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सिन्धु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) Sindhu Ghati Sabhyata

सिन्धु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) Sindhu Ghati Sabhyata

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सिन्धु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) Sindhu Ghati Sabhyata

हड़प्पा सभ्यता (सिन्धु घाटी सभ्यता) के टीलों की ओर सर्वप्रथम 1826 ई. में चार्ल्स मैसन  (Charles Masson) ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। 1856 ई. में जॉन ब्रटन (John Brunton) एवं विलियम ब्रटन (William Brunton) ने हड़प्पा के टीलों से प्राप्त ईंटों का प्रयोग लाहौर से करांची तक रेलवे लाईन बिछाने में किया। 1853 ई. एवं 1856 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम (Alexander Cunningham) ने हड़प्पा के टीलों का सर्वे किया।

सर्वप्रथम 1921 ई. में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल (John Marshall) के निर्देशन में राय बहादुर दया राम साहनी (Rai Bahadur Daya Ram Sahni) ने पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) के मोण्टगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित हड़प्पा का अन्वेषण किया।

सिन्धु घाटी सभ्यता का नामकरण :-

इस सभ्यता के लिये तीन नामों- सिन्धु सभ्यता, सिन्धु घाटी की सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता का प्रयोग होता है। जब इस सभ्यता के बहुत से केन्द्रों का उत्खनन सिन्धु नदी घाटी क्षेत्र से बाहर भी हुआ, तो सिन्धु का सभ्यता इसके लिये उपयुक्त नाम नहीं रहा।

पुरातत्व की परम्परा के अनुसार किसी सभ्यता का नामकरण उसके प्रथम उत्खनित स्थल के नाम पर किया जाता है अतः इसका सर्वाधिक उपयुक्त नाम हड़प्पा सभ्यता है।

सर्वप्रथम इस सभ्यता का उत्खनन हड़प्पा नामक स्थान पर 1921 ई. में हुआ। इसी स्थान के नाम पर इसका नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया। अतः तकनीकी रूप से यह हड़प्पा संस्कृति के नाम से जानी जाती है।

सर्वप्रथम जॉन मार्शल ने 1924 ई. में इलस्ट्रेटेड लन्दन न्यूज’ (Illustrated London News) में प्रकाशित लेख में इसे सिन्धु सभ्यता कहा।

जॉन मार्शल की पुस्तक का नाम ‘मोहनजोदड़ो एण्ड द इण्डस सिविलाई जेशन’ (Mohenjo Daro and the Indus Civilization, 1931) है।

मॉर्टिमर व्हीलर (Mortimer Wheeler) ने भी अपनी पुस्तक ‘सिविलाई जेशन्स ऑफ दि इण्डस वेली एण्ड बियोण्ड’ (Civilizations of the Indus Valley and Beyond) में इसे सिन्धु सभ्यता कहा।

एम. आर. मुगल (M.R. Mugal) ने इसे ‘वृहत्तर सिन्धु घाटी सभ्यता’ (Greater Indus Valley Civilization) कहा। इनकी पुस्तक का नाम Early Harappal Culture है।

गॉर्डन चाइल्ड (Gordon Childe) ने सिन्धु सभ्यता को प्रथम नगरीय क्रान्ति कहा। इनकी पुस्तक का नाम The Urban Revolution है ।

हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक संकेन्द्रण सरस्वती घाटी में घग्घर-हाकरा नदी के किनारे है इसलिए कतिपय विद्वान इसे सरस्वती सभ्यता या सिन्धु सरस्वती सभ्यता कहते हैं।

हड़प्पा सभ्यता को तृतीय कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है, कांस्य युग की दो अन्य सभ्यताएं- मिश्र एवं मेसोपोटामिया थी।

सिन्धु सभ्यता के अब तक खोजे गए स्थलों में 917 स्थान भारत में, 481 स्थान पाकिस्तान में और 2 स्थान अफगानिस्तान में हैं। ये आँकड़े नई खोजों के साथ बदलते हैं। इनमें से सर्वाधिक स्थल गुजरात में हैं। विभाजन से पूर्व खोजे गये अधिकांश स्थल विभाजन के बाद पाकिस्तान में चले गये। केवल दो स्थल, सतलज नदी पर कोटला निहंग खां (रोपड़) तथा मादर नदी पर रंगपुर (काठियावाड़) भारत में शेष रहे।

काल निर्धारण :-

हड़प्पा सभ्यता के काल के बारे में विद्वानों के विभिन्न मत

विद्वान निर्धारित तिथि
जॉन मार्शल 3250 ई.पू.-2750 ई.पू.
अर्नेस्ट मैके 2800 ई.पू.-2500 ई.पू.
माधोस्वरूप वत्स 3500 ई.पू.-2700 ई.पू.
सी.जे. गैड 2350 ई.पू.-1750 ई.पू.
मॉर्टिमर ह्वीलर 2500 ई.पू.-1500 ई.पू.
फेयर सर्विस 2000 ई.पू.-1500 ई.पू.
आल्चिन 2150 ई.पू.-1750 ई.पू.
डी. पी. अग्रवाल एवं रोमिला थापर 2300 ई.पू.-1750 ई.पू.
झा एवं श्रीमाली 2800 ई.पू.-2000 ई.पू.
डेल्स 2900 ई.पू.-1900 ई.पू.

सर्वप्रथम जॉन मार्शल ने 1931 ई. में हड़प्पा सभ्यता की तिथि निर्धारित की। सारगोन (मेसोपोटामिया) के अभिलेख के आधार पर हड़प्पा सभ्यता का समय 3250-2750 ई.पू. माना गया है।

रेडियो कार्बन-14 (C-14) :-

रेडियो कार्बन 14 (C-14) के विश्लेषण के आधार पर डी.पी. अग्रवाल द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2300 ई.पू. से 1750 ई.पू. मानी गयी है। यह मत सर्वाधिक मान्य प्रतीत होता है। .रेडियो कार्बन डेटिंग विधि 1949 ई. में विलार्ड फ्रैंक लीबी (Willard Frank Libby) ने विकसित की। इसके लिए लीबी को 1960 ई. का रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया।

जीवधारियों में कार्बन C-14 की मात्रा 5730 वर्षों में घटकर आधी रह जाती है, लेकिन इससे सीसे में आयु ज्ञात नहीं होती।

भारत में रेडियो कार्बन तिथि निर्धारण की पद्धति का प्रयोग सबसे पहले टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फन्डामेन्टल रिसर्च (TIFR), मुम्बई में हुआ।

हड़प्पा सभ्यता का विस्तार/सिंधु सभ्यता का विस्तार :-

क्षेत्र पुरास्थल
अफगानिस्तान मुंडीगाक, शोर्तुगई
बलूचिस्तान (पाकिस्तान) मेहरगढ़, सुत्कागेंडोर, सोत्काकोह बालाकोट, रानाघुंडई, कुल्ली, क्वेटाघाटी, दंबसादात, डाबरकोट
सिन्ध (पाकिस्तान) कोटदीजी, आमरी, मोहनजोदड़ो, अलीमुराद, चन्हूदड़ो, जुदेरजोदड़ो
पंजाब (पाकिस्तान) हड़प्पा, डेरा इस्माइलखान, रहमान ढ़ेरी, जलीलपुर, गुमला
पंजाब (भारत) रोपड़ (रूपनगर), बाड़ा, संघोल, चक- 86
हरियाणा राखीगढ़ी, बनवाली, मीत्ताथल
जम्मू-कश्मीर माण्डा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश आलमगीरपुर, बड़ागाँव, हुलास
राजस्थान कालीबंगा
गुजरात 1. काठियावाड़

2. कच्छ का रन

लोथल, रंगपुर, रोजदी, प्रभासपतन, भगतराव

धौलावीरा, देशलपुर, सुरकोटदा

  • कालीबंगा, बनवाली एवं राखीगढ़ी प्राक्-हड़प्पन स्थल है।
  • रंगपुर एवं रोजदी हड़प्पोत्तर कालीन स्थल हैं।

हड़प्पा सभ्यता का उदय पश्चिमोत्तर भारत में पहले से चली आ रही पाषाण एवं ताम्र-पाषाण सभ्यताओं के निरन्तर विकास के फलस्वरूप हुआ।

विकसित हड़प्पा सभ्यता का मूल केन्द्र पंजाब एवं सिन्ध में था, किन्तु गुजरात, राजस्थान, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के क्षेत्र में भी इस सभ्यता का विस्तार हुआ।

हड़प्पा सभ्यता का विस्तार उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पश्चिम में मकरान के समुद्र तट से लेकर पूर्व में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले तक है।

इसका कुल क्षेत्रफल 13 लाख वर्ग किमी. है। सम्पूर्ण सभ्यता त्रिभुजाकार के रूप में विस्तृत है।

हड़प्पा सभ्यता का भारतीय सीमा में सर्वाधिक उत्तरी पुरास्थल माँडा (जम्मू की चेनाब नदी के दाएँ तट पर) तथा दक्षिणी छोर दैमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) है। उत्तर दक्षिण विस्तार 1400 किमी. है। सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुत्कागेंडोर (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) और पूर्वी पुरास्थल आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) है। पूर्व-पश्चिम विस्तार 1600 किमी. है।

हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उत्तरी छोर मुंडीगाक एवं शोर्तुगई (दोनों अफगानिस्तान) हैं। इन दोनों में भी शोर्तुगई हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उत्तरी छोर है। ये दोनों स्थल हिन्दूकुश पर्वत के उत्तर में स्थित हैं। शोर्तुगई से नहर प्रणाली के साक्ष्य मिले हैं। शोतुंगई की खोज 1976 ई. में हुई। यह आमू दरिया के किनारे स्थित है। मुंडीगाक दक्षिणी अफगानिस्तान में स्थित है।

सैन्धव स्थलों का सर्वाधिक संकेन्द्रण (विस्तार) ‘हकरा-घग्गर'(सरस्वती) मार्ग क्षेत्र में है।

सिन्धु सभ्यता के निर्माता :-

सिन्धु सभ्यता में कम से कम चार प्रजातियाँ थी-

  1. प्रोटो-ऑस्ट्रेलाइड (कॉकेशियन)
  2. भूमध्य सागरीय (मेडिटेरेनियन) इनका सम्बन्ध द्रविड़ जाति से बताया जाता है।
  3. अल्पाइन
  4. मंगोलायड

हड़प्पा सभ्यता के लोग मुख्यतः भूमध्य सागरीय थे।

हड़प्पा सभ्यता के निर्माता संभवतः द्रविड़ थे।

सर्वप्रथम बी. बी. लाल ने प्रतिपादित किया कि हड़प्पा सभ्यता के लोग एवं ऋग्वैदिक आर्य एक ही थे।

विद्वान सिन्धु सभ्यता के निर्माता
डॉ. लक्ष्मण स्वरूप एवं रामचन्द्र आर्य
गॉर्डन चाइल्ड, ह्वीलर, क्रेमर सुमेरियन (मेसोपोटामिया)
राखलदास बनर्जी, सुनीति चटर्जी द्रविड़
अमलानन्द घोष, धर्मपाल अग्रवाल सोथी संस्कृति
फेयर सर्विस, रोमिला थापर ग्रामीण संस्कृति / बलूची ग्रामीण संस्कृति

हड़प्पा सभ्यता का विकास :-

हड़प्पा सभ्यता के विकास के तीन क्रमिक चरण थे-

  1. प्रारम्भिक / प्राकू हड़प्पा (3200 से 2600 ई.पू.)
  2. परिपक्व हड़प्पा (2600 से 1900 ई.पू.)
  3. उत्तर / परवर्ती हडप्पा (1900 से 1300 ई.पू.)

प्राक् हड़प्पा

प्राक् हड़प्पा बस्तियाँ नवपाषाण युग तथा परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के बीच संक्रमण का प्रतिनिधित्व करती है।

हड़प्पा सभ्यता, प्राक् हड़प्पा सभ्यताओं के निरन्तर विकास का परिणाम था।

ये कृषक बस्तियाँ विकसित होकर लगभग 2500 ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता के रूप में परिणत हुई।

एम.आर. मुगल ने चोलिस्तान के उत्खनन के आधार पर इसे प्राक् हड़प्पा/प्रारम्भिक हड़प्पा नाम दिया।

अमलानन्द घोष पहले विद्वान थे, जिन्होंने 1965 ई. में प्राक् हड़प्पा एवं नगरीय हड़प्पा की समानताओं को रेखांकित किया।

प्राक् हड़प्पा सभ्यता स्थल-

बलूचिस्तान – मेहरगढ़, किली गुल मुहम्मद (4555 ई.पू. से 3885 ई.पू.), दंब सादात ( 3370 ई.पू. से 2530 ई.पू.), राना घुंडई (4550 ई.पू. से 3165 ई.पू.), पेरियान-ओ-घुण्डई, नौशारो, कुल्ली, नाल, बालाकोट

मेहरगढ़ से प्रस्तर युग से हड़प्पा संस्कृति तक निरन्तर वास एवं सांस्कृतिक विकास का प्रमाण मिलता है।

मेहरगढ़ प्राक् हड़प्पा का सबसे प्राचीन स्थल है, हड़प्पा संस्कृति की सबसे प्राचीनतम् स्त्री मृणमूर्ति मेहरगढ़ से मिली है और यहाँ एक कब्र से सिर रहित स्त्री की आकृति से युक्त ताम्र-दर्पण मिला है।

नौशारों एवं मेहरगढ़ से स्त्रियों की मृण्मूर्तियों मिली हैं, जिनके मांग में सिन्दूर है।

नाल से गरूड़ आकृति की मुहर मिली है, जो अपने पंजे में सर्प को दबाये हुए है।

 सिन्ध- कोटदीजी, अमरी

कोटदीजी और अमरी अपने सिंधु पूर्व निक्षेपों के लिए प्रसिद्ध हैं। अमरी में हड़प्पा सभ्यता के शुरू होने के पहले ही अपनी बस्तियों की किलेबन्दी हो गई थी।

अमरी में पुरानी, सिन्धु- पूर्व संस्कृति और परवर्ती सिन्धु सभ्यता के बीच का संक्रमण काल परिलक्षित होता है।

कोटदीजी :-

कोटदीजी सिन्ध प्रान्त के खैरपुर में स्थित है। इसकी खोज जी. एस. घुर्ये (G.S. Ghurye) ने 1935 ई. में की। 1955 ई. में फजल अहमद ने इसकी खुदाई करवाई।

यहाँ से सामुदायिक अग्नि स्थल मिले हैं। कोटदीजी का अन्त दो भयंकर अग्निकाण्डों से हुआ।

कोटदीजी के मृद्भाण्डों पर सींग वाले देवता का अंकन है।

कोटदीजी एवं अमरी सिन्ध के दो प्राक्-हड़प्पा स्थल हैं। संभवत: पाषाण युगीन सभ्यता का अन्त एवं हड़प्पा सभ्यता का विकास यहाँ हुआ।

यहाँ से प्राप्त मुख्य अवशेष बाणाग्र, काँस्य की चूड़ियाँ हथियार

कोटदीजी से पत्थर के बाणाग्र और किलेबन्द बस्ती के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

कोटदीजी के अलावा प्राक् हड़प्पा सीलों (मुहरों), कालीबंगा एवं पादरी के मृद्भाण्डों पर भी सींग वाले देवता का अकंन है।

आमरी का उत्खनन एन.जी. मजूमदार ने किया। यहाँ बारहसिंगा का साक्ष्य मिला है।

गैंडा (Rhino) की हड्डियाँ केवल आमरी से ही मिली हैं।

गोमल घाटी- रहमान ढ़ेरी, गुमला।

पंजाब (पाकिस्तान)- सराय खोला, जलीलपुर आदि सिंधु घाटी की आरंभिक बस्तियाँ थी।

चोलिस्तान रेगिस्तान पाकिस्तान पंजाब के बहावलपुर में है, तुर्की । भाषा में चोल शब्द का अर्थ रेगिस्तान है। स्थानीय भाषा में इसे ‘रोही’ कहा जाता है। हकरा नदी का सूखा पाट इस क्षेत्र में है। यहाँ पर हड़प्पा सभ्यता के बहुत से स्थल खोजे गये हैं। इसमें गनेड़ीवाल प्रमुख है। पाकिस्तान के पुरातत्वविद् रफीक मुगल ने चोलिस्तान क्षेत्र में उत्खनन करवाया है। रफीक मुगल की पुस्तक है- Ancinet cholistan: Archaeology and architecture

राजस्थान कालीबंगा, सोथी।

कालीबंगा में दक्षिण-पूर्वी भाग में जुते हुए खेत के साक्ष्य, जौ की खेती के साक्ष्य, दुर्गीकरण एवं भूकम्प के साक्ष्य प्राक् हड़प्पा काल के है। सोथी की खाज अमलानन्द घोष ने की थी।

हरियाणा- राखीगढ़ी, बनावली, कुणाल, बालू, भीराना, सिसवाल। ।

पंजाब (भारत)- रोहिला, मसोरना

प्राक् हड़प्पा में ईंटों का अनुपात 3:2:1 था।

परिपक्व हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा :- पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के पुराने मोण्टगोमरी जिले तथा वर्तमान शाहीवाल जिले में रावी नदी के बाँये तट पर स्थित हड़प्पा के टीले की सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मैसन (Charles) Masson) ने दी।

1921 ई. में दया राम साहनी ने इसका सर्वेक्षण किया तथा बाद में इस स्थान पर उत्खनन प्रारम्भ हुआ।

1926 ई. में माधोस्वरूप वत्स तथा 1946 ई. में मॉर्टिमर ह्वीलर (Mortimer Wheeler) ने हड़प्पा का व्यापक स्तर पर उत्खनन कराया।

हड़प्पा को तोरणद्वार का नगर एवं अर्द्ध औद्योगिक नगर कहा जाता है।

हड़प्पा के दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिम टीले को दुर्ग टीला कहा जाता है।

दुर्ग टीले को ह्वीलर ने माउण्ड ए बी की संज्ञा दी है।

हड़प्पा के आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक कब्रिस्तान है, जिसे कब्रिस्तान आर-37/कब्रिस्तान H नाम दिया गया है, जिसका उत्खनन जे.एम. केनोयर (J.M. Kenoyer) ने किया। शव काष्ठ पेटिका मिली है जो देवदार की लकड़ी की बनी थी। यहाँ के कंकालों में गठिया / जोड़ों के दर्द की बीमारी अधिक पाई गई।

पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों को सिन्धु सभ्यता की जुड़वा राजधानी कहा था हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के बीच की दूरी 640 किमी है।

गढ़ भाग के उत्तर में एक अन्य टीला मिला है, जिसे माउण्ड एफ कहा गया है।

हड़प्पा से मिला सबसे विशाल अवशेष 6-6 की दो पंक्तियों में निर्मित कुल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार का है। यह अन्नागार हड़प्पा सभ्यता के समस्त केन्द्रों से मिले अवशेषों में लोथल के गोदीबाड़े के बाद सबसे विशाल है। प्रत्येक अन्नागार 50 x 20 फीट का है। 10.अन्नागार, नगर के पश्चिम द्वार के पास है। इसे व्हीलर ने शस्त्रागार परिसर कहा है।

हड़प्पा के सभी घरों से शौचालय के अवशेष मिले हैं।

ऋग्वेद के हरियूपिया का समीकरण हड़प्पा से किया गया है।

हड़प्पा से मिले अन्य महत्वपूर्ण अवशेष :-

कर्मचारियों के आवास एवं मजदूरों के बैरक (श्रमिक आवास) ।

पीतल की इक्का गाड़ी।

एक मुद्रा पर पैर में साँप दबाये गरूड़ का चित्रण।

स्त्री के गर्भ से निकलते हुए पौधे वाली मृणमूर्ति। (मार्शल ने इसे पृथ्वी माता कहा है।)

नरकबंध प्रस्तर (पुरुष के धड़ की पाषाण मूर्ति ) ।

ईंटों के वृत्ताकार चबूतरे।

दो पाषाण मूर्ति-लाल पत्थर की मानव मूर्ति एवं काले पत्थर की नर्तक की मूर्ति ।

मुख्य स्थल

स्थल उत्खनन वर्ष उत्खनन कर्ता स्थल की स्थिति नदी
हड़प्पा 1921 दया राम साहनी शाहीवाल (पंजाब, पाकिस्तान) रावी
मोहनजोदड़ो 1922 राखल दास बनर्जी लरकाना (सिन्ध, पाकिस्तान) सिन्धु
सुत्कागेंडोर 1927 आर.एल. स्टाइन बलूचिस्तान (पाकिस्तान) दाश्क
चन्हूदड़ो 1931 एन. जी. मजूमदार सिन्ध (पाकिस्तान) सिन्धु
डाबर कोट 1935 अर्नेस्ट मैके बलूचिस्तान (पाकिस्तान) झोबघाटी
कोटदीजी 1935 घुर्ये सिन्ध (पाकिस्तान) सिन्धु
रोपड़ 1953 यज्ञदत्त शर्मा पंजाब (भारत) सतलज
राखीगढ़ी 1969 सूरजभान, रफीक मुगल हिसार (हरियाणा) घग्घर
बनावली 1973 रवीन्द्र सिंह बिष्ट फतेहाबाद (हरियाणा) घग्घर
धौलावीरा 1990-91 रवीन्द्र सिंह बिष्ट कच्छ (गुजरात)
देसलपुर 1963-64 पी.पी. पांड्या, एम.ए. धाके कच्छ (गुजरात)
लोथल 1957 एस. आर. राव अहमदाबाद (गुजरात) भोगवा
सुरकोटड़ा 1972 जगपति जोशी कच्छ (गुजरात)
 रंगपुर 1933 माधोस्वरूप वत्स अहमदाबाद (गुजरात) मादर
आलमगीरपुर 1958 यज्ञदत्त शर्मा मेरठ (उत्तरप्रदेश) हिण्डन
कालीबंगा 1953 अमलानन्द घोष हनुमानगढ़ (राजस्थान) घग्घर
दैमाबाद 1974-79 एस.ए. सली अहमदनगर (महाराष्ट्र) प्रवरा
सोत्का कोह 1962 डेल्स बलूचिस्तान (पाकिस्तान) शादीकौर
मांडा 1976-77 मधु बाला एवं जे.पी. जोशी जम्मू (भारत) चिनाब

हड़प्पा से मिले अन्य महत्वपूर्ण अवशेष :-

  • गेहूँ तथा जौ के दाने।
  • एक बर्तन पर बना महुआरों का चित्र
  • शंख का बना बैल
  • धूसर पाषाण की पुरुष नर्तक आकृति।
  • ताँबे की मानवाकृतीय आकृति (Anthropomorphic Figure )
  • प्रसाधन मंजूषा
  • काँसे का दर्पण।
  • मनुष्य के शव के साथ बकरे का अस्थिपंजर
  • पशुओं की हड्डियों का ढेर।

हड़प्पा से एच आर समाधि, 16 ताम्र भट्टियाँ, 6 लड़ियों के सोने का हार, तांबे की मुहर, 5 ताँबे के कटार, हिरण पर आक्रमण करते कुत्ते की पीतल मूर्ति, ताँबे का पैमाना, गधे एवं कछुए की हड्डियाँ, अन्न कूटने के चबूतरे, मुहर पर गरूड़ का अंकन, मुहर पर समारोह का दृश्य आदि भी मिले हैं।

यहाँ से कब्रिस्तान संस्कृति के साक्ष्य भी मिले हैं।

हड़प्पा से लकड़ी के ताबूत (Wooden Coffin) में शवाधान साक्ष्य प्राप्त हुआ है। इसे विदेशी की कब्र माना जाता है।

सर्वाधिक अभिलेख युक्त मुहरे हड़प्पा से प्राप्त हुई हैं, जबकि सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ों से मिली हैं।

मोहनजोदड़ो- (सिन्ध का नखलिस्तान) :-

सिन्धी भाषा में मोहन जोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है, ‘मृतकोंका टीला’।इसे मुर्दों का भाटा भी कहा जाता है।

मोहनजोदड़ो के उपनाम- सिन्ध का बाग, सिन्ध का नखलिस्तान, रेगिस्तान का बगीचा, स्तूपों का शहर आदि हैं।

मोहनजोदड़ो सिन्ध के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के दाहिनें तट पर स्थित है। उसकी खोज राखलदास बनर्जी (Rakhaldas Bandyopadhyay, also known as R. D. Banerji) ने 1922 ई. में की। यहाँ से सभ्यताओं के सात क्रमिक स्तर मिले हैं। बाढ़ के कारण मोहनजोदड़ो सात बार उजड़ा एवं बसा।

1930 के दशक में अर्नेस्ट मैके, 1945 में व्हीलर तथा 1965 में जॉर्ज डेल्स ने मोहनजोदड़ों का उत्खनन किया।

वृहत् स्नानागार:-

मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल विशाल स्नानागार है। स्नानागार किले / दुर्ग के टीले में है। स्नानागार के उत्तर एवं दक्षिण पार्श्व में तालाब में उतरने हेतु 9-9 सीढ़ियाँ बनी थी।

यह स्नानागार धार्मिक उद्देश्यों के लिये स्नान हेतु निर्मित हुआ था। यह 39 फीट लम्बा, 23 फीट चौड़ा एवं 8 फीट गहरा है। जॉन मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण कहा है।

बृहत् स्नानागार की तुलना डी. डी. कोशाम्बी ने पुष्कर/कमलताल से की है।

विश्व में वाटर प्रूफिंग का पहला उदाहरण मोहनजोदड़ो स्नानागार से ही मिला है।

मोहनजोदड़ों के विशाल स्नानागार के निर्माण में बिटुमिन का प्रयोग हुआ है।

अन्नागार:-

मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत इसका विशाल अन्नागार है। यह 45.71 मीटर लम्बा और 15.23 मीटर चौड़ा है।

अन्नागार किले के बाहर या नदियों के तट पर स्थित होते थे, लेकिन मोहनजोदड़ों का अन्नागार किले के अन्दर था।

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल एवं कालीबंगा से अनागार का साक्ष्य मिला है।

सड़कें :-

मोहनजोदड़ो में ग्रिड पैटर्न पर समानान्तर सड़कों का जाल बिछा हुआ था।

टीले:-

मोहनजोदड़ो के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग टीले के ऊपर कुषाण शासक कनिष्क ने एक स्तूप का निर्माण करवाया था, अतः इसे स्तूप टीला/आध्यात्मिक नगर भी कहा जाता है।

पश्चिम दुर्ग टीले की खोज व्हीलर ने की। पूर्वी टीले को HR, VS, DK क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। मोहनजोदड़ो की शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक न होकर जनतन्त्रात्मक थी।

मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्य अवशेष-

  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त सबसे महत्त्वपूर्ण धातु निर्मित मूर्तियों में कांस्य नर्तकी (Dancing Girl) एवं प्रस्तर की योगी / पुजारी की मूर्ति है।
  • काँसे की नृत्यरत नारी की मूर्ति 14 से मी. ऊँची है।
  • यूनिकॉर्न प्रतीक वाली दो चाँदी की मुहरें मिली है।
  • सर्वाधिक भारी बटखारा (Goblet) मोहनजोदड़ो से ही मिला है।
  • वस्त्र निर्माण का एवं चाँदी का प्राचीनतम् साक्ष्य मोहनजोदड़ो से मिला है।
  • मोहनजोदड़ों के मृद्भाण्डों पर काँच के समान ओपकारी की गई है, जो विश्व में ओपकारी का पहला प्रमाण है।
  • महाविद्यालय भवन (पुरोहितों का महाविद्यालय/ कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स (College of Priests)
  • मुद्रा पर अंकित पशुपतिनाथ (शिव) की मूर्ति ।
  • सूती कपड़ा।
  • हाथी का कपालखण्ड
  • कुम्भकारों के 6 भट्टे ।
  • कुम्भकारों की बस्ती।
  • गले हुए ताँबे के ढेर।
  • सीपी की बनी हुई पटरी
  • घोड़े के दाँत एवं घोड़े की मृण्मूर्ति, ऊँट की हड्डियाँ।
  • गीली मिट्टी पर कपड़े के साक्ष्य।
  • अन्तिम स्तर पर बिखरे हुये नर कंकाल ।
  • कूबड़दार बैल का खिलौना।
  • बकरे के पीछे चाकू लिए हुए व्यक्ति का चित्रण
  • स्तम्भों वाला भवन।
  • मुहर पर सुमेरियन नावों का अंकन।
  • चाँदी का कलश एवं शिलाजीत।
  • ताँबे की हेयरपिन ।
  • श्लाकायुक्त तलवारें ।
  • काँस्य निर्मित भैसें एवं मेढें की आकृतियाँ।
  • वृषभ मुद्रा
  • सर्वाधिक कुओं की प्राप्ति।
  • पट्टेदार जल निकासी।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त पत्थर की नृत्यरत आकृति को जॉन मार्शल ने नटराज शिव कहा है।
  • मोहनजोदड़ो से चाँदी के बर्तन में कपड़े के अवशेष तथा ताँबे के उपकरणों को लपेटे सूत का कपड़ा एवं धागा मिला है।

के.यू. आर. केनेडी (K.U.R. Kennedy) को मोहनजोदड़ो के कंकालों से मलेरिया के साक्ष्य मिले हैं, जबकि ह्वीलर ने नर कंकालों के आधार पर संहार सिद्धान्त दिया।

  • मोहनजोदड़ो से किसी कब्रिस्तान के साक्ष्य नहीं मिले हैं।
  • मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा के मकान पक्की ईंटों के बने हैं।
  • यहाँ से प्राप्त एक प्रसिद्ध मुहर के अग्रभाग पर योगी की आकृति और पश्च भाग पर बैल (वृषभ) की आकृति अंकित है।
  • सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं।

चन्हूदड़ो :-

मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ो की खोज 1931 ई. में एन.जी. मजूमदार ने की थी। इसका उत्खनन 1935 ई. में अर्नेस्ट मैके ने किया।

चन्हूदड़ो से हड़प्पोत्तर संस्कृति, जिसे झूकर संस्कृति और झांगर संस्कृति कहते हैं, के अवशेष मिले हैं। झूकर के बाद झांगर संस्कृति आई झुकर में शहरीकरण का अभाव है। पत्थर के बाट एवं नारी की टेराकोटा मूर्तियाँ भी झूकर संस्कृति में नहीं मिली हैं।

चन्हूदड़ो मनके बनाने का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ के कारीगर सीप एवं मुद्रा (मुहरें) भी बनाते थे। यहाँ गुरिया निर्माण का कारखाना भी मिला है। मुहरें काटने के लिए धातु के उपकरण मिले हैं।

चन्हूदड़ो हड़प्पा सभ्यता का औद्योगिक केन्द्र था।

चन्हूदड़ो एकमात्र पुरास्थल है, जहाँ से वक्राकार ईंटें (इंटरलॉक)मिली हैं। चन्हूदड़ो से किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिला है।

चन्हूदड़ो से प्राप्त प्रमुख अवशेष :-

  • अलंकृत हाथी के खिलौने
  • बिल्ली का पीछा करते हुये कुत्ते के पद-चिह्न।
  • सौंदर्य प्रसाधन- लिपिस्टिक
  • स्याही की दवात।
  • बैल गाड़ी तथा इक्का गाड़ी

अलीमुराद :-

  • यह सिंध में स्थित ग्रामीण स्थल था।
  • अलीमुराद में एक कुआँ भी मिला है।

लोथल :-

अहमदाबाद (गुजरात) में भोगवा एवं साबरमती नदी के संगम पर खंभात की खाड़ी में स्थित लोथल की खोज 1957 ई. में एस. आर. राव ने की थी। 2.लोथल को एस. आर. राव ने लघु-हड़प्पा एवं लघु-मोहनजोदड़ो कहा।

यहाँ से आवासीय क्षेत्रों में (घरों से) वृत्ताकार/चतुर्भुजाकार अग्निवेदी मिली है।

लोथल हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख बन्दरगाह था। यहाँ से पश्चिमी एशिया से व्यापार होता था।

लोथल में गढ़ और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।

पश्चिम दुर्ग क्षेत्र को एस. आर. राव ने एक्रोपॉलिस (Acropolis) की संज्ञा दी है

लोथल में दुर्ग पश्चिम में नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्व में स्थित था।

लोथल के पूर्वी भाग में जहाज की गोदी (डॉक-यार्ड) मिली है। इसका आकार 214×36 मीटर है तथा गहराई 3.30 मीटर है। यह पक्की ईंटों से बना है। लोथल का गोदीबाड़ा सबसे विशाल हड़प्पा संरचना है।

हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी संरचना क्रमशः लोथल का गोदीबाड़ा, हड़प्पा का अन्नागार, मोहनजोदड़ो का अन्नागार, मोहनजोदड़ो का स्नानागार है।

कालीबंगा के समान छिद्रयुक्त बालक की खोपड़ी मिली है, जो खोपड़ी पर शल्य चिकित्सा का प्राचीनतम् प्रमाण है।

लोथल से मिली फारस की मुहर और पक्के रंग में रंगे हुए पात्रों के मिलने से यह पता लगता है, कि लोथल पश्चिमी एशिया से सामुद्रिक व्यापार का एक प्रमुख केन्द्र था।

यहाँ से चावल का प्रथम साक्ष्य मिला है।

लोथल से मिली प्रमुख वस्तुएँ :-

  • डॉक-यार्ड (गोदीबाड़ा ) ।
  • धान (चावल) एवं बाजरे का साक्ष्य।
  • फारस की मुहर
  • तीन युगल समाधियाँ (एस.आर. राव ने इसे सती प्रथा का प्रतीक माना है।)
  • घोड़े की लघु मृणमूर्ति।
  • मिट्टी की ‘ममी’ का मॉडल।
  • नावों के पाँच मॉडल।
  • दो मोहरें।
  • हाथीदाँत का स्केल।
  • लकड़ी का अन्नागार।
  • गोरिल्ला की मृणमूर्ति।
  • बतख, खरगोश, कुत्ता एवं वृषभ की ताँबे की मूर्ति।
  • ताँबे की कार्यशाला।
  • दिशा सूचक यंत्र।
  • बाट एवं माप ईकाई तथा पाषाण उपकरण
  • वृत्ताकार चक्की के दो पाट
  • लोथल की समुद्री देवी का नाम सिकोतरी माता था।
  • यहाँ से अग्निकुण्ड के साक्ष्य मिले हैं।
  • लोथल में कब्रों में कंकालों के सिर उत्तर में तथा पैर दक्षिण दिशा की ओर मिले हैं।
  • यहाँ से प्राप्त एक मृद्भाण्ड पर एक कौवा तथा एक लोमड़ी उत्कीर्ण है। इसका साम्य पंचतन्त्र की कथा चा लोमड़ी से किया गया है।
  • लोथल से मालिक के साथ बकरी दफनाये जाने का साक्ष्य मिला है।
  • लोथल में मिले एक मकान में दरवाजा गली की तरफ न खुलकर सड़क की ओर खुलता था, जबकि संपूर्ण हड़प्पा सभ्यता के अन्य मकानों में दरवाजे गली की तरफ खुलते थे।
  • एस. आर. राव ने युगल समाधियों को सती प्रथा का प्रतीक माना है।

कालीबंगा-

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा की खोज प्राचीन सरस्वती के बाएँ तट पर अमलानन्द घोष (Amalananda Ghosh) ने 1953 ई. में की। यहाँ के उत्खनन से हड़प्पा कालीन सांस्कृतिक युग के पाँच स्तर मिले हैं।

दशरथ शर्मा ने इसे हड़प्पा सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा था।

कालीबंगा से प्राक्-हड़प्पा एवं हड़प्पा काल के अवशेष मिले हैं। यहाँ से हड़प्पोत्तर सभ्यता के अवशेष भी मिले हैं। 1961 ई. में बी. के. थापर (Bal Krishan Thapar) एवं बी.बी. लाल (Braj Basi Lal) ने भी कालीबंगा में उत्खनन कराया।

कालीबंगा से प्राक्-हड़प्पा काल के ‘जुते हुए खेत का साक्ष्य’ मिला है।

जालीदार जुताई तथा दो फसलों (चना एवं सरसों) की एक साथ बुआई का साक्ष्य कालीबंगा से मिला है।

कालीबंगा से सात आयताकार ‘हवन-कुण्ड’ या ‘अग्नि-कुण्ड’के साक्ष्य भी मिले हैं।

कालीबंगा से बेलनाकार मुहर मिली है, जो समकालीन मेसोपोटोमिया सभ्यता में प्रचलित थी। 8.यहाँ से एक युगल समाधि तथा प्रतीकात्मक समाधि भी मिली है।

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो एवं कालीबंगा में एक सी नगर योजना थी, परन्तु मोहनजोदड़ो के विपरीत कालीबंगा के घर कच्ची ईंटों के बने हैं। अतः कालीबंगा दीन-हीन बस्ती प्रतीत होती है।

सार्वजनिक नाली नहीं मिली है, लेकिन लकड़ी की नाली मिली है। इस प्रकार यहाँ स्पष्ट शहरी जल निकास प्रणाली का अभाव दिखाई देता है।

कालीबंगा से अपवादस्वरूप पक्की सड़क मिली है।

कालीबंगा में पश्चिमी टीले के दो पृथक-पृथक परन्तु परस्पर संबद्ध खण्ड (दुर्ग का द्विभागीकरण सिर्फ यहीं से मिलता है।) हैं। एक टीले में जनसंख्या का विशिष्ट वर्ग निवास करता था तथा दूसरे टीले पर हवन कुण्डों के अस्तित्व के साक्ष्य मिले हैं।

इसके पश्चिम में कब्रिस्तान है।

कालीबंगा में दुर्ग एवं नगर क्षेत्र दोनों अलग-अलग रक्षा प्राचीर से घिरे थे।

किसी अन्य हड़प्पा नगर में निचला नगर रक्षा प्राचीर से नहीं लेय है, लेकिन नवीन उत्खनन से पता चला है, कि हड़मा एवं मोहनजोदड़ों के निचले भाग भी रक्षा प्राचीर से घिरे थे।

कालीबंगा में कोई स्पष्ट जल निकास प्रणाली नहीं थी।

कालीबंगा में शवों की अंत्येष्टि के लिये तीन विधियों पूर्ण समाधिकरण; आंशिक समाधिकरण एवं दाह-संस्कार के प्रमाण मिले हैं।

यहाँ से मिली सेलखड़ी की मुहरों एवं मिट्टी की छोटी मुहरों से हड़प्पा कालीन लिपि के समान अश्वर मिले हैं। अलंकृत ईंट एवं पूरा हाथी- दाँत केवल कालीबंगा से मिला है।

कालीबंगा से मिले प्रमुख अवशेष-

  • बेलनाकार मुहर।
  • ईंटों से निर्मित चबूतरे।
  • फर्श में अलंकृत ईंटों का प्रयोग।
  • हल के निशान (जुते हुए खेत के साक्ष्य)।
  • हवन कुण्ड ।
  • युगल तथा प्रतीकात्मक समाधियाँ।
  • ऊँट की अस्थियाँ (मोहनजोदड़ो से भी ऊँट की हड्डियाँ मिली है।)।
  • खिलौना गाड़ी एवं पहिये।
  • ताँबे की आक्रामक मुद्रा में वृषभ मूर्ति।
  • सिलबट्टा।
  • मृणपट्टिका पर सींगयुक्त देवता की आकृति का अंकन।
  • हाथीदांत की कंघी।
  • एक पल्ले वाला दरवाजा
  • कालीबंगा के अनेक घरों में अपने-अपने कुएँ थे।
  • कालीबंगा से मिट्टी की काले रंग की चूड़ियाँ प्राप्त हुई हैं,
  • अतःइसका नाम कालीबंगा रखा गया।
  • कालीबंगा से मातृदेवी की कोई मूर्ति नहीं मिली है।
  • कालीबंगा एवं लोथल से खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के प्रमाण मिले हैं।

बनावली-

यह समृद्ध लोगों का नगर था। बनावली (Banawali) हरियाणा के फतेहाबाद जिले में रंगोई नदी के तट पर स्थित है। इस पुरास्थल की खोज रवीन्द्र सिंह बिष्ट (Ravindra Singh Bisht) ने 1973 ई. में की थी।

बनवाली में भी कालीबंगा की तरह प्राक्-हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति मिलती है।

बनवाली में जल निकास प्रणाली, जो सिन्धु सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी, का अभाव है।

बनावली से प्राप्त कुछ प्रमुख अवशेष –

  • खिलौने के रूप में हल आकृति/मिट्टी का हल (हल का टेरीकोटा मॉडल)।
  • जौ के अवशेष।
  • तिल एवं सरसों के ढेर।
  • ताँबे के बाणाग्र
  • सेलखड़ी एवं पकाई मिट्टी की मुहरें, जिन पर सैन्धव लिपि है।
मातृदेवी की लघुमृणमूर्तियाँ, आरायुक्त मृणपहिया। 7.मिट्टी के बर्तन, धावन पात्र (Wash Basin)

सुरकोटदा-

गुजरात के कच्छ जिले में स्थित सुरकोटदा (Surkotada) की खोज सर्वप्रथम 1960 ई. में जगपति जोशी ने की। यहाँ से प्राचीर युक्त बस्ती मिली है।

सुरकोटदा हड़प्पा सभ्यता के पतन को दर्शाता है।

सुरकोटदा के अन्तिम स्तर से घोड़े की अस्थियाँ मिली हैं। यह महत्वपूर्ण खोज है, क्योंकि घोड़े की अस्थियाँ अन्य किसी भी हड़प्पा-कालीन स्थल से नहीं मिली हैं।

पाकिस्तान की स्वात घाटी में गालिगाई, बलुचिस्तान में पिराक तथा महाराष्ट्र में इनामगांव से घोड़े के साक्ष्य मिले हैं।

सुरकोटदा से प्राप्त प्रमुख अवशेष –

  • घोड़े की हड्डियाँ
  • विशेष प्रकार के कब्रगाह (चार कलश शवधानों के साक्ष्य ) ।
  • तराजू का पलड़ा।
  • शॉपिंग कॉम्पलेक्स।

रंगपुर:

  • रंगपुर अहमदाबाद जिले में स्थित है।
  • इसकी खोज 1931 ई. में एम.एस.वत्स (M.S. Vats) ने की तथा 1953 ई. में एस. आर. राव ने खुदाई की।
  • रंगपुर से न तो कोई मुद्रा और न ही कोई मातृदेवी की मूर्ति मिली है।
  • यहाँ से कच्ची ईंटों का दुर्ग भी मिला है।
  • रंगपुर तथा प्रभास पत्तन (सोमनाथ) सिन्धु सभ्यता के औरस पुत्र (Direct Descendents) हैं।
  • रंगपुर में सैन्धव सभ्यता के उत्तर-कालीन अवशेष मिले हैं।

 रोजदी-

यह स्थल गुजरात में भादर नदी (Bhadar River) के उत्तरी तट पर स्थित है।

रोजदी से हाथी के अवशेष मिले हैं।

मालवण-

यह काठियावाड़ (गुजरात) के सूरत जिले में ताप्ती नदी के निचले मुहाने पर स्थित है। संभवतः यह हड़प्पा सभ्यता का एक बन्दरगाह था।

मालवण का पता एफ. आर. आल्चिन (F.R. Allchin) तथा जे.पी.जोशी (J.P. Joshi) ने 1967 ई. में लगाया तथा 1970 ई. में सीमित उत्खनन करवाया।

मालवण से लाल, चमकीले लाल, काले एवं लाल इत्यादि प्रकार के मृद्भाण्ड मिले हैं, जो इस बात का द्योतक है कि मालवण मध्य भारतीय दक्कनी और सौराष्ट्र के ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति का संगम स्थल था।

यहाँ से ताँबे एवं काँसे के उपकरण, साँड की मृणमूर्तियाँ, कार्नीलियन के मनके, जंगली तथा पालतू पशुओं की हड्डियाँ मिली हैं।

राखीगढ़ी-

यह हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। यहाँ रफीक मुगल (Rafique Mughal) ने खोज की। राखीगढ़ी प्राक्-हड़प्पा स्थल है। यहाँ से सिंधु लिपि युक्त एक लघुमुद्रा भी प्राप्त हुई है। यहाँ से बच्चों के पिट्टु खेल का साक्ष्य भी मिला।

राखीगढ़ी सिन्धु सभ्यता के पाँच बड़े नगरों में से एक है। यह भारत में सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन नगर है।

मीत्ताथल –

हरियाणा के भिवानी जिले में स्थित है। यहाँ 1968 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय के तत्त्वावधान में सूरजभान ने उत्खनन करवाया। यहाँ से ताँबे की कुल्हाड़ी मिली है।

कुनाल-

हरियाणा के हिसार जिले में सरस्वती नदी के किनारे स्थित कुनाल नामक स्थान से दो चाँदी के मुकुट प्राप्त हुए हैं।

कुनाल की खोज जगपति जोशी एवं रवीन्द्र सिंह बिष्ट ने 1974 ई. में की।

धौलावीरा-

धौलावीरा गुजरात के कच्छ जिले की भचाऊ तहसील में स्थित है। इसकी खोज 1967-68 ई. में जगपति जोशी ने की, लेकिन इसका  व्यापक उत्खनन रवीन्द्र सिंह बिष्ट ने 1990-91 ई. में किया। यह सात सांस्कृतिक चरणों में बांटा गया है। यह मानसर एवं मानहर नदियों के बीच कादिरा द्वीप पर स्थित था। 2.धौलावीरा सफेद कुआँ/वीरा का कुआँ, आयताकार नगर कहलाता है।

हड़प्पा सभ्यता की पहली खगोलीय पर्यवेक्षणशाला धौलावीरा से मिली है।

धौलावीरा की रक्षा प्राचीर पत्थर से निर्मित थी।

सुनामी जैसे समुद्री तूफान का प्राचीनतम् साक्ष्य यहाँ से मिला है। यहाँ 16 तालाब भी मिले हैं।

राखीगढ़ी एवं धौलावीरा भारत में खोजे गये सबसे बड़े हड़प्पा कालीन नगर हैं तथा भारतीय उपमहाद्वीप में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा एवं बहावलपुर में गनेड़ीवाल (सभी पाकिस्तान में) के बाद राखीगढ़ी स चौथा सबसे बड़ा हड़प्पा-कालीन नगर है।

नोट :- 2015-16 ई. में हुई खोज के आधार पर राखीगढ़ी का क्षेत्रफल 410 हेक्टयर माना गया है। इस आधार पर कुछ विद्वान राखीगढ़ी को समस्त हड़प्पा स्थलों में सबसे बड़ा मानते हैं।

राखीगढ़ी एवं धौलावीरा के बाद कालीबंगा देश का तीसरा सबसे बड़ा पुरातात्त्विक स्थल है।

जहाँ अन्य हड़प्पाकालीन नगर दो भागों, किला (दुर्ग) तथा निचले नगर में विभाजित थे, वहीं धौलावीरा तीन भागों में विभाजित है। इनमें से दो भाग आयताकार दुर्गबन्दी में पूरी तरह सुरक्षित थे। ऐसी दुर्गबन्दी या नगर योजना अन्य हड़प्पाकालीन नगरों में देखने को नहीं मिलती है। शासक वर्ग एवं अधिकारी वर्ग मध्यमा (मध्य नगर) में निवास करते थे।

धौलावीरा को छोड़कर सिन्धु सभ्यता के शेष सभी नगरों के पश्चिमी भाग स्थित दुर्ग में प्रशासनिक या धार्मिक क्रियाकलाप किया जाता था।

धौलावीरा से खेल के स्टेडियम तथा सूचना पट्ट या साइन बोर्ड (Sign Bord) के साक्ष्य मिले हैं।

इसमें 10 अक्षर हैं, प्रत्येक अक्षर 37 सेमी लम्बा एवं 27 सेमी चौड़ा है।

धौलावीरा से बाँध निर्माण/कृत्रिम जलाशय (जल संग्रहण) / उत्कृष्ट जल प्रबन्धन (वाटर हार्वेस्टिंग) के साक्ष्य भी मिले हैं।

राजसभा के अवशेष का प्रमाण, गिरगिट की प्रतिमा, नेवले की पाषाण मूर्ति, पॉलिशदार श्वेत पाषाण स्तम्भ धौलावीरा से मिले हैं।

प्राचीनतम् काल का सबसे बड़ा बन्दरगाह धौलावीरा से मिला है।

सबसे मोटी एवं सर्वाधिक सुरक्षा प्राचीर तथा सर्वाधिक प्रवेश द्वार धौलावीरा से मिले हैं।

धौलावीरा के उत्थान एवं पतन के सात सांस्कृतिक चरण प्राप्त होते हैं।।

रोपड-

रोपड़ पंजाब में सतलज नदी के बाएं तट पर स्थित है। इसकी खोज 1950 ई. में बी. बी. लाल ने की तथा उत्खनन 1953-56 ई. में यज्ञदत्त शर्मा किया।

स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में खोजा गया एवं उत्खनित प्रथम स्थल रोपड़ है एवं दूसरा कालीबंगा था।

रोपड़ की खुदाई से हड़प्पा से लेकर गुप्त एवं मध्यकाल तक की संस्कृति के छः स्तरीय क्रम मिले हैं।

रोपड़ से मानव की कब्र के साथ कुत्ते के शवाधान के प्रमाण भी मिले हैं। किसी अन्य हड़प्पाकालीन स्थल से ऐसे साक्ष्य नहीं मिले हैं, परन्तु इस प्रकार की प्रथा नव पाषाणकाल में बुर्जहोम में प्रचलित थी।

संघोल-

पंजाब के लुधियाना जिले में स्थित संघोल की खुदाई एस. एस. तलवार तथा रवीन्द्र सिंह बिष्ट ने करवाई।

संघोल से सिन्धु सभ्यता के अंतिम स्तर से लेकर चित्रित धूसर मृद्भाण्ड तथा ऐतिहासिक काल के अवशेष मिले हैं। दीवारें कच्ची ईंटों की बनी थी।

संघोल से कुछ वृत्ताकार गर्त मिले हैं जो अग्नि स्थल के रूप में प्रयुक्त हुए लगते हैं।

यहाँ से ताँबे की दो छैनियाँ, मिट्टी की चूड़ियाँ, बाली एवं मनके भी मिले हैं।

बाड़ा-

 पंजाब में रोपड़ के पास ही बाड़ा नामक स्थल से पतनोन्मुख हड़प्पा संस्कृति के मृद्भाण्ड मिले हैं।

मांडा-

माँडा (जम्मू) चिनाब नदी के दाएँ तट पर अखनूर के पास स्थित है। यहाँ से हड़प्पा एवं ऐतिहासिक युग से संबंधित संस्कृति का त्रि-स्तरीय क्रम प्राप्त हुआ है।

आलमगीरपुर-

यह गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में यमुना की सहायक हिण्डन नदी के बाएँ तट पर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित है। हड़प्पा सभ्यता के इस सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल की खोज भारत सेवक समाज के तत्त्वावधान में यज्ञदत्त शर्मा के नेतृत्व में 1958 ई. में हुई।

भीराना-

हरियाणा स्थित भीराना (Bhirrana, also Bhirdana and Birhana) से प्राप्त लाल मृद्भाण्डों पर एक स्त्री का चित्र अंकित है, जिसकी तुलना मोहनजोदड़ों से प्राप्त काँस्य नर्तकी से की गई है। भीराना प्राचीनतम हड़प्पा स्थल माना जाता है।

माण्डी (उत्तर प्रदेश) हड़प्पा सभ्यता की टकसाल थी।

हुलास (उत्तर प्रदेश) से गेहूँ की खेती किए जाने का स्पष्ट प्रमाण मिला है, लेकिन यह उत्तर हड़प्पाकालीन है।

सनौली (उत्तरप्रदेश) से शवाधान का साक्ष्य मिला है। सनौली हड़प्पा सभ्यता का अन्तिम ज्ञात कब्रगाह स्थल है एवं इसे विश्व का विशालतम कब्रगाह स्थल माना जाता है

बालू (हरियाणा) से सर्वाधिक फसली साक्ष्य प्राप्त होते हैं। यहाँ से अदरक का भी प्राचीनतम् साक्ष्य मिला है।

अल्लादीनों (Allahdino) पाकिस्तान में स्थित बिना सुरक्षा दीवार से घिरा हडप्पा का एक गाँव था।

अल्लादिनो (सिन्ध) की खोज डब्ल्यू.ए, फेयरसर्विस ने कराची के पास की। अल्लादिनो से टेराकोटा का जार, जिसमें सोने, चांदी एवं कांसे के अभूषण है, मिला है। एक बेल्ट पर 36 कार्नेलियन के मनके (beads) मिले है। वस्त्र उद्योग का भी केन्द्र था।

बालाकोट का उत्खनन 1979 में जॉर्ज एफ. डेल्स ने करवाया। बालाकोट से किले बन्द बस्ती, मर्तबान (जार), स्नानागार सहित बड़े घर आदि मिले हैं। बालाकोट पूर्वी मकरान तट (बलुचिस्तान) पर लासबेला जिला में है।

सिन्धु सभ्यता के नगरों की अवस्थिति

नगर नदी
मोहनजोदडो सिन्धु नदी
चन्हूदड़ो सिन्धु नदी
कोटदीजी सिन्धु नदी
हड़प्पा रावी नदी
रोपड़ सतलज नदी
बाड़ा सतलज नदी
कालीबंगा घग्गर नदी (पुरानी सरस्वती एवं दृषद्वती)
माँडा चिनाब नदी
बणावली / बनवाली प्राचीन सरस्वती नदी (रंगोई नदी)
सुत्कागेंडोर दाश्क नदी
सोत्काकोह शादी कौर नदी (अरब सागर)
बालाकोट विंदार नदी (अरब सागर)
आलमगीरपुर हिण्डन नदी (यमुना की सहायक)
रंगपुर मादर नदी
रोजदी/ रोजड़ी मादर नदी
मालवण ताप्ती नदी
भगत्राव / भगतराव नर्मदा नदी
लोथल भोगवा नदी
दैमाबाद प्रवरा नदी (गोदावरी की सहायक)

नगर नियोजन (Town Planning):

हड़प्पा सभ्यता की सबसे प्रभावशाली विशेषता उसकी नगर योजना एवं जल निकास प्रणाली (Drainage System) है।

सड़क-

नगर योजना जाल पद्धति (Grid Pattern) / चेसबोर्ड पर आधारित है। सड़के एवं गलियाँ योजनानुसार निर्मित की गई है। मुख्य सड़कें उत्तर से दक्षिण की तरफ जाती हैं तथा सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थी। सड़कें कच्ची मिट्टी की बनी होती थी।

नगर की प्रमुख सड़क को प्रथम सड़क कहा गया है। नगरों में प्रवेश पूर्वी सड़क से होता था और जहाँ यह प्रथम सड़क से मिलती थी, उसे ‘ऑक्सफोर्ड सर्कस’ कहा गया है। सड़कें मिट्टी की बनी होती थी।

मोहनजोदड़ो की सबसे चौड़ी सड़क 10 मीटर से कुछ अधिक चौड़ी थी।

नगर विन्यास-

नगर नियोजन- नगर दो भागों में बँटा था-

  1. पश्चिमी टीला– इसमें किला/दुर्ग होता था, किला आयताकार क्षेत्र का होता था।
  2. पूर्वी टीला– इसे निचला नगर कहते थे, जो सामान्य जनता का आवास क्षेत्र था।

प्राप्त नगरों के अवशेषों में पूर्व तथा पश्चिम दिशा में दो टीले हैं। पूर्वी टीले पर आवास क्षेत्र के साक्ष्य मिले हैं तथा पश्चिमी टीले पर दुर्ग के साक्ष्य मिले हैं।

केवल लोथल एवं सुरकोटदा के दुर्ग और नगर एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।

हड़प्पा कालीन नगरों के चारों ओर प्राचीर बनाने का उद्देश्य शत्रु आक्रमण से रक्षा करना नहीं था, अपितु लुटेरों एवं पशु चोरों से सुरक्षा करना था।

नालियाँ-

जल निकासी प्रणाली सिन्धु सभ्यता की अद्वितीय विशेषता थी, जो अन्य समकालीन सभ्यताओं में नहीं मिलती है।

नालियाँ ईंटों या पत्थरों से ढ़की होती थी, परन्तु कभी-कभी चूने एवं जिप्सम का प्रयोग भी किया जाता था।

घरों से जल निकासी हेतु मोरियों द्वारा होती थी, जो मुख्य नालियों में गिरती थी।

प्रत्येक मकान में ढ़की हुई नालियाँ होती थी।

भवन-

हड़प्पा कालीन नगरों के भवन साधारणतः छोटे-छोटे आवासीय भवन होते थे। इनमें चार-पाँच कमरे होते थे। कुछ विशाल दो मंजिला भवनों का भी निर्माण हुआ।

प्रत्येक मकान में रसोई घर एवं स्नानागार होता था। 3.घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े (गली) की ओर खुलते थे।

हड़प्पा सभ्यता के नगरों में कुछ सार्वजनिक भवन भी होते थे, जैसे स्नानागार, अन्नागार आदि।

 ईटें-

हड़प्पा सभ्यता के भवन एवं नालियाँ पक्की ईंटों से बने होते थे। हालांकि कालीबंगा एवं रंगपुर में ईंटों का प्रयोग हुआ है। सभी जगहों की ईंटों का अनुपात 4: 2: 1 होता था।

सामान्यतः एक ईंट का आकार 10.25× 5× 2.25 था। बड़ी ईंटों का प्रयोग नालियों को ढ़कने हेतु किया जाता था। हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी ईंट मोहनजोदड़ों से मिली है।

सैंधव ईंटें चतुर्भुजाकार होती थी। ईंटों की चिनाई एवं जुड़ाई इंग्लिश बाण्ड पद्धति से की गई थी (रक्षा प्राचीर, सड़के एवं चबूतरे में कच्ची ईंटों का प्रयोग होता था।)

केवल कालीबंगा में एक फर्श में अलंकृत ईंटों का प्रयोग हुआ है।

राजनीतिक व्यवस्था –

हड़प्पा संस्कृति के राजनीतिक स्वरूप की कोई निश्चित जानकारी नहीं है, परन्तु इसका व्यापक विस्तार एवं नियोजित नगरों को देखकर लगता है कि इस सभ्यता में शासन पर पुरोहित वर्ग का प्रभाव था।

स्टुअर्ट पिग्गट ने मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वाँ राजधानियाँ बताया है।

पिग्गट ने हड़प्पा सभ्यता के शासन को अत्यन्त केन्द्रीकृत साम्राज्य माना है, जो पुरोहित वर्ग द्वारा संचालित था।

ह्वीलर के अनुसार हड़प्पा सभ्यता में मध्यम वर्गीय जनतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था थी। इसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया गया है।

हन्टर के अनुसार मोहनजोदड़ो का शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतन्त्रात्मक था।

मैके के अनुसार मोहनजोदड़ो का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथ में था।

एस. आर. राव ने हड़प्पा सभ्यता को विश्व के प्रथम महान् साम्राज्य की संज्ञा दी है।

ए.एल. बाशम ने हड़प्पा सभ्यता की प्रकृति धर्मतन्त्रीय (थियोक्रेटिक) मानी है तथा पुरोहित वर्ग का प्रभाव माना है।

हड़प्पा काल में व्यापार वाणिज्य के विकास को देखकर लगता है कि संभवतः हड़प्पा का शासन वणिक वर्ग के हाथ में था।

सामाजिक जीवन-

मुहरों पर अंकित चित्र एवं मातृदेवी की मूर्ति से यह लगता है कि हड़प्पा समाज सम्भवतः मातृ सत्तात्मक था।

हड़प्पा सभ्यता के नगर नियोजन को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि समाज अनेक वर्गों जैसे पुरोहित, व्यापारी, अधिकारी, श्रमिक इत्यादि वर्गों में विभाजित था।

समाज में चार वर्ग विद्वान, यौद्धा, व्यापारी एवं श्रमिक थे।

शिल्पकारों में कुम्हारों का विशेष महत्व था।

हड़प्पा सभ्यता के लोग शान्तिप्रिय थे, युद्धप्रिय नहीं। हड़प्पा स्थलों से तलवार, ढाल, कवच एवं शिरस्त्राण नहीं मिले हैं।

लोग शाकाहारी एवं माँसाहारी दोनों थे।

लोग सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। आभूषणों का प्रयोग पुरुष एवं महिलाएं दोनों करते थे।

मनोरंजन-

मनोरंजन हेतु पासे का खेल (शतरज), नृत्य, पशुओं की लड़ाई आदि साधन थे।

लोथल से खेलने का बोर्ड एवं मोहनजोदड़ों से चतुष्कोण गोटियाँ प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से टेराकोटा के मुखौटे मिले हैं।

शवाधान-

शवों का अन्तिम संस्कार तीन प्रकार से किया जाता था-

  1. पूर्ण समाधिकरण- इसमें शव को पूर्ण रूप से भूमि में दफना दिया जाता था।
  2. आंशिक समाधिकरण- इसमें शव का, पशु-पक्षियों के खाने के बाद, शेष भाग भूमि में दफनाया जाता था।
  3. दाह संस्कार।

हड़प्पा से आंशिक शवाधान, मोहनजोदड़ो के कलश शवाधान तथा कालीबंगा से प्रतीकात्मक शवाधान के साक्ष्य मिले हैं।

हड़प्पा में शवों को दफनानें तथा मोहनजोदड़ों में जलाने की प्रथा विद्यमान थी। हड़प्पा में शव उत्तर-दक्षिण दिशा में दफनाये जाते थे, जिसमें सिर उत्तर की ओर होता था।

शव पात्रों के चित्रण में मयूर का चिह्न चित्रित किया जाता था.

धार्मिक जीवन –

पुरास्थलों से मिले अवशेषों के आधार पर ऐसा लगता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग मातृदेवी, पुरुष देवता (पशुपति नाथ) लिंग-योनि, वृक्ष, जल आदि की पूजा करते थे। सबसे ज्यादा पूजा मातृदेवी की होती थी। मार्शल ने मातृदेवी को पृथ्वीदेवी कहा है।

मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख वाला एक पुरुष ध्यान की मुद्रा में बैठा है। उसके सिर पर तीन सींग हैं। इस मुहर पर 5 प्रकार के कुल 6 पशु है। उसके बाँयी ओर एक गैंडा और एक भैंसा तथा दाँयी ओर एक हाथी और एक चीता (व्याघ्र) तथा सामने दो हिरण हैं। यह पशुपति शिव का रूप माना गया है। मार्शल ने इसे आद्य शिव (Proto Shiva) कहा है।

पशुपति, योगीश्वर और नटराज के रूप में शिव की पूजा, मातृ शक्ति की पूजा, पीपल (अश्वत्थ) पूजा, वृषभ एवं अनेक पशुओं का देवताओं से सम्बन्ध, लिंग पूजा, जल की पवित्रता, मूर्ति पूजा, योगाभ्यास, यज्ञ आदि तत्व परवर्ती भारतीय धार्मिक जीवन में सिन्धु सभ्यता से लिए गए थे।

हड़प्पा सभ्यता के लोग पृथ्वी को उर्वरता की देवी मानकर इसकी पूजा करते थे। मूर्ति पूजा का आरम्भ सिन्धु सभ्यता से ही होता है।

कालीबंगा से अग्निकुण्ड (Fire Altar) भी मिले हैं। संभवतः ये यज्ञ की वेदी थे।

हड़प्पा सभ्यता से मिले स्वास्तिक एवं चक्र सूर्यपूजा के प्रतीक हैं। स्वास्तिक चिह्न सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है। नाग पूजा, जल पूजा एवं योग क्रिया का प्रचलन था।

मोहनजोदड़ो एवं कालीबंगा से प्राप्त कुछ मुहरों पर पशु बलि के प्रमाण मिलते हैं। भारत में लिंग पूजा का आरम्भ सम्भवतः प्रोटो-आस्ट्रेलाइड जाति में हुआ था।

पीपल सबसे पवित्र वृक्ष तथा बतख (फाख्ता) को पवित्र पक्षी माना जाता था। हाजा पक्षी (मोर) का भी महत्व था।

हड़प्पा सभ्यता के किसी भी स्थल से मन्दिर के अवशेष नहीं मिले हैं, लेकिन बणावली के एक भवन से मन्दिर होने का अनुमान लगाया जाता है।

आर्थिक जीवन –

 हड़प्पाकालीन अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन एवं आन्तरिक एवं विदेशी व्यापार पर निर्भर थी।

1. कृषि-

हड़प्पा सभ्यता व्यापार प्रधान थी किन्तु आजीविका एवं अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि ही था।

हड़प्पा सभ्यता में कोई हल या फावड़ा नहीं मिला है, परन्तु कालीबंगा से प्राक्-हड़प्पा स्तर के जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। संभवतः हड़प्पा सभ्यता के लोग लकड़ी के हलों का प्रयोग करते थे।

हडप्पा सभ्यता बलूचिस्तान, पंजाब एवं सिन्ध की प्राकृ-हड़प्पा कृषि सभ्यताओं का ही एक विकसित रूप थी।

हड़प्पा सभ्यता का अधिकांश भौगोलिक विस्तार अर्द्धशुष्क क्षेत्र था।

हड़प्पा सभ्यता की उर्वरता का मुख्य कारण सिन्धु नदी में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ थी।

बलूचिस्तान से गवरबन्द (बाँध) एवं अफगानिस्तान के शोर्तुगई। शोर्तुघई से नहरों के साक्ष्य मिले हैं।

फसल काटने के लिये पत्थर के हसियों का प्रयोग करते थे।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा एवं अन्य नगरों से अन्नागार (Granary) के साक्ष्य विकसित कृषि अवस्था को इंगित करते हैं।

हड़प्पा सभ्यता के लोग नवम्बर के महीने के बाढ़ का पानी उतरने के बाद उपजाऊ मिट्टी (Alluvial Soil) में गेहूँ एवं जौ बोते थे तथा अप्रैल में फसल काट लेते थे।

प्रमुख फसलें-

हड़प्पा सभ्यता में अब तक नौ प्रकार की फसलों की पहचान की है। चावल, गेहूं (तीन किस्में), जौ (दो किस्में), खजूर, तरबूज, मटर, राई, तिल, कपास। एक किस्म ब्रासिकाजुंसी भी मिली है।

चावल के साक्ष्य लोथल, रंगपुर, हड़पा एवं कालीबंगा से मिले है, जबकि बाजरा के लोथल, हड़प्पा, सुरकोटड़ा एवं शोर्तुघई से मिले हैं।

गेहूँ, जौ एवं कपास की खेती का ज्ञान मेहरगढ़ से प्राप्त किया।

हड़प्पा सभ्यता के लोगों का मुख्य खाधान गेहूँ एवं जौ था।

सिन्धु सभ्यता के लोग रागी एवं ईख से अपरिचित थे।

लोथल से चावल एवं बाजरे के, बनवाली से जौ, तिल एवं सरसों के तथा हड़प्पा से गेहूँ एवं जौ के दानों के साक्ष्य मिले हैं।

सर्वप्रथम कपास उगाने का श्रेय सिन्धु सभ्यता के लोगों यूनानियों ने इसे सिंडोन, जिसकी उत्पत्ति सिन्ध से हुई है, नाम दिया है।

गुजरात के नागवाड़ा नामक स्थान पर भी प्राक्-हड़प्पा कालीन किसान रहते थे।

3. पशुपालन-

हड़प्पा सभ्यता के लोग बैल, गाय, भेड़, बकरी, सुअर आदि पालते थे।

गुजरात का नेसदी नगर पशुपालकों का केन्द्र था।

गाय, ऊँट एवं घोड़े का अंकन मुहरों पर नहीं मिलता।

गाय की आकृतियुक्त कोई मूर्ति नहीं मिली है।

हड़प्पा संस्कृति में कूबड़ वाला बैल विशेष महत्व रखता था।

घोड़े के अस्थिपंजर केवल सुरकोटदा/सुरकोटड़ा (गुजरात) नामक स्थल से मिले हैं। अतः निष्कर्ष निकाला गया है कि सिन्धु सभ्यता के लोग संभवतः घोड़े से परिचित नहीं थे।

मोहनजोदड़ो की ऊपरी सतह से तथा लोथल से घोड़े की टेराकोटा की मूर्ति मिली है। बलूचिस्तान स्थित राना घुण्डई के निम्न स्तरीय धरातल से घोड़े के दाँत प्राप्त हुए हैं, जो हड़प्पा सभ्यता से कुछ शताब्दी पहले के हैं।

गुजरात के निवासी हाथी पालते थे।

शिल्प कला एवं धातु –

हड़प्पा सभ्यता काँस्य युगीन सभ्यता थी।

यहाँ के लोग ताँबे के साथ टिन मिलाकर काँसा तैयार करते थे। ताँबा एवं टिन का अनुपात 9: 1 था। काँसे के औजार बहुतायत में नहीं मिलते हैं।

हड़प्पा काल में मृद्भाण्डों का निर्माण कुम्हार के चाक पर किया जाता था। हड़प्पा सभ्यता के मृद्भाण्ड लाल एवं काले रंग के होते थे।

हड़प्पा सभ्यता के लोग लोहे से परिचित नहीं थे। वे तलवार से भी परिचित नहीं थे।

मोहनजोदड़ो के मृद्भाण्डों पर लेख नहीं हैं, किन्तु हड़प्पा के बर्तनों पर लेख भी मिलते हैं।

सबसे प्रमुख उद्योग वस्त्र उद्योग था।

सीप एवं मोती उद्योग लोथल एवं बालाकोट में, मनके बनाने के कारखाने लोथल, बनावली, भगासरा एवं चन्हुदड़ो में तथा शंख शिल्प का केन्द्र बालाकोट तथा नागेश्वर (गुजरात) में स्थित था।

कार्नेलियन मनकों का कारखाना चन्हूदड़ों एवं मोहनजोदड़ो से मिला है।

व्यापार –

हड़प्पा सभ्यता मुख्यतः व्यापार प्रधान थी। इसकी समृद्धि भी व्यापार के कारण थी।

व्यापार वस्तु विनिमय (Barter System) द्वारा होता था। धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं होता था।

सिन्धु सभ्यता के सुमेरियन सभ्यता एवं मिस्र की सभ्यता से व्यापारिक सम्बन्ध थे।

सुमेरियन लेखों से ज्ञात होता है कि सुमेरिया के व्यापारी मेलुहा के व्यापारियों के साथ वस्तु विनिमय करते थे। मेलुहा का समीकरण सिन्धु प्रदेश से किया गया है।

मोहनजोदड़ों की एक मुहर पर सुमेरियन ढंग की नाव का चित्र अंकित है।

लोथल से फारस की मुहरें तथा कालीबंगा से बेलनाकार मुहरें भी सिन्धु सभ्यता के विदेशी व्यापार को दर्शाती हैं।

बहरीन द्वीप (दिलमुन) के व्यापारी विदेशी व्यापार में बिचौलियों का कार्य करते थे।

दिलमुन को सुमेरियन लेखों में उगते सूर्य, साफ-सुथरा नगर तथा हाथियों का देश कहा है। स्थलीय व्यापार में अफगानिस्तान एवं ईरान तथा जलीय व्यापार में मकरान तट के नगरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

सुत्कागेंडोर, बालाकोट, अल्लाहदीनों, लोथल एवं सुरकोटड़ा अरब सागर के तट पर सैन्धव-कालीन बन्दरगाह थे।

आयात की जाने वाली वस्तुएँ

  1. टिन, चाँदी – ईरान, अफगानिस्तान
  2. ताँबा – खेतड़ी (राजस्थान), बलूचिस्तान
  3. सोना – ईरान, अफगानिस्तान, दक्षिण भारत (कर्नाटक)
  4. फिरोजा – ईरान
  5. हरा अमेजन – नीलगिरि की पहाड़ियाँ
  6. सीसा – ईरान, अफगानिस्तान, राजस्थान, दक्षिण भारत
  7. लाजवर्द (वैदूर्य) – बदख्शाँ (अफगानिस्तान), मेसोपोटामिया
  8. शिलाजीत – हिमालय क्षेत्र
  9. लाल गोमेद – राजस्थान, काठियावाड़, कश्मीर
  10. नील रत्न – बदख्शाँ (अफगानिस्तान)
  11. हरित मणि – दक्षिण भारत
  12. सेलखड़ी – बलूचिस्तान, राजस्थान, गुजरात
  13. शंख एवं कौड़ियाँ – सौराष्ट्र, कच्छ (गुजरात), दक्षिण भारत

सिन्धु सभ्यता की मुहरें मेसोपोटामिया के सूसा, उर, निप्पुर, किश, से उम्मा आदि शहरों में पाई गई है। तेल असमार (मेसोपोटामिया) से भी सिन्धु सभ्यता की वस्तुएँ मिली हैं।

सिन्धु एवं मेसोपोटामिया दोनों सभ्यताओं में मातृशक्ति की उपासना होती थी। बैल, बतख एवं पाषाण स्तम पवित्र माने जाते थे।

मेसोपोटामिया (सुमेरिया) के अभिलेखों में मेलुहा (सिन्धु प्रदेश) साथ व्यापार के दो मध्यवर्ती केन्द्रों का उल्लेख मिलता है-
  1. दिलमुन। (बहरीन)
  2. माकन। (इसका समीकरण ओमान से किया जा सकता है।)

मेलुहा को नाविकों का देश एवं काले विदेशी लोगों की भूमि कहा गया है।

मेसोपोटामिया में प्रवेश के लिए प्रमुख बन्दरगाह उर था।

मिश्र के साथ व्यापार मुख्यतः लोथल से होता था।

सुत्कागेडोर को हड़प्पा व्यापार का चौराहा कहा जाता था।

सर्वाधिक आयात धातुओं एवं बहुमूल्य पत्थरों का होता था।

मापतोल-

हड़प्पा सभ्यता में मानकीकृत मापतोल प्रचलित था।

तोल की इकाई 16 के अनुपात में थी, जैसे- 16, 64, 160, 320,640 आदि। इनके बाट दशमलव प्रणाली पर आधारित थे।

मोहनजोदड़ो से सीप का बना हुआ तथा लोथल से हाथीदांत का बना हुआ एक-एक पैमाना (स्केल) मिला है। इसका उपयोग संभवतः लम्बाई मापने में किया जाता था। कालीबंगा से मिट्टी का पैमाना मिला है।

न्यूनतम भारों के सम्बन्ध में द्विचर पद्धति (बाइनरी प्रणाली) का अनुपात (1:2:4 : 8 : 16 : 32 :  64….. 12800 तक) एवं उच्चतर भारों के सम्बन्ध में दशमलव पद्धति का अनुपात (160, 320, 640) काम में लिया जाता था।

सबसे अधिक प्रचलित बाट 16 मान का था, जो वजन में 13.625 ग्राम था।

लिपि-

हड़प्पा लिपि को अभी तक पढ़ने में सफलता नहीं मिली है। यह भावचित्रात्मक (Pictographic) लिपि है तथा उनकी लिखावट क्रमशः दाँयी ओर से बाँयी ओर जाती थी, जो बूस्ट्रोफेडन/सर्पाकार रूप में लिखी जाती थी। इसमें मूलतः 52 चिह्न थे। हड़प्पा लिपि में 250 से 400 तक चित्रावर हैं।

सबसे ज्यादा प्रचलित चिह्न मछली का है।

लिपि एवं धर्म के नमूने मुहरों के अतिरिक्त मृद्भाण्डों पर भी मिले है।

सैंधव लिपि का सबसे प्राचीन नमूना 1853 ई. में कनिंघम को मिला।

अधिकांश लिपि के नमूने सेलखड़ी (Steatite) की मुहरों पर मिले हैं।

हड़प्पा लिपि देशी है तथा पश्चिम एशिया की लिपियों से कोई सम्बन्ध नहीं है।

फादर हेरास ने इस लिपि को तमिल लिपि का आदि रूप माना है।

सिन्धु लिपि को पढ़ने का प्रयास के. एन. वर्मा, प्रो. एस. आर. राव एवं आई. महादेवन ने किया है। सिन्धु लिपि को पढ़ने का सर्वप्रथम प्रयास एल.ए. वेडेन ने 1925 ई. में किया।

लिपि का उद्बाचन आई. महादेवन ने किया, जिसने इसे कम्प्यूटर से पढ़ने का प्रयास किया। हड़प्पा सभ्यता में सबसे लम्बा अभिलेख 26 चिह्नों वाला है।

भाषा-

बलूचिस्तान की बाहुई जनजाति बाहुई भाषा बोलती है, जो कि एक द्रविड़ भाषा है, जिसके स्रोत के रूप में सिन्धु घाटी सभ्यता की भाषा को माना जा सकता है।

मुहरें-

अब तक विभिन्न हड़प्पाकालीन स्थलों से लगभग 2000 मुहरें प्राप्त हुई हैं।

सबसे अधिक मुहरें मोहनजोदड़ो (लगभग 500) से मिली हैं।

हड़प्पाकालीन मुहरे सेलखड़ी (Steatite) नामक पत्थर की बनी हैं।

लोथल एवं देसलपुर से ताँबे से बनी मुहरें प्राप्त हुई हैं। लोथल से बटन के आकार की मुहर मिली है।

सैन्धव मुहरें वर्गाकार, आयताकार, गोलाकार एवं बेलनाकार हैं।

सबसे अधिक मुहरे वर्गाकार / चौकोर हैं।

अधिकांश मुहरों पर लघु लेखों के साथ जानवरों की आकृतियाँ भी अंकित हैं।

कुछ मुहरों पर देवी-देवताओं के चित्र भी अंकित है। 9.हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर व्याघ्र का अंकन मिलता है, जबकि वेदों में व्याघ्र का उल्लेख नहीं मिलता।

हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर सर्वाधिक अंकन पीपल एवं बिना कूबड़ का बैल / एक श्रृंगी पशु (Unicorn) का था। लोथल एवं कालीबंगा से मुद्रा छाप (राजमुद्रांक ) मिले हैं।

मोहनजोदड़ो की एक मोहर के चित्र की तुलना सुमेरियन पौराणिक पात्र से गिलगमेश से की जाती है।

मृण्मूर्तियाँ (टेराकोटा)-

हड़प्पा सभ्यता के क्षेत्रों से अत्यधिक संख्या में आग में पकी हुई  टोराकोटा की मूर्तियाँ मिली है।

इनका प्रयोग खिलौनों एवं पूजा के लिये मूर्तियाँ बनाने में होता था।

नारी मृण्मूर्तियाँ संख्या में सर्वाधिक है।

इन मृणमूर्तियों का निर्माण हाथ से चिकोटी पद्धति (Pinch and pressure) से किया गया है।

समस्त मृण्मूर्तियों में 73 प्रतिशत पशु-पक्षियों एवं 25 प्रतिशत मानव मृणमूर्तियाँ हैं।

पशुओं में सर्वाधिक कूबड़दार वृषभ एवं पक्षियों में गौरैया की सर्वाधिक मृणमूर्तियाँ हैं।

हड़प्पा सभ्यता से निम्न चीजों के कोई अवशेष नहीं मिले हैं- 

  1. नहरों द्वारा सिंचाई (शोतुंगई को छोड़कर)
  2. नदी उपासना
  3. मंदिर
  4. सिंह
  5. पन्ना
  6. लोहा

परवर्ती या उत्तर हडप्पा संस्कृति

1800 ई.पू. के बाद हड़प्पा सभ्यता का चरमकाल समाप्त हो गया और यह सभ्यता पतनोन्मुख हो गई। इसके बाद परवर्ती या उत्तर हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले हैं।

रंगपुर एवं प्रभासपत्तन से परवर्ती हड़प्पा (Later Harappa) संस्कृति के अवशेष मिले हैं।

भारत में उत्तर हड़प्पा के 980 स्थल है, जो सर्वाधिक है। यह संस्कृति विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान थी। सिंध में झूकर झांगर संस्कृति, हडप्पा एवं बहावलपुर में कब्रिस्तान (Cemetery) H संस्कृति, पेशावर में गान्धार कब्र संस्कृति (Gandhara grave culture)!

गान्धार कब्र संस्कृति के एक स्थल कटेलाई (Katelai) से दो ऐसी कब्र मिली हैं, जहाँ मालिक के साथ घोड़ों को दफनाया गया था।

भगवानपुरा (हरियाणा) एवं दघेरी (पंजाब) से पाण्डुवर्णी मृद्भाण्ड वाली संस्कृति के अवशेष मिले हैं। गुजरात के रंगपुर, रोजदी, प्रभासपटन, डाबरकोट, पादरी, कनेवाल से लाल चमकदार मृद्भाण्ड संस्कृति के अवशेष मिले हैं।

परवर्ती हड़प्पा संस्कृतियाँ मुख्यतः ग्रामीण सभ्यताएँ एवं ताम्र पाषाणिक थी।

परवर्ती हड़प्पा के लोग काला-धूसर ओपदार मृद्माण्ड का प्रयोग करते थे।

भगवानपुरा में उत्तर हड़प्पा के लोग पकाई हुई ईंटों का प्रयोग करते थे। अन्य हड़प्पोत्तर स्थलों पर यह नहीं पाया गया है।

हड़प्पा सभ्यता का पतन

ह्वीलर ने सिन्धु सभ्यता के पतन के लिये इन्द्र को जिम्मेदार माना है। व्हीलर ने जाली प्रकार की उत्खनन पद्धति भी विकसित की।

सर्वप्रथम रामप्रसाद चन्द्रा ने आर्य आक्रमण का सिद्धान्त दिया था और सर्वप्रथम जॉर्ज डेल्स ने आर्य आक्रमण सिद्धान्त का खण्डन किया था।

शिरिन रत्नागार ने मेसोपोटामिया के साथ लाजवर्द व्यापार के पतन को हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण माना है।

हड़प्पा सभ्यता का पतन

विद्वान पतन के कारण
गार्डन चाइल्ड हवीलर, रामप्रसाद चन्दा, पिग्गट आय का आक्रमण
एस. आर. राव, जान मार्शल, मैके  बाढ़
 H. T. लैम्बिरिक, माधोस्वरूप वत्स, डेल्स- सिन्धु नदी का मार्ग बदलना
आर. एल. स्टाइन, ए.एन घोष, गुरदीप शुष्कता एवं जलवायु परिवर्तन
एम. आर साहनी, रॉबर्ट राइक्स एवं जॉर्ज एफ डेल्स भू-तात्विक परिवर्तन (भूकम्प) के कारण बाढ़
 के. यू. आर. केनेडी प्राकृतिक आपदा (मलेरिया)
जॉन मार्शल प्रशासनिक शिथिलता
फेयर सर्विस, रफीक मुगल, बी. के. थापर पारिस्थितिकी असन्तुलन
धर्मपाल अग्रवाल, रफीक मुगल घग्गर, हकरा नदी क्षेत्र का सूख जाना

विविध तथ्य-

तरखानवाला डेरा राजस्थान में हड़प्पा सभ्यता का केन्द्र था। यह हड़प्पा सभ्यता का पॉटरी केन्द्र था।

शिकरपुर गुजरात में हड़प्पा सभ्यता का स्थल है।

गुजरात में कच्छ से कानमेर से भारत-जापान की संयुक्त टीम द्वारा 2006 में उत्खनन किया गया। इस उत्खनन में बड़ी संख्या में मनके एवं सेलखड़ी के मनके मिले है।

गुजरात की भुज तहसील (कच्छ जिला) में शिकारपुर से हड़प्पा स्थल का उत्खनन कुलदीप भान ओर पी. अजीत प्रसाद ने किया।

कच्छ स्थित जूनी कुरन से दो स्टेडियम के साक्ष्य मिले हैं।

नागेश्वर, नागवाड़ा, कुन्तासी (उत्तरी सौराष्ट्र) गुजरात के हड़प्पाकालीन स्थल है।

.कुन्तासी से बन्दरगाह के साक्ष्य मिले हैं।

लोथल और बालाकोट (बलुचिस्तान) से विकसित सीप उद्योग के प्रमाण मिले है।

धौलावीरा से भैंस की हड्डी की बनी स्केल मिली है।

मोहनजोदड़ो से मानव अस्थिपंजर के निकट बकरे का अस्थि पंजर मिला है।

मार्शल के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का विकास स्वतः हुआ। इसका पश्चिम से कोई सम्बन्ध नहीं था।

सुत्कागेन्डोर से नगरदुर्ग और किलेबन्द निचली बस्ती के साक्ष्य मिले हैं।

स्वात घाटी उत्तर हड़प्पा का उत्तरी छोर माना जाता है।

गुजरात में कानमेर हड़प्पाकालीन स्थल नवीनतम उत्खनित स्थल है। लोथल से सोना धातु के अवशेष नहीं मिले हैं।

बाघ से लड़ते व्यक्ति का चित्र मोहनजोदड़ों के मुहरों पर है।

मोहनजोदड़ो से मिट्टी के रथ का नमूना मिला है।

राखीगढ़ी तत्कालीन महानगर था।

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