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वर्धन वंश (Vardhana Dynasty) – पुष्यभूति वंश

वर्धन वंश (Vardhana Dynasty) - पुष्यभूति वंश

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वर्धन वंश (Vardhana Dynasty) – पुष्यभूति वंश

इन्होंने गुप्तों के बाद उत्तर भारत में सबसे विशाल राजवंश ( वर्धन वंश ) की स्थापना की। ह्वेनसांग तथा आर्यमंजूश्रीमूलकल्प के अनुसार वर्धन वंश (पुष्यभूति वंश) वैश्य (फीशे) जाति का था।

दिल्ली के निकट थानेश्वर (वर्तमान में हरियाणा) में शिव उपासक पुष्यभूति ने इस वंश की स्थापना छठी शताब्दी ई. में की।

थानेश्वर को स्थाण्वीश्वर भी कहते हैं।

बाणभट्ट की हर्षचरित में वर्धन वंश का संस्थापक पुष्यभूति को बताया है, लेकिन वर्धन वंशके अभिलेख एवं मुहरों में प्रथम शासक नरवर्धन | को बताया गया है।

वर्धन वंश के प्रथम चार राजा क्रमशः

नरवर्धन, राज्यवर्धन प्रथम, आदित्यवर्धन और प्रभाकरवर्धन सभी सूर्य के उपासक थे।

पुष्यभूति वंश में तीन प्रसिद्ध शासक हुये। प्रभाकरवर्धन और उसके दो पुत्र राज्यवर्धन व हर्षवर्धन

प्रभाकरवर्धन

प्रभाकरवर्धन को हर्षचरित में मालव लक्ष्मी लतापरशुः, सिन्धु राजज्वरः,गुर्जर प्रजागर भी कहा गया है।

महाराजाधिराज एवं परमभट्टारक की उपाधि धारण करने वाला प्रथम शासक प्रभाकरवर्धन था।

हर्षचरित में प्रभाकरवर्धन को हुणहरिणकेसरी कहा है अर्थात् प्रभाकर वर्धन हूण रूपी हिरण के लिए सिंह के समान थे।

सर्वप्रथम प्रभाकर वर्धन ने ही वर्धन वंश में हूणों को परास्त किया।

हर्ष की माता यशोमति ने अपने पति की बीमारी से न बचने की आशा में पति के जीवित रहते हुये ही चिता मे जलकर आत्मदाह कर लिया।

रसायन व सुषेन नामक राजवैद्य ने हर्ष के पिता प्रभाकर वर्धन को बीमारी से बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन वे बचा न सके।

राज्यवर्धन द्वितीय

प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद राज्यवर्धन द्वितीय ने सिंहासन ग्रहण किया, तभी उसके बहनोई ग्रहवर्मा द्वितीय (राज्यश्री के पति) की हत्या मालवा के देवगुप्त ने कर दी एवं राज्यश्री को कारागार में डाल दिया तब  राज्यवर्धन सेना लेकर देवगुप्त से लड़ने गया एवं देवगुप्त को मार डाला।

राज्यवर्धन द्वितीय की गौड़ के राजा शशांक ने हत्या कर दी। हर्ष को कुन्तल नामक दूत द्वारा अपने भाई राज्यवर्धन की हत्या का समाचार मिला। हर्षचरित में लिखा है कि हर्ष ने यह प्रतिज्ञा ली कि मैं कुछ दिनों के भीतर ही पृथ्वी को गौड़ विहीन न कर दूँ तो पतंगे की भांति जलती हुई चिता में प्रवेश कर अपने प्राण दे दूंगा।

हर्षवर्धन (606-647 ई.)

ज्योतिषी तारक ने हर्ष के जन्म पर उसके चक्रवर्ती सम्राट बनने का संकेत दिया था। सेनापति सिंहनाद के कहने पर हर्ष ने सिंहासन ग्रहण किया। हर्षवर्धन ने 606 ई. में राज्यारोहण के साथ ही हर्ष संवत् चलाया।

हर्षवर्धन के शासक बनने के समय राज्य की स्थिति काफी संकटपूर्ण थी। गौड़ के राजा शशांक ने हर्ष के भाई राज्यवर्धन का तथा मालवा के देवगुप्त ने हर्ष के बहनोई ग्रहवर्मा का वध कर दिया था। हर्ष के ममेरे भाई व मित्र भण्डी ने राज्यश्री के विन्ध्याचल जंगल में भागने की खबर दी। हर्ष ने एक बौद्ध भिक्षु दिवाकर मित्र की सहायता से अपनी बहिन को ढूंढा, जब वह आत्मदाह करने जा रही थी। हर्ष व दिवाकर मित्र की प्रथम भेंट विन्ध्य प्रदेश में हुई।

भास्कर वर्मा का दूत हंसबेग असंख्य उपहारों के साथ अपने स्वामी की ओर से सन्धि प्रस्ताव लेकर हर्ष के समक्ष उपस्थित हुआ। हर्ष ने कामरूप (असम) राजा भास्कर वर्मा से संधि कर गौड़ के राजा शशांक के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की।

हर्षचरित

हर्षचरित में लिखा है कि इससे पूर्व भास्करवर्मा ने शिव के अतिरिक्त किसी के सामने सिर नहीं झुकाया था।

हर्ष ने गौड़ शासक शशांक को हराया। आर्यमंजूश्रीमूलकल्प में शंशाक की पराजय की जानकारी है।

ह्वेनसांग के अनुसार बानि के नेतृत्व में कन्नौज के राजनीतिज्ञों ने हर्ष से कन्नौज का प्रशासन सम्भालने की प्रार्थना की। अवलोकितेश्वर बोधिसत्व के परामर्श पर हर्ष ने कन्नौज के सिंहासन पर बैठने एवं महाराज की उपाधि न धारण करने की प्रतिज्ञा की और आर्यपुत्र / राजपुत्र की उपाधि धारण की, लेकिन कालान्तर में उसने महाराजाधिराज (बासखेड़ा लेख के अनुसार) की उपाधि भी ग्रहण की थी।

चीनी ग्रन्थ फैगचिन्ह के अनुसार हर्ष एवं राज्यश्री कन्नौज के सिंहासन पर साथ-साथ बैठते थे।

साम्राज्य विस्तार:-

हर्ष ने दक्षिण में सम्राज्य विस्तार के लिए वल्लभी (सौराष्ट्र) पर आक्रमण किया, यह युद्ध ही हर्ष एवं पुलकेशिन द्वितीय के मध्य युद्ध का कारण बना।

हर्ष का साम्राज्य दक्षिण में नर्मदा के तट तक फैला था। वातापी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा के दक्षिण में हर्ष के विस्तार को रोका। रविकीर्ति के 634 ई. के ऐहोल अभिलेख के अनुसार हर्ष पुलकेशिन द्वितीय से नर्मदा नदी के तट पर युद्ध में पराजित हुआ। यह युद्ध 630 से 634 ई. के बीच हुआ।

पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध

पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध का उल्लेख ऐहोल लेख, सी यू की एवं येक्केरी अभिलेख में है। ऐहोल अभिलेख में हर्ष की गजसेना (गज का नाम दर्पशात) का भी उल्लेख है।

हर्ष का साम्राज्य पूर्व में गंजाम से लेकर पश्चिम में वल्लभी तक फैला था तथा उत्तर में कश्मीर को छोड़कर शेष प्रान्त साम्राज्य में शामिल थे।

हर्ष की पंचभारत विजय में पंजाब, बंगाल, कन्नौज (उत्तरप्रदेश), मिथिला (बिहार) एवं उड़ीसा शामिल थे।

पंचभारत विजय के पश्चात् कन्नौज पर अपनी बहन के आग्रह पर अधिकार करके अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की।

ध्रुवसेन द्वितीय से युद्ध

हर्ष ने वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय को पराजित किया। जयभट्ट तृतीय के नौसारी ताम्रपत्र के अनुसार ध्रुवसेन ने भड़ौंच के गुर्जर शासक दद्द द्वितीय के दरबार में शरण ली।

ध्रुवसेन को ही ध्रुवभट्ट अथवा दुर्लभ भट्ट कहते हैं। बाद में हर्ष ने वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय से अपनी पुत्री का विवाह किया।

हर्ष के समकालीन सिन्ध का शासक साहसीराय था।

ह्वेनसांग मगध का शासक पूर्णवर्मा को बताता है जिसे हर्ष ने हराकर मगध पर अधिकार किया था।

हर्ष द्वारा अंतिम युद्ध 643 ई. में गंजाम या कांगोद (उड़ीसा) में लड़ने का उल्लेख है।

मात्वालिन के अनुसार

हर्ष ने 641 ई. में चीनी नरेश ताई-सुंग (ती आंग) के दरबार में अपना दूत भेजा जिसके जवाब में तीन चीनी दूतमण्डल भी हर्ष के दरबार में आये 641 ई. में पहला चीनी दूत मण्डल लियांग होई-किंग के नेतृत्व में, 643 ई. में लि-यि-पियओ के नेतृत्व में तथा 647 ई. में वैन-ह्यान-शे (वांगश्वासे) के नेतृत्व में कुल तीन चीनी दूत मण्डल हर्ष के दरबार में आये लेकिन 647 ई. में तीसरा

दूत मण्डल हर्ष की मृत्यु के बाद दरबार पहुंचा।

हर्ष सूर्य व शिव के साथ बुद्ध की भी उपासना करता था। बाद में उसका झुकाव महायान बौद्ध धर्म की ओर अधिक हो गया।

राजतरंगिणी के अनुसार बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व हर्ष शैव मतावलम्बी था। उसे अभिलेखों में परममाहेश्वर कहा गया है।

वर्धन वंश में सर्वप्रथम हर्ष के भाई राज्यवर्धन ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। बंसखेड़ा और मधुबन अभिलेखों में राज्यवर्धन को परम सौगात (बौद्ध)

कहा गया है।

हर्ष ने कश्मीर नरेश दुर्लभवर्धन से बलपूर्वक बुद्ध के दाँत के अवशेष प्राप्त किये व कन्नौज में एक विहार बनाकर इसे सुरक्षित रखा।

प्रयाग महामोक्षपरिषद्:

हर्ष प्रत्येक पाँचवें वर्ष प्रयाग में महोत्सव (धर्म महासम्मेलन) करके दान करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग 643 ई. में इस प्रकार के छठे महोत्सव में शामिल हुआ था।

इसमें 18 देशों के राजाओं ने भाग लिया। 75 दिनों तक चले इस समारोह के प्रथम दिन बुद्ध, दूसरे दिन आदित्य (सूर्य) एवं तीसरे दिन ईश्वरदेव (शिव) की पूजा की गई।

प्रयाग में ही ह्वेनसांग ने हर्ष से चीन जाने की विदाई मांगी।

हर्ष ने नालन्दा महाविहार को 100 गाँवों की आय दान में दी थी।

दानशीलता के लिए हर्ष को भारतीय हातिम भी कहा गया है।

हर्ष के बसखेड़ा, मधुवन एवं नालन्दा लेखों में भूमिदान का उल्लेख है।

कन्नौज धर्म सभा (643 ई.)-

महायान धर्म की महता स्थापित करने के लिए यह महासम्मेलन बुलाया गया था जो 20 दिनों तक चला था, जिसमें 20 देशों के राजाओं ने भाग लिया। 21वें दिन विशाल जुलूस निकाला जिसमें बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा सबसे आगे थी और ब्रह्मा की वेशभूषा में भास्करवर्मा एवं शक्र (इन्द्र) की वेशभूषा में हर्ष बुद्ध के अनुचर की भांति चल रहे थे। हर्ष ने घोषणा की कि जो कोई धर्माचार्य (ह्वेनसांग) के विरूद्ध बोलेगा, उसकी जिह्वा काट ली जायेगी। अन्त में हर्ष ने 500 ब्राह्मणों को देश निर्वासित किया।

इसी सभा में ह्वेनसांग को महायानदेव एवं मोक्षदेव की उपाधियाँ प्रदान की गई।

आर. के. मुखर्जी ने इस धर्म सभा को ‘धर्मों का महासम्मेलन’ कहा है।

ह्वेनसांग 629 ई. से 645 ई. तक भारत में रहा। उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। नालन्दा इस समय शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था।

हर्ष की साहित्यिक उपलब्धियाँ-

हर्ष उच्च कोटि का कवि था। उसने संस्कृत में नागानन्द, रत्नावली व प्रियदर्शिका नामक तीन नाटकों की रचना की। अतः हर्ष को साहित्यकार सम्राट भी कहा जाता है।

कहा जाता है कि धावक नामक कवि ने हर्ष के तीनों नाटक लिखे।

कादम्बरी व हर्षचरित के लेखक बाणभट्ट, सुभाषितावली, मयूरशतक व सूर्यशतक के लेखक मयूरभट एवं हेनसांग को हर्षवर्धन ने आश्रय दिया।

बाणभट्ट बिहार के औरंगाबाद जिले के प्रीथिकूटा गांव का निवासी था।हर्षचरित में आठ अध्याय / उच्छवास है।

कुछ विद्वानों ने चण्डीशतक, पार्वतीपरिणय एवं मुकुटताड़ितक का रचयिता भी बाणभट्ट को माना है।

हर्ष की सभा में मातंग दिवाकर नामक विद्वान था जो कि चाण्डाल था।

भर्तृहरि ने श्रृंगारशतक, नीतिशतक, वैराग्यशतक की रचना की।

बाणभट्ट के पुत्र भूषणभट्ट (पुलिन्दभट्ट) ने अपने पिता के अपूर्ण ग्रन्थ कादम्बरी को पूर्ण किया। 8.कुमारदास ने जानकीहरण, जयादित्य एवं वामन ने काशिकावृति की रचना की।

बाणभट्ट ने हर्ष को कुशल बांसुरी वादक बताया है।

उद्योतकर नामक विद्वान ने संभवतः इसी समय न्याय वार्तिक लिख ह्वेनसांग ने योगाचार दर्शन पर एक ग्रंथ लिखा।

हर्ष ने जयसेन नामक बौद्ध विद्वान को उड़ीसा के 80 ग्राम दान देने चाहे परन्तु जयसेन ने विनीत भाव से दान लेना अस्वीकार कर दिया।

ह्वेनसांग चीनी सम्राट ताइशुंग का समकालीन था। 13.एक यूरोपीय लेखक ने हर्ष को ‘हिन्दूकाल का अकबर’ कहा है।

हर्ष का दूसरा नाम शिलादित्य था। ह्वेनसांग हर्ष का शिलादित्य नाम से ही वर्णन करता है।

11वीं शताब्दी के गुजराती लेखक सोढ़ल ने अपनी उदयसुन्दरी कथा में हर्ष को कवीन्द्र एवं वाणी का हर्ष कहा है। गीतगोविंद के लेखक जयदेव ने प्रसन्नराघव में उसे कविताकामिनी का साक्षात हर्ष काव्य का हर्ष तथा भास एवं कालिदास के समतुल्य बताया है।

हर्षचरित में हर्ष को सभी देवताओं का सम्मिलित अवतार कहा गया है।

बंसखेडा अभिलेख में हर्ष के हस्ताक्षर है एवं सोनपत मुहर पर हर्ष का पूरा नाम हर्षवर्धन (हर्ष नाम अंकित मुहर) मिलता है।

हर्ष निःसंतान था अतः उसकी मृत्यु के साथ ही 647 ई. में वंश का अंत हो गया।

चालुक्य अभिलेखों (ऐहोल अभिलेख) में हर्ष को सकलोत्तरापथनाथ (संपूर्ण उत्तरी भारत का सम्राट) कहा गया है।

बाण ने उसे “चतुः समुद्राधिपति”, “सकलराजचक्रचूडामणि तथा “सर्वचक्रवर्तिनांधौरेय” कहा है।

हर्ष का प्रशासन

  • हर्ष अत्यधिक परिश्रमी था। उसने दिन को तीन भागों में बांट रखा था, जिनमें से एक राज्य कार्य के लिए निश्चित था।
  • इस का प्रशासन निरंकुश तथा गणतंत्रीय तत्वों को मिश्रण था। हर्ष को प्रशासन में सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् होती थी।
  • हर्ष के प्रशासन में एक सुव्यवस्थित सचिवालय था, जिसके प्रमुख पदाधिकारी निम्न थे-

अधिकारी – कार्य

  1. अवन्ति – युद्ध व शांति का अधिकारी, विदेश मंत्री/ सचिव
  2. सिंघनाद – सेनापति
  3. कुन्तल – अश्व सेना का प्रधान
  4. स्कन्दगुप्त – हस्ति सेना का प्रधान
  5. भण्डी =- प्रधान सचिव / प्रधानमंत्री

हर्ष की प्रशासन प्रणाली सामन्त प्रणाली की अग्रगामी थी।

विदेश सचिव को महासंधिविग्रहिक कहा जाता था। मंत्री को सचिव या अमात्य कहा जाता था। राजस्थानीय संभवतः वायसराय (प्रान्त प्रमुख) थे।

चाट और भाट पुलिस अधिकारी थे।

हर्ष के प्रशासन व पदाधिकारियों के नाम बंसखेड़ा अभिलेख में मिलते है।

बंसखेड एवं मधुवन लेखों में हर्ष के महासामन्त स्कन्दगुप्त एवं ईश्वरगुप्त का उल्लेख है।

हर्ष ने अपनी बहिन को प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की थी।

हर्षचरित के अनुसार हर्ष ने सर्वप्रथम पदाधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि देने की जागीरदारी प्रथा शुरू की।

ह्रेनसांग के अनुसार मंत्रियों एवं केन्द्रीय कर्मचारियों को नकद वेतन नहीं बल्कि भूखण्ड दिए जाते थे और सैनिक पदाधिकारियों को नकद वेतन दिया जाता था।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि राज-भूमि को चार भागों में बांटा गया था। एक भाग राज्य कार्य चलाने के लिए था, दूसरा भाग मंत्रियों तथा अन्य राजकर्मचारियों को वेतन देने के लिए था। तीसरा भाग सुयोग्य व्यक्तियों को पुरस्कृत करने के लिए था। चौथा भाग धार्मिक सम्प्रदायों को दान देने के लिए था।

हर्ष वर्धन के बारे में जानकारी के स्रोत

मधुबन ताम्रपत्र अभिलेख (631 ई.) :- उत्तरप्रदेश के मऊ जिले की घोषी तहसील में स्थित है। इसमें हर्ष द्वारा श्रावस्ती भुक्ति के सोमकुण्डा नामक ग्राम दान देने का विवरण है।

बंसखेड़ा  ताम्रपत्र अभिलेख (628 ई.):-

उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में स्थित इस अभिलेख से हर्ष कालीन शासन के अनेक प्रदेशों व पदाधिकारियों के नाम, हर्ष की वंशावली व राज्यवर्धन की धोखे से हत्या आदि का विवरण है।

बसखेड़ एवं मधुवन लेखों में हर्ष की नौसेना का उल्लेख है।

भिटौरा मुद्राभाण्ड:-

फैजाबाद जिले के भिटौरा नामक स्थान से एक विशाल मुद्राभाण्ड प्राप्त हुआ है। जिसमें 9 मुद्राएँ प्रतापशील (प्रभाकर वर्धन) की, 284 मुद्राएँ शिलादित्य (हर्षवर्धन) की, 9 मौखरि नरेश ईशानवर्मा की, 6 सर्ववर्मा की तथा 17 अवन्ति वर्मा की हैं। ये सभी मुद्राएं चाँदी की हैं।

नालन्दा से मिट्टी की व सोनीपत से हर्षवर्धन के समय की ताँबे की मुद्राएं प्राप्त हुई हैं।

सोनीपत की मुद्रा पर शिव, पार्वती तथा नन्दी का अंकन है। नालन्दा की मुद्रा पर श्री हर्ष लिखा है तथा उसे माहेश्वर, सार्वभौम तथा महाराजाधिराज कहा गया है।

फर्रूखाबाद से हर्ष का स्वर्ण सिक्का प्राप्त हुआ है। इस पर परभट्टारक महाराजाधिराज श्रीहर्षदेव एवं नन्दी पर आसीन शिव पार्वती का अंकन हुआ है।

जालन्धर का राजा उदित हर्ष का समकालीन था। 9.हर्ष का टीला थानेश्वर में स्थित है

ह्वेनसांग (युवान- चुवांग)

ह्वेनसांग का जन्म 600 ई. के लगभग होनान प्रान्त के चिन-चिउ नामक स्थान पर हुआ।

उसके पिता का नाम चेन हुई था। 629 ई. में वह चीन से भारत के लिए रवाना हुआ था तथा वह सर्वप्रथम भारतीय राज्य कपिशा पहुँचा, बाद में वह हर्ष की राजधानी कन्नौज पहुँचा।

शुआन त्यांग, युवान चुआग, शुआन त्सांग आदि ह्वेनसांग के नाम हैं।

वह कामरूप के शासक भास्कर वर्मा के दरबार में भी गया। दक्षिण में ह्वेनसांग पल्लव नरेश नरसिंहवर्मा की राजधानी काँची में भी गया।

काँची से वह चालुक्य शासक पुलकेशिन के राज्य मो-हो-ल-च-अ (महाराष्ट्र) गया वह सिन्ध भी गया तथा उसने सिन्ध के शासक को शूद्र बताया है। ह्वेनसांग मालवा एवं वल्लभी भी गया।

ह्वेनसांग ने थानेश्वर में जयगुप्त नामक बौद्ध विद्वान से शिक्षा ग्रहण की।

उसने नालन्दा में भी शिक्षा प्राप्त की। इस समय आचार्य शीलभद्र नालन्दा विश्वविद्यालय के कुलपति थे।

ह्वेनसांग ने कन्नौज की धर्मसभा की अध्यक्षता की तथा 643 ई. में प्रयाग में हुई छठी महामोक्ष परिषद में भाग लिया। वह 644 ई. में भारत से चला गया।

ह्वेनसांग ने अपना यात्रा विवरण सि-यू की (पश्चिमी संसार का विवरण) में लिखा है। सि-यू- की का अंग्रेजी अनुवाद बील ने किया। 665 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसे तीर्थ यात्रियों का राजकुमार (Prince of Pilgrims) भी कहा जाता है।

चीनी सम्राट की आज्ञा न मिलने पर ह्वेनसांग गुप्त रूप से भारत आया था, किन्तु चीन वापस जाने पर उसे क्षमा कर दिया गया और चीनी सम्राट द्वारा सम्मानित किया।

ह्वेनसांग ने बंगाल में जैन धर्म को समृद्ध स्थिति में बताया।

ह्वेनसांग मलयपर्वत (मलकूट) के चन्दन की प्रशंसा करता है।

भारत के प्रत्येक प्रान्त में इतिहास लिखने के लिए इतिहासकार नियुक्त थे’ -ह्वेनसांग

इस ने वाराणसी में 100 फीट ऊँची शिव मूर्ति का उल्लेख किया है।

ह्वेनसांग के अनुसार मथुरा सूती वस्त्रों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था

ह्वेनसांग के समय बौद्ध धर्म 18 सम्प्रदायों में बँटा हुआ था।

त्रिपक्षीय संघर्ष

हर्ष की मृत्यु के कुछ समय पश्चात् कन्नौज के सिंहासन पर यशोवर्मन नामक शासक ने अधिकार कर लिया। वह कुशल शासक व विद्वान था। उसके दरबार में वापति नामक कवि ने प्राकृत भाषा में गोड़़वहो की रचना की।

यशोवर्मन ने 725 से 752 ई. तक शासन किया। उसके चीन के साथ राजनैतिक संबंध थे। यशोवर्मन ने 731 ई. में बुद्धसेन (पुटासिन) नामक अपने मंत्री को चीनी शासक हेन-शुंग के दरबार में भेजा था।

कश्मीर का शासन ललितादित्य उसका समकालीन था।

यशोवर्मन के दरबार में भवभूति नामक प्रसिद्ध नाटककार रहते थे। उन्होंने मालतीमाधव, उत्तररामचरित तथा महावीरचरित नामक तीन नाटक लिखे।

भवभूति का मालती माधव 10 अंकों का नाटक है। 6.भवभूति का उत्तररामचरित सात अंकों का नाटक है।

भवभूति का महावीर चरित सात अंकों का नाटक है। इसमें भगवान राम का जीवन है।

यशोवर्मन की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर तीन महाशक्तियों में संघर्ष हुआ जो त्रिपक्षीय संघर्ष कहलाता है। ये तीन शक्तियाँ थी:- गुर्जर प्रतिहार, पाल व दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट।

त्रिपक्षीय संघर्ष के समय कन्नौज पर शक्तिहीन आयुध शासकों का शासन था। त्रिपक्षीय संघर्ष आठवीं शताब्दी के अन्त से शुरू होकर लगभग 150/ वर्षों तक अनेक चरणों में चला।त्रिपक्षीय संघर्ष में अन्ततोगत्वा गुर्जर प्रतिहारों की ही विजय रही। मिहिरभोज ने कन्नौज को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

त्रिपक्षीय संघर्ष का प्रथम चरण वत्सराज, ध्रुव प्रथम व धर्मपाल के बीच हुआ।

गुर्जर-प्रतिहार पाल राष्ट्रकूट

गुर्जर-प्रतिहार पाल राष्ट्रकूट
वत्सराज (783-800 ई़) धर्मपाल (770-810 ई़) ध्रुव प्रथम (780-793ई़ )
नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई़ ) देवपाल (810-850)ई़ गोविंद तृतीय (793-814ई़ )
मिहिरभोज (836-885 ई़ ) विग्रहपाल (850-854ई़ ) अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई़ )
महेन्द्रपाल प्रथम (885-910 ई़) नारायण पाल (854-915ई़ ) कृष्ण द्वितीय (878-915 ई़)
महीपाल प्रथम (912-943 ई़) धर्मपाल (770 इन्द्र तृतीय (915-922ई़ )

वत्सराज ने कन्नौज के इन्द्रायुध को पराजित कर दिया तथा पाल नरेश धर्मपाल को भी हराया लेकिन राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव प्रथम ने हस्तक्षेप करके वत्सराज को पराजित किया।

  • राष्ट्रकूट पहली दक्षिण भारतीय शक्ति थी जिसने उत्तर की राजनीति में सक्रिय भाग लिया।
  • चक्रायुध व इन्द्रायुध आयुध वंश के दो भाई थे। धर्मपाल ने चक्रायुध का तथा वत्सराज ने इन्द्रायुध का पक्ष लिया।
  • वाणी डिन्डोरी, राधनपुर व अमोघवर्ष प्रथम के संजन ताम्रपत्र त्रिपक्षीय संघर्ष के बारे में जानकारी मिलती है।
  • ग्वालियर अभिलेख से धर्मपाल की नागभट्ट द्वितीय द्वारा पराजय की जानकारी मिलती है।

गुप्तोत्तर कालीन समाज

शिल्पियों व श्रेणियों के जातियों में परिवर्तित होने से तथा प्रतिलोम विवाह के कारण गुप्तोत्तर काल में जातियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। वैजयंती ने 64 वर्ण संकर जातियों की सबसे लम्बी सूची दी है, जबकि राजतरंगिणी में 64 उपजातियों का वर्णन है।

राजनैतिक अव्यवस्था व आर्थिक कारणों से ब्राह्मणों ने अन्य व्यवसाय भी अपनाये।

मेधातिथि के अनुसार विषम परिस्थितियों में ब्राह्मण शस्त्र ग्रहण का सकता है तथा वेदज्ञ ब्राह्मण को सेनापति व राजपद ग्रहण करने की अनुमति दी।

पाराशर स्मृति में कृषि ब्राह्मण के लिए सामान्य व्यवसाय है। बशर्ते ब्राह्मण स्वयं खेती ना करें।

प्रतिहारों के पेहोवा अभिलेख में ब्राह्मण घोड़े व्यापारी का उल्लेख है। चालुक्य कुमारपाल के लेख में ब्राह्मण खेतिहरों के नाम मिलते है मध्यप्रदेश व प्राच्य के ब्राह्मण स्वयं अपने हाथों से खेती करते थे। ह्वेनसांग ने टक्क (पंजाब) देश के ब्राह्मणों को स्वयं खेती करते देखा

  • ब्रह्म क्षत्रिय– वह ब्राह्मण जो क्षत्रिय कर्म अपना लेता है।
  • क्षेत्र ब्राह्मण– वह जो युद्ध करके जीविका चलाता है।
  • सत् क्षत्रिय– क्षत्रियों से उच्चतम स्तर का दावा करने वाला।
  • वैश्य ब्राह्मण– वार्ता (कृषि, पशुपालन व व्यापार) से जीविका चलाने वाला।
  • निषाद ब्राह्मण– चोरी डकैती करने वाला ब्राह्मण।
  • शूद्र ब्राह्मण– लाख, नमक, दूध, शहद, घी आदि का व्यवसाय करने वाला।

ब्राह्मण को मृत्युदण्ड से छूट थी ब्राह्मण के लिए सबसे कठोर दण्ड देश निकाला था। ह्वेनसांग ने भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है।

मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि के अनुसार राजा शब्द अश्वत्रिय के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है बशर्ते वह राज्य का स्वामी हो।

राजपूतों का अभ्युदय इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी। राजपूतों ने क्षत्रियों का स्थान ले लिया। 12वीं शताब्दी तक राजपूतों की 36 जातियाँ प्रसिद्ध हो गई।

15. इब्न खुर्दाद्ब ने क्षत्रियों के दो वर्गों का उल्लेख किया है:-

  1. सबूकफूरिया
  2. कतारिया।

ह्वेनसांग ने मणिपुर व सिंध देश के राजा को शूद्र कहा है।

इस काल में वैश्यों की स्थिति में गिरावट आई। मनुस्मृति व बौधायन धर्म सूत्र में वैश्यों को सर्वप्रथम शूद्रों के समकक्ष माना गया।

अलबरूनी ने वैश्यों व शूद्रों में कोई अन्तर नहीं पाया है। उसके अनुसार दोनों को ही वेदों के अध्ययन व श्रवण की अनुमति नहीं थी। अतः कृषक के रूप में शूद्रों का रूपान्तरण और वैश्यों का शूद्र के स्तर तक की गिरावट से वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन हुआ।

ह्वेनसांग ने शूद्रों का कृषक के रूप में उल्लेख किया है।

शूद्रों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

उदयन व तेजपाल जैसे धनी व्यापारी थे।

पूर्व मध्यकाल में वैश्यों ने वैष्णव व जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया।

पाराशर ने कुसीद वृति (ब्याज पर रूपये उधार देना) वैश्य का व्यवसाय बताया है।

बिहार के आठवीं शताब्दी के दूधपाणि अभिलेख से ज्ञात होता है कि उदयभान नामक समृद्ध व्यापारी ने तीन गाँवों के लोगों की ओर से राजकीय कर दिया।

व्यास, पाराशर व वैजयंती ने कुटुम्बी नामक कृषक वर्ग का उल्लेख किया है। कुटुम्बी स्वतंत्र किसान होते थे।

गुप्तकाल में कुटुम्बिन का अभिप्राय शूद्र कृषक वर्ग से था, किन्तु गुप्तोत्तर काल में इनकी स्थिति स्वतन्त्र किसानों की हो गई और यह भूमि के स्वामी हो गये।

त्यधसीरिन या सीरिन वे किसान थे जो बंटाई पर कार्य करते थे।

देवल व पाराशर ने शुद्र के लिए सेवा के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन, वाणिज्य व शिल्प उपयुक्त व्यवसाय बताये हैं।

मेघातिथि के अनुसार नारद स्मृति के टीकाकार असहाय ने कीनाश वर्ग को शूद्र बताया है।

शूद्रों को दो वर्गों में बांटा गया। सत् शूद्र व असत् शूद्र।

सत शूद्रों को संस्कार, पंचमहायज्ञ आदि करने का अधिकार दिया गया।

इस युग में खान-पान संबंधी नियमों के कट्टरता आयी।

अस्पृश्य जातियों की संख्या व अस्पृश्यता में वृद्धि हुयी।

इस युग में दासों की स्थिति में भी सुधार हुआ एवं वे कृषि दास बन गये।

पूर्व मध्यकाल में दास प्रथा में वृद्धि हुई। विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा में नारद द्वारा कथित 15 प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है।

लेख पद्धति से राजस्थान व गुजरात में प्रचलित दास प्रथा की जानकारी मिलती है।

समाज में तंत्रवाद के प्रसार से भी शूद्रों की स्थिति में सुधार हुआ क्योंकि इसमें शुद्र व स्त्री भी शामिल हो सकते थे।

कायस्थों का एक जाति के रूप में उदय इस काल में हुआ। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में किया गया है तथा एक जाति के रूप में कायस्थों का उल्लेख औशनम स्मृति में मिलता है।

भूराजस्व, भू-अनुदान एवं हिसाब-किताब संबंधी कार्यों में वृद्धि के कारण कायस्थों की संख्या में वृद्धि हुई।

न्यायालयों में निर्णय लिखने का काम करणिक करते थे।

कल्हण के अनुसार प्रजा कायस्थों के अत्याचार से पीड़ित थी।

क्षेमेन्द्र के अनुसार कायस्थों के उदय से ब्राह्मणों के अधिकारों पर आघात पहुँचा। कायस्थों ने ब्राह्मणों के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। अतः कायस्थों को ब्राह्मणों का कोपभाजन बनना पड़ा।

महिलाओं की स्थिति:-

स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई व बाल विवाह की प्रथा में तेजी आई।बाल विवाह से स्त्री शिक्षा पर असर पड़ा।

सती प्रथा अत्यधिक प्रचलित हो गई। अंगिरा, हारीत आदि पूर्व मध्यकालीन स्मृतियों तथा अपराकं, विज्ञानेश्वर आदि निबंधकारों ने सती प्रथा की प्रशंसा की।

मेधातिथि ने सती प्रथा को आत्महत्या कह कर इसकी आलोचना की है।

बाणभट्ट व देवण्णभट्ट ने भी सती प्रथा की निन्दा की है।

पूर्व काल में सती प्रथा को बढ़ावा इसलिए मिला क्योंकि सामन्तों व राजाओं द्वारा अधिक संख्या में पत्नियाँ व स्त्रियाँ रखने के कारण संपत्ति विषयक विवादों को बढ़ावा मिला। विधवा विवाह निषेध था। अतः संपत्ति के विवादों से बचने व विधवा के दण्डनीय जीवन से मुक्ति का समाधान पति के साथ सती होने में दिखाई दिया।

पूर्व मध्यकाल में महिलाओं के संपत्ति संबंधी अधिकारों में वृद्धि हुई।

इसका कारण यह था कि सामंती समाज के विकास के कारण निजी संपत्ति की अवधारणा को बल मिला।

वैजयन्ती में सच्चरित्र महिला को परिवृक्ति, युद्ध में जीती हुई स्त्री को कालफॉल, उपपत्नी को अवरोध वधू तथा चंचल स्त्रियों को विलासिनी कहा है।

आर्थिक दशा

कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था।

अग्निपुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिए सिंचाई के साधन जुटाना राजा के प्रमुख आठ कर्तव्यों में से है।

बंधुआ मजदूरी का सबसे पहला उल्लेख भागवत पुराण (8वीं सदी) में मिलता है।

राजतरंगिणी में खूया नामक इंजीनियर का उल्लेख है जिसने झेलम नदी पर बांध बनाकर नहर निकलवाई।

चंदेल राजाओं ने राहिल्यसागर और कीरतसागर नामक जलाशय बनाये।भोज परमार ने भोजसागर बनवाया।

सिंचाई रहट से होती थीं संस्कृत ग्रंथों में अरघट्ट का उल्लेख है।इसको खींचने वाले को अरघट्टीयनर कहा जाता है।

बाणभट्ट के हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुलायंत्र (जल पंप) का उल्लेख मिलता है।

हेनसांग के अनुसार हर्ष के समय खेतों में सिंचाई के लिए ‘घंटी यन्त्र’ तथा उद्घघटि का प्रयोग किया जाता था।

बंजर भूमि को इरिण कहा जाता है।

व्यापार :-

सामन्तवाद के कारण बंद व स्थानीय अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। ग्राम आत्मनिर्भर थे अतः व्यापार वाणिज्य में गिरावट आई।

मालवा गन्ना, नील व अफीम के लिए, मगध व कलिंग धान के लिए प्रसिद्ध थे।

गुजरात सूती कपड़े व नील के लिए प्रसिद्ध था।

उज्जैन व कन्नौज (कान्यकुब्ज) इस समय के समद्ध नगर थे।

बंगाल मलमल, पान, सुपारी तथा सण के लिए प्रसिद्ध था।

पूर्वी तट के बन्दरगाह :-

ताम्रलिप्ति, सप्तग्राम, पुरी, कलिंग व शिकाकोस। इस काल में ताम्रलिप्ति के स्थान पर सप्तग्राम का महत्त्व बढ़ा।

पश्चिमी तट के बन्दरगाह :-

देवल, थाना, खंभात, भडौ़ंच तथा सोमनाथ सोना, ताँबा, टिन, मसाले, मूंगा तथा घोड़े आयात किये जाते थे।

कुवलयमाला में उत्तर दिशा व दक्षिण के व्यापारियों का एक स्थान पर मिलने का उल्लेख है।

चोर व डाकुओं के कारण मार्ग सुरक्षित नहीं थे। ह्वेनसांग को भी दो बार लूटेरों ने लूट लिया।

नदियों द्वारा व्यापार अधिक सुरक्षित समझा जाता था।

तरशुल्क राज्य की आय का महत्त्वपूर्ण साधन था।

तर शुल्क लेने वाले अधिकारी को पाल अभिलेखों में तरिक कहा जाता था।

अरब आक्रमण के कारण पश्चिम से व्यापार में गिरावट आई।

अरब साम्राज्य के विस्तार के कारण समुद्री व्यापार पर अरबों का व्यापार बढ़ा।

चीनियों द्वारा बड़े जहाजों के निर्माण से समुद्री व्यापार में चीन का प्रभाव बढ़ा।

राजेन्द्र चोल द्वारा दक्षिण पूर्व एशिया में विजय के कारण दक्षिण भारत का दक्षिण पूर्व एशिया व चीन से व्यापार बढ़ा।

दसवीं शताब्दी के बाद पश्चिमी देशों से भी व्यापार में वृद्धि हुई।

गहड़वाल शासकों ने मुस्लिम व्यापारियों पर ‘तुरूष्क दण्ड’ नामक कर लगाया।

उद्योग :-

पूर्व मध्यकाल की स्मृतियों में शिल्प और उद्योग शूद्र के लिए आवश्यक व्यवसाय माने गये।

वस्त्र उद्योग विकसित अवस्था में था।

मानसोल्लास के अनुसार 12वीं शताब्दी में मुल्तान, अन्हिलवाड़ व कलिंग वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र थे।

अपरान्त, मालवा, काशी, बंगाल व मदुरा भी वस्त्र उद्योग के केन्द्र थे।

भडौंच के बने कपड़े वरोज के नाम से विख्यात थे। 4.खंभात के बने कपड़े खंबायात के नाम से जाने जाते है।

ह्वेनसांग ने कश्मीर के सफेद लिनन का उल्लेख किया है।

ह्वेनसांग ने अनेक प्रकार के रेशमी व सूती वस्त्रों का उल्लेख किया है जैसे कौशेय तथा क्षौम शण के रेशों से बना कपड़ा होता है।

पौधों के रेशों से बना हुआ कपड़ा दुकूल कहलाता है।

बाण ने हर्षचरित में रेशम के बने अनेक वस्त्रों का उल्लेख किया है। जैसे लालातुज, अशुक, चीनांशुक आदि।

शांतिदेव के शिक्षा समुच्चय (7वीं शताब्दी) से ज्ञात होता है कि वाराणसी श्रेष्ठ रेशम के लिए प्रसिद्ध था।

कामरूप (असम) का चित्रपट्ट व जातिपट्ट (रेशम का कपड़ा) प्रसिद्ध वस्त्र थे।

अरब यात्री सुलेमान ने बंगाल की मलमल के बारे में लिखा है कि यह इतनी महीन होती है कि अंगूठी के बीच से पूरा थान निकल जाये।

इब्न हौकल के अनुसार सिन्ध का देवल नगर तलवारों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।

श्रेणी संगठन :-

शिल्प व उद्योग श्रेणियों में संगठित होते थे। श्रेणी एक ही व्यवसाय करने वाले लोगों का संगठन होता था। वे अनेक स्थानों के लोग भी हो सकते थे बशर्ते वे एक ही व्यवसाय करने वाले लोग हो।

श्रेणी का मुखिया महत्तक या माहर कहलाता था।

इन श्रेणियों की कार्य समिति को कार्यचिंतक कहा गया है।

पूर्व मध्यकाल में सिक्के का प्रयोग कम हो गया।

विदेशी व्यापार में गिरावट एवं सामंती व्यवस्था में राज्य कर्मचारियों को वेतन के स्थान पर भूमिदान दिये जाने के कारण सिक्कों की आवश्यकता कम हो गई।

शुद्ध सिक्के तो बहुत ही कम मिले है।

  • साधारण लेन-देन कौड़ियों के माध्यम से होता था जिन्हें प्रतिहार अभिलेखों में कपर्दक कहा गया है।

धर्म

गुप्तोत्तर काल में तांत्रिक धर्म का उदय हुआ। महायान बौद्ध धर्म विकृत होकर मंत्रयान, वज्रयान व सहजयान जैसे तंत्र सम्प्रदायों का आधार बन गया। पाल राजाओं के काल में सहजयान का विकास हुआ। सहजयान का मार्ग योग क्रिया का है।

  • ह्वेनसांग ने कपिलवस्तु, कुशीनगर व श्रावस्ती को उजड़ा हुआ पाया।
  • तंत्रवाद ने बौद्ध धर्म व हिन्दू धर्म (शैव मत) के बीच अंतर को समाप्त कर दिया।

शैव धर्म:-

शैव धर्म में भी कापालिक, कालामुख जैसे अघोरी संप्रदाय विकसित हुए।

उज्जैन शैव धर्म का गढ़ था।

नाथ व कौल मार्ग जैसे तन्त्र सम्प्रदाय विकसित हुए।

उज्जैन स्थित महाकाल का मंदिर संपूर्ण देश में प्रसिद्ध था।

शक्ति की पूजा भी इस युग में अत्यधिक लोकप्रिय हुई। मध्यप्रदेश व उड़ीसा में 64 योगिनियों के मंदिर हैं।

दुर्गा पूजा शुरू करने का श्रेय मार्कण्डेय पुराण को है।

बुद्ध व जिन को विष्णु का अवतार माना जाने लगा।

प्रतिहार नरेश मिहिरभोज ने आदिवराह की उपाधि धारण की और इसी शैली के सिक्के जारी किये।

शैव धर्म भी इस काल में लोकप्रिय हुआ।

परमार नरेश शैल मतानुयायी थे।भोज परमार ने शैव धर्म पर ‘तत्व परीक्षा लिखी।

पाल, सेन व चंदेल राजाओं के अभिलेख ओम नमः शिवाय को प्रार्थना से शुरू होते है।

दक्षिण भारत के शैव अनुयायियों को नयनार कहा जाता था। इनकी संख्या 63 थी।

नयनारों के प्रमुख संत अप्पार, नान सबंदर और सुन्दरमूर्ति थे।

दक्षिण भारत (कर्नाटक) में लिंगायत या वीरशैव मत भी प्रसिद्ध हुआ।

वैष्णव धर्म:-

अलवार संतों ने दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार किया। इसका प्रमुख क्षेत्र तमिल प्रदेश था।

अलवार संतों की संख्या 12 थी, जिनमें प्रमुख हैं- तिरूमंगाई, पेरिय अलवार, अण्डाल, नाम्पालवार, मधुरकवि, कुलशेखर (पाण्ड्य राजा), तिरूप्यान, भूतयोगी, महायोगी, सरोयोगी आदि।

  • तिरूमंगाई वेल्लाल जाति (शूद्र) का था।
  • अलवार वैष्णव धर्म भावनात्मक है, दार्शनिक नहीं।

सूर्य पूजा-

आदित्य सेन व जीवित गुप्त के शाहपुर और देवबर्नाक अभिलेख में सूर्य पूजा का उल्लेख है।

मोढेरा (गुजरात) का सूर्य मंदिर भी प्रसिद्ध है।

मन्दसौर, मूलस्थान (गुजरात) तथा माडास्यात (बुलन्दशहर) में सूर्य मन्दिर बने थे।

ललितादित्य ने कश्मीर में सूर्य का प्रसिद्ध मार्तण्ड मंदिर बनवाया।

मुल्तान के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का उल्लेख ह्वेनसांग, अबूजईद, अलमसूदी तथा अलबरूनी ने किया है।

मुल्तान सूर्य पूजा का प्रसिद्ध केन्द्र था

बंगाल के सेन शासक विश्वरूप सेन तथा केशव सेन ने सूर्योपासक होने के कारण परमसौर की उपाधि ग्रहण की।

दक्षिण के कदम्ब, गंग, होयसल, राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी चालुक्यों ने तथा गुजरात के चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया।

राजस्थान व मालवा में भी जैन धर्म को प्रश्रय मिला।

भाषा एवं साहित्य

आठवीं शताब्दी के एक जैन ग्रंथ कुवलयमाला में 18 प्रमुख राष्ट्रों तथा 16 प्रकार के लोगों की नृवंशात्मक विशिष्टताओं का वर्णन है।

  • पूर्व मध्यकाल भाषा की दृष्टि से क्षेत्रीयता के चिह्न प्रस्तुत करता है।
  • संस्कृत के प्रयोग में क्लिष्टता एवं कृत्रिमता आती जा रही थी।
  • अपभ्रंश का विकास आद्य हिन्दी, आद्य बंगाली, आद्य गुजराती, आद्य राजस्थानी व आद्य मराठी में हो रहा था।
  • क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ क्षेत्रीय लिपियों का भी विकास हुआ।
  • सिद्धमात्रका इस काल में विकसित हुई लिपि थी। हर्षचरित के टीकाकार शंकर थे।

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वर्धन वंश FAQ

Q 1 वर्धन वंश का संस्थापक कौन था?

Ans – वर्धन वंश का संस्थापक पुष्यभूति वर्धन था।

Q 2 हर्षवर्धन कौन से वंश के राजा थे?

Ans – वह वर्धन राजवंश के शासक प्रभाकरवर्धन का पुत्र था।

Q 3 वर्धन वंश का सबसे प्रतापी शासक कौन था?

Ans – गुप्त वंश के पतन के पश्चात छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास ‘पुष्यभूति’ नामक शासक ने ‘वर्द्धन या वर्धन वंश’ की स्थपना की थी। वर्द्धन या वर्धन वंश को ‘पुष्यभूति वंश’ भी कहा जाता है। इसकी राजधानी थानेश्वर थी। इस वंश का सबसे महान और ख्याति प्राप्त राजा हर्षवर्धन था।

Q 4 वर्धन वंश के बाद कौन सा वंश आया था?

Ans – पुष्यभूति वंश की स्थापना छठी शताब्दी ई. में गुप्त वंश के पतन के बाद हरियाणा के अम्बाला ज़िले के थानेश्वर नामक स्थान पर हुई थी। इस वंश का संस्थापक ‘पुष्यभूति’ को माना जाता है, जो कि शिव का उपासक और उनका परम भक्त था। इस वंश में तीन राजा हुए- प्रभाकरवर्धन और उसके दो पुत्र राज्यवर्धन तथा हर्षवर्धन।

Q 5 हर्षवर्धन की राजधानी कहाँ थी?

Ans हर्षवर्धन की राजधानी कन्नौज.

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