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संगम काल का इतिहास | Sangam Kal

संगम काल का इतिहास

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संगम काल का इतिहास | Sangam Kal

तमिल भाषा का प्राचीनतम् साहित्य संगम साहित्य के नाम से विख्यात है। संगम का अर्थ संघ या परिषद् होता है। संगम साहित्य में दक्षिण भारत के जनजीवन की झांकी मिलती है। संगम शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नयनार अप्पार ने किया।

  • कात्यायन की वार्तिक में चोलएवं पाण्डय राज्यों का उल्लेख है।
  • संगम संस्कृति की महापाषाणीय संस्कृति से साम्यता एच.डी. सांकलिया ने बताई है।
  • कोडुमनल से 150 से अधिक महापाषाणीय शवाधान प्राप्त एवं मणिमेखलै महाकाव्य में अन्तेष्टि संस्कार तथा महापाषाणीय शवाधान पद्धतियों का उल्लेख है।
  • संगम साहित्य में तीन महत्त्वपूर्ण राज्यों चोल, चेर व पाण्ड्य का उल्लेख मिलता है।
  • इनमें चेर का सबसे अधिक उल्लेख है।
  • यह सबसे प्राचीन वंश था।
  • पाण्ड्य शासकों के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किये गये,जिनमें संकलित साहित्य को संगम साहित्य की संज्ञा दी गई।
  • प्रथम संगम मदुरा में, द्वितीय संगम कपाटपुरम् में तथा तृतीय संगम उत्तरी मदुरा में आयोजित किया गया।
  • तीनों संगमों की कुल अवधि 9950 वर्ष मानी जाती है व 197 पाण्ड्य राजाओं ने इसे संरक्षण प्रदान किया।
  • प्रथम संगम का कोई ग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है।
  • तृतीय संगम के भी अधिकांश ग्रन्थ नष्ट हो गये हैं, लेकिन अवशिष्ट तमिल साहित्य तीसरे संगम से ही संबंधित है।
  • तोल्लकाप्पियम् द्वितीय संगम का एकमात्र उपलब्ध प्राचीनतम् साहित्य है।
  • इसके रचनाकार तोल्लकाप्पियर थे, जो अगस्त्य ऋषि के 12 शिष्यों में से एक थे।
  • यह सबसे प्राचीन तमिल व्याकरण ग्रन्थ है जो सूत्र शैली में रचित है।
  • तोल्लकाप्पियम् में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है।
  • तिरूक्काम्पुलियर चेर, चोल व पाण्ड्य तीनों राज्यों का संगम स्थल था।
  • तीनों संगमों का सर्वप्रथम उल्लेख अग्गपोरूल (8वीं शदी) के भाष्य की भूमिका में मिलता है।
  • संगम साहित्य से ज्ञात होता है कि दक्षिण में आर्य सभ्यता का विस्तार ऋषि अगस्त्य एवं कौंडिन्य ने किया।
  • संगम साहित्य का काल रामशरण शर्मा के अनुसार 300-600 ई. के बीच था, जबकि नीलकण्ठ शास्त्री ने पुस्तक हिस्ट्री ऑफ साउथ इण्डिया में 100 ई. से 250 ई. माना है।
  • आर. एस. शर्मा ने संगम साहित्य मोटे रूप से दो भागों में बाँटा है आख्यानात्मक और उपदेशात्मक आख्यानात्मक ग्रन्थ मेलकनक्कु अर्थात् अठारह मुख्य ग्रन्थ कहलाते हैं।
  • उपदेशात्मक ग्रन्थ किल्कनक्कु अर्थात् अठारह लघु ग्रन्थ कहलाते हैं।

उपलब्ध संगम साहित्य को दो भागों में बांटा गया है

  1. पतुप्पातु- 10 गीतों का संग्रह।
  2. इत्थुथोके / एत्तुतोकै- 8 गीतों का संग्रह।

एतुतौकै में आठ गीत है

  • नण्णिनै
  • कुरून्थोकै
  • एनकुरूनुर
  • पवित्रप्पतु
  • परिपादल
  • कलिथौके
  • अहिनानुरू
  • पुरूनानुरू

परिरूपतु में 10 कविताएं है, इसमें चेर राज्य में प्रचलित कलश शवाधानों का उल्लेख है/समाधियों का उल्लेख है।

संगम साहित्य की दो मुख्य विषय वस्तु है

  1. अहूम- इसका सम्बन्ध प्रेम से है।
  2. पुरम- ये युद्ध के बारे में है। (शासकों की उपलब्धियाँ)

दस कविताओं का संग्रह ‘पत्तुप्पतु‘ तीसरे संगम के दौरान लिखा गया।

दस गीतों के संग्रह में नक्कीरर द्वारा लिखी गई नेडुनअलवदै में पाण्ड्य राजा नेडुनजेलियन व उसकी रानी का वर्णन है।

रूद्रन कन्नार द्वारा लिखित ‘पत्तिनप्पलै‘ भी पत्तुप्पतु की एक कविता है। यह पुहार (कावेरी पट्टनम) पर लिखी गई है।

संगम साहित्य में आठ गीतों के एक संग्रह को ‘एत्तुतोकै‘ कहा जाता है। इनमें आठवाँ गीत ‘पुरनानुरू‘ सबसे प्रसिद्ध है। इसमें कपिलार, अन्वै तथा कोवुर किलार सहित 150 कवियों की कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं से तमिल सामाजिक इतिहास की झलक मिलती है।

अगनानुरू में 400 प्रणय गीत हैं।

एतुतोकै के चौथे संग्रह पदिरूप्पत्रु में दस कविताएं हैं। इनमें आठ चेर शासकों की प्रशस्ति मिलती है।

अठारह लघु गीतों का एक संग्रह पडिनैन्किल्कनक्कु है।

इनमें तिरूवल्लुवर द्वारा लिखा गया तिरूक्कुरल या कुरल तमिल दर्शन ग्रन्थ है तथा दूसरा प्राचीन तमिल ग्रन्थ भी है।

29.तिरुक्कुरल को तमिल साहित्य का आधार ग्रन्थ भी माना जाता है। इसकी गणना साहित्यिक त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) के अन्तर्गत की जाती है। इस ग्रन्थ की रचना श्रीलंका के शासक इल्ल एवं उसके पुत्र को शिक्षित करने के लिए की गई थी। इसे लघु वेद, पंचम वेद व तमिल बाईबिल भी कहते है। इसमें 113 खण्ड हैं।

30.अगस्त्य ऋषि ने अगतियम नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जो अप्राप्त है।

31.’शिलप्पदिकारम’ तथा ‘मणिमेखलै‘ संगमकालीन महाकाव्य है।

32. शिलप्पदिकारम का लेखक जैन है, जो चेर शेनगुटवन का भाई था तथा इस महाकाव्य की नायिका कण्णगी है। इसमें कुल 30 सर्ग एवं 3 खण्ड है। यह प्रेम कथा है। इसे तमिल साहित्य का रत्न एवं प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इसमें कण्णगी पूजा का उल्लेख है।

33.इस ग्रन्थ में मगध, वत्स एवं अवन्ति का उल्लेख है एवं 32 प्रकार के सूती वस्त्रों की चर्चा है।

34.शिलप्पदिकारम का नायक कोवलन एक व्यापारी है, जो माधवी नामक गणिका पर अपना सारा धन गंवा कर अपनी पत्नी कण्णगी के पास आता है। कोवलन एवं कण्णगी काबुण्डी नामक जैन भिक्षुणी के साथ मदुरा के लिये रवाना होते हैं। मदुरा में कोवलन पर रानी की एक पायल (नूपुर) चुराने का झूठा आरोप लगता है व राजा कोवलन को जल्दबाजी में मृत्युदण्ड दे देता है। कण्णगी अपने पति को निर्दोष साबित करती है। निर्दोष कोवलन को मृत्युदण्ड देने की ग्लानि में राजा की मृत्यु हो जाती है तथा कण्णगी के शाप से मदुरा जल कर राख हो जाता है।

मणिमेखलै-

यह महाकाव्य वणिक कथा से सम्बन्धित है, इसमें 30 सर्ग है, नायिका मणिमेखलै है। इस ग्रन्थ में महायान बौद्ध धर्म, तर्कशास्त्र की भ्रान्तियों की लम्बी सूची, कांची में पड़े अकाल, संगमकालीन चित्रकला की जानकारी मिलती है।

  • मणिमेखले में कोवलन व माधवी की बेटी, मणिमेखलै कण्ण्गी से प्रेरणा लेकर अन्त में बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है।
  • मणिमेखलै का लेखक मदुरै का बौद्ध अन्न व्यापारी शीतलै सत्तनार था। इसकी कथा दार्शनिक व शास्त्रार्थ बातों के ताने-बाने में बुनी गई है।
  • प्रो. मेहण्डाले ने शिलप्पदिकारम को तमिल काव्य का इलियड और मणिमेखलै को तमिल काव्य का ओडेसी कहा है।
  • ओवैयार तथा नच्चेलियर संगम काल की दो प्रसिद्ध कवयित्रियां (विदुषी स्त्रियाँ) थी।
  • पत्तुपातु कोवरीपत्तनम पर रचित एक लम्बी कविता है।
  • पट्टिनप्पालै भी कावेरीपत्तनम पर लिखी एक लम्बी कविता है, इसकी रचना रूद्रन कन्नार ने की।
  • परिपादल 70 गीतों की एक संगम कालीन चयनिका (संग्रह) है, जिसमें मयूर नृत्य का वर्णन है।
  • परिपाडल संगम दर्शन ग्रन्थ है।

पाँच प्रमुख महाकाव्य-

1. शिलप्पदिकारम् 2. मणिमेखलै 3. जीवक चिन्तामणि 4. वलयपति 5. कुंडलकेशि

प्रमुख संगम साहित्य संगम साहित्य

1. तोल्लकाप्पियम 2. शिलप्पदिकारम् (नूपुर की कहानी) 3. मणिमेखलै 4. जीवक चिन्तामणि (जैन) 5. कुरल 6. अहनानूरू 7. मरूगर्रूपादय Qरचनाकार तोल्लकापियर इलंगो आदिगल सीतलै सत्तार तिरुन्तक देवर तिरूवल्लुवर रूद्रशर्मन (मामूलनार) नक्कीरर नक्कीरर

44. संगम कवि कपिलर को पारि नामक चेर राजा ने संरक्षण दिया। कपिला ने परणार, कलिथोकै और कुरिन्जप्पात्तु नामक ग्रन्थ लिखे।

45.मामूलनार नामक तमिल कवि ने नन्दों व मौर्यों का उल्लेख किया है तथा नन्दों ने कोष गंगा में छिपाया था, का भी उल्लेख किया है।

46.जीवक चिन्तामणि को विवाह की किताब भी कहा जाता है।

47. नच्चिरविकनियर ने संगम कृतियों पर टीका लिखी।

चेर राज्य (दक्षिण-पश्चिमी)

  • संगम साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन वंश चेर वंश है तथा इसका ही सबसे अधिक उल्लेख है।
  • चेरों का प्रतीक चिह्न धनुष तथा राजधानी वांजि (करूवुर) एवं दूसरी राजधानी तोण्डी थी।
  • चेर राज्य मालावार (केरल) क्षेत्र में था।

तीसरे संगम के समय एतुतोगे (अष्ट पदावली) का चौथा संग्रह पदिट्रप्पतु (पदिरूपतु) है। पदिट्टप्पत्तु में दस कविताओं का संग्रह है। इसमें आठ चेर शासकों की शौर्य गाथाओं का वर्णन मिलता है। डॉ. एम.एम आयंगर ने पदित्रुप्पत्तु को ‘तमिल व्याकरण तथा रीति-रिवाजों का कोश कहा है।

  • चेर राज्य का प्रथम शासक ‘उदियन जेरल’ था। उसने महाभारत भाग लेने वाले वीरों को भोजन कराया था। उसने एक बड़ी पाक भी बनवाई।
  • इसे ‘वन वारामबन’ एवं ‘पेरूनजोरम उदयन’ भी कहा जाता है।

नेदुनजेरल आदन इसने सात राजाओं को पराजित कर अधिराज उपाधि धारण की तथा समस्त भारत पर विजय प्राप्त कर हिमालय तक अपने साम्राज्य को बढ़ाया तथा हिमालय पर चेर राज्य का चिन्ह धनुष अंकित कर इमयवरम्बन एवं अधिराज की उपाधि धारण की, जिसका अर्थ है ‘हिमालय तक सीमा वाला’।

  • नेदुनजेरल ने मरन्दै को अपनी राजधानी बनाया व यवन व्यापारियों को भी कैद किया।
  • नेडुनजेरल के पुत्र ‘पेरून्जेरल इरपोरई’ (190 ई. के आस-पास) ने सामेल जिले में तगडूर (धर्मपुर) के शासक को परास्त किया।
  • कुट्टवन को हाथियों का स्वामी कहा जाता है (यह शेनगुट्टुवन से पहले शासक बना था।)

शेनगुट्टुवन –

इसे लालचेर एवं भलाचेर भी कहा जाता है। यह चेर वंश का सबसे महानतम् शासक था। यह इमयवरम्बन का पुत्र था। यह 190 ई. के आस-पास शासक बना।

  • संगम कालीन कवि परणर ने शेनगुट्टुवन का यशोगान किया है। उसके पास जहाजी बेड़ा भी था।
  • शेनगुट्टुवन ने उत्तर में चढ़ाई कर गंगा नदी को पार किया।

शिलप्पदिकारम के अनुसार शेनगुट्टुवन ने कौमार्य (सतीत्व) की देवी की पूजा पत्तिनी पूजा (कण्णगी पूजा) के रूप में प्रारम्भ कराई, इसमें उसे श्रीलंका के शासक गजबाहु प्रथम का सहयोग भी मिला।

  • गजबाहु एक तमिल कवि इलम्बोधियार के साथ शेनगुट्टवन के दरबार में आया।
  • अन्तिम चेर शासक सेईयै था, जिसे पाण्ड्य नेडुनजेलियन ने परास्त किया था।
  • आदिग इमान नामक चेर शासक ने दक्षिण में गन्ने की खेती आरम्भ की।

चेर राज्य के प्रमुख बन्दरगाह (सभी पश्चिम में थे)

1. तोण्डी 2. मुशिरी (मुजरिस) 3. बन्दर 4. नौरा (कैन्ननौर) 5. करूर (वांजी) 6. करोरा

  • बन्दर चेर राज्य का सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह था।
  • वट्टेलुत्तु चेरों की एक लिपि थी।

चोल राज्य (उत्तर-पूर्व)

चोल राज्य तमिलनाडु में पेन्नार तथा वेल्लारू नदियों के मध्य स्थित था। इसका प्रतीक चिह्न बाघ था।

चोलों की प्रारम्भिक राजधानी उत्तरी मनलूर थी।

बाद में उरैथूर तथा तंजौर (तंजावुर) चोलों की राजधानी बनी।

उरैयूर कपास (सूती वस्त्र) व्यापार का प्रसिद्ध केन्द्र था।

एलारा नामक चोल राजा ने ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में श्रीलंका पर विजय प्राप्त कर वहां 50 वर्षों तक शासन किया।

करिकाल-

करिकाल का शाब्दिक अर्थ झुलसे पैरों वाला व शत्रुदल के हाथियों का विनाश करने वाला है। करिकाल इस काल में सबसे महत्त्वपूर्ण चोल शासक था। उसने 190 ई. के आस-पास शासन किया।

चेरों ने 150 ई. के आस-पास चोल राजा करिकाल के पिता ‘इलनजेतचेनी’ को मार डाला। इलनजेतचेनी चोल वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था, जिसने उरैयूर को राजधानी बनाया।

करिकाल को उसके शासन के प्रारम्भिक काल में पदच्युत कर दिया। गया था। पट्टिनप्पालै में करिकाल की सफलताओं का वर्णन है। पत्तुपातु नामक कविता, जो कावेरी पत्तनम पर लिखी है, में करिकाल द्वारा कैद से भागने एवं बलपूर्वक राजसिंहासन व कावेरीपत्तनम पर अधिकार का वर्णन है।

करिकाल ने पुहार (आधुनिक कावेरी पत्तनम्) की स्थापना की तथा कावेरी नदी के किनारे 160 किमी. लम्बा बांध बनाया। पुहार कावेरी की सहायक नदी वैगई पर स्थित है।

तंजौर के निकट बेण्णि के युद्ध में उसने चेर तथा पाण्ड्य राज्यों के ग्यारह राजाओं के समूह को पराजित किया।

इनमें प्रमुख बेलिर नामक राजा था।

वाहेप्परन्दलई के युद्ध में करिकाल ने नी राजाओं को पराजित किया।

करिकाल ने चेर शासक पेरूनजेरल को पराजित किया।

करिकाल ने उद्योग धन्धों तथा कृषि को प्रोत्साहन दिया तथा सिंचाई के लिए तालाब खुदवाए।

इस की संगीत में रूचि थी।

वह सातों स्वरों का ज्ञाता (भागी राग विशेषज्ञ) था। करिकाल वैदिक धर्म का अनुयायी था।

करिकाल ने एक कवि (पट्टिनप्पलै का रचयिता) को 16 लाख स्वर्ण मुद्राएँ दी।

करिकाल के बाद शासक बने तोंडईमान इलनदियान ने कांची से शासन किया एवं इसके चार गीत संगम साहित्य में है।

पेरूनरकिल्लि नामक एक चोल राजा ने राजसूय यज्ञ किया।

चोलों का सर्वप्रथम उल्लेख कात्यायन ने किया है।

संगम काल में चोल शासकों ने कुम्भकोणम में विशाल कोषागार की व्यवस्था की।

पाण्ड्य राज्य (सुदूर दक्षिण)

  • पाण्ड्य राज्य सुदूर दक्षिण व दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित था। इनकी राजधानी मदुरै थी।
  • इस राज्य का सर्वप्रथम उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में है।
  • पाण्ड्यों का प्रतीक चिह्न मछली (कार्प) था इनकी प्रारम्भिक राजधानी कोरकई (कौल्ची) थी, बाद में मदुरै (मदुरा) राजधानी बनी।
  • कोरकई ताम्रपर्णि नदी एवं मदुरै वेंगई नदी तट पर स्थित है। वैगई/वैगी नदी पाण्ड्यों की जीवन रेखा थी।
  • पाण्ड्यों का उल्लेख मेगस्थनीज ने भी किया है। मेगस्थनीज के अनुसार पाण्ड्य राज्य मातृसत्तात्मक था, वहां पर एक स्त्री का शासन था। पाण्ड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था।
  • नेडियोन नेडियोन ने ‘समुद्र पूजा’ प्रारम्भ कराई व ‘पहरूली’ नदी को अस्तित्व प्रदान किया।

पलशालइ मुदुकुमी –

वेलविकुड़ी दानपत्र के अनुसार यह पाण्ड्य वंश का प्रथम ऐतिहासिक राजा था। उसने अनेक वैदिक यज्ञ कराये। उसने ‘पलशालै’ (अनेक यज्ञशालाएं बनाने वाला) तथा ‘महेश्वर’ की उपाधि धारण की।

  • नेडुजेलियन यह सबसे विख्यात पाण्ड्य शासक था। नेडुंजेलियन ने ‘तलैयालगानम’ के युद्ध में विजय प्राप्त की।
  • पाण्ड्यों की प्रारम्भिक राजधानी ‘कोरकाई’ मोतियों के लिए विख्यात थी।
  • नेडुजेलियन स्वयं कवि था व कवियों का संरक्षक था।
  • नेडुजेलियन ने रोमन सम्राट आगस्टस के दरबार में अपना दूत भेजा था।
  • शिलप्पदिकारम के नायक कोवलन को नेडुंजेलियन ने ही मृत्युदण्ड दिया था।
  • मदुरैकांची नामक कविता में नेडुंजेलियन के शासन का विवरण मिलता है। इसकी रचना भांगुदि मरुदनार ने की थी।
  • नल्लिवकोडन अन्तिम पाण्ड्य शासक था।

कालाभ्रों का विद्रोहः-

छठी सदी में दक्षिण भारत में कालाभ्रों के नेतृत्व में विद्रोह हुआ। कालाभ्रों ने चेर, चोल एवं पाण्ड्‌यों को बन्दी बना लिया। कालाभ्रों को दुष्ट शासक कहा जाता है। कालाभ्रों ने ब्राह्मणों को मिले ब्रह्मदेय अधिकार समाप्त कर दिये। संभवतः कालाभ्र बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया।

कालाभ्र विद्रोह को पाण्ड्यों, पल्लवों व वातापी के चालुक्यों के सम्मिलित प्रयास से ही दबाया जा सका। यह कालाभ्र विद्रोह दक्षिण भारत की तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ था। कालाभ्र विद्रोह जनजातीय स्वरूप का था।

राजनीतिक व्यवस्था

संगमकालीन प्रशासन राजतन्त्रात्मक था राजपद वंशानुगत था। राज्य को मण्डल कहा जाता था।

समस्त अधिकार राजा में निहित थे। राजा को कोन, को, मन्नम, वेन्दन, कारेवन, इरैवन इत्यादि उपाधियाँ दी गई थी। ये उपाधियाँ राजा एवं देवता दोनों के लिए होती थी। राजा के सर्वोच्च न्यायालय या राजसभा को ‘मनरम’ कहते थे तथा राजा का जन्म दिन ‘पेरूनल’ कहत था। राजा के दरबार को ‘नलबै’ भी कहा जाता था।

राजा के पुत्रों को इलैगो एवं युवराज को कोमहन कहा जाता है।

कवियों द्वारा शाही ढोल मरच को बजाकर सुबह राजा को नींद से जगाया जाता था। राजा की सुरक्षा हेतु सशस्त्र महिलाएं नियुक्त होती थी। संगमकालीन प्रशासनिक शब्दावली नाडु पेरूर सिरैयूर उर मुडूर पट्टिनम पेडियल अवै अमियचार ओर्रार दूतार सालै तैरू प्रान्त बड़े गाँव छोटा गाँव नगर पुराना ग्राम तटीय शहर सार्वजनिक स्थल छोटे गाँवों की सभा मंत्री गुप्तचर राजदूत प्रमुख सड़क प्रमुख गली

5.प्रो. नीलकंठ शास्त्री ने संगमकाल में दो प्रशासनिक संस्थाएँ बताई है-

ऐन पेरूमकुलु-

इसमें मंत्री (अम्मियचार) पुरोहित, सेनानायक,दूत व गुप्तचर (ओर्रार या वै) नामक पाँच अधिकारी होते थे जो राजा की शक्ति पर नियंत्रण रखते थे।

ऐन पेरायम –

  • इस में नौकरशाह, प्रबुद्ध नागरिक व सेना के जैन अंग होते थे।
  • सेना के सेनापति को एनाडि की उपाधि दी जाती थी। सेना की अग्र टुकड़ी को तुसी तथा पिछली टुकड़ी को कुलै कहा जाता था।
  • सेना में वेल्लाल (धनी कृषक) भर्ती किए जाते थे।
  • युद्ध में मरे सैनिकों की स्मृति में पाषाण मूर्तियाँ बनाई जाती थी। इस प्रकार के Hero stone को नडुकल या वीस्काल (Virakal कहते थे।
  • कल्लिबेली संगम साहित्य में युद्ध पद्धति की जानकारी है। सेना चतुरंगिनी थी (पैदल, हाथी, अश्व एवं रथ ) ।
  • सेना को पदै कहा जाता था।
  • युद्ध में शौयं प्रदर्शित करने वाले वीरों को मारया की उपाधि दी जाती थी।
  • युद्ध में बंदी स्त्रियों को दासी बनाकर उनसे मंदिरों में दीपक जलाने का कार्य कराया जाता था।
  • पुरनानुरू में राजाओं की प्रशंसा में 400 पद्य है तथा एक कविता में चक्रवर्ती राजा की चर्चा की गई है।

सामाजिक स्थिति

संगम काल में उत्तरी भारत की आर्य संस्कृति के तत्वों का दक्षिण में प्रसार हुआ।

संगम काल के चार वर्ग- 1.अरसर (शासक) 2.अंडनार (ब्राह्मण) 3.वेनिगर (वणिक) 4.वेलालर (किसान)

संगमकालीन समाज उत्तर भारतीय समाज की भाति वर्गभेद पर आधारित था, लेकिन चतुर्वर्ण व्यवस्था नहीं थी और दास प्रथा भी नहीं थी।

ब्राह्मणों को सर्वोच्च सामाजिक दर्जा प्राप्त था।

संगम काल में भी जाति प्रथा का आधार व्यवसाय ही थे। व्यवसाय का आधार विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति हुआ करती थी।

समाज का विभाजन क्षितिजीय (Horizontal) आधार पर था न कि आर्य वर्ण व्यवस्था की भांति ऊर्ध्वाकार (Vertical)

तमिल क्षेत्र में ब्राह्मणों का आगमन सर्वप्रथम संगम काल में ही होता है।

क्षत्रिय वर्ग, वैश्य वर्ग तथा किसान वर्ग मिलकर गैर ब्राह्मण वर्ग बनाते थे। अतः समाज मोटे रूप से ब्राह्मण एवं गैर ब्राह्मण दो भागों में ही बंटा था।

भूमि अधिकतर वेल्लाल (वेलालर) जाति के हाथों में थी। ये धनी कृषक वर्ग था। शासक वर्ग भी वेल्लाल जाति से ही निकलता था। वेल्लाल के प्रमुख को वेलिर कहा जाता था।

खेतों में काम करने वाले मजदूरों को कडैसियर कहते थे, जो निर्धन वर्ग में आते थे।

वेल्लाल दो वर्गों में विभाजित थे।

  1. धनी कृषक वर्ग,
  2. भूमिहीन/ निर्धन वर्ग।

चोल राज्य में धनी कृषकों को ‘वेल’ व ‘आरशु’ की उपाधि दी जाती थी व पाण्ड्य राज्य में इन्हें ‘कविदि’ की उपाधि दी जाती थी।

  • परियार- पशु की खाल या चमड़े का काम करने वाले।
  • एनियर- शिकारी।
  • पुलैयन- रस्सी की चारपाई बनाने वाले या रस्सी का कार्य करने वाले।
  • मलवर या कलवर- उत्तरी सीमा पर रहने वाले लोग जो डाका डालते थे।

मरवा नामक जनजाति में वेत्ची (गोहरण) प्रथा प्रचलित थी। वेत्ची प्रथा में पशुओं की चोरी या लूट की जाती थी।

उच्च सैनिक वर्गों में सती प्रथा का प्रचलन था।

विधवा विवाह एवं पुनर्विवाह का प्रचलन था, सूत कातने वाली स्त्रियों को परूट्टी पेन्टुकल कहते थे।

वेश्यावृति को सम्मानीय दर्जा प्राप्त था। वैश्याओं के दो वर्ग थे- कविगैय्यर एवं परतियर।

चारण काव्य को वाचने वाली एवं नृत्य करने वाली स्त्रियां वीरलियार कहलाती थी।

अन्तर्जातीय विवाह भी प्रचलित था।

दो प्रकार के विवाह प्रचलित थे-

  1. कलाबु यह माता-पिता की जानकारी के बगैर किया जाता था।
  2. कार्पू यह परिवार वालों द्वारा किया जाता था। पांचतिणै-

संगम काल में स्त्री पुरुषों का प्रणय निवेदन पेरून्दिण- अनुचित प्रेम कैक्किडै- एक पक्षीय प्रणय निवेदन

गायक व नर्तकों को पाणर और विडेलियर कहा जाता था।

संगम काल में विदुषी औरतों को अवैयार कहा जाता था। स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी, किन्तु स्त्रियों को राजसिंहासन पर आसीन होने का भी अधिकार था। मेगस्थनीज के अनुसार पाण्ड्य राज्य में हेराक्लीज की पुत्री का शासन था।

  • पेरियाल, पलाईयाल एवं सेनगोट्रिटपाल आदि भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्र थे। मुख्य वाद्य यंत्र याल था।
  • जनजातियां कुदिसि कहलाती थी, जिनमें तुदियान, परैयान, पनान, वेलन और कदम्ब प्रमुख थी।
  • चेट्टि नामक वाणिज्यिक समुदाय संगम काल से ही प्रचलित था।
  • वेल्वि शब्द यज्ञ के सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है।

संगमयुग में पान सुपारी का प्रचलन हुआ। कौवा को शुभ पक्षी माना जाता था, जो अतिथि आगमन, विरहिणी को पति के आगमन की सूचना देता था एवं समुद्री जहाज की यात्रा में भी इसे साथ रखा जाता था।

विभिन्न जातियाँ

1. उमनार 2. कुचावर 3. कोल्लार 4. थैचर 5. वन्नार 6. उलावार 7. परादावार व्यवसाय नमक कुम्हार लोहार खाती धोबी हलवाई मछुआरा

आर्थिक स्थिति

संगम काल में कषि, पशुपालन व शिकार जीविका के मुख्य आधार थे।

कावेरी नदी डेल्टा के बारे में कहा जाता था– “जितनी जमीन पर एक हाथी लेट सकता हो, उतनी जमीन सात आदमियों का पेट भर सकती है।”

  • संगम साहित्य में धान, रागी एवं गन्ने की पैदावार का रोचक वर्णन है।
  • निम्न वर्ग की महिलाएं मुख्यतः खेती कार्य में संलग्न थी, जिन्हें कडैसियर कहा जाता था।
  • संगम साहित्य में पाँच प्रकार की भूमियों का उल्लेख है, जो तिलाई (भौगोलिक संरचना) से जुड़ी है।
  • भूमिकर को करई कहते थे जो 1/6 था। कडमई / कडमे राजा को दिया जाने वाला भाग था
  • संगम साहित्य में गेहूं का उल्लेख नहीं मिलता है। धान, गन्ना, रागी एवं जौ प्रमुख फसले थी।
  • दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषि द्वारा कृषि का विस्तार किया गया।
  • जहाजों का निर्माण तथा कताई-बुनाई महत्वपूर्ण उद्योग थे। उरैयूरती वस्तु उद्योग का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था।

10.अधिकांश व्यापार वस्तु विनिमय द्वारा होता था। बाजार को अवनम कहते थे।

संगमकालीन प्रमुख बन्दरगाह-

पूर्वी तट की अपेक्षा पश्चिमी तट पर बन्दरगाह अधिक थे। पश्चिमी तट के मुख्य बन्दरगाह नौरा, तोण्डी, मुशिरी, कोडुमणम, बन्दर, वांजी, करोरा और नेल्सिंडा थे। ‌‌

पाण्ड्य राज्य के बन्दरगाह- शालियूर एवं कोरकै (कौल्ची) पूर्वी तट पर तथा नेल्सिंडा पश्चिम तट पर था।

चोल राज्य के बन्दरगाह (सभी पूर्वी तट पर) –

पुहार (कावेरीपत्तनम),उरैयूर, पोडुका

संगम युग का महत्वपूर्ण बन्दरगाह पुहार था।

वसव समुद्र (मद्रास) पालार नदी के किनारे महत्वपूर्ण बन्दरगाह था।

टालमी ने कावेरीपत्तनम को खबेरिस नाम दिया है।

तोण्डी, मुशिरी तथा पुहार में यवन लोग बड़ी संख्या में विद्यमान थे।

पेरीप्लस में जहाजों को कोलन्दिया एवं संगर कहा गया है।

संगमकाल में रोम के साथ व्यापार उन्नत अवस्था में था।

अरिकामेडु-

यह स्थल जीजी या अयिरनकूपय नदी तट पर था। नीलकण्ठ शास्त्री ने इसे रोमन बस्ती कहा है। यहाँ से रोमन बस्ती, एम्फोरा जार, मनके कारखाने, रोमन दीप के टुकड़े रोमन सम्राट आगस्टस व टिवेरियस की मुहरें एवं सबसे बड़ा मालगोदाम मिला है।

  • अरिकमेडु से तीन प्रकार के मृदभाण्ड मिले है- एरेटाइन, एम्फोरा, चक्रांकित मृदभाण्ड या रोलेट।
  • पेरिप्लस ने अरिकमेडु को ‘पोडुका’ कहा है।
  • रोमन सम्राट नीरो के सिक्के भी अनेक तमिल क्षेत्रों से मिले हैं।
  • अलग गुलम से भी रोमन व्यापार के साक्ष्य मिले हैं।
  • चेरों की प्राचीन राजधानी करूर (वाजि) से भी रोमन सुराहियों के टुकड़े, रोमन ताम्र सिक्का तथा ग्रेफाइट चिह्नों वाले काले और मिट्टी के बरतन मिले हैं।
  • कोडुमनल संगम काल का एक व्यापारिक केन्द्र है। संगम साहित्य यहाँ भारत रोमन व्यापार का वर्णन मिलता है।
  • अज्ञात नाविक द्वारा लिखी गई ‘पेरिप्लस आफ दि ऐरिथ्रियन सी से संगम काल के व्यापार (आयात-निर्यात) के संबंध में जानकारी मिलती है।
  • पश्चिमी देशों को काली मिर्च, मसालों, हाथीदांत, रेशम, मोती, सूती वस्त्र, मलमल का निर्यात किया जाता था।
  • रोमिला थापर ने कालीमिर्च को काला सोना कहा है। .
  • आयातित वस्तुओं में सिक्के, पुखराज, छपे हुए वस्त्र, शीशा, टिन् तांबा व शराब प्रमुख थे। सर्वाधिक आयात सोना-चाँदी का था।
  • यवन व्यापारी मुशिरी में जहाजों में सोना भरकर लाते व यहां से कालीमिर तथा समुद्र और पर्वतों से प्राप्त दुर्लभ वस्तुएँ ले जाते।
  • पुहार एक सर्वदेशीय महानगर (Cosmopolitan city) था। यहां का विभिन्न देशों के नागरिक रहते थे।
  • संगम काल में दक्षिण भारत का मलय द्वीपों व चीन के साथ भी व्यापार था।
  • यूनान के दक्षिण भारत के साथ व्यापार के कारण ग्रीक भाषा में चावल अदरक आदि शब्द तमिल भाषा से लिये गये है।
  • नीरपेयार्रू भी एक समुद्री बन्दरगाह था जहां से पश्चिम से घोड़े आयात किए जाते थे।
  • अरागरिटिक एक प्रकार का मलमल था जिसे निर्यात किया जाता था।
  • उरैयुर से संगोरा वृतों के महापाषाणीय शवाधानों का संकेत साहित्यिक विवरण में प्राप्त होता है।
  • उरैयूर या ओर्थोरा (चोलों की प्राचीनतम राजधानी) मलमल, सूती वस्त्र व मोतियों के लिए प्रसिद्ध थी।
  • कावेरी के उत्तर में स्थित अलगरै नामक नगर महापाषाण काल का एक भव्य आवासीय एवं शवाधान केन्द्र था। यहां के भित्ति आरेख हड़प्पा व ताम्रपाषाणीय भित्ति आरेखों से मिलते जुलते हैं।
  • कोरकई (कौल्ची) पाण्ड्यों की प्रारम्भिक राजधानी थी व मोतियों लिए प्रसिद्ध थी।
  • पेरिप्लस के अनुसार मुशिरी (पेरियार नदी तट पर) में आगस्टस का मंदिर था। यहाँ पर रोमन सेना की दो टुकड़ियाँ भी रहती थी।
  • पेरिप्लस ने संगमयुग के 24 बन्दरगाहों का उल्लेख किया है, जो सिन्धु मुहाने से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थे।
  • मणि पल्लवन व मरूवर पाक्कम भी संगम युगीन बन्दरगाह थे।
  • भूमि मापन की इकाई ‘वेलि’ या ‘मा’ होती थी। अम्बानम अनाज का माप था। नाली, उलाकू और अलाक भी छोटे माप थे।
  • मेगस्थनीज ने पाण्डय राज्य का उल्लेख माबर नाम से किया
  • घुमक्कड़ व्यापारियों को अयाबोल कहते थे।
  • पड़ौसी क्षेत्र के लिए पक्कम शब्द आया है।
  • संगम युग में मंत्रियों को अम्मैचार कहा जाता था।

राजस्व की शब्दावली

करई उल्गू / संगम वरियम वारि इरई कडमै या पाडु वारियार इराकु / इरवै भूमिकर (उपज का 1/6 भाग) सीमा शुल्क या पथकर वह इकाई क्षेत्र जिससे कर लिया जाये सामन्तों द्वारा दिया जाने वाला कर तथा युद्ध में लूटा हुआ माल राजा को अदा किया जाने वाला कर वरियमवारि से कर वसूल करने वाला अधिकारी बल पूर्वक उपहार

धार्मिक जीवन

संगम युग में दक्षिण भारत में वैदिक धर्म का आगमन हो गया। दक्षिण भारत में मुरूगन की उपासना सबसे प्राचीन है। मुरूगन का एक अन्य नाम सुब्रह्मण्यम भी मिलता है। बाद में सुब्रह्मण्यम का एकीकरण स्कन्द कार्तिकेय से किया गया।

  • मुरूगन का दूसरा नाम ‘वेलन’ भी था। वेल या बर्धी इसका प्रमुख अस्त्र था। मुरूगन का प्रतीक मुर्गा था।
  • पहाड़ी क्षेत्र के शिकारी पर्वत देव के रूप में मुरूगन की पूजा करते थे।
  • मुरूगन की पत्नियों में एक कुरवस नामक पर्वतीय जनजाति की स्त्री है।
  • मरियम्मा (परशुराम की माता) चेचक की देवी थी।
  • येलम्मा सीमा की देवी थी।कोरलै विजय की देवी थी।
  • विष्णु का तमिल नाम तिरूमल है। विष्णु मन्दिर को विनागर कहते हैं।
  • किसान मरूडम इन्द्रदेव की पूजा करते थे। पुहार के वार्षिक उत्सव में इन्द्र की विशेष पूजा होती थी।
  • मणिमेखलै में कापालिक शैव संन्यासियों का वर्णन है। इसमें बौद्ध धर्म के दक्षिण में प्रसार का भी वर्णन है।
  • शिलप्पदिकारम में जैन धर्म के संस्थानों का वर्णन है।

संगम साहित्य में भौगोलिक क्षेत्रों के नाम व उनके देवता

प्राचीन तमिल क्षेत्र उनके निवासी देवताओं के नाम
कुरिचि (पहाड़ियाँ) कुर्वास मुरूगन
पलाई (सूखी रेतीली भूमि) मोरावर कोनाईवई या कोरावई (दुर्गा)
मुलाई (जंगली चारागाह भूमि) अवार मेयन (विष्णु)
मरूदम (कृषि उपजाऊ भूमि) वैलारस इन्द्र
नैडल (समुद्र तटीय मैदान) मिनिवार वरूण

 

तीन संगम

संगम अध्यक्ष संरक्षक स्थल
प्रथम अगस्त्य ऋषि 89 पाण्ड्य शासक मदुरा (अब समुद्र में विलीन)
द्वितीय तोल्लकापियर (संस्थापक अध्यक्ष अगस्त्य ऋषि) 59 पाण्ड्य शासक कपाटपुरम (अलवै)
तृतीय नक्कीरर 49 पाण्ड्य शासक उत्तरी मदुरा

 

परम्पराओं के अनुसार प्रथम संगम 4400 वर्ष चला। इसमें कुल 549 सदस्य थे। द्वितीय संगम 3700 वर्ष चला व तीसरा संगम 1850 वर्ष चला। तीनों संगमों का कुल काल 9950 वर्ष माना जाता है।

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