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सूफी आन्दोलन | Sufi Andolan in Hindi

सूफी आन्दोलन | Sufi Andolan in Hindi
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सूफी आन्दोलन | Sufi Andolan in Hindi

मध्यकालीन आंदोलनों में सूफी आन्दोलन का उल्लेख करना भी आवश्यक है। सूफीवाद इस्लाम के रहस्यवादी, उदार और समकालिक दर्शन का शब्द है। सूफियों ने कुरान की एक रहस्यमय और उदार व्याख्या दी, जिसे तारिकत कहा जाता था। सूफी आंदोलन का व्यवस्थित रूप अब्बासियों के खिलाफ खिलाफत युग में दिखाई देता है। सूफीवाद एक धर्म के रूप में नौवीं शताब्दी ई. में विकसित हुआ। सूफीवाद में दुनिया की सभी प्रमुख धार्मिक विचारधाराएं शामिल थीं। इस धर्म में इस्लाम के अलावा हिंदू वेदांत, बौद्ध, ग्रीक, ईसाई आदि के सिद्धांत भी शामिल थे। सूफीमत भी दार-उल-हरब को दार-उल-इस्लाम में बदलना चाहता था। फर्क सिर्फ इतना था कि सूफी बदलाव के लिए शांतिपूर्ण और नैतिक साधनों का इस्तेमाल करना चाहते थे। सूफी संतों और मनीषियों ने भी हिंदू-मुस्लिम सौहार्द स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया।

सूफी मत

12वीं सदी में मोहम्मद गौरी के आक्रमण के बाद अनेक सूफी सन्त भारत आकर बस गये।

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में अपना निवास बनाया।

सूफी एवं भक्ति विचारधारा ने भारतीय समाज में प्रचलित कर्मकांड,अन्धविश्वास, जातिवाद, साम्प्रदायिक वैमनस्य आदि को दूर करने का सार्थक प्रयास किया।

इन्होंने स्थानीय भाषा में अपनी विचारधारा का प्रचार किया व सामान्यतःराजनीति से दूर रहे तथा समाज के नैतिक उत्थान में योगदान दिया।

सूफी मुसलमानों के धर्मप्रचारक थे जिन्होंने प्रेम पर विश्वास व एक ईश्वर के प्रति समर्पण के सिद्धान्त का प्रचार किया।

भारतीय दर्शन में रहस्यवाद सूफीवाद से प्रभावित था।

सूफियों ने जवान ए-हिन्दवी को बढ़ावा देकर सांस्कृतिक समन्वय में योगदान दिया।

इस्लाम में विभिन्न रहस्यात्मक प्रवृत्तियों और आन्दोलनों को सूफीमत या तसव्वुफ के नाम से जाना जाता है।

सूफीवाद की शुरुआत एक सुधारवादी आन्दोलन के रूप में इस्लाम धर्म में ही हुई।

इसकी शुरुआत सर्वप्रथम ईरान में हुई।

यह एकेश्वरवादी विचारधारा है।

मूलतः इनका आधार इस्लाम ही था, परन्तु इन्होंने इस्लाम के कर्मकाण्ड के स्थान पर उसके आध्यात्मिक पहलू पर अधिक जोर दिया।

वे इस्लाम की मूल आत्मा में विश्वास करते थे न कि उसके बाहरी रूप में।

सूफी शब्द अरबी भाषा के शब्द सफा से बना है जिसका अर्थ है पवित्रता। अतः जो आध्यात्मिक लोग पवित्रता व सादगी का जीवन जीते थे वे सूफी कहलाये।

कुछ लोग सूफी शब्द की उत्पत्ति सफा/ऊन से मानते हैं।

प्रथम ज्ञात सूफी संत हसन बसरी (642 ई.- 728 ई.) थे।

महिला रहस्यवादी रबिया (आठवीं सदी) और मंसूर बिन हल्लाज (दसवीं सदी) प्रारम्भिक सूफी सन्त थे।

मंसूर को फाँसी दे दी गई। मंसूर ने अपने को अनलहक (में ईश्वर हूँ) घोषित किया, जो वेदान्त के अहम् ब्रह्मास्मि से प्रेरित था। मंसूर समुद्री मार्ग से भारत आया।

मंसूर बिन हल्लाज ने सूफी की दस अवस्थाओं का वृतान्त देने वाली दस मुकामी रेक्ता की रचना की।

अलगजाली की रचना तहफ तुल फलसफा से सूफीवाद को इस्लाम के अन्तर्गत सम्माननीय स्थान प्राप्त हुआ, अलगजाली की उपाधि हुज्जत उल इस्लाम थी।

भारत में सूफीवाद का प्रवेश अरबों की सिन्ध विजय के बाद हुआ था।12वीं शताब्दी तक सूफी सम्प्रदाय का 12 सिलसिलों में विभाजन हो गया था।

सूफी लोग पीर (गुरु) तथा मुरीद/तालिब (शिष्य) के सम्बन्ध को अत्यधिक महत्व देते हैं। गुरु को मुर्शीद/शेख भी कहा जाता है।

सूफी सन्त के उत्तराधिकारी को वली कहते थे।

18.सूफी सिलसिला दो वर्गों में विभाजित है-

  1. बा शरा:- जो इस्लामी विधान (शरा) को मानते हैं।
  2. बे शरा:- जो शरा को नहीं मानते हैं।

सूफी शब्दावली:-

  • मलफूजात– सूफी सन्तों के विचारों व कथनों के संकलन को सामुहिक रूप से मलफूजात कहा जाता है।
  • मकतूबात– सूफी सन्तों के पत्रों के संकलन को मकतूबात कहा जाता है।
  • खानकाह– सूफियों के निवास स्थान ‘खानकाह’ कहलाते हैं।
  • जमायतखाना– जमायत खाना भी सूफियों का निवास स्थान ही था, जी खानकाह से बड़ा होता था।
  • तर्क-ए-दुनिया – अधिकांश सूफी सन्तों में राजसत्ता व सांसारिक वस्तुओं के प्रति कोई आकर्षण नहीं होता था। उनके विश्व परित्याग (सांसारिक सुखों का परित्याग) की भावना को सूफी विचारधारा में तर्क-ए-दुनिया कहा गया।
  • विलायत– राज्य नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र को सूफी शब्दावली में विलायत कहा गया है। इसे चिश्ती सूफियों ने विकसित किया।
  • बैयत– शिष्यता ग्रहण करते समय होने वाला अनुष्ठान, जिसमें शिष्य सिर मुण्डन करवाते थे।
  • चिल्ला– 40 दिन तक साधना।
  • चिल्ल ए माकूस– 48 दिन तक उल्टा लटकना
  • बरकत– एक सूफी की आध्यात्मिक पवित्रता।
  • फुतुह– बिना मांगी खैर/दान।
  • मशायख– सूफी संत, वस्ल सूफियों का संघ
  • हक– परमात्मा
  • खल्क– सृष्टि

सूफीवाद की अन्तिम अवस्था बका (मोक्ष) है।

फना एवं बका का तात्पर्य सांसारिक प्रवृत्तियों का अन्त है।

तैफूरी सम्प्रदाय के संस्थापक अबू यजीद तैपूर ने सर्वप्रथम फना शब्द का प्रयोग किया।

सूफी सन्त समा एवं रक्स (संगीत एवं नृत्य) को ईश्वर प्राप्ति में (फना होने में) सहायक मानते थे।

इब्न-उल-अराबी (मृत्यु 1240 ई.) ने फतुहात-ए-मक्किया (फुसूस अल हिकाम) में वहदत-उल-वजूद (ईश्वर का एकत्व/ अस्तित्व की एकता या सर्वेश्वरवाद) का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

शेख अलाउद्दीन सिम्मानी (मृत्यु 1336 ई.) ने इब्न-उल-अरबी के वहदत-उल-वुजूद के सिद्धान्त का खण्डन किया और उसके स्थान पर वहदत-उल-शुहृद का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार अल्लाह व सृष्टि के बीच अन्तर होता है न कि समायोजन यह विचार शरियत के विचार से मिलता है। यह प्रत्यक्षवादी दर्शन है।

अबुल फजल ने आइने अकबरी में चौदह सूफी सिलसिलों का उल्लेख किया है।

भारत में इस्लामी रहस्यवाद की प्रथम पाठ्य पुस्तक फारसी भाषा में ‘कश्फ-उल-महजूब‘ (परदेवाले की बेपर्दगी) की रचना गजनी के निकट हुजवरी के निवासी अबुल हसन अल हुजविरी (अली बिन उस्मान हुजविरी) ने 11वीं सदी के शुरू में लाहौर में की। इस पुस्तक में तसव्वुफ का अर्थ एवं इसका पालने करने वाले सूफियों के बारे में बताया गया है।

कश्फ-उल-महजूब से यह जानकारी मिलती है कि भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर की परम्पराओं ने भारत में सूफी चिंतन को किस तरह प्रभावित किया।

हुजविरी महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद लाहौर में आकर रहने लगे थे। हुर्जावरी की 1071 ई. में मृत्यु हो गयी। लाहौर में हुजविरी की मजार पर गजनी के पोते ने दरगाह बनवाई।

आज भी हुजविरी दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय है तथा उनकी दरगाह को दाता दरबार यानी देने वाले की दरगाह कहा जाता है।

ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती भी भारत आने से पहले लाहौर में कुछ समय हुजविरी की खानकाह में रूके थे।

बंगाल में हठ योग की पुस्तक अमृत कुण्ड का अनुवाद संस्कृत से फारसी में हो चुका था।

बाद में सैयद मुर्तजा (मृत्यु 1662 ई.) ने योग पद्धतियों का अबु अली कलन्दर की कलन्दरिया साधना से तादात्म्य स्थापित करते हुए योग कलन्दर की रचना की।

17वीं शताब्दी में फारसी में लिखी गई पुस्तक दबिस्तान-ए-मजाहिब में सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

प्रमुख सूफी सिलसिले एवं भारत में उनके संस्थापक

सिलसिला संस्थापक स्थान
1. चिश्ती ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (12वीं सदी) अजमेर
2. सुहरावदी शिहाबुद्दीन सुहरावदी (12वीं सदी) मुल्तान
3. फिरदौसी (सुहरावदर्दी से प्रभावित) शेख बदरूद्दीन समस्कन्दी  (13वीं सदी) बिहार
4. शत्तारी (सुहरावदी से प्रभावित) शाह अब्दुल्ला शत्तारी (15वीं सदी) जौनपुर
5. कादिरी शाह नियामतुल्ला एवं नासिरुद्दीन मुहम्मद जिलानी (15वीं सदी) उच्छ
6. नक्शबन्दी ख्वाजा बाकी बिल्लाह (16वीं सदी) उच्छ

भारत में इनके आगमन का क्रम चिश्ती- सुहरावर्दी- फिरदौसी-शत्तारी- कादिरी नक्शबन्दी था।

चिश्ती सम्प्रदाय

इसकी उत्पत्ति भारत से बाहर हेरात में हुई। इसके मूल संस्थापक ख्वाजा अब्दुल चिश्ती थे।

चिश्ती सन्त निजी सम्पत्ति के खिलाफ थे, सम्पत्ति को आध्यात्मिक विकास में बाधक मानते थे। वे समा (रहस्यात्मक संगीत) में विश्वास करते थे। वे अपने आपको सुल्तानों, राजनीति व सरकारी सेवा से अलग रखते थे तथा सादगी एवं दरिद्रता का जीवन बिताते थे एवं राजनीति से दूर रहते थे। योग पद्धति को सर्वप्रथम चिश्ती सिलसिले ने स्वीकार किया।

  • भारत में चिश्ती सन्तों ने ‘विलायत’ नामक संस्था विकसित की, जो राज्य के नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र था।
  • भारत में सबसे पहले बसने वाले चिश्ती सूफी सखी सरवर थे।

(i) ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती:-

चिश्ती भारत का सबसे प्राचीन सिलसिला है। भारत में इसके संस्थापक ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1141-1235 ई.) मुहम्मद गौरी को सेना के साथ 1192 ई. में भारत आये। इन्होंने अजमेर में चिश्ती संप्रदाय की नींव डाली। ये सिजिस्तान (ईरान) के मूल निवासी थे। ईश्वर प्रेम और मानव सेवा उनके प्रमुख सिद्धान्त थे। वे अद्वैत दर्शन में विश्वास करते थे।

ख़्वाजा मुईनुद्दोन चिश्ती के गुरु उस्मान हारूनी थे।

मुहम्मद गौरी ने ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को सुल्तान-उल-हिन्द (हिन्द का आध्यात्मिक गुरु) की उपाधि दी। ख्वाजा साहब को गरीब नवाज भी कहा जाता है।

अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह के निर्माण का प्रारम्भ इल्तुतमिश ने करवाया तथा पूर्ण मालवा के गियासुद्दीन खिलजी ने किया।

ख्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह का सबसे पहले किताबी उल्लेख चौदहवीं शताब्दी में मिलता है। मुहम्मद बिन तुगलक पहला सुल्तान था जो ख्वाजा साहब की दरगाह पर आया था, किन्तु मजार पर पहली इमारत मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खिलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बनवायी।

अकबर पहली बार 1562 ई. में ख्वाजा साहब की मजार पर आया। अकबर 1580 ई. तक ख्वाजा साहब की दरगाह पर चौदह बार आया।

इसने दो बार पैदल यात्रा भी की थी, सर्वप्रथम चित्तौड़ विजय के पश्चात् एव दूसरी 1569 ई. में सलीम के जन्म के बाद।

अकबर ने खाना पकाने के लिए दरगाह एक विशाल देग भेंट की।

मुगल शहजादी जहांआरा 1643 ई. में चिश्ती की दरगाह पर आयी ।इसका वर्णन जहांआरा द्वारा रचित मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस-अल-अखाह (आत्मा का विश्वस्त) में मिलता है।

  • जहांआरा बेगम ने इसकी दरगाह पर प्रवेश द्वार तथा संगमरमर का एक बरामदा (बेगम दालान) बनवाया।
  • दलैल अल अरफिन में ख्वाजा के कथनों का संग्रह है।
  • ख्वाजा ने रामदेव एवं जादूगर जयपाल जोगी को अपना शिष्य बनाया,उन्होंने जयपाल का नाम अब्दुला रखा।
  • ख्वाजा “विश्व के समस्त धर्मों का स्त्रोत एक ही है।
  • मुईनुद्दीन चिश्ती ने संगीत को आत्मा का पौष्टिक आहार बताया था।

(ii) शेख हमीददीन नागौरी:-

प्रसिद्ध चिश्ती सन्त शेख हमीदुदीन नागौरी, नागौर के सुवल गांव (राजस्थान) में आकर बसे। इनका मूल नाम अबु अहमद सईदी था। ये केवल कृषि से जीविका चलाते थे।

हमीदुद्दीन नागौरी ऐबक की दिल्ली विजय के पश्चात् वहाँ जन्म लेने वाले प्रथम शिशु थे। वे एकमात्र चिश्ती सूफी थे, जिन्होंने शाकाहार को अपनाया।

हमीदुद्दीन नागौरी को उनके संयम और धार्मिकता के कारण ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने ‘सुल्तान-उत तरीकीन’ (संन्यासियों के सुल्तान) की उपाधि दी। इनकी मृत्यु 1274 ई. में हुई।

नोट – शेख हमीदुद्दीन नागौरी तो चिश्ती सम्प्रदाय के थे, जबकि इन्हीं के नाम से मिलते-जुलते काजी हमीदुद्दीन नागौरी (मृत्यु 1244-45 ई.) सुहरावर्दी सिलसिले के थे। काजी हमीदुद्दीन नागौरी का मूल नाम शेख मुहम्मद इब्ने अत्ता था तथा ये बुखारा के निवासी थे।

(iii) ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी:-

ख्वाजा साहब के शिष्य ख्वाजा कुतुबद्दीन बख्तियार काकी (1186-1235 ई.) सुल्तान इल्तुतमिश के समकालीन थे। ये फरगना के निवासी थे।

कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी को बख्तियार (भाग्यबंधु) की उपाधि ख्वाजा साहब ने दी थी। इल्तुतमिश के शासनकाल में काकी दिल्ली आए। इन्होंने इल्तुतमिश द्वारा प्रदत्त शेख उल इस्लाम के पद को अस्वीकार कर दिया, अतः इल्तुतमिश द्वारा सर्वप्रथम शेख नज्मुद्दीन सुगरा उर्फ शेख नक्शबी को शेख उल इस्लाम का पद दिया गया।

  • इल्तुतमिश शेख नज्मुद्दीन सुगरा को पिताजी कहता था।
  • पानीपत के प्रथम युद्ध के विजयोपरान्त बाबर काकी की दरगाह पर आया था।

(iv) शेख फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर (Ganj-i-Shakar):-

बख्तियार काकी के शिष्य शेख फरीदुद्दीन मसूद गंज-ए-शकर (1175-1265 ई.) थे। ये सिक्ख परंपरा में बाबा फरीद के रूप में प्रसिद्ध हुये। बाबा फरीद के कारण चिश्तिया संप्रदाय भारत में लोकप्रिय हुआ। बाबा फरीद बलबन के दामाद भी थे। फरीद ने बलबन की पुत्री हुजैरा से विवाह किया था। फरीद ने भी बलबन द्वारा दी गई भूमि की भेंट अस्वीकार कर दी तथा धन गरीबों में बांट दिया।

फरीद का जन्म मुल्तान में हुआ किन्तु बाद में फरीद अजोधन (पाकिस्तान वाला पंजाब) में निवास करने लगे। पाकपाटन (अजोधन) में बाबा फरीद की मजार एवं खानकाह है।

बाबा फरीद के वचन गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है। फरीद को पंजाबी भाषा का प्रथम कवि माना जाता है।

फरीद के प्रयत्नों से ही चिश्ती सम्प्रदाय एक अखिल भारतीय सम्प्रदाय बन गया। बाबा फरीद चिल्ल ए माकूस का अभ्यास करते थे। शेख जमालुद्दीन (गजनी), ऑलिया एवं अलाउद्दीन साबिर फरीद के शिष्य थे।

फरीद की मृत्यु के पश्चात् चिश्ती सम्प्रदाय दो उपशाखाओं में बंट गया।

साबिरी उपशाखा– संस्थापक अलाउद्दीन साबिर (जलाली)।

निजामी उपशाखा– निजामुद्दीन औलिया।

(v) निजामुद्दीन औलिया:-

सबसे लोकप्रिय चिश्ती संत निजामुद्दीन औलिया (1236-1325 ई.) और उनके शिष्य नासिरूद्दीन चिराग-ए-दिल्ली थे। ये हिन्दुओं समेत सभी वर्गों के लोगों से मुक्त रूप से मिलते थे

निजामुद्दीन औलिया बाबा फरीद के शिष्य थे। औलिया का वास्तविक नाम मुहम्मद बिन अहमद बिन दानियल अल बुखारी था व इनका जन्म बदायूँ में हुआ।

हजरत निजामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य अमीर खुसरो थे। खुसरो ने मार्च, 1325 ई. में निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु की खबर सुनकर दूसरे दिन प्राण त्याग दिये। खुसरो को उनके गुरु के पास ही दफनाया गया। इन्हीं की समाधि के अहाते में बरनी को दफनाया गया।

औलिया के जनाजे की नमाज सुहारवर्दी शेख रूकनुद्दीन ने पढ़ाई।

अमीर खुसरो ने कौल का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया। कौल को कव्वाली के शुरू और आखिर में गाया जाता था शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गाने वाले कव्वाल अपने गायन की शुरूआत कौल से करते हैं। कौल अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ कहावत है।

मुबारक खिलजी ने घोषणा की थी कि वह उस व्यक्ति को 1000 टके देगा जो उसे औलिया का सिर लाकर देगा।

औलिया के दरबार में न आने पर मुबारक खिलजी ने देख लेने की या गम्भीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी।

औलिया की खानकाह एवं मजार दिल्ली के बाहर यमुना किनारे गियासपुर में थी। एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ौसी क्षेत्र के लोगों ने औलिया का खानकाह में शरण ली थी।

निजामुद्दीन औलिया अविवाहित व ब्रह्मचारी थे, जबकि अन्य सभी चिश्ती सन्तों ने गृहस्थ जीवन अपनाया था।

निजामुद्दीन औलिया को गयासुद्दीन तुगलक ने उनकी लोकप्रियता से भयभीत होकर दिल्ली छोड़ने का आदेश दिया।

उन्होंने गयासुद्दीन के बारे में, जब वह बंगाल से वापस दिल्ली आ रहा था तो यह कहा कि “अभी दिल्ली दूर है।” दिल्ली पहुंचने से पहले ही दिल्ली से पहले अफगानपुर गाँव में गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हो गई।

निजामुद्दीन औलिया ने खुशरव शाह (1320 ई.) से 5 लाख टंका की भेंट स्वीकार की।

कहा जाता है कि निजामुद्दीन औलिया के समय में सात सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठे, पर वे किसी के दरबार में नहीं गये।

जब अलाउद्दीन खिलजी ने निजामुद्दीन औलिया से मिलने की अनुमति  माँगी तो निजामुद्दीन ने जवाब दिया की मेरे मकान में दो दरवाजे हैं यदि सुल्तान एक दरवाजे से आयेगा तो मैं दूसरे दरवाजे से बाहर चला जाऊँगा।

निजामुद्दीन औलिया को उनके उदार दृष्टिकोण के कारण “महबूब ए-इलाही” कहा जाता था। इन्हें सुल्तान उल औलिया भी कहा जाता था।

औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल-मशेख (शेखों में सुल्तान) कहते थे।

निजामुद्दीन औलिया को योग की प्राणायाम (हब्स-ए-दम) पद्धति में निपुणता प्राप्त थी। अतः उन्हें योगी सिद्ध (सिद्ध पुरुष) कहा जाने लगा।

औलिया ने मंडन और व्यायाम की शुरूआत की। औलिया ने सुलह ए कुल का सिद्धान्त दिया।

निजामुद्दीन की इच्छा थी कि उनकी कब्र पर कोई स्मारक न बने व उन्हें खुले मैदान में विश्राम करने दिया जाये, किन्तु मुहम्मद बिन तुगलक ने उनकी कब्र पर मकबरा बनाया।

औलिया के मकबरे के अहाते में अतगाखान एवं जहांआरा बेगम को दफनाया गया और दरगाह के अन्दर मुहम्मदशाह रंगीला का मकबरा है।

निजामुद्दीन औलिया ने रहतुल कुलुब लिखी।

औलिया ने कहा “कुछ हिन्दू जानते हैं कि इस्लाम एक सच्चा धर्म है, लेकिन वे इस्लाम को कबूल नहीं करते।”

बंगाल में औलिया के उपदेशों का प्रचार शेख सिराजुद्दीन उस्मानी ने किया, जिनको औलिया ने आइन ए हिन्द (भारत का दर्पण) की उपाधि दी थी।

अमीर हसन सिज्जी (देहलवी) ने निजामुद्दीन औलिया की वार्ताओं को अपने फारसी ग्रंथ फवायद-उल-फुवाद में संगृहीत किया। यह ग्रन्थ सूफी मत के व्यावहारिक पक्ष पर लिखा हुआ है।

अमीर हसन सिज्जी / देहलवी का पूरा नाम निजामुद्दीन हसन था।

 (vi) नासिरूद्दीन चिराग-ए-दिल्ली (1274-1356 ई.):-

नासिरूद्दीन चिराग-ए-दिल्ली ने ‘तौहीद-ए-वजूदी’ की रचना की। वे उत्तरी भारत में प्रथम दौर के अन्तिम लोकप्रिय चिश्ती सन्त थे। चिराग ए-दिल्ली की 100 वार्ताओं का वर्णन ‘खैर-उल-मजलिस’ में है। जिसकी रचना हमीद कलन्दर ने की।

नासिरूद्दीन चिराग ए दिल्ली का जन्म अयोध्या (अवध) में हुआ था।

चिराग ए दिल्ली प्रथम चिश्ती सूफी थे, जिन्होंने सरकारी सेवा को चिश्ती सूफी के लिए बाधक नहीं माना। ये केवल दोपहर में सोते थे, इनके साथी इनको गंज (ज्ञान का भण्डार) कहते है।

18वीं सदी में दक्कन के दरगाह कुली खाँ ने मुरक्का-ए-देहली (दिल्ली का एलबम) में चिराग-ए-दिल्ली की दरगाह का जीवन्त वर्णन किया है।

नासिरूद्दीन चिराग ए दिल्ली को ऑलिया ने उस समय का इब्राहीम अधम कहा था।

नासिरूदीन चिराग ए दिल्ली का मुबारक खिलजी से विवाद हुआ।

(vii) अन्य चिश्ती सन्तः-

चिराग-ए-दिल्ली के उत्तराधिकारी सैयद मुहम्मद गेसूदराज बहमनी साम्राज्य में आकर 1398 ई. में गुलबर्गा (कर्नाटक) में बस गये। गेसू दराज को बन्दा नवाज भी कहा जाता था।

सैयद मुहम्मद गेसूदराज ने उर्दू शायरी की पहली किताब मिराज उल आशिकिन लिखी तथा मुहम्मद अली सामानी ने सियार ए मुहम्मदी में गेसूदराज का जीवन चरित लिखा है।

दक्षिण भारत में चिश्ती सिलसिले की नींव निजामुद्दीन औलिया के शिष्य शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने रखी। वे दौलताबाद में रहते थे।

बंगाल के शासक हुसैनशाह का सत्यपीर आन्दोलन चिश्ती सम्प्रदाय से प्रभावित था।

शेख अब्दुल कुद्दूस गंगोही (1455-1536 ई.) लोदी कालीन व बाबर के समकालीन चिश्ती सन्त थे। इनकी खानकाह गंगोह (सहारनपुर) में स्थित होने के कारण इन्हें गंगोही कहा जाता है। इन्होंने ‘अलख’ नाम से कविताएँ लिखनी प्रारम्भ की थी। इनकी पुस्तक रश्दनामा है।

शेख सलीम चिश्ती मुगलकालीन विख्यात सन्त थे।

इन्हें शेख उल हिन्द कहा जाता था, इनका अकबर अत्यधिक सम्मान करता था।

इनका मकबरा अकबर ने फतेहपुर सीकरी में बनवाया।

शेख सलीम चिश्ती ने 24 बार मक्का की यात्रा की।

जहांगीर का जन्म शेख सलीम चिश्ती की कुटिया में हुआ। अकबर के दूसरे बेटे मुराद का जन्म भी शेख सलीम चिश्ती की कुटिया में हुआ।

शेख फरीदुद्दीन मसूद (महमूद) भी चिश्ती संत थे, जिनके उपदेशों का संकलन सुरूर उस सुदुर में हैं। 10.औरंगजेब के समय शेख कलीमुल्ला के नेतृत्व में चिश्ती सिलसिले को पुनर्जीवित करने का प्रयास हुआ।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय

इस दर्शन का मूल प्लेटो की रिपब्लिक है, जहाँ ईश्वर को सूर्य के प्रतीक द्वारा निरूपित किया गया है।

इस सिलसिले में गद्दीनवीशी का वंशानुगत सिद्धान्त भी दिखाई देता है।

शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी ने सर्वप्रथम फरें इजदी (दैवीय प्रकाश ) का विचार दिया था।

फिरदोसी एवं सतारी इस सम्प्रदाय की ही उपशाखाएं थी।

मुल्तान सुहरावर्दी सम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र था। यह पंजाब व सिन्ध में भी प्रसिद्ध हुआ जकारिया खुरासान के निवासी थे।

चिश्तियों के विपरीत ये आराम पसन्द व विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे तथा सक्रिय राजनीति में भी भाग लेते थे तथा आत्मा की उन्नति के लिए शारीरिक कष्ट में विश्वास नहीं करते थे। वे सद्र-ए विलायत जैसे राजकीय पद भी ग्रहण करते थे।

बगदाद के शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी ने इस सिलसिले की स्थापना की। “शिहाबुद्दीन सुहरावदों ने अवारिफुल मआरिफ की रचना की। उनके शिष्य शेख बहाउद्दीन जकारिया (1182-1262 ई.) तथा जलालुद्दीन तबरीजी ने इसे भारत में लोकप्रिय बनाया। तबरीजी ने बंगाल में इस मिलसिले को लोकप्रिय बनाया।

बहाउद्दीन जकारिया धनी सूफी संत थे। इनका कहना था कि “धन हृदय में रोग है; परन्तु हाथ में औषधि के समान है।”

बहाउद्दीन जकारिया ने नासिरूद्दीन कुबाचा के विरुद्ध इल्तुतमिश को सहायता दी। अतः इल्तुतमिश ने उसे शेख-उल-इस्लाम (प्रधान काजी) की उपाधि प्रदान की।

नोट– इल्तुतमिश द्वारा शेख उल इस्लाम का पद सर्वप्रथम शेख नजामुद्दीन सुगरा को दिया गया था।

शेख बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान में खानकाह की स्थापना की। वह व्रत रखने व आत्मा की उन्नति के लिये शारीरिक कष्ट बर्दाश्त करने में विश्वास नहीं करते थे।

बहाउद्दीन की मृत्यु के बाद उनका पुत्र सद्रुदीन आरिफ मुल्तान की सुहरावदी संप्रदाय की गद्दी पर बैठा आरिफ के बाद उसका पुत्र शेख रुकनुद्दीन अब्लुफत मुल्तान शाखा की गद्दी पर बैठा। एक अन्य शिष्य “सैय्यद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारो ने उच्छ (सिन्ध) में खानकाह स्थापित की।

सद्रुदीन/सद्दीन आरिफ ने बलबन के पुत्र मुहम्मद खां को कहा कि “कल शाम को उसकी मंगोलों से लड़ते हुए मृत्यु हो जायेगी।”

सैय्यद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने छत्तीस बार मक्का की यात्रा की। इस्लामी देशों में भ्रमण के कारण इन्हें जहाँनियाँ जहाॅंगश्त भी कहा जाता है।

मुहम्मद बिन तुगलक एवं फिरोज तुगलक ने सैय्यद जलालुद्दीन को अपने राज्य में शेख-उल-इस्लाम (मुख्य काजी) नियुक्त किया किन्तु वे पद त्याग कर हज करने के लिए मक्का चले गये। सैय्यद जलालुदीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शेख जलालुद्दीन मखइन जहाँनिया उच्छ की गद्दी पर बैठा। 15.शेख मूसा, शाहदाला दरियाई एवं शेख जमाली/जमालुद्दीन अन्य सुहरावर्दी सूफी थे।

शेख मूसा सदैव स्त्री की वेशभूषा में रहते थे। 17.शाहदौला दरियाई की दानशीलता के विषय में प्रचलित था- ‘जिसको न दे मौला, उसको दे दौला’

शेख जमालुद्दीन ने सियार उल अरीफीन की रचना की जमालुद्दीन सिकन्दर लोदी का मित्र था एवं बाबर इनका सम्मान करता था और यह हुमायूँ के साथ गुजरात अभियान में गये थे।

फिरदौसी सिलसिला

भारत में इसकी स्थापना शेख बदरूद्दीन समरकन्दी ने 13वीं शताब्दी में की। यह बिहार में अधिक प्रसिद्ध था। बिहार में शेख सरफुद्दीन याहिया मुनीरी इसके प्रसिद्ध सन्त थे, जो फिरोज तुगलक के समकालीन थे। वे मूलतः सुहरावर्दी थे।

शेख याहिया मुनीरी ने मक्तूबात (पत्रों) की रचना की, जिसमें वहदत- उल-वजूद के सिद्धान्त को इस्लाम के नजदीक लाया गया।

यह सिलसिला सुहरावदी सिलसिले से अधिक प्रभावित था व उसकी एक शाखा रूप था।

सत्तारी संप्रदाय

तैपूरी सम्प्रदाय को ही भारत में सत्तारी कहा गया है।

सत्तारी सम्प्रदाय ने नियमित यौगिक क्रियाओं को अपनाया था।

लोदी काल में जौनपुर के शाह अब्दुल्ला सत्तारी (मृत्यु 1485 ई.) ने इस सिलसिले की स्थापना की।

शाह अब्दुला सवारी ने सूफियों को चुनौती दी थी कि या तो वे उनके शिष्य बन जाये या उन्हें अपना शिष्य बना ले।

सत्तारी भी सुहरावर्दियों की भांति आरामदायक जीवन व्यतीत करते थे। सचारी सिलसिला भी सुहरावदों से प्रभावित था।

इस सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध सन्त ग्वालियर के मुहम्मद गौस (1485-1563 ई.) थे। गौस को कुत्ब भी कहा जाता था।

प्रथम सत्तारी खानकाह अहमदाबाद में गौस द्वारा स्थापित किया गया।

मुहम्मद गौस की मजार ग्वालियर में है। गौस ने कृष्ण को औलिया के रूप में माना था।

गौस ने हुमायूँ को भारत निर्वासन के दौरान पत्र लिखकर कहा था ‘सफलता की दुल्हन शीघ्र ही विवाह के मंच पर कदम रखेगी।

मुहम्मद गौस हाजी हमीद हसन के शिष्य थे।

सत्तारी सन्तों ने हिन्दु-मुस्लिम धार्मिक विचारों की साम्यता दिखाकर उन्हें निकट लाने का प्रयास किया।

मुगल सम्राट हुमायूँ व तानसेन मुहम्मद गौस के शिष्य थे।

मुहम्मद गौस की प्रसिद्ध पुस्तके ‘जवाहर-ए-खामशाह’, ‘कलीद-ए-मुखाजिन’, ‘रिसाला ए मेराजिमा’ तथा ‘गुलजार ए अबरार है।

कलीद ए मुखाजिन प्राचीन भारतीय खगोल, गणित एवं ज्योतिष से सम्बन्धित हैं।

गौस ने हठ योग की पुस्तक अमृत कुण्ड का बहार-उल-हयात नाम से संस्कृत से फारसी में अनुवाद भी किया।

सत्तारी बंगाल, जौनपुर और दक्खन में केन्द्रित थे। 17. शेख बुद्धन सत्तारी भी जौनपुर में सत्तारी सम्प्रदाय के सूफी संत थे।

सत्तारी गुजरात व मध्यप्रदेश में भी प्रसिद्ध हुये। 19.गुजरात में प्रसिद्ध सत्तारी सूफी गौस के उत्तराधिकारी शाह वजीउद्दीन थे।

बुरहानपुर में सत्तारी सूफियों में शेख ईसा तथा उसके शिष्य शेख बुरहानुद्दीन गरीब प्रमुख थे। औरंगजेब ने भी उत्तराधिकार युद्ध शुरू होने से पहले शेख बुरहानुद्दीन से आशीर्वाद लिया था।

कादिरी सम्प्रदाय

इसकी स्थापना शेख अब्दुल कादिर जिलानी (1077-1166ई.) बगदाद ने की थी। यह इस्लाम का पहला रहस्यवादी पंच है।

भारत में इस सिलसिले की शुरुआत 15वीं सदी में सैय्यद नासिरुद्दीन मुहम्मद जिलानी ने उच्छ (सिन्ध) में की व शाह नियामतउल्ला ने भी योगदान दिया।

अकबर ने शेख मूसा को 5000 का मनसब प्रदान किया था।

शेख अब्दुलमाली कादिरी ने अकबर द्वारा प्रदत्त मनसब ठुकरा दिया।था, तब अकबर ने इन्हें मदद ए माश के रूप में प्रदत्त भूमि वापस ले ली।

मियाँ मीर जहांगीर एवं शाहजहां के समकालीन थे।

शेख मीर मुहम्मद मियाँ मीर (मृत्यु 1635 ई.) इस सिलसिले के भारत में सबसे प्रसिद्ध सन्त थे।

मियाँ मीर के शिष्य गुरु अर्जुन देव भी थे। मियाँ मीर ने ही अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी।

मियाँ मीर के एक शिष्य मुल्ला शाह बदख्शी ने इस मत का प्रचार कश्मीर में किया।

शाहजहाँ भी मुल्लाशाह का आदर करते थे।

दारा शिकोह भी कादिरी सिलसिले के अनुयायी थे। उसने लाहौर में मियाँ मीर से मुलाकात भी की।

मियाँ मीर की मृत्यु के बाद दारा शिकोह मियाँ मीर के शिष्य व उत्तराधिकारी मुल्ला शाह बदख्शी के शिष्य बन गये।

मुल्ला शाह दारा की बहिन जहांआरा के भी आध्यात्मिक गुरु थे।

मुल्ला शाह की जीवनी जहांआरा ने साहिबिया नामक शीर्षक से लिखी है।

कादिरी सिलसिले का प्रसार उत्तरप्रदेश व दक्षिण में अधिक हुआ।

कादिरी संप्रदाय के अन्य लोकप्रिय सन्त शेख मूसा, शेख दाउद किरमानी और शेख अब्दुल माली कादिरी थे।

नक्शबंदी सम्प्रदाय

इसकी स्थापना ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबन्दी (1317-1389 ई.) ने बगदाद में की।

भारत में इस सिलसिले की स्थापना ख्वाजा बाकी बिल्लाह (1563 1603 ई.) ने उच्छ में की।

यह सबसे कट्टरवादी सिलसिला था।

इन्होंने शरीअत के कानूनों पर बल दिया।

इस सिलसिले के सन्त बाकी बिल्लाह के शिष्य शेख अहमद फारूख सरहिन्दी (मृत्यु 1625 ई.) ने स्वयं को मजहि अलिफसानी कहा व अकबर की उदार नीतियों का विरोध किया।

इस सिलसिले ने संगीत का भी विरोध किया।

मुजहिद का अर्थ सुधारक होता है।

सरहिन्दी के पत्रों का संकलन मक्तुबात ए रब्बानी है।

सरहिन्दी ने इन्सानुल कामिल की उपाधि धारण की।

मुजहिद अलिफसानी का अर्थ इस्लाम की स्थापना के एक हजार वर्ष बाद होने वाले सुधारक से है।

बाबर भी नक्शबन्दी नेता ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार का अनुयायी था। बाबर को कलन्दर भी कहा जाता था।

सरहिन्दी ने अल्लाह के साथ एकत्व (वहदत-उल-वुजूद) के दर्शन को अस्वीकार कर वहदत-उल-शुहूद (प्रत्यक्षवाद) का दर्शन प्रतिपादित किया।

सरहिन्दी मनुष्य व ईश्वर का सम्बन्ध दास व मालिक का मानते थे न कि प्रेमिका व प्रेमी का।

शेख अहमद सरहिन्दी को इस्लाम का नवजीवनदाता एवं धर्मसुधारक कहा जाता है। सरहिन्दी ने कहा ‘वह खुदा का मुरीद एवं उसकी मर्जी है।’

जहांगीर ने शेख अहमद सरहिन्दी को 1619 ई. में बन्दी बना लिया और ग्वालियर किले में कैद रखा।

शाहजहां ने सरहिन्दी के शिष्य आदमबनूरी को देश से निष्कासित कर दिया था।

औरंगजेब शेख अहमद सरहिन्दी के पुत्र मीर मासूम का शिष्य था।

औरंगजेब ने सरहिन्दी के पत्रों के प्रचार पर औरंगाबाद में रोक लगा दी थी।

इसके समय मिर्जा मजहर जान ए जाना ने कहा कि ‘चूंकि वेद दैवीय ग्रन्थ है, इसलिए हिन्दुओं का दर्जा अहल ए किताब का है।”

18वीं शताब्दी में इल्मे इलाही मुहम्मदी नामक रहस्यवादी सिद्धन्त का विकास दिल्ली के ख्वाजा मुहम्मद नासिर अंदलीब व उनके पुत्र ख्वाजा मीर दर्द ने क्रिया जो नक्शबन्दी सिलसिले के अनुयायी थे।

मीर दर्द ने इल्मुल किताब की रचना की।

अन्य सन्त शेख अब्दुल लतीफ, ख्वाजा महमूद (कश्मीर), शेख बुरहान,शाह वली उल्लाह देहलवी, मिर्जा मजहर जानेजाना थे।

शाहवली उल्ला का जन्म औरंगजेब के शासनकाल में हुआ।

इन्होंने निजामुलमुल्क एवं अहमदशाह अब्दाली को पत्र लिखा कि मुसलमानों को मराठो के अत्याचारों से बचाए। ‘हुज्जत उल्लाह इल बालिधा’ इनके फारसी पत्र हैं।

नक्शबंदी संप्रदाय के अनुसार मनुष्य का ईश्वर से संबंधी प्रेमी और प्रेमिका का नहीं अपितु गुलाम और मालिक की भाँति है।

नक्शबंदी के अलावा सभी सुफी संप्रदायों ने यौगिक मुद्राओं व प्राणायाम को अपनाया यौगिक मुद्राओं को सबसे अधिक चिश्ती संप्रदाय ने अपनाया।

अन्य सूफी संत एवं सम्प्रदाय:-

कश्मीर के शेख नुरूद्दीन ऋषि/शेख-उल-आलम (नुन्द ऋषि) (मृत्यु 1430 ई.) का ऋषि आन्दोलन सिलसिला भी सुफी आन्दोलन का ही हिस्सा था।

कश्मीर की शैव महिला संत लल्ला योगेश्वरी (लल्ल देवी) के विचारों को भी शेख नुरूद्दीन ऋषि ने अपने आन्दोलन में शामिल कर लिया।

लल्ला योगेश्वरी को रचनाएं वाख नाम से प्रसिद्ध है।

नुरुद्दीन की दरगाह श्रीनगर में चरार-ए-शरीफ नाम से प्रसिद्ध थी।

जिसे 1995 में आतंकवादियों ने जला दिया। नुरूद्दीन को सहजानन्द भी कहा जाता था।

मीर सैय्यद हमदानी कुबराविया शाखा के सूफी कवि थे यह सिलसिला।

मुख्यतः कश्मीर में प्रचलित था। हमदानी 14वीं शताब्दी में कश्मीर आये।

पंजाबी सूफी सन्त बुल्लेशाह का नाम बुलाकीराम था।

बुल्ले शाह का जन्म कुस्तुन्तुनिया में 1703 ई. में एक सैयद परिवार में हुआ।

यह नवसूफीवाद मिलसिला था। बुल्लेशाह सभी धर्म ग्रन्थों के आलोचक थे।

अब्दुल वहीद बेलग्रामी नामक सूफी सन्त ने ‘हकैक-ए-हिन्दी’ नामक पुस्तक की रचना की जिसमें उसने सूफी रहस्यवादी संदर्भ में कृष्ण, गोपी, राधा, मुरली, यमुना आदि शब्द के अर्थ स्पष्ट करने की कोशिश की।

रोशनिया सम्प्रदाय

इसके संस्थापक बायजित पीर रोशन अंसारी अफगान थे।

16वीं सदी में पश्तो साहित्य का विकास बायजित असारी के खैर-उल-बयान (Khayr-al-Bayan) से शुरू हुआ।

बायजित नेअकबर के खिलाफ भी विद्रोह किया।

कलंदरी सम्प्रदाय:-

कलंदरी सम्प्रदाय की स्थापना/जनक अब्दुल अजीज मक्की ने की थी और भारत में इसका प्रचार नज्मुद्दीन कलंदर ने किया, जो औलिया के शिष्य थे। नज्यूद्दीन का जन्म 1234 ई. में दिल्ली में हुआ।

इस सम्प्रदाय में घुमन्तु फकीर होते थे, जो इस्लामी सिद्धांतों को नहीं मानते थे।

कलन्दरों का संपर्क नाथ यौगियों से अधिक था और वे नाथ योगियों व नागा संन्यासियों के समान कान छिदवाते थे।

नज्मुद्दीन कलंदर ने 42 बार मक्का (हज यात्रा) तथा चीन एवं इंग्लैण्ड की दो बार यात्रा की थी।

इसके अलावा स्पेन, यमन आदि को भी यात्रा की नज्मुदीन के बारे में कहा जाता है कि इन्होंने लगातार एक पत्थर पर 30 वर्ष तक समाधि लगाई एवं एक बार 40 वर्ष का व्रत रखा था, नज्मुद्दीन की मजार माण्डू में है।

मुंडित केश भी कलन्दर सूफी थे। जिनके बारे में प्रचलित है कि इबादत करते समय इनका सिर गर्दन से अलग हो जाता था।

महदवी सम्प्रदाय / आन्दोलन:-

मुस्लिम मसीहा को महदी कहा जाता था. इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक जौनपुर के सैयद मोहम्मद थे, जो अपने को महदेवी या युग का मानना था।

सैयद मोहम्मद की गतिविधियों करकेन्द्र अहमदाबाद था

दक्षिण में अहमदनगर ने इस समय को राजधर्म बनाया।

फिरोज तुगलक ने रूकन एवं इस्लामशाह सूरी ने शेख अलाई नामक महदी को मृत्युदण्ड दिया था और अकबर ने महदी मिया मुस्तफा बदगी को गिरफ्तार करवाया था।

पीर सदउद्दीन ने भारत में खोजह सम्प्रदाय का प्रचार किया था।

मदारिया सिलसिले के प्रवर्तक बदीउद्दीन मदार थे। इनकी गतिविधियों का केन्द्र मकनपुर (कानपुर) था।

रायबरेली के सैयद अहमद ने तरीका ए मुहम्मदिया नामक सूफी सम्प्रदाय का प्रचलन किया।

नवसूफीवाद सिलसिला सिन्ध में प्रचलित था, जिसके प्रवर्तक शाह करीम थे।

बेदिल एवं बेकस प्रसिद्ध नवसूफीवाद संत थे, जिनके गीत सिन्धी समाज में लोकप्रिय है।

सालार मसूद गाजी (सिपहसालार गाजी) एक सैनिक से संत बने थे।

बहराइच में इनकी मजार है, जिसका सर्वप्रथम वर्णन खुसरो ने एजाज ए खुसरवी पुस्तक में किया है।

इसकी मजार पर सर्वप्रथम जाने वाले सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक (1341 ई. में) थे, बाद में फिरोज तुगलक (1375 ई. में) गये थे।

बंगाल के शासक हाजी इलियास ने स्वयं के कुष्ठ रोग के निदान हेतु इस मजार/दरगाह की यात्रा की थी।

पंजाब के सूफी सैयद अहमद को उपाधि सुल्तान सखी सरवर,लखदाता एवं सुल्तानी थी।

अलाउद्दीन खिलजी भी निजामुद्दीन औलिया एवं साबिरी उपशाखा के सूफी शेख शम्सुद्दीन तुर्क का सम्मान करता था।

लाल शाहबाज कलन्दर (1177-1274 ई.) का वास्तविक नाम सैयद शाह हुसैन मरवन्दी था।

लाल शाहबाज का मकबरा सेहवण (Sehwan), सिन्ध में है तथा प्रसिद्ध गीत ‘दमादम मस्त कलन्दर इन्हीं लाल शाहबाज की महिमा में गाया गया है।

सिन्ध के हिन्दू शाहबाज कलन्दर को झूले लाल का अवतार भी मानते हैं।

लाल शाहबाज कलन्दर, बहाउद्दीन जकारिया, बाबा फरीद एवं सैयद जलालुद्दीन बुखारी में गहरी मित्रता थी, अतः इन्हें ‘चार यार’ कहा जाता है।

सूफी सम्प्रदाय से सम्बन्धित अन्य तथ्य:-

दक्खनी:- कर्नाटक के बीजापुर के आस-पास 17वीं-18वीं शताब्दी में इस क्षेत्र में बसने वाले चिश्ती संतों ने दक्खनी में छोटी कविताएँ  लिखी। ये कविताएं औरतों द्वारा घर का काम जैसे चक्की पीसते एवं चरखा कातते हुए गाई जाती थी। कुछ और रचनाएं लोरीनामा एवं शादीनामा के रूप में लिखी गई।

मुलफुजातः-

सूफी संतों की बातचीत मुलफुजात कहलाती थी।

मुलफुजात पर आरम्भिक ग्रंथ अमीर हसन सिजजी देहलवी द्वारा संकलित फवाइद-अल-फुआद है।

यह शेख निजामुद्दीन ओलिया की वार्तालाप पर आधारित है।

मुलफुजात का संकलन विभिन्न सूफी सिलसिला के शेखों की अनुमति से हुआ।

इसका मुख्य उद्देश्य उपदेशात्मक था।

मक्तुबात (लिखे हुए पत्रों का संकलन):-

ये वे पत्र थे जो सूफी सतों द्वारा अपने अनुयायियों और सहयोगियों को लिखे गए।

इन पत्रों में धार्मिक सत्य के बारे में सूफी संतों के अनुभवों का वर्णन मिलता है।

इन पत्रों में सूफी संत अपने अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन, उनकी आकांक्षाओं एवं मुश्किलों पर भी टिप्पणी करते थे।

शेख अहमद सरहिन्दी ने मक्तुबात-ए-इमाम रब्बानी लिखा।

तजकिरा:-

सूफी संतों की जीवनियों का स्मरण तजकिरा कहलाता है। भारत में लिखा पहला सूफी तजकिरा चिश्ती संतों के बारे में लिखा गया। तजकिरा मीर खुर्द किरमानी का सियार-उल-औलिया है। सबसे प्रसिद्ध तजकिरा अब्दुल हक मुहाहिस देहलवी का अख्बार-उल अखयार है। तजकिरा लेखकों का मुख्य उद्देश्य अपने सिलसिले को प्रधानता स्थापित करना और अपनी आध्यात्मिक वंशावली की महिमा का बखान करना था। तजकिरे के बहुत से वर्णन अविश्वसनीय होते है।

नाथपथी योगियों ने सूफियो को हठयोग का अभ्यास करवाया था।

सूफियों के अंगवस्त्र या लबादा को खिरका कहते हैं।

उर्स का अर्थ ‘विवाह’ है अर्थात पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन किसी सूफी संत की बरसी को भी उर्स कहते हैं।

शेख जियाउद्दीन अबुल जीव (अबुनजीब) ने सूफी आचरण संहिता (आदाब अल सूफिया) पर आदाब उल मुरीदीन की रचना की थी।

सर्वप्रथम कुका के अबू हशीम को सूफी कहकर पुकारा गया था।

जहांगीर ने सूफी मत की तुलना वेदान्त से की थी। 7.नक्शबंदी एवं कादिरी सम्प्रदाय ने इस्लाम को पुनर्जीवन प्रदान किया था।

पानीपत के सूफी संत शरीफुदीन बु अली कलदर को दो बार दफनाया गया था।

भारत में मुजद्दीया या विरोधी आन्दोलन का केन्द्र औरंगाबाद था।

पीरबोधन युग का श्रेष्ठतम संगीतज्ञ माने जाते थे।

शेख अब्दुल हल दारा शिकोह की तरह वेदों को ईश्वर द्वारा प्रकट मानता था।

दक्षिण तट के मोपलाओं को अबदुला खर्राजी के शिष्यों ने इस्लाम में धर्मान्तरित किया।

भारत की सूफी महिलाओं में बीबी जुलेखा (औलिया की माँ), जमाल (ख्वाजा की पुत्री), बीबी करसूम (फरीद की माँ) प्रमुख थी।

बीबी देवा शरीफ (बाराबंकी, उत्तरप्रदेश) में हाजी वारिस अली शाह को मजार पर मेला लगता है।

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