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राजपूतों की उत्पत्ति (Rajputo ki Utpatti)

राजपूतों की उत्पत्ति (Rajputo ki Utpatti)

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राजपूतों की उत्पत्ति (Rajputo ki Utpatti)

हूणों के आक्रमण के कारण साम्राज्य के पतन के पश्चात गुप्तोत्तर काल में पाटलिपुत्र के स्थान पर कन्नौज का राजनैतिक सत्ता के केन्द्र के रूप में उदय हुआ। कन्नौज को सम्राटों की क्रीड़ा स्थली भी कहा जाता है।

  • डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इस समय को ‘राज्य के अन्दर राज्यों का काल’ कहा है।
  • सामन्तवाद का उत्कर्ष इस काल की प्रमुख विशेषता थी, जिसने प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा दिया और देश की राजनैतिक एकता को नष्ट कर दिया।
  • एक शक्तिशाली राजवंश के स्थान पर इस युग में उत्तर भारत में अनेक में राजपूत राजवंशों ने शासन किया। इसलिए इस युग को राजपूत युग भी कहा जाता है।
  • राजपूत शब्द का प्रयोग नवीं शताब्दी से पूर्व नहीं हुआ है। राजपूत संस्कृत शब्द राजपुत्र का अपभ्रंश है।

राजपूत युग एवं राजपूतों की उत्पत्ति

गुत्तोत्तर काल के पश्चात् जहाँ भारत में राजनीति के क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति का जन्म हुआ।

सातवीं शताब्दी के आस-पास उत्तरी भारत में छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों का निर्माण हुआ।

स्मिथ के अनुसार ‘हर्ष की मृत्यु के बाद से तुर्कों के आधिपत्य तक राजपूत इतने प्रभावशाली हो गये थे कि सातवीं शताब्दी (647 ई.) से 12वीं शताब्दी (1191-92 ई.) तक काल को राजपूत काल कहा जाता है।’

राजपूत / रजपूत शब्द संस्कृत के राजपुत्र शब्द का विकृत रूप है।

श्री जगदीश गहलोत के अनुसार (पुस्तक- राजपूताने का इतिहास 1937 ई.) मुसलमानों के आगमन या आक्रमण तक यहाँ के शासक क्षत्रिय कहलाते थे। धीरे-धीरे मुसलमानों ने ही इन क्षत्रियों को हराकर इन्हें सामन्त बनाया और राजवंशी होने के कारण इन सत्ताहीन क्षत्रियों को राजपूत कहने लगे।

राजपूत स्वयं को वैदिक आर्यों से सम्बन्धित सूर्य एवं चन्द्रवंशी बताते हैं।

प्रतिहार राजपूत राम के भाई लक्ष्मण की सन्तान बताते हुए सूर्यवंशी होने का दावा करते हैं।

राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित विभिन्न मत

अग्निकुण्ड से उत्पत्ति का सिद्धान्त:- 1.चन्दबरदाई ने अपने ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में राजपूतों को अग्निकुण्ड से उत्पन्न बताया है।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू पर्वत पर ऋषि तपस्या करते थे, किन्तु कुछ असुर यज्ञ को दूषित कर देते थे तब आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा एक यज्ञ किया गया। जिसकी अग्नि से चार यौद्धा उत्पन्न हुए।

अग्नि कुंड से चार जातियों की उत्पत्ति मानी जाती है। इनका क्रम है:

  1. गुर्जर-प्रतिहार (परिहार)
  2. चालुक्य (सोलंकी)
  3. परमार (पंवार)
  4. चाहमान (चौहान)

अग्निकुण्ड से जन्म होने के कारण ये राजवंश अग्निवंशीय कहलाये।

18वीं शताब्दी में सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में अग्निकुण्ड सिद्धान्त का समर्थन किया।

मुहणौत नैणसी ने अपनी ख्यात ‘नैणसी री ख्यात’ में अग्निवंशीय सिद्धान्त का समर्थन किया।

विलियम क्रुक एवं कर्नल टॉड ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन करते हुए राजपूतों को विदेशी बताया है।

कर्नल जेम्स टॉड ने अग्निकुण्ड के मत का प्रयोग अपने मत (विदेशी उत्पत्ति) की पुष्टि के लिए किया टॉड ने इस मत को समर्थन देते हुए कहा कि विदेशी जातियाँ शक, कुषाण यूनानी, सीथीयन, हूण आदि को अग्नि संस्कार द्वारा शुद्ध करके उन्हें भारतीय समाज में शामिल कर लिया गया और वे ही लोग राजपूत कहलाये।

खण्डन

  • अग्निकुण्ड सिद्धान्त का ओझा जी ने अग्निपुराण ग्रंथ के अनुसार खण्डन किया।
  • दशरथ शर्मा ने अग्निकुण्ड का सिद्धान्त राजपूत, चारण। एवं भाटों की मानसिक कल्पना की उपज बताया है।
  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इस मत का विरोध किया और चन्दबरदाई की बात को काल्पनिक माना है।
  • डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने इसे ब्राह्मणों का एक प्रतिष्ठित जाति की महत्ता निर्धारित करने का प्रयास कहा है।

ब्राह्मणों से उत्पत्ति

सर्वप्रथम डॉ. भण्डारकर ने चित्तौड़ एवं अचलेश्वर से प्राप्त शिलालेखों के आधार पर राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से बताई है।

घटियाला लेख (मण्डौर, जोधपुर) से प्राप्त शिलालेख में प्रतिहारों को ब्राह्मणवंश का बताया गया है। इस शिलालेख के अनुसार प्रतिहार ब्राह्मण हरिशचन्द एवं उसकी पत्नी भ्रदा /मादरा की सन्तान थे।

बिजौलिया शिलालेख के अनुसार वासुदेव का उत्तराधिकारी सामन्त वत्सगोत्रीय ब्राह्मण था।

राजशेखर ब्राह्मण का विवाह अवन्ति सुन्दरी के साथ होना, चौहानों के ब्राह्मण होने का स्पष्ट प्रमाण है।

डॉ़ गोपीनाथ शर्मा के अनुसार मेवाड़ के गुहिलों को नागर जाति के ब्राह्मण गुहादत का वंशज बताया है।

ओझाजी के अनुसार महाराणा कुम्भा ने जयदेव के गीत गोविन्द की टीका रसिक प्रिया में स्वीकार किया है कि गुहिलोत, नागर जाति के ब्राह्मण गुहादत की सन्तान थे।

पिंगल सूत्रवृत्ति में भी राजपूतों (मेवाड़ के गुहिलों को) को ब्राह्मण से उत्पन्न बताया गया है। किन्तु डॉ. दशरथ शर्मा ने तर्क सहित इस मत का खण्डन किया है।

राजपूतों की उत्पत्ति से संबंधित विभिन्न सिद्धान्त

सिद्धान्त

 

विद्वान

 

1. आबू पर्वत पर वशिष्ट के अग्नि कुंड से उत्पन्न चन्दबरदाई का पृथ्वीराज रासो

 

2. शक, कुषाण एवं हूण आदि विदेशी जातियों की सन्तान कर्नल टॉड, डॉ. ईश्वरी प्रसाद, स्मिथ, कुक, डी. आर भण्डारकर ।
3. प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान (सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी उत्पत्ति) जी.एच. ओझा, सी.वी. वैद्य
4. सामाजिक आर्थिक प्रक्रिया की उपज वी. डी. चट्टोपाध्याय

 

5. प्राचीन आदिम जातियों गोंड, खरवार, भर आदि के वंशज

 

स्मिथ

 

6. यू ची (कुषाण) जाति के वंशज

 

कनिंघम।

 

7. विभिन्न जातियों का मिश्रण

 

दशरथ शर्मा, विशुद्धानन्द पाठक।

 

8. ब्राह्मण वंशीय उत्पत्ति

 

दशरथ शर्मा, वी. एस. पाठक, गोपीनाथ शर्मा

 

विदेशी उत्पत्ति का मत

कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक, वी. ए. स्मिथ, कनिंघम, ईश्वरी प्रसाद एवं भण्डारकर राजपूतों को विदेशी जातियों की सन्तान बताते है।

कर्नल टॉड ने राजपूतों को विदेशी सीथियन (शक) जाति की सन्तान माना है। तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत और सीधियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता को आधार बनाया है। क्योंकि राजपूतों की एवं इन विदेशी जातियों की कुछ परम्पराएँ जैसे- सती प्रथा, अश्व पूजा, अश्वमेघ यज्ञ, शस्त्र पूजा एवं सूर्य उपासना दोनों में समानता थी।

मध्य एशिया से यूनानी, शक, हूण, यूची (कुषाण) सभी विदेशी जातियाँ भारत आई और भविष्य में यह राजपूत कहलायी।

इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने राजपूतों को हूणों की सन्तान बताया है। इतिहासकार विलियम क्रुक एवं कनिंघम ने टॉड का समर्थन करते हुए राजपूतों के वंशजों का उद्भव, शक/कुषाणों के आक्रमण के समय माना है।

डॉ. भण्डारकर ने चारों अग्निवंशीय (परमार, प्रतिहार, चौहान,चालुक्य) को विदेशी सिद्ध करने का प्रयास किया है।

डॉ. भण्डारकर के अनुसार हूण जाति के साथ भारत में एक और खज जाति का भी आगमन हुआ और गुर्जर इन्हीं खजों की सन्तान हैं।

इसलिए गुर्जर प्रतिहार विदेशी हैं।

कन्नौज के प्रतिहारों को राष्ट्रकूटों ने अपने अभिलेखों में तथा अरबों ने अपने यात्रा विवरणों में गुर्जर बताया है।

राजौर अभिलेख में प्रतिहारों की एक शाखा को गुर्जर कहा गया है।

अतः गुर्जर पांचवीं शताब्दी में हूणों के साथ भारत में प्रविष्ट हुए।

मनुस्मृति में शकों को व्रात क्षत्रिय कहा गया है।

प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान

डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा (पुस्तक- राजपूताने का प्राचीन इतिहास 1925 ई.) के अनुसार राजपूत प्राचीन वैदिक क्षत्रियों की सन्तान थे।

सी. एम. वैद्य ने भी ओझा का समर्थन करते हुए, राजपूतों को वैदिक क्षत्रियों की सन्तान कहा है।

नद्धहरण से प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार महाकाव्य काल के राम एवं कृष्ण क्षत्रिय थे अतः राजपूत भी वैदिक आर्यों की सन्तान है।

मनुस्मृति में राजपूतों को ब्रह्मा की सन्तान बताया है।

ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में राजपूतों को ब्रह्मा की भुजाओं से उत्पन्न बताया है।

सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी

श्री जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार ‘राजपूतों के राजवंश वैदिक एवं पौराणिक काल में राजन्य, क्षत्रिय आदि नाम से प्रसिद्ध सूर्य एवं चन्द्रवंशी क्षत्रियों की सन्तान थे। यह न तो विदेशी है और न ही अनायों के वंशज।

डॉ. दशरथ शर्मा ने (पुस्तक- राजस्थान थू द एजेज) ‘राजपूतों को सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी स्वीकार करते हुए उन्हें आम की सन्तान एवं भारत का मूल निवासी माना है।’

ओझा ने अग्निवंशीय मत का खण्डन करते हुए राजपूतों को सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी बताते हुए उन्हें विशुद्ध प्राचीन परियों का वंशज कहा है।

अग्निपुराण के अनुसार चन्द्रवंशी कृष्ण एवं अर्जुन, सूर्यवंशी राम एवं लवकुश के वंशज ही राजपूत थे।

हर्षनाथ अभिलेख (सीकर) में चौहानों को सूर्यवंशी बताया है।

वंशावलियों में राठौड़ों को सूर्यवंशी यादवों एवं भाटियों को चन्द्रवंशी बताया है।

मिश्रित उत्पत्ति का सिद्धान्त

डॉ. बी.डी. चटोपाध्याय ने राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक नया सिद्धान्त ब्रह्म- क्षत्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

इसके अनुसार राजपूत मिश्रित जातियों के सन्तान थे।

दशरथ शर्मा, वी. एस. पाठक एवं वी. एन. पाठक का मानना है कि राजपूत जाति में कई क्षत्रियेत्तर वर्ण भी शामिल थे।

पृथ्वीराज रासो में 36 राजपूत कुलों का उल्लेख मिलता है।

कुमारपाल चरित, वर्ण रत्नाकर एवं राजतरंगिणी में भी 36 कुलों का उल्लेख है।

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