्र)

 

टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस

 

एत्तिकिनि या अन्तेकिन (मोसिडोनिया) एन्टिगोनस
मग (सिरीन)

 

मेगस

 

अलिक सुन्दर (एपीरस)

 

अलेक्जेन्डर

 

मौर्य प्रशासन

मौर्य प्रशासन केन्द्रीय राजतन्त्रात्मक प्रशासन था, जिसने पहली बार भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में बांधा। अर्थशास्त्र में राजा को परामर्श दिया गया है कि वह सम्पूर्ण शक्ति को अपने हाथों में ग्रहण करें।

“प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में उसकी भलाई। राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं है वरन् हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे”- अर्थशास्त्र

मौर्य साम्राज्य प्रथम साम्राज्य था, जिसने लोक कल्याणकारी राज्य के स्वरूप को साकार किया।

प्राचीन भारत में सबसे विस्तृत नौकरशाही मौर्यकाल में थी।

अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियन्त्रण सर्वाधिक था।

कौटिल्य ने राज्य के सप्तांग बताये हैं-

  1. राजा
  2. अमात्य
  3. राष्ट्र / जनपद
  4. दुर्ग
  5. बल / दण्ड (सेना)
  6. कोष
  7. मित्र

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में मंत्री परिषद् को एक वैधानिक आवश्यकता बताते हुए कहा है कि “राज्य एक पहिये पर नहीं चल सकता”।

मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को 12,000 पण वार्षिक मिलते थे, जबकि मन्त्रिणः के सदस्यों को 48,000 पण वार्षिक वेतन मिला था। सेवकों एवं अंगरक्षकों को केवल 60 पण वेतन मिलता था। न्यूनतम वेतन 60 पण वार्षिक था।

मन्त्रिण: बहुत ही विश्वसनीय व्यक्तियों की एक अत्यधिक छोटी परिषद् होती थी जिसमें प्रायः तीन-चार व्यक्ति होते थे।

युवराज, प्रधानमंत्री एवं सेनापति का वेतन 48000 पण वार्षिक था।

अशोक के अभिलेखों में मंत्रिपरिषद् को परिषा कहा गया है।

अर्थशास्त्र पहली पुस्तक है, जिसमें कर्मचारियों के नकद वेतन का सुझाव दिया गया है।

केन्द्रीय प्रशासन

राजा को प्रशासन में मदद देने के लिए 18 पदाधिकारियों का एक समूह होता था, जिसे तीर्थ कहा जाता था। ये महामात्य भी कहे जाते थे। सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ मंत्री एवं पुरोहित थे। मंत्रियों की नियुक्ति हेतु इनके चरित्र को जाँचा-परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहते थे।

युक्त तथा उपयुक्त केन्द्रीय तीर्थ एवं अध्यक्षों के नियन्त्रण में कार्य करते थे। इनके द्वारा केन्द्रीय एवं स्थानीय शासन के बीच संपर्क बना रहता था।

मंत्री परिषद् के नीचे द्वितीय श्रेणी के पदाधिकारी थे, जिन्हें अध्यक्ष कहा जाता था। यूनानी स्रोतों में इन्हें मजिस्ट्रेट कहा गया है।

अर्थशास्त्र में उल्लिखित 26 अध्यक्ष

अध्यक्ष कार्य
1. मुद्रा एवं टकसाल का अध्यक्ष लक्षणाध्यक्ष व छापेखाने का प्रमुख

 

यह सिक्के जारी करता था, जबकि रूपदर्शक नामक अधिकारी मुद्रा का परीक्षण करता था।

 

2. पण्याध्यक्ष व्यापार एवं वाणिज्य का अध्यक्ष
3. कुप्याध्यक्ष जंगल की वस्तुओं के निरीक्षण हेतु अधिकारी

 

4. पौतवाध्यक्ष माप एवं तौल का अध्यक्ष
5. शुल्काध्यक्ष चुंगी वसूली के लिये अध्यक्ष

 

6. सूत्राध्यक्ष कटाई, बुनाई एवं वस्त्र उत्पादन गतिविधियों का अध्यक्ष

 

7. आयुधागाराध्यक्ष अस्त्र-शस्त्रों के रख-रखाव के लिये नियुक्त

 

8. सीताध्यक्ष राजकीय कृषि विभाग का अध्यक्ष
9. सुराध्यक्ष  आबकारी विभाग का अध्यक्ष
10. सूनाध्यक्ष बूचड़खाने का अध्यक्ष यह अवध्य पशुओं एवं पक्षियों के संरक्षण का भी कार्य करता था।

 

11.आकराध्यक्ष खानों का अध्यक्ष
12.विविताध्यक्ष चारागाहों का अध्यक्ष
13 नवाध्यक्ष नौ सेना का अध्यक्ष

 

14. गणिक वेश्याओं का निरीक्षक

 

15. संस्थाध्यक्ष व्यापारिक मार्गों का अध्यक्ष

 

16. लवणाध्यक्ष

 

नमक अधिकारी

 

17 मुद्राध्य पासपोर्ट अधिकारी

 

18.गराध्यक्ष भण्डार गृहों का अधिकारी

 

19. स्वर्णाध्यक्ष स्वर्ण उत्पादन एवं शुद्धता के मानकीकरण का अधिकारी

 

20. हस्ति अध्यक्ष हाथियों की देखभाल का अधिकारी अश्वाध्यक्ष एवं गोध्यक्ष भी होते थे।
21. बन्धनागाराध्यक्ष जेल/कारागार का अध्यक्ष

 

22. देवताध्यक्ष धार्मिक संस्थाओं का अध्यक्ष

 

23. लोहाध्यक्ष (अवशालाध्यक्ष) धातु विभाग का अध्यक्ष

 

24. पत्तनाध्यक्ष बन्दरगाहों का अध्यक्ष

 

25. ताध्यक्ष जुआ अधिकारी

 

26. मानाध्यक्ष दूरी एवं समय सके तक से सम्बन्धित है।

 

महामात्रापसरण (महामात्यापसर्प)

 

गुप्तचर खुफिया और सूचना विभाग का अधिकारी होता था।

 

‘प्रशस्त्रि’ नामक अधिकारी भी जेलों की देखभाल करता था।

अर्थशास्त्र में वर्णित अठारह तीर्थों की सूची

1. मन्त्री और पुरोहित
2. समाहर्ता राजस्व का संग्रहकर्ता / आय-व्यय का ब्यौरा रखना

 

3. सन्निधाता कोषाध्यक्ष

 

4. सेनापति युद्ध विभाग का मंत्री

 

5. युवराज राजा का उत्तराधिकारी

 

6. प्रदेष्टा कंटकशोधन (फौजदारी) न्यायालय का न्यायाधीश

 

7. नायक सेना का संचालक

 

8. कर्मान्तिक उद्योग-धन्धों का प्रधान निरीक्षक

 

9. व्यावहारिक धर्मस्थनीय (दीवानी) न्यायालय का न्यायाधीश

 

10. मंत्रिपरिषदाध्यक्ष मंत्री परिषद् का अध्यक्ष

 

11. दण्डपाल सेना की सामग्री जुटाने वाला अधिकारी

 

12.अन्तपाल सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक / मार्ग की सुरक्षा

 

13.दुर्गपाल दुर्गों का प्रबन्धक

 

14.नागरक नगर का प्रमुख अधिकारी

 

15.प्रशास्ता राजकीय कागजों को सुरक्षित रखने एवं

राजकीय आज्ञाओं को लिपिबद्ध करने

वाला अधिकारी

 

16.दौवारिक राजमहलों की देखरेख करने वाला

 

17.अन्तर्वशिक सम्राट की अंगरक्षक सेना का प्रधान

 

18.आटविक वन विभाग का प्रधान

 

अशोक के अभिलेखों में पुरोहित का उल्लेख नहीं मिलता है, जबकि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में यह महत्वपूर्ण था।

प्रान्तीय प्रशासन

मौर्य साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय चार तथा  अशोक के समय कलिंग विजय के साथ पाँच प्रान्त हो गये। प्रान्तों को चक्र कहा जाता था।

प्रान्त

 

राजधानी

 

1. उत्तरापथ (पश्चिमोत्तर) तक्षशिला

 

2. दक्षिणापथ सुवर्णगिरि
3. अवन्ति (पश्चिम प्रान्त) उज्जैन

 

4. मध्यदेश (प्राची-पूर्वी प्रदेश) पाटलिपुत्र
5. कलिंग तोसाली

 

चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्यकुस से प्राप्त चार प्रान्तों को उत्तरापथ प्रान्त में शामिल किया।

प्रान्तों के अन्तर्गत छोटे शासन केन्द्र भी थे, जिनमें कुमार के अधीन महामात्य शासन करते थे।

अशोक ने तक्षशिला, उज्जैन एवं तोसाली में कुमार नियुक्त किये। ये प्रान्तपति थे तथा युवराज होते थे।

प्रान्तों का शासन राजवंश के किसी निकट संबंधी या राजकुमार द्वारा चलाया जाता था।

पाटलिपुत्र के अधीन कौशाम्बी, सुवर्णगिरि के अधीन इसिला, तोसाली के अधीन समापा में महामात्य रहते थे। (ब्रह्मगिरि, मास्की एवं सिद्धपुर अभिलेख में इसिला का उल्लेख है)।

प्रान्तों का विभाजन मण्डल में हुआ था। मण्डल का प्रमुख प्रादेशिक था, जिसे अर्थशास्त्र का प्रदेष्टा कहा गया है। प्रादेशिक समाहर्ता के अधीन कार्य करता था एवं स्थानिक एवं गोप के कार्यों की जाँच करता था।

मौर्य प्रशासन का विभाजन निम्न प्रकार था।

1. साम्राज्य
2. प्रान्त
3. मण्डल (कमिश्नर क्षेत्र)
4. आहार या विषय जिला
5. स्थानीय 800 गाँवों का समूह

 

6. द्रोणमुख 400 गाँवों का समूह

 

7. खार्वटिक 200 गाँवों का समूह

 

8. संग्रहण 10 गाँवों का समूह

 

9. ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई

 

अशोक ने युक्त नामक अधिकारियों की नियुक्ति की। ये केन्द्र तथा स्थानीय शासन के बीच की संपर्क कड़ी थे।

यूनानी लेखकों ने पाटलिपुत्र को पोलिबोधा कहा है। स्ट्रेबो के अनुसार पाटलिपुत्र (पोलिबोथा) की लम्बाई 80 स्टेडिया तथा चौड़ाई 18 स्टेडिया थी। इसमें 64 द्वार एवं 570 बुर्ज थे।

नगर का जनगणना अधिकारी एवं प्रशासक नागरक कहलाता था।

जिला प्रशासन

1.जिले को विषय/आहार कहा जाता था। इसका प्रमुख विषयपति होता था, जिसे मेगस्थनीज ने एग्रोनोमोई कहा है। जिले में ही युक्त, राजुक एवं प्रादेशिक अधिकारी होते थे।

मध्य स्तर

युक्त-युक्त केन्द्र एवं स्थानीय शासन के बीच कड़ी का कार्य करता था एवं लेखाकार एवं राजस्व वसूली का कार्य करता था।

युक्त धन का अपहरण करते थे। अर्थशास्त्र में वर्णित है कि जैसे जल में विचरण करती मछली को जल पीते हुए नहीं देखा जा सकता, उसी प्रकार इन युक्तों को धन का अपहरण करते कोई नहीं जान सकता।

राजुक– ग्रामीण क्षेत्रों की देखभाल हेतु, कर संग्रह एवं न्यायिक शक्तियों ये युक्त अधिकारी। यह सम्भवतः राज्याभिषेक के 27वें वर्ष में नियुक्त किया गया था।

राजुक आधुनिक जिलाधिकारी/जिला कलेक्टर जैसी स्थिति का अधिकारी था, जो राजस्व के साथ न्यायिक कार्य भी करते थे। राज्याभिषेक के 27वें वर्ष में (26 वर्ष बाद) इनको न्यायिक एवं दण्डात्मक अधिकार सौपे गए।

प्रादेशिक– जिलाधिकारी (अर्थशास्त्र का प्रदेष्टश)

प्रादेशिक वर्तमान संभागीय आयुक्त के समान, अर्थशास्त्र का प्रदेष्टा ही प्रादेशिक है।

मध्यवर्ती स्तर / कोटिया जिला एवं गाँव के मध्य होती थी।

अवरोही क्रम था स्थानीय, द्रोणमुख, खार्वटिक, संग्रहण

दस गाँवों का मुखिया (संग्रहण का प्रमुख) गोप होता, जो स्थानिक (स्थानीय का प्रमुख) के अधीन होता था।

गोप लेखपाल एवं जनगणना कार्य भी करता था।

जिले में मध्य स्तर का प्रशासनिक अधिकारी स्थानिक था, जो जिला एवं ग्राम के मध्य स्तर पर कर संग्रहण के उत्तरदायी था।

अन्तपाल द्वारा सीमावर्ती अर्धस्वायत्त राजाओं पर नियन्त्रण रखा जाता था। 8.अपराधों पर नियंत्रण हेतु पुलिस की व्यवस्था भी थी। पुलिस को रक्षिण कहा जाता था।

ग्राम का प्रधान ग्रामिक कहलाता था।

प्रशासनिक अधिकारियों का बढ़ता हुआ क्रमः

गोप– स्थानिक- युक्त- राजुक- प्रादेशिक- विषयपति- समाहर्ता- महामात्य- प्रान्तपति- राजा (बढ़ते क्रम में )

महामात्र– उच्चाधिकारी (महामात्र को केन्द्र में राजा से, प्रांतपति की जानकारी के बिना, सीधे आदेश मिलते थे।) 3.प्रतिवेदक- राजा को सूचना देने वाला अधिकारी।

नगर प्रशासन

कौटिल्य नगर प्रशासन का वर्णन नहीं करता है, जबकि मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र का नगर प्रशासन तीस सदस्यों के एक मण्डल द्वारा जो 6 समितियों में विभक्त था, चलाया जाता था। प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य थे।

  1. प्रथम समिति– उद्योग-शिल्पों का निरीक्षण
  2. द्वितीय समिति– विदेशियों की देख-रेख
  3. तृतीय समिति– जन्म-मरण का रजिस्ट्रेशन/ जनगणना
  4. चतुर्थ समिति– व्यापार एवं वाणिज्य
  5. पंचम् समिति– निर्मित वस्तुओं के विक्रय का निरीक्षण
  6. षष्ठम् समिति– विक्रीकर वसूल करना (1/10 भाग)

मेगस्थनीज नगर अधिकारी को ऐस्टोनोमोई कहता है। एग्रोनोमोई नामक अधिकारी जिले में सड़क एवं भवन निर्माण का काम देखता था।

न्याय व्यवस्था

सम्राट सर्वोच्च एवं अन्तिम न्यायाधीश था।

अर्थशास्त्र में दो प्रकार के न्यायालयों का वर्णन है

धर्मस्थीय– इन्हें दीवानी अदालत कहा जाता था। इसका प्रमुख न्यायाधीश धर्मस्थ / व्यावहारिक होता था।

कण्टक शोधन– ये फौजदारी अदालत तथा राज्य व नागरिकों के मध्य होने वाले विवादों का निपटारा करती थी। फौजदारी मामलों के न्यायाधीश को प्रदेष्टा कहा जाता था।

जनपद के न्यायाधीश को राजुक कहा जाता था।

चाणक्य के अनुसार मौर्य न्याय व्यवस्था के चार प्रमुख अंग थे-

  1. धर्म
  2. व्यवहार (समकालीन विधि संहिताएँ) 3. चरित्र (रीति रिवाज)
  3. राजशासन / रराजाज्ञा

न्याय व्यवस्था के ये चार प्रमुख स्त्रोत थे, जिन्हें चतुष्पाद कानून कहा गया। इन चारों में कौटिल्य ने राजशासन को सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोच्च माना है।

चोरी एवं लूट के मामलों को साहस कहा जाता था। इन्हें धर्मस्थीय न्यायालयों में पेश किया जाता था।

गुप्तचर व्यवस्था

अर्थशास्त्र में गुप्तचर व्यवस्था पर विस्तृत एवं महत्वपूर्ण सूचना मिलती है।

गुप्तचर प्रमुख को महामात्यापसर्प कहते हैं।

अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को गूढ पुरुष कहा गया है।

दो प्रकार के गुप्तचर होते थे-

  • संस्था– एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने वाले गुप्तचर
  • संचारा– भ्रमणशील गुप्तचर

संस्था गुप्तचर पाँच प्रकार के होते थे

  1. कापटिक- दूसरे के रहस्यों को जानने वाला, विद्यार्थी के वेश में रहने वाला गुप्तचर।
  2. उदास्थित- संन्यायी वेशधारी गुप्तचर।
  3. गृहपतिक- गरीब किसान के वेश में रहने वाला गुप्तचर।
  4. वैदेहक – गरीब व्यापारी के वेश में रहने वाला गुप्तचर।
  5. तापस- सिर मुंडाये या जटा धारण किये तपस्वी के वेश में गुप्तचर।

संचारा (भ्रमणशील गुप्तचरों के प्रकार)

  • सत्री- समुद्री विद्या, ज्योतिष, व्याकरण, इन्द्रजाल, वशीकरण तथा नाचने गाने की कला में निपुण गुप्तचर 2.तीक्ष्ण- धन के लिये प्राणों की भी परवाह न कर हर तरह के खतरे में कार्य करने वाला गुप्तचर
  • सरद- अपने बन्धुओं से भी स्नेह न रखने वाला, क्रूर तथा प्रकृति से आलसी गुप्तचर।
  • परिव्राजिका (वृपली, भिक्षुकी)- संन्यासिनी के वेश में गुप्तचर कार्य करने वाली स्त्री।
  • पुरुष गुप्तचरों को सन्ती, तिष्णा तथा सरद कहा जाता था।
  • राजा की व्यक्तिगत सुरक्षा हेतु महिला अंगरक्षिकाएँ होती थी। मेगस्थनीज एवं स्ट्रेबो महिला अंगरक्षकों का उल्लेख करते हैं।
  • महिला अंगरक्षिकाओं को ‘समारानुरागिनी’ कहा जाता था। 8.मेगस्थनीज एवं डियोडोरस ने गुप्तचरों को ओवरसियर्स (एपिस्कोपई ) तथा स्ट्रेबो एवं एरियन ने इंसपेक्टर (एफोरोई) कहा है।
  • विदेशों में नियुक्त होने गुप्तचरों को उभयवेतन कहते थे।

सैन्य प्रशासन

कौटिल्य ने चारों वर्णों के लोगों को सेना में भर्ती होने का विधान दिया है।

सैनिक छावनियों को गुल्म एवं सैनिकों के वेतन को गुल्मदेय कहा जाता था।

कौटिल्य के अनुसार सेना के चार अंग (चतुरंग बल)- पैदल, अश्व, रथ, हाथी

राजा की स्थायी सेना मौलबल कहलाती थी।

मेगस्थनीज के अनुसार सैन्य प्रशासन छः समितियों द्वारा देखा जाता था। प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे। ये छः समितियाँ थी

  1. जल / नौ सेना
  2. यातायात युद्ध एवं रसद सामग्री
  3. पैदल
  4. अश्व
  5. हाथी
  6. रथ।

जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना डाकुओं का गिरोह कहा है।

अन्तपाल नामक अधिकारी सेना का प्रशासन देखता था। इसके अतिरिक्त वह सीमान्त क्षेत्रों में स्थित दुर्गों की देखभाल भी करता था।

नौ सेना का प्रधान नवाध्यक्ष कहलाता था।

सर्वप्रथम ग्रुनवेडेल (Grünwedel) ने यह बताया कि मौयों का वंश चिह्न (Dynastic emblem) मोर था।

सामाजिक स्थिति

मौर्य समाज चार वर्णों में विभक्त था। कौटिल्य ने वर्णाश्रम व्यवस्था को सामाजिक संगठन का आधार माना है।

अर्थशास्त्र में शूद्रों को मलेच्छों से पृथक माना है तथा उन्हें आर्य शूद्र कहा है। 3.अर्थशास्त्र में शूदों को कृषक कहा गया है।

मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात जातियों में बाँटा है-

  1. दार्शनिक
  2. कृषक
  3. शिकारी व पशुपालक
  4. व्यापारी व
  5. यौद्धा (सैनिक)
  6. निरीक्षक / गगुप्तच
  7. मंत्री / सलाहकार / पार्षद।

मेगस्थनीज के अनुसार दार्शनिक दो प्रकार के होते थे-

  1. ब्रोकामेन (गृहस्थ )
  2. सारामेन (संन्यासी)

मेगस्थनीज ने दार्शनिक मण्डलिक एवं सिकन्दर के बीच वार्तालाप का विवरण दिया है।मेगस्थनीज एवं स्ट्रैबों के अनुसार भारत में दास प्रथा नहीं थी।मेगस्थनीज दास प्रथा को इसलिये नहीं देख पाया, क्योंकि दासों की स्थिति सन्तोषजनक थी।

उनके साथ दयापूर्ण व्यवहार होता था तथा उन्हें संपत्ति रखने तथा बेचने का अधिकार भी था।

मेगस्थनीज के अनुसार भारतीयों को लेखन कला का ज्ञान नहीं था।

मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय यूनानी देवता डायोनिसियस (शिव) तथा हेराक्लीज (कृष्ण) की पूजा करते थे।

अर्थशास्त्र में कृषि, पशुपालन तथा वाणिज्य को शूद्रों का धर्म बताया है। शूद्रों को सेना में भर्ती होने का अधिकार भी था।

ब्राह्मणों को अपराध करने पर कोई यातना या सजा नहीं दी जाती थी।

स्त्रियों की दशा ठीक थी। उन्हें विवाह विच्छेद की अनुमति थी, जिसे अर्थशास्त्र में मोक्ष कहा गया है। उन्हें पुनर्विवाह एवं नियोग की अनुमति भी थी।

उच्च वर्ग की स्त्रियाँ, जो घरों के अन्दर रहती थी, उन्हें कौटिल्य ने अनिष्कासिनी एवं सूर्य को न देखने वाली स्त्रियों को असूर्यपश्या कहा है।

छन्दवासिनी एवं आढय विधवाएँ होती थी।

वेश्याओं को रूपाजीवा कहा जाता था। इनके कार्यों का निरीक्षण गणिकाध्यक्ष करता था।

वैश्याओं के संगठन का अध्यक्ष बन्धिकपोषक कहलाता था।

पुरुष गायक एवं नर्तक कलाकारों को रंगोपजीवी तथा ऐसी महिलाओं को रंगोपजीवनी कहा जाता था।

अर्थशास्त्र में सती प्रथा का कोई उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है। 20.प्रवहण एक सामूहिक समारोह था, जिसमें खाने-पीने की चीजों का प्रचुर इस्तेमाल होता था।

कौटिल्य के अनुसार अस्थाई रूप से बंधक एवं आश्रित दास आहितक कहलाते थे।

इसने नौ प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।

कौटिल्य के अनुसार केवल अनार्य (म्लेच्छ, युद्धबन्दी) को ही दास बनाया जा सकता है।

मौर्यकाल की एक महत्वपूर्ण सामाजिक घटना दासों को बड़े पैमाने पर कृषि कार्य में लगाया जाना था। सर्वप्रथम दासों को कृषि कार्य में बुद्ध युग में लगाया गया।

कौटिल्य के अनुसार किसी भी परिस्थिति में आर्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्व एवं शूद्र) दास नहीं बनाया जा सकता। 26.ह्वेनसांग ने कपिशा में अशोक के स्तूप का उल्लेख किया है।

ब्राह्मणों को राज्य से मिलने वाली करमुक्त भूमि को अर्थशास्त्र में ब्रह्मदेय कहा गया है।

ग्रीक लेखकों ने गंगा नदी का उल्लेख उपास्य देवी के रूप में किया है। अर्थशास्त्र ने देवताओं की मूर्तियाँ बनाने वाले शिल्पियों को देवता कारू कहा जाता था।

मौर्यकाल में वैदिक एवं बौद्ध धर्म अधिक प्रसिद्ध थे।

कौटिल्य ने 8 प्रकार के विवाह का उल्लेख किया है।

त्रिपिटकों में चार प्रकार के चिकित्सक बताए गए हैं।

प्रेक्षा तमाशा के लिए लाइसेंस अनिवार्य था।

पतंजलि ने मौयों एवं शुंगों का नागपंचमी उत्सव बताया है।

पतंजलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है।

परिहार शब्द करों में छूट से सम्बन्धित था।

पुण्ड्रवर्धन का साम्य उत्तर बंगाल से है।

मौर्य कालीन अर्थव्यवस्था

राज्य की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य पर आधारित थी, जिसे सम्मिलित रूप से ‘वार्ता’ कहा जाता था। कौटिल्य ने सर्वप्रथम वार्ता को शूद्र वर्ण की सामान्य वृत्ति माना।

मौर्यकाल में पहली बार राजस्व प्रणाली की रूपरेखा तैयार की गई।

मौयों का वित्तीय वर्ष / राजकोषीय वर्ष आषाढ़ (जुलाई) माह से प्रारम्भ होता था।

अर्थशास्त्र में भू-स्वामी को क्षेत्रक कहा गया है। काश्तकार को उपवास कहा जाता था। मेगस्थनीज, स्ट्रेबो एवं एरियन के अनुसार सारी भूमि राजा की होती थी।

भूमि पर अधिकार राजा एवं कृषक दोनों का था।

अर्थशास्त्र के अनुसार दासों को कृषि कार्य में लगाया जाता था। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन था।

अर्थशास्त्र में प्रणय कर (1/3 से 1/4) का उल्लेख है। यह एक आपातकालीन कर था। अर्थशास्त्र में कुल 21 प्रकार के करों का उल्लेख है।

कर मुक्त गांवों को परिहारिका कहा जाता था। जो गाँव सैनिक आपूर्ति करते थे, उन्हें आयुधिका तथा जो गाँव कच्चे माल की आपूर्ति करते थे, उन्हें कुप्य कहा जाता था।

अशोक के रूम्मिनदेई अभिलेख में केवल दो करों का उल्लेख मिलता है- बलि और भाग।

निजी भूमि से प्राप्त आय भाग कहलाती थी एवं राजकीय भूमि से प्राप्त आय सीता कहलाती थी।

राजकीय कृषि विभाग का अध्यक्ष सीताध्यक्ष कहलाता था। अर्थशास्त्र में हल से जोतकर उत्पन्न किये गये पदार्थ को सीता कहा गया है।

मेगस्थनीज के अनुसार भारत में अकाल नहीं पड़ता, जबकि अर्थशास्त्र के अनुसार भारत में अकाल पड़ते थे। अर्थशास्त्र में अकाल के समय राजा द्वारा जनता की भलाई के उपायों का वर्णन है।

,नमक खान, जंगल, शराब, जहाजरानी आदि से संबंधित व्यवसाय राज्य के नियंत्रण में था। जंगल दो प्रकार के थे- हस्तिवन तथा द्रव्यवन ।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में दस प्रकार की भूमियों का वर्णन किया है।

इनमें कुछ भूमि इस प्रकार हैं-

अदेवमातृक– वह भूमि, जिसमें बिना वर्षा के (कृत्रिम साधनों से) भी अच्छी खेती हो सके।

देवमातृक– सिर्फ वर्षा द्वारा खेती पर निर्भर भूमि।

कृष्ट– जुती हुई भूमि

अकृष्ट– बिना जुती हुई भूमि

स्थल– ऊँची भूमि

भूमिकर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। यह उपज का 1/6 भाग होता था।

भूमि पर कुल भूमिकर सिंचाई कर को मिलाकर उपज का ½ भाग था।

उदकभाग (1/5 से 1/3) मौर्यकाल में वसूल किया जाने वाला कृत्रिम सिंचाई कर था।

द्रोण अनाज की माप एवं निवर्तन भूमि माप इकाई थी।

विभिन्न कर निम्न प्रकार थे:-

  1. भाग- कृषकों द्वारा उत्पादित कृषि उत्पादों पर कर
  2. सीता- राजकीय एवं वन्य भूमि से आय पर कर
  3. प्रणय- आपातकालीन कर
  4. बलि- एक प्रकार का भू-राजस्व
  5. हिरण्य- नकद कर
  6. सेतुबन्ध- राज्य की ओर से सिंचाई के प्रबन्ध हेतु कर
  7. विष्टि बेगार (निःशुल्क श्रम)

अन्य कर:

  1. पंकोदसन्निरोधे- सड़क पर कीचड़ फैलाने पर।
  2. वर्तनी- सड़क कर
  3. तरदेय- पुल पार करने पर।
  4. सेतु- फल-फूल-सब्जियों पर
  5. पिण्डकर- सम्पूर्ण गाँव पर सामूहिक

उपयुक्त करो के अतिरिक्त आवागमन के मार्ग, साधनों, चारागाहों आदि पर कर लगते थे।

कौटिल्य चावल की फसल को सर्वोत्तम एवं ईख को निकृष्ट बताते हैं।

प्राकृतिक स्रोतों से सिंचाई सहोदय सेतु एवं कृत्रिम उपायों से सिंचाई आहार्योदक सेतु कहलाती थी।

अर्थशास्त्र में आय के सात साधनों (दुर्ग, राष्ट्र, खनिज, सेतु, वन, ब्रज, वणिक पथ) को राज्य का आय रूपी शरीर कहा है।

मौर्यकाल में हाथीदांत व्यापार विकसित अवस्था में था तथा काशी इसका प्रमुख केन्द्र था। अर्थशास्त्र के अनुसार वार्षिक ब्याज दर 15 प्रतिशत के थी। सर्वाधिक ब्याज दर समुद्र से व्यापार करने वाले व्यापारियों पर थी।

टकसाल के अधिकारियों हेतु कौटिल्य ने सौवर्णिक एवं लक्षणाध्यक्ष के नाम लिये हैं।

आयात कर को प्रवेश्य (20 प्रतिशत) तथा निर्यात कर को निष्क्राम्य कहा जाता था।

सिंचाई पर विशेष ध्यान दिया जाता था। रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के गर्वनर पुष्यगुप्त वैश्य ने सौराष्ट्र में सुदर्शन झील का निर्माण करवाया। अशोक के गर्वनर यवनराज तुषा ने इसकी मरम्मत करवाई थी।

सुदर्शन झील उर्जयन्त एवं रैवतक पहाड़ियों से निकलने वाली पलाशिनी एवं सुवर्ण सिकता नदियों पर स्थित है।

टकसाल का अधिकारी लक्षणाध्यक्ष तथा मुद्रा परीक्षण करने वाला अधिकारी रूपदर्शक कहलाता था। जब लोग स्वयं मुद्रा बनाते थे, तो उन्हें ‘रूपिका’ और ‘परीक्षण’ नामक कर राज्य को देना पड़ता था।

रजुग्राहक नामक अधिकारी खड़ी फसल को मापकर उस पर कर लगाने वाला बन्दोबस्त अधिकारी था।

मौर्यकालीन सिक्के –

  • कार्षापण, पण या धरण,रूप्यरूप – चाँदी का सिक्का
  • सुवर्ण, निष्क- सोने का सिक्का
  • माषक- ताँबे का सिक्का
  • काकणि ताँबे का छोटा सिक्का
  • मौर्यकालीन सिक्के आहत सिक्के (पंचमार्क) थे।
  • वेदिका से घिरा वृक्ष मौर्यकालीन आहत सिक्कों पर प्रतीक है।
  • पण मौर्यकाल में चाँदी का सिक्का था, जिसका भार 3/4 तौला के बराबर होता था।

व्यापार

व्यापार जल एवं थल मार्ग दोनों से होता था। व्यापारी श्रेणियों में संगठित थे। इनका मुखिया श्रेष्ठी कहलाता था। जातकों में 18 प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख है।

व्यापारिक जहाजों का निर्माण भी एक प्रमुख उद्योग था। स्ट्रेबो तथा कौटिल्य के अनुसार जहाज निर्माण पर राज्य का एकाधिकार था।

पश्चिमी भारत में भृगुकच्छ (भड़ौच), सोपारा एवं पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति प्रमुख बन्दरगाह थे।

कौटिल्य के अनुसार स्थल मार्ग की अपेक्षा नदी मार्ग से व्यापार अधिक अच्छा था।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विभिन्न व्यापारिक मार्गों के तुलनात्मक गुणों का विवेचन किया गया है।

तक्षशिला, उज्जैन, काशी, कौशाम्बी, तोसाली, पाटलिपुत्र आदि आन्तरिक व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे।

मिश्र नरेश टालमी ने लाल सागर के तट पर बरनिस नामक बन्दरगाह स्थापित कराया।

मौर्यकाल का सबसे प्रधान उद्योग सूत कातने एवं बुनने का था वस्त्र निर्माण के लिये सरकारी कारखाने भी थे।

अर्थशास्त्र के अनुसार काशी, बंग, पुण्ड, कलिंग, मालवा सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे। काशी एवं पुण्ड्र में रेशमी वस्त्र भी बनते थे। बंग की मलमल विश्व विख्यात थी।

चीनीपट्ट– चीन से आने वाला रेशम 11.पत्रोम- पेड़ के पत्तों या रेशों से बनाये गये वस्त्र

दुकुल– श्वेत एवं चिकना वस्त्र (पेड़ की छाल से)

क्षौम– एक प्रकार का रेशमी वस्त्र

कौसेय– कौटिल्य द्वारा वर्णित एक प्रकार का वस्त्र

श्रेणी न्यायालय का प्रधान महाश्रेष्ठ कहलाता था।

यूनानी लेखक कर्टियस ने श्वेत लोहे की तलवार का उल्लेख किया है तथा यह भी कहा है कि मौर्यकाल में लौह उद्योग अत्यन्त विकसित अवस्था में था।

भारत विदेश में हाथीदांत, मोती, कछुए, सीपिया, रंग, नील एवं वस्त्र निर्यात करता था, जबकि सोना, कीमती वस्त्र, मीठी शराब आयात करता था।

स्थानीय वस्तुओं (देशज) पर 4 प्रतिशत एवं विदेशों से आयातित वस्तुओं पर 10 प्रतिशत विक्रीकर था।

कर्टियस के अनसार भारतीय सन के वस्त्र एवं वृक्षों की छाल का (भोजपत्र) प्रयोग लिखने के लिए करते थे।

स्ट्रेबो के अनुसार भारतीय सन के के टुकड़ों पर लिखते थे।

“भारतीय जो सूती वस्त्र पहनते थे वे श्वेत रंग के थे और अन्यत्र उपलब्ध किसी भी सूती वस्त्र से अधिक चमकदार थे।” -नियार्कस

व्यापारिक मार्ग

आर्थिक एवं प्रशासनिक आवश्यकता हेतु राजमार्गों की जरूरत थी। प्रमुख राजमार्ग निम्न थे-

  • प्रथम मार्ग– उत्तरापथ (पुष्कलावती) से तक्षशिला, श्रावस्ती, पाटलिपुत्र होते हुए ताम्रलिप्ति जाने वाला राजमार्ग। यह सबसे महत्वपूर्ण था। यह मार्ग आजकल ग्राण्ड ट्रंक रोड कहलाता है। यह प्राचीन भारत में सबसे लम्बा व्यापारिक मार्ग था।
  • दूसरा मार्ग– यह पश्चिम में पाटल से पूर्व में कौशाम्बी के समीप उत्तरापथ से मिलता था।
  • तीसरा मार्ग दक्षिण में प्रतिष्ठान से उत्तर में श्रावस्ती तक जाता था।
  • चौथा मार्ग– भृगुकच्छ से उज्जैन होते हुए मथुरा तक जाता था।

मेगस्थनीज ने इंडिका में सिन्ध से पाटलिपुत्र जाने वाले राजमार्ग का उल्लेख किया है।

मौर्यकालीन भौतिक संस्कृति का विस्तार

मौर्यकालीन भौतिक संस्कृति का गंगाघाटी क्षेत्र में विस्तार में लोहे के उपयोग, आहत सिक्कों के उपयोग, उत्तरी काली पॉलिस मृद्भाण्ड के प्रयोग (NBPW), पकी ईंटों तथा मंडल कूपों (वलय कूप) के उपयोग ने उत्तरी पूर्वी भारत में नगरों की संख्या में वृद्धि में योगदान दिया।

पक्की ईंटों तथा मंडल कूपों का प्रयोग भी सबसे पहले मौर्यकाल में दृष्टिगोचर होता था।

पक्की ईंटों ने अधिक स्थाई मकानों के निर्माण में मदद दी।

मंडल कूपों (Ring wells) के निर्माण से पानी के लिये नदी तट पर बस्तियों के निर्माण की परम्परा में परिवर्तन हुआ। अब लोग कुएं खोदकर नदी तट से दूर-दूर के इलाकों में भी बसने लगे। अतः मण्डल कूपों ने पानी की समस्या के समाधान में मदद दी। ये मंडल कूप तंग बस्तियों में शोषगत (Soakage pits) का भी कार्य करते थे।

मौर्यकाल में उत्तरी काली पॉलिश मृद्माण्ड (NBPW) मिले हैं।

उड़ीसा में शिशुपालगढ़ तथा बंगाल में चन्द्रकेतुगढ़ इन मृद्माण्डों के उत्खनन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

मौर्यकालीन कला

कुमारस्वामी ने मौर्य कला को राजकीय कला एवं लोक कला में विभाजित किया।

पाटलिपुत्र/पटना के समीप बुलन्दीबाग से नगर के परकोटे एवं कुप्रहार से 80 स्तम्भ वाले राजप्रसाद के अवशेष मिले हैं। इन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है।

स्पूनर ने कुम्रहार राजप्रसाद को चन्द्रगुप्त मौर्य का एवं अल्तेकर तथा मिश्र अशोक का मानते हैं।

फाह्यान के अनुसार “यह प्रासाद मानव कृति नहीं है, वरन दैवों द्वारा के निर्मित है।”

मेगस्थनीज एवं एरियन के अनुसार इस राजप्रासाद की शानोशौकत का मुकाबला न तो सूसा और न एकबेतना ही कर सकते हैं।

पाटलिपुत्र नगर की लम्बाई 80 स्टेडिया एवं चौड़ाई 18 स्टेडिया थी। इसमें 64 द्वार एवं 570 बुर्ज थे।

बुलन्दीवाग से आरे युक्त लकड़ी का बना रथ का पहिया भी मिला है। 8.मौर्यकाल में काष्ठ के स्थान पर पत्थर का उपयोग शुरू हुआ।

अशोक के स्तम्भ:

अशोक के एकाश्मक स्तम्भ (एक ही पत्थर को तराश कर बनाये। गये) मौर्य कला के सर्वश्रेष्ठ नमूने हैं। इन पर चमकदार पॉलिश है। अशोक को स्तम्भ लगवाने एवं उन पर अभिलेख खुदवाने का विचार अखैमनी (ईरान) के शासक डेरियस या दारा प्रथम (522 ई.पू. से 486 ई.पू.) से मिला। दारा प्रथम ने 516 ई. पू. में भारत पर आक्रमण किया।

इसके स्तम्भों पर पशु आकृतियों को निहाररंजन रे ने यूनानी प्रभाव माना है।

अशोक का प्रथम स्तम्भ बसाढ़ बखिरा (वैशाली) का कोलुहा स्तम्भ है। इसके शीर्ष पर शेर की मूर्ति है, यह बुद्ध के अन्तिम उपदेश की स्मृति में निर्मित है।

फाह्यान ने 6 एवं हेनसांग ने अशोक के 15 स्तम्भों का उल्लेख किया, जबकि वर्तमान में 30 स्तम्भ प्राप्त है।

लौरिया नन्दनगढ़ एवं रामपुरवा स्तम्भ की चौकी पर दाना चुगते हुए हंसो का अंकन है।

रूम्मिनदेई स्तम्भ सबसे छोटा है एवं इसके शीर्ष पर घोड़े की आकृति है। 8.सारनाथ स्तम्भ चौकी/फलक पर पशुओं का क्रम-गज (हाथी), वृषभ (बैल), घोडा, सिंह है।

स्तम्भों को मुख्यतः चार भागों में बाँटा गया है- लाट/यस्टि, अवांगमुखी कमल/उल्टा कमल, चौकी, शीर्ष

भारतीय एवं ईरानी स्तम्भों की तुलना:

  1. भारतीय स्तम्भ सपाट हैं तथा नीचे से ऊपर की ओर पतले होते जाते हैं जबकि ईरानी स्तम्भ नालीदार हैं तथा इनकी चौड़ाई एक समान है।
  2. मौर्य-स्तम्भ एक पत्थर से निर्मित हैं, जबकि ईरानी स्तम्भ प्रस्तर खण्डों से निर्मित हैं।
  3. अशोक के स्तम्भ स्वतंत्र रूप से स्थित हैं, जबकि ईरानी स्तम्भ चौकी पर स्थित हैं।
  4. इसके स्तम्भ में शीर्ष पर पशु आकृतियाँ बनाई गई हैं, जबकि ईरानी स्तम्भों में पशु आकृतियाँ नहीं हैं।
  5. अशोक के स्तम्भ स्वतंत्र रूप से लगाये गये हैं, जबकि ईरानी स्तम्भ विशाल भवनों में लगाये गये हैं।
  6. इसके स्तम्भों में पॉलिश अत्यधिक चमकदार है, जबकि ईरानी स्तम्भों में चमकदार पॉलिश नहीं है।
  7. अशोक के स्तम्भों में उल्टा कमल (घंटा) लटकाया गया है, जबकि ईरानी स्तम्भों में ऐसा नहीं है।
  8. अशोक के स्तम्भ उत्तर प्रदेश के चुनार (मिर्जापुर) के बलुआ पत्थर से बने हैं।

स्तम्भों का शीर्ष अलग बना हुआ है तथा शीर्ष पर पशुओं की मूर्तियाँ हैं। शीर्ष का मुख्य अंश घंटा है। इसे अवांगमुखी कमल कहा जाता है। विभिन्न स्तम्भों के शीर्ष पर निम्न पशु हैं-

अशोक के स्तम्भ

 

पशु
सारनाथ स्तम्भ

 

चार सिंह
लौरिया नन्दनगढ़

 

एक सिंह
रामपुरवा स्तम्भ (दूसरा)

 

एक बैल
वैशाली स्तम्भ (बसाढ़/ कोलुहा)

 

एक सिंह
संकिसा स्तम्भ

 

एक हाथी
सांची स्तम्भ

 

चार सिंह

रामपुरवा के प्रथम स्तम्भ पर एक सिंह बैठाया गया है। यह लेख युक्त है।

कौशाम्बी, रामपुरवा, वैशाली तथा संकिसा के स्तम्भ लेख-विहीन है।

लोरिया अरराज, कोशाम्बी स्तम्भ लेख शीर्ष विहीन हैं।

अशोक के एकाश्मक स्तम्भों का सर्वश्रेष्ठ नमूना सारनाथ के सिंह स्तम्भ का शीर्ष है, जिसमें चार सिंह पीठ सठाये बैठे है तथा एक चक्र धारण किये हुए हैं। यह चक्र बुद्ध द्वारा धर्मचक्रप्रवर्तन का प्रतीक है। आधुनिक भारत का राष्ट्रीय चिह्न भी सारनाथ के स्तम्भ से लिया गया है। इस चक्र में मूलतः 32 तीलियाँ (Spokes) थी।

सांची एवं भरहुत के मूल स्तूप के निर्माण का श्रेय भी अशोक को दिया जाता है।

गुहाकला:

अशोक ने वास्तुकला की नई शैली गुफा निर्माण को शुरू किया। मौर्यकाल में कुल सात गुफाओं का निर्माण हुआ।

बराबर ( पूर्व में गया जिला, वर्तमान जेहानाबाद) की तीन गुफाओं का निर्माण अशोक ने करवाया। इनके नाम कर्ण चौपार, सुदामा तथा विश्वकर्मा (विश्व झोंपड़ी) हैं। सुदामा गुफा एवं विश्वकर्मा गुफा अशोक ने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष एवं कर्ण चौपार राज्याभिषेक के 19वें वर्ष में आजीविकों को प्रदान की।

“A passage to India’ में बराबर की गुफाओं का उल्लेख है। बराबर की पहाड़ियों में लोमश ऋषि की गुफा भी मौर्यकालीन है। इसका निर्माण दशरथ ने करवाया। लोमश ऋषि गुहालेख में दशरथ को देवनाप्रिय कहा गया है।

अशोक के पौत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी पहाड़ियों में आजीविकों को 3 गुफाएँ प्रदान की। इनमें गोपी गुफा प्रसिद्ध है। वापी गुफा तथा पदधिक गुफा अन्य गुफाएँ हैं।

राजगृह के निकट सीतामढ़ी गुफा है। यह किसी पहाड़ी पर नहीं है, बल्कि स्वतंत्र रूप से ग्रेनाइट पत्थर को भीतर से खोदकर बनाया गया है। इसका निर्माण सम्भवतः दशरथ ने कराया था।

लोक कला

मथुरा के परखम ग्राम से प्राप्त यक्ष मूर्ति (यह मणिभद्र कहलाती है), पटना के दीदारगंज से प्राप्त चामर ग्राहिणी यक्षी, बेसनगर से प्राप्त यक्षी, ग्वालियर की मणिभद्र यक्षी की मूर्ति, राजघाट (वाराणसी) से प्राप्त त्रिमुख यक्ष की प्रतिमा, शिशुपालगढ़ से प्राप्त यक्ष की प्रतिमा, विदिशा से यक्षी की मूर्ति।

पटना के बुलन्दीबाग से नर्तकी की। मृणमूर्ति है तथा रथ का एक पहिया मिला है, जिसमें 24 तीलियाँ (Spokes) हैं।

उड़ीसा में धौली में चट्टान को काटकर हाथी की आकृति बनाई गई।

लोहानीपुर (पटना) से दो जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा प्राप्त हुई हैं।

मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ अयोध्या से मिली हैं।

कालसी (देहरादून) से हाथी की मूर्ति मिली है, जिसके नीचे गजतमे लिखा है।

रोपड़ से मौर्यकालीन हाथीदांत की एक मुहर मिली है। इस पर शासक का नाम भदूपालकस लिखा है, जो यहाँ का स्थानीय शासक था।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

कौटिल्य के पिता का नाम चणक होने के कारण चाणक्य कहलाए। हेमचन्द्र कृत अभिधान चिन्तामणि में चाणक्य के 8 नाम मिलते हैं।

पुराणों में उन्हें द्विजर्षभ (श्रेष्ठ ब्राह्मण) कहा गया है। द्रामिल नाम उसके अभिजन होने का सूचक है। उन्हें भारत का मैकियावली एवं वर्णाश्रम धर्म का महान् पोषक कहा गया है।

अर्थशास्त्र की भाषा संस्कृत है। यह गद्य-पद्य मिश्रित सूत्र शैली (अन्य पुरुष शैली) में है। इसमें 6000 श्लोक, 180 प्रकरण, 141 अध्याय एवं 15 अधिकरण हैं।

कौटिल्य ने राजा की दिनचर्या में ‘इतिहास श्रमण’ को आवश्यक बताया है। 5.कौटिल्य ने चार आश्रम बताए हैं।

अर्थशास्त्र प्राचीन भारत में राजकीय एवं सामाजिक व्यवस्था के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत है। अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय चिन्तन की नीतिशास्त्र परम्परा का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। इसमें व्यक्ति के लौकिक आचरण और उसकी उन्नति, राज्य की सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक समस्याओं आदि का विवेचन किया गया है।

अर्थशास्त्र में बताया गया है कि कैसे राज्य को प्राप्त करना तथा सहेजना चाहिए।

1905 ई. में तन्जौर के एक ब्राह्मण ने अर्थशास्त्र की हस्तलिखित पांडुलिपि मैसूर रियासत के पुस्तकालयाध्यक्ष शाम शास्त्री को भेंट की, जिन्होंने 1909 ई. में इस ग्रन्थ का प्रकाशन करवाया। 1915 ई. में अर्थशास्त्र का अंग्रेजी अनुवाद किया गया। कौटिल्य का वास्तविक नाम विष्णुगुप्त शर्मा है, जिसे चाणक्य नाम से भी जाना जाता है। अर्थशास्त्र गद्य-पद्य दोनों का मिश्रण है। अर्थशास्त्र में कुल 15 अधिकरण हैं,

जिनकी विषय-वस्तु निम्नलिखित है-

प्रथम अधिकरण में राज्य की समस्याओं, राजस्व प्रशासन ज्ञान की शाखाओं आदि का सैद्धान्तिक विवेचन है।

दूसरे अधिकरण में राज्य के प्रशासनिक विभागों (तीर्थ एवं अध्यक्ष),संगठनों और पदाधिकारियों का विवेचन है।

तीसरे और चौथे अधिकरण में क्रमशः राज्य की दीवानी और फौजदारी न्यायिक प्रणाली का विवेचन है।

पाँचवें अधिकरण में राजकीय कर्मचारियों के अनुशासन, अधिकारों एवं दायित्वों का वर्णन है।

छठे अधिकरण में राज्य की सात प्रकृतियों या अंगों अर्थात् सप्तांग सिद्धान्त एवं मण्डल सिद्धान्त का विवेचन है।

सातवें अधिकरण में षड्गुण नीति के उद्देश्यों एवं प्रकारों पर विचार किया गया है, ताकि शत्रु, मध्यम एवं उदासीन राज्यों को वश में किया जा सके और विदेश नीति का उल्लेख है।

षड्गुण नीति- संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय, द्वैधीभाव।

आठवें अधिकरण में व्यसनों (घातक दुर्गुण) के निरूपण सम्बन्धी व्यवस्थाओं का विवेचन है।

नवें अधिकरण में विभिन्न आपत्तियों (आक्रमण) से राज्य के बचाव की नीतियों का वर्णन है।

दसवॉं अधिकरण युद्ध नीति के बारे में है।

ग्यारहवाँ अधिकरण शत्रु को भेद डालकर नष्ट करने व उसे वश में करने के बारे में है।

बारहवाँ अधिकरण राजा द्वारा अपनाये जाने वाले रक्षा उपायों पर है। 21.तेरहवें अधिकरण में दुर्ग प्राप्ति के उपायों का निरूपण है।

चौदहवें अधिकरण में शत्रु के नाश के लिए विषैली औषधियों, मन्त्रों आदि का वर्णन है।

पन्द्रहवाँ अधिकरण मुख्यतः पारिभाषिक है। इसमें अर्थशास्त्र के अर्थ की सामान्य विवेचना प्रस्तुत की गई है तथा यह भी बताया गया है कि नन्द राजा को नष्ट करने वाले कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र ग्रन्थ की रचना की है। 24.मेगस्थनीज एवं पतंजलि कौटिल्य के नाम का उल्लेख नहीं करते हैं।

कौटिल्य ने अपने ऊपर आश्रित बच्चों एवं पत्नी की समुचित व्यवस्था किये बिना भिक्षु बनने वालों के लिये दण्ड का विधान किया है।

कौटिल्य ने दैविक विपदाओं को 8 भागों में वर्गीकृत किया है।

अशोक के 14 शिलालेख एवं उनकी विषय-वस्तु

  • धर्म प्रचारक भेजने का उल्लेख 2, 5 एवं 13 वें शिलालेख में है।
  • विदेशी राजाओं/राज्य का उल्लेख 2, 5 एवं 13वें शिलालेख में है।
  • दक्षिण राज्य/संगम राज्यों का उल्लेख 2 एवं 13वें शिलालेख में है।
  • पाँचवें शिलालेख में अशोक ने स्वयं के एवं अपने भाईयों के परिवार का उल्लेख किया है।

प्रथम शिलालेख –

  1. समाज (उत्सव) का निषेध
  2. पशु बलि का निषेध

अशोक लिखता है कि पहले पाकशाला में हजारों जानवर मारे जाते थे। भविष्य में वे भी नहीं मारे जायेंगे।

द्वितीय शिलालेख-

  1. सीमान्त राज्यों (चोल, पाण्डेय, सतियपुत्र, केरलपुत्र/चेर, श्रीलंका/ ताम्रपणि) का उल्लेख ।
  2. यवन राजा एन्टीयोकस का उल्लेख
  3. पशुओं एवं मनुष्यों के लिए चिकित्सालय बनाना तथा दवाइयों के लिए जड़ी-बूटियों को उगाना।
  4. लोक कल्याण के कार्य जैसे कुएँ खुदवाना, छायादार पेड़ लगवाना।

तृतीय शिलालेख-

  1. अशोक ने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में युक्तों को राजुकों एवं प्रादेशिकों के साथ प्रति पाँचवें वर्ष दौरे का आदेश।
  2. माता-पिता, मित्रों तथा रिश्तेदारों के प्रति आज्ञाकारी होना, ब्राह्मणों श्रमणों को दान देना।
  3. अहिंसा,अल्पसंग्रह एवं अल्पव्यय धम्म के लिए आवश्यक हैं।

चतुर्थ शिलालेख –

  1. रणघोष के स्थान पर धम्म घोष की आवाज
  2. लोगों को दिव्य विमान, हाथी, अग्नि-स्कन्ध आदि दिव्य रूपों के दर्शन।

पाँचवाँ शिलालेख-

  1. राज्याभिषेक के 13वें वर्ष में धम्म-महामात्रों की नियुक्ति
  2. यवन, कंबोज, गंधार, रिष्ठिक, पेत्तनिक आदि जनपदो एवं जातियों का उल्लेख ।

छठा शिलालेख –

  1. अशोक ने प्रतिवेदकों को स्पष्ट आदेश दिया कि चाहे वह कहीं भी हो, चाहे खाना खा रहा हो या अन्तःपुर में हो, उसे प्रतिवेदक प्रजा कार्यों की सूचना देते रहें।

सातवाँ शिलालेख

इसमें लोगों को धर्म श्रावण के सन्देश दिये गये है। जैसे:-

  1. सभी धर्मों के लोग सभी स्थानों पर रहें।
  2. सभी पंथो के मध्य आत्म नियन्त्रण (आत्म संयम) एवं मन को पवित्रता (आत्म शुद्धि) होनी चाहिए।

आठवाँ शिलालेख-

  1. शासन के दसवें वर्ष में विहार यात्रा (आखेट) के स्थान पर धम्म यात्रा की शुरूआत, जिसमें ब्राह्मणों, संन्यासियों तथा लोगों से मिलन, धर्म वार्ता करना एवं उनके धम्म संबंधी प्रश्नों का उत्तर दिया जाता था।

नवां शिलालेख –

लोग विशेषतः स्त्रियाँ बहुत से सारहीन मंगल करती है। इनके स्थान पर धम्म मंगल (गुरुजनों का सम्मान, ब्राह्मणों-श्रमणों को दान, अहिंसा) करना चाहिए। इस शिलालेख में धम्म मंगल को श्रेष्ठ बताया गया है।

दसवाँ शिलालेख-

इसमें धम्म की श्रेष्ठता पर बल दिया गया है।

ग्यारहवाँ शिलालेख-

धम्मदान साधारण दान से उत्तम है। दासों एवं सेवकों के प्रति उचित व्यवहार, माता पिता की सेवा, मित्रों, परिचितों, ब्राह्मणों श्रमणों के प्रति उदारता एवं अहिंसा ही धम्म-दान (धर्मदान) है।

बारहवाँ शिलालेख-

  1. यह धार्मिक सहिष्णुता का शिलालेख है। इसमें कहा गया है कि सभी संप्रदायों के लोग एक दूसरे सम्प्रदायों के सिद्धान्तों को जानें।
  2. 2. सभी धर्मों के सार की वृद्धि की कामना।
  3. जो मनुष्य अपने धर्म को पूजता है एवं दूसरे के धर्म की आलोचना करता है, वह ऐसा करते हुए अपने धर्म को हानि पहुंचाता है। अतः वाणी पर संयम होना चाहिए। है।
  4. इसमें धर्म महामात्र, स्त्र्याध्यक्ष महामात्र एवं ब्रजभूमिक महामात्र नामक अधिकारियों के नाम मिलते हैं।

तेरहवाँ शिलालेख-

  1. राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में कलिंग विजय
  2. धम्म विजय साधारण विजय से अधिक कल्याणकारी है।
  3. कलिंग विजय में हुए नरसंहार पर पश्चाताप
  4. विदेशी राजाओं- एन्टियोकस, टालमी, एन्टीगोनस, मेगस एवं अलेक्जेन्डर का उल्लेख तथा इन राजाओं के क्षेत्र में भी धम्म विजय का उल्लेख।
  5. दक्षिण में चोल, पाण्ड्य एवं श्रीलंका में धम्म विजय
  6. साम्राज्य के अन्दर भी यवनों, कम्बोजों, नाभकों, नाभपंक्तियों,भोजो, पित्तनिको, आन्ध्रों एवं पुलिन्दों में हर जगह देवनाप्रिय के धम्म के आदेशों की अनुपालना होती है।
  7. देवनाप्रिय को विश्वास है कि जो लोग गलती करते हैं, उन्हें जहाँ तक संभव हो माफ कर देना चाहिए। आटवी जातियों (जंगल में रहने वाली जातियाँ) को, जो अपराध करती हैं, क्षमा करने का आश्वासन दिया गया है एवं दण्ड देने की चेतावनी भी दी गई है।

चौदहवाँ शिलालेख –

1.धम्म अभिलेख राजा प्रियदर्शी द्वारा इसलिए खुदवाये गये हैं कि लोग धम्म के सिद्धान्तों की अनुपालना कर सकें।

2.धौली एवं जौगढ़ में 11, 12, 13 नम्बर के शिलालेखों के स्थान पर दो पृथक कलिंग अभिलेख मिले हैं। ये तोसाली एवं समपा के जिला अधिकारियों को संबोधित किए गये हैं। तोसाली धौली का प्रशासनिक केन्द्र था तथा जौगढ़ का प्रशासनिक केन्द्र समपा था।

प्रथम पृथक कलिंग अभिलेख-

  1. ‘सभी मनुष्य मेरी सन्तान हैं, जिस प्रकार मैं अपनी सन्तान के लिए इहलौकिक एवं पारलौकिक कल्याण की कामना करता हूँ, उसी प्रकार अपनी प्रजा के लिए भी कामना करता हूँ।”
  2. इस अभिलेख की घोषणा तिष्य नक्षत्र में आठवें दिन की गई।
  3. नगर प्रशासकों को आदेश दिया गया है कि लोगों को बिना किसी कारण के न तो बन्दी बनाया जाये और न ही यातना दी जाये। इस उद्देश्य के लिए प्रति पाँचवे वर्ष एक अधिकारी को दौरे पर भेजा जायेगा जो यह देखेगा कि इन आदेशों की सही अनुपालना हो, लेकिन उज्जैन के राजुकुमार को यह आदेश दिया गया कि यह अधिकारी प्रति तीसरे वर्ष दौरे पर जायें। इसी तरह तक्षशिला में भी प्रति तीसरे वर्ष अधिकारी दौरा करके यह सुनिश्चित करेगें कि आदेशों की सही अनुपालना हो।

द्वितीय पृथक कलिंग शिलालेख –

  1. इसमें भी अशोक यह कहता है कि सभी मनुष्य मेरी सन्तान हैं।
  2. सीमान्त क्षेत्रों में अविजित लोगों को भी धम्म का सन्देश पहुँचाने एवं उनका विश्वास जीतने का आदेश अधिकारियों को दिया गया है।
  3. इस अभिलेख की घोषणा तिष्य नक्षत्र के प्रत्येक चौथे माह में की जायेगी।

स्तम्भ लेख

स्तम्भ अभिलेखों की संख्या 7 है। ये अशोक के काल की आखिरी घोषणा मानी जाती है।

प्रथम स्तम्भ लेख-

1.राज्याभिषेक के 26 वर्ष बाद यह धम्म लिपि उत्कीर्ण करवाई। महामात्रों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि ‘धर्मानुसार लोगों का पोषण एवं शासन करो’।

द्वितीय स्तम्भ लेख-

धम्म क्या है/ कियम् च धम्मे?

तीसरा स्तम्भ लेख-

1.”मनुष्य अपने सुकृतों को तो देखता है, परन्तु वह कभी अपने आसिनव (पाप) पर दृष्टि नहीं डालता।”

2.चण्डिये, निठुलिये, क्रोधे, मानो, ईर्ष्या (ईर्ष्या) नामक 5 आसीनव (पाप) बताएँ हैं।

चौथा स्तम्भ लेख-

1.”जैसे एक माँ अपनी सन्तान को एक कुशल धाय को सौंप कर निश्चित हो जाती है, उसी प्रकार मैंने भी राजुकों की नियुक्ति की है।”

2.मृत्युदण्ड प्राप्त लोगों को तीन दिन का प्रायश्चित का समय देने की घोषणा।

3. राजुको को न्यायिक एवं दण्डात्मक अधिकार दिये गये।

नोट- चौथे स्तम्भ लेख से पता चलता है कि अशोक ने मृत्युदण्ड समाप्त नहीं किया था।

पाँचवा स्तम्भ लेख –

1.अशोक ने राज्याभिषेक के 26 वर्ष बाद उन प्राणियों की सूची दी है, जिनकी हत्या करना निषेध किया गया है। इस सूची में 23 पशु-पक्षियों के नाम है।

2. इन 26 वर्षों में 25 बार कैदियों को रिहा किया गया।

छठा स्तम्भ-

1.जनता का हित एवं सुख जिसमें है, उसकी मैं परीक्षा करता हूँ।

सातवाँ स्तम्भ-

  1. धम्म की व्याख्या एवं धम्म प्रसार हेतु किये गये कार्य एवं लोक-कल्याण के कार्यों की जानकारी।
  2. आजीविकों, निग्रन्थों आदि का संघ के साथ उल्लेख मिलता है। यह सिर्फ दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख में मिला है।

अशोक के अभिलेखों के बारे में विभिन्न तथ्य :

कन्धार के द्विभाषीय अभिलेख के अनुसार अशोक के धम्म का प्रभाव शिकारियों एवं मछुआरों पर भी पड़ा।

कौशाम्बी के संघ भेद रोकने संबंधी आदेश में अशोक कहता है कि जो भी संघ में फूट डालने की कोशिश करता है, चाहे वह भिक्षु हो या भिक्षुणी उसे सफेद कपड़े पहना कर संघ से निष्कासित कर दिया जाये।

कौशाम्बी अभिलेख में ही लिखा है कि उपासकों को प्रत्येक उपोसथ दिवस पर आकर इस नियम की अनुपालना करनी चाहिए।

अशोक के ब्रह्मगिरि, जटिंग रामेश्वर एवं सिद्धपुर अभिलेख में कापड़ (चापड़ ) नामक एकमात्र लेखक का नाम मिलता है।

स्वर्णगिरी दक्षिणापथ की राजधानी थी। आजकल यह मास्की के दक्षिण में कनकगिरी नामक कस्बा है।

अशोक के अभिलेख में इशिला नामक प्राचीन नगर सिद्धपुर एवं ब्रह्मगिरी के पास है, जहाँ से अशोक के लघु शिलालेख मिले हैं। इशिला नामक नगर का उल्लेख ब्रह्मगिरि अभिलेख में है।

भाब्रू अभिलेख अशोक का सबसे लम्बा अभिलेख है। इसमें अशोक बुद्ध, धम्म एवं संघ नामक त्रिरत्नों में आस्था प्रकट करता है तथा भाबू अभिलेख ही यह सिद्ध करता है कि अशोक की बौद्ध धर्म में आस्था थी।

एकमात्र कोशाम्बी के लघु स्तम्भ लेख से ही अशोक की एक रानी कारूवकी तथा उसके एक पुत्र तीवर का नाम मिलता है। तीवर तथा कारूवकी के अलावा अशोक के परिवार के अन्य किसी भी सदस्य का नाम अशोक के अभिलेखों में नहीं मिलता।

मौर्यकाल में जनसाधारण की भाषा पालि थी। अशोक की राजभाषा प्राकृत थी एवं अभिलेख भी प्राकृत भाषा में ही खुदवाये।

मौर्यकालीन शब्द एवं उनके अर्थ

1.सीता राजकीय भूमि तथा इस भूमि से प्राप्त आय

 

2.बलि एक प्रकार का धार्मिक कर या चढ़ावा
3.क्षेत्रक भूमि का मालिक

 

4.उपवास काश्तकार
5. रूपजीवा वेश्यावृत्ति कर जीविकायापन करने वाली स्त्रियाँ

 

6.जेठ्ठक शिल्पी संघ का मुखिया

 

7.श्रेष्ठी व्यापारिक संघ का मुखिया

 

8.गहपति  भू-स्वामी

 

9.सेतु फल, फूल, सब्जियों पर लिया जाने वाला कर

 

10.विष्टि बेगार
11.भाग भूमिकर (किसानों की निजी भूमि पर कर)
12.अमात्य उच्च प्रशासनिक अधिकारियों का वर्ग
13.रज्जु भूमि माप के समय लिया जाने वाला कर

 

14.उद्रंग सिंचाई कर

 

15.प्रणय आपातकालीन कर

 

16.सेनाभक्तम सेना कर जो सेना के प्रयाण के समय तेल व चावल के रूप में लिया जाता था।

 

17.हिरण्य नकद कर, जो अनाज के रूप में नहीं लिया जाता था।

 

18.राष्ट्र अन्य साधनों से प्राप्त राजस्व

 

19.पौर राजधानी का शासक

 

20.अक्षपटलाध्यक्ष महालेखा पाल

 

21.महामात्यापसर्प गुप्तचर विभाग का अध्यक्ष

 

22.वार्ता कृषि, पशुपालन एवं व्यापार का सम्मिलित रूप

 

23.पथिकर समाहर्ता द्वारा वसूल किया गया अतिरिक्त कर

 

24.विवीत पशुओं की रक्षा के लिए वसूला गया कर

 

25.रक्षित पुलिस (अर्थशास्त्र के अनुसार)

 

26.कौष्ठेयक सरकारी जलाशय से सिंचित भूमि से लिया जाने वाला कर

 

27.सार्थवाह व्यापारियों का काफिला

 

28.परिहीनक सरकारी भूमि पर पशुओं द्वारा हानि पहुँचाने पर लिया जाने वाला कर

 

29.पिण्डकर पूरे गाँव से वर्ष में एक बार वसूला जाने वाला कर

 

30.औपायनिक विशेष अवसरों पर राजा को दी जाने वाली भेंट

 

31.पश्र्व अधिक लाभ होने पर व्यापारियों से लिया जाने वाला

 

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